नमस्कार,
मैं अंतरात्मा बोल रही हूं. लोगों का मानना है कि मैं हर एक के अंदर होती हूं. अक्सर सोई हुई. ठीक वैसे, जैसे ज्वालामुखी के अंदर पड़ा लावा. अक्सर दिखाई नहीं देती. कई बार आदमी ज़िंदगी पूरी करके मर जाता है, लेकिन मैं नहीं जागती. लोग हैरान होते रहते हैं कि मैं उसके अंदर कभी थी भी या नहीं! हिटलर का ही उदाहरण ले लीजिए. पट्ठे ने भनक न लगने दी कि मेरा उसके अंदर वजूद कभी था या नहीं. लेकिन कई बार मैं होती भी हूं और रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर केस में जागती भी हूं. भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मेरा ट्रैक रिकॉर्ड ठीक-ठाक है. मैं कई बार बड़े नाज़ुक मौकों पर जागी हूं.
नीतीश को ही ले लीजिए. मैं अचानक से उनके अंदर जाग गई और पूरे भारत की नींद उड़ गई. वो कल भी सीएम थे, आज भी सीएम हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब उनके अंदर मेरा जागा हुआ स्वरूप विराजमान है. एकाध दिन में फिर सो जाऊंगी मैं. ज़्यादा जागना मेरी सेहत पर नागवार गुज़रता है. जिसके अंदर मैं जागती हूं, वो बंदा ही अफोर्ड नहीं कर सकता मेरा ज़्यादा समय तक जागे रहना. ज़रा नीतीश जी की दूसरी पारी सही ढंग से शुरू हो जाए, जारी बवंडर की धूल थोड़ी बैठ जाए तो मैं चादर तान कर सो जाऊं.
तब तक आपको कुछ किस्से सुनाती हूं. वो किस्से, जब मैं बिना किसी नोटिस के जाग पड़ी थी. कई बार तो ऐसा हुआ कि मेरा जागने का इरादा तक नहीं था, लेकिन जटिल राजनीतिक समीकरणों के चलते मुझे जागना पड़ा. मैं समय की तरह सर्वव्यापी हूं. कभी भी, कहीं भी जाग सकती हूं.
सोनिया गांधी के अंदर मैं
2004 का मई महीना था. दिल्ली में आम और राजनीतिक दोनों तरह का तापमान गर्म था. आज जिनका अश्वमेध का घोड़ा विश्वविजय करता फिर रहा है, वो भाजपा उस वक़्त पराजितों की कतार में थी.
‘फील गुड फैक्टर’ और
‘इंडिया शाइनिंग’ की हवा जनता ने निकाल दी थी. भारत को दूसरी महिला प्रधानमंत्री मिलने ही वाली थी. लेकिन तभी...
तभी मैं जाग गई. मेरी कतई मर्ज़ी नहीं थी जागने की, फिर भी जागना पड़ा. बताओ कोई समय था वो जागने का! सब कुछ इतना अच्छा-अच्छा चल रहा था. मुझे नींद से बेदार होने की कतई ज़रूरत नहीं थी. फिर भी मैं जागी. सोनिया जी के अंदर. और सोनिया गांधी से ऐलान करवा दिया कि वो प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी. उन्होंने ऑन कैमरा कहा कि वो अंतरात्मा की यानी मेरी आवाज़ को सुनकर इस पद को ठुकरा रही हैं.

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कुछ जलकुकड़े लोग बाद में ये कहते रहे कि सोनिया गांधी अगर अंतरात्मा को नहीं जगातीं, तो सरकार बनती ही नहीं. गठबंधन के कुछ सहयोगी सोनिया गांधी के नाम पर सहमति दिखाने में आनाकानी कर रहे थे. इसी को काउंटर करने के लिए सोनिया ने वो दांव चला था. अंतरात्मा वाली बात महज़ स्टंट होने का दावा किया ऐसे लोगों ने. बताओ तो! ज़रूर इन आलोचकों में कोई अंतरात्मा नहीं होती होगी.
अरविंद केजरीवाल से जब ‘मिली हुई थी’ मैं
2013 के दिसंबर में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस को 15 सालों बाद गद्दी से उतारा. 8 सीटों पर ला छोड़ा. बड़ी पार्टी भाजपा होने के बावजूद सरकार बना ली. उसी कांग्रेस के समर्थन से. लेकिन इस निकाह के पहले ही दिन से तलाक के हालात साफ़ दिखने लगे थे. जनलोकपाल बिल को लेकर माहौल गरमा गया. केजरीवाल बोले कि वो तो लाना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस साथ नहीं दे रही. तब शायद पहली बार केजरीवाल जी ने अपनी फेमस पंचलाइन बोली थी. कहा था
ये दोनों पार्टियां मिली हुई हैं.इसके फ़ौरन बाद मुझे जगाया और इस्तीफा दे दिया.

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मेरे उस घड़ी जागने का फायदा अरविंद केजरीवाल को तब हुआ, जब दोबारा चुनाव हुए. पब्लिक ने वोट बरसा दिए उनकी पार्टी पर. इस बार कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा तक को दिल्ली से गायब कर दिया उन्होंने. हां, लेकिन उस दिन के बाद मैं उनके अंदर सो गई. देखो, फिर कब जगाते हैं.
नवजोत सिंह सिद्धू, सिर्फ जागी ही नहीं, अट्टहास भी किया मैंने
ये जनाब राजनीति को भी क्रिकेट का मैदान समझ अंधाधुंध बल्ला भांजने में यकीन रखते हैं. बरसों भाजपा की तरफ से बैटिंग करने के बाद सरदार जी ने पाला बदल लिया. उसमें भी भतेरे स्टंट किए. अंतरात्मा को, यानी मुझे, जगा तो लिया, लेकिन आख़िरी समय तक मुझे भी अंधेरे में रखा. मुझे कतई आईडिया नहीं था कि जागकर मैंने क्या कर लिया है? सिद्धू जी आम आदमी पार्टी की उम्मीदें बढ़ाते रहे और अंतिम समय में कांग्रेस से जा मिले. ज़ाहिर सी बात है इसका बिल उन्होंने मेरे नाम ही फाड़ा. अंतरात्मा के नाम पर सब जायज़ हो गया.

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कांग्रेस में लौटकर उसे अपनी घरवापसी बताना और खुद को पैदाइशी कांग्रेसी घोषित करना मेरे नाम पर किया गया सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा था. लेकिन मैं बेबस कर भी क्या सकती थी! मेरे हाथ में सिर्फ मुश्किल घड़ी में जागना है. उसके बाद की चीज़ें तो बंदा ही डिक्टेट करता है.
रामविलास पासवान, हर कश्ती का मुसाफिर
भारतीय राजनीति में अगर सबसे ज़्यादा किसी ने मुझे जगाया है, तो वो यही महाशय हैं. इनकी खासियत है कि ये हर नाज़ुक मौके पर मेरे नाम से मलाई काटने में कामयाब रहे हैं. ‘गंगा गए गंगादास, जमना गए जमनादास’ वाली कहावत इनसे ज़्यादा किसी पर फिट नहीं बैठती. यूपीए और एनडीए दोनों ही सरकारों में ठसक के साथ मंत्री रह चुके हैं. पहले अटल सरकार में मंत्री थे, फिर मनमोहन सरकार में हुए, अब मोदी सरकार में भी हैं. कुल जमा 5 प्रधानमंत्रियों के शासन में मंत्रीपद को सुशोभित कर चुके हैं. लोग इन्हें अवसरवादी कहते हैं, लेकिन ये उनकी नादानी है. सारा खेला मेरा नाम पर चलता है.

इनका फंडा सिंपल है. इनकी अंतरात्मा, यानी फिर से मैं, मुनाफे के सौदे को ध्यान में रखते हुए जागती है. मजाल है जो आज तक बंदे ने डूबते जहाज़ में पैर धरा हो. जिसका सिक्का चल रहा हो, जिसका सूरज चढ़ रहा हो, उस तरफ हो जाना इनकी यूएसपी है. ब्लेम मेरे हिस्से आता है हमेशा ही.
शाजिया इल्मी, जिनको कोई दीवाना नहीं कहता
‘आम आदमी पार्टी’ जब बन रही थी, तब उनके शुरुआती चेहरों में ये चेहरा काफी अहम था. कुमार विश्वास के साथ-साथ, शाजिया इल्मी की भी अपनी फैन फॉलोइंग थी. लेकिन वक़्त एक सा न रहा. कुछ अपने बड़बोलेपन से और कुछ आम आदमी पार्टी के स्ट्रक्चर में तेज़ी से आए बदलाव ने उनको उतना प्रासंगिक नहीं रखा. तब मैं जागी. आई मीन ऐसा उन्होंने बताया कि मैं जागी.

उन्होंने उसी पार्टी का दामन थाम लिया, जिसके खिलाफ़ बोलते-बोलते उनकी राजनीति शुरू हुई थी. अचानक से उन्हें भाजपा का नेतृत्व एक स्ट्रॉंग लीडरशीप लगने लगी. उन्होंने कहा कि भाजपा ने स्वच्छ भारत कैम्पेन में जो गांधी जी को मैस्कॉट बनाया, उससे उनकी आंखें खुल गई. इस बात को सुन के और भी कई लोगों की खुल गई, लेकिन वो किस्सा फिर कभी.
उदाहरण अभी और भी हैं. ढेर सारे हैं. इतने कि नीतीश 16वीं बार सीएम बन जाएंगे, लेकिन किस्से ख़त्म नहीं होंगे. किरण बेदी से लेकर विनोद कुमार बिन्नी तक, अरविंदर सिंह लवली से लेकर संजय निरुपम तक न जाने कितने ही लोग हैं, जिनका दावा है कि वो मेरी आवाज़ सुनते हैं.
मैं क्या हूं! मैं सहूलियत हूं. मैं वो चोर गली हूं, जिससे गुज़रकर सवालों की बौछार को डक किया जा सकता है. मैं वो कील हूं, जिसके सहारे मनमानी से लिए गए फैसले लटकाए जाते हैं. मैं हमेशा से ‘सरहद पर खड़ा जवान’ हूं, जिसके ज़िक्र के बाद हर आर्गुमेंट खतम हो जाता है.
मुझे इंतज़ार है उस दिन का, जब इस देश की सम्मिलित अंतरात्मा के रूप में मैं जागूं. जब तक ये नहीं हो जाता, अवसरवादी राजनेताओं के लिए एक कारगर टूल से ज़्यादा मेरी कोई हैसियत नहीं. मैं वो उदात्त भावना हूं, जो गलत जगह मौजूद रहने के लिए अभिशप्त है.
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