गणतंत्र दिवस की परेड. हम सभी ने बचपन में ये निबंध लिखा है. और हम में से कई कम से कम एक बार ये परेड अपनी आंखों से देखना चाहते हैं. मतलब आमने सामने. टीवी या फोन पर नहीं. अब जिन लोगों ने ये परेड अटेंड की है, वो आपको बताएंगे कि मार्चिंग कंटिंजेंट देखना का मज़ा एक तरफ, वायुसेना की फ्लाइपास्ट देखने का मज़ा दूसरी तरफ. हर विमान के साथ फ्लाइ पास्ट में अड्रेनालिन रश बढ़ता जाता है. और उसका चरम आता है शो स्टॉपर के साथ - जब वायुसेना के जेट आसमान में त्रिशूल बनाते हैं और उसके ठीक बाद एक फाइटर जेट सीधा आते-आते अचानक 90 डिग्री के कोण पर आसामान में घुस जाता है. इस करतब को कहते हैं वर्टिकल चार्ली. पिछले कुछ सालों से वर्टिकल चार्ली करता था इंडियन एयरफोर्स की बैकबोन कहलाने वाला सुखोई 30 एमकेआई. लेकिन इस बार शो स्टॉपर बना नया नवेला रफाल.
रफाल ने आसमान को 90 डिग्री पर चीरने वाला करतब कैसे किया?
पहले वर्टिकल चार्ली करता था सुखोई 30 एमकेआई, अब शो स्टॉपर बना रफाल.


अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर तैनात रफाल नं 17 स्कॉड्रन माने गोल्डन एरोज़ का हिस्सा हैं. 10 सितंबर 2020 को पहले पांच रफाल विमान आधिकारिक रूप से भारतीय वायुसेना में शामिल किए गए. तो ये रफाल की पहली गणतंत्र परेड है. वर्टिकल चार्ली देखने में बड़ा साधारण करतब है. जहाज़ एक लो पास शुरू करता है. माने ज़मीन से बहुत कम ऊंचाई पर उड़ता है. इसके बाद बड़ी तेज़ी से अपनी नोक आसमान की तरफ उठा लेता है. जहाज़ 90 डिग्री के कोण पर आसामान को भेदने लगता है. साथ में गोल गोल चक्कर भी काटता है. काफी ऊपर जाने के बाद जहाज़ सीधा होता है. या नीचे आता है.
IAF एयरक्राफ्ट राजपथ पर रिहर्सल करते हुए. (PTI)आप सोच सकते हैं कि फाइटर जेट में तो इतनी ताकत होती है, फिर वो वर्टिकल चार्ली कर ले, इसमें इतनी बड़ी बात क्या है. अब हम एयरोस्पेस इंजीनियर नहीं हैं. लेकिन कुछ बेसिक बातें आपको बता सकते हैं. कोई भी हवाई जहाज़ हवा में रह पाता है क्योंकि उसके पंख लिफ्ट पैदा करते हैं. फाइटर जेट के विंग्स या किसी भी प्लेन के विंग्स इस तरह बनाए जाते हैं कि उनके ऊपर हवा तेज़ी से बहे और नीचे धीरे. इससे विंग्स के नीचे हवा का प्रेशर ज़्यादा हो जाता है. और यही बढ़ा हुआ प्रेशर हवाई जहाज़ को ऊपर ले जाता है. माने लिफ्ट पैदा करता है.
अब ये समझने वाली बात है कि अगर हवाई जहाज़ 90 डिग्री के कोण पर ऊपर जाएगा तो विंग्स लिफ्ट पैदा नहीं कर पाएंगे. ऐसे में फाइटर जेट को सिर्फ उसके इंजन्स का थ्रस्ट ऊपर ले जा सकता है. माने जो गैस उसके इंजन से बाहर निकल रही है, उसी का सहारा है. इसके अलावा एक और चीज़ है. गणतंत्र दिवस में सुखोई जब वर्टिकल चार्ली के लिए आता है तो उसकी रफ्तार तकरीबन 900 किलोमीटर प्रति घंटा होती है. ऐसे में अचानक उसे ऊपर ले जाने से जहाज़ पर बहुत दबाव पड़ता है. अगर प्लेन मज़बूत नहीं हुआ तो वो बिखर भी सकता है. इसीलिए सिविलियन एयरक्राफ्ट्स अमूमन करतब नहीं दिखाते. मिलिट्री एयरक्राफ्ट्स भी वही करतब दिखाते हैं, जो उनके डिज़ाइन लिमिट्स के अंदर आते हों.
जब एयरक्राफ्ट पर इतना दबाव पड़ता है, ज़ाहिर है कि पायलट के शरीर पर भी बहुत दबाव पड़ता है. इसे हम कहते हैं जी फोर्स. जी फोर्स का असर शरीर में बहने वाले खून पर भी पड़ता है. वो पैरों की तरफ जमने लगता है. जबकि उसकी ज़रूरत सबसे ज़्यादा होती है सिर में. इसे काबू करने के लिए सारे फाइटर पायलट्स जी सूट पहनते हैं. मज़बूत जहाज़ और जी सूट के बाद हमें ज़रूरत होती है एक बेहद कुशल फाइटर पायलट की. जिसने घंटों की फ्लाइंग में वर्टिकल चार्ली को मास्टर किया होता है. तब जाकर आपको गणतंत्र दिवस में मज़ा आता है. ये बात आप समझिए कि सारे एक्रोबैटिक्स तमाम इक्विपमेंट और ट्रेनिंग के बावजूद एक कैलकुलेटेड रिस्क होते हैं.
वायुसेना का ध्येय वाक्य नभः स्पृशं दीप्तम् है. गर्व के साथ आसामान को छूना. इसे बड़े करीब से क्षितिज पर उकेरता है वर्टिकल चार्ली. ज़मीन के करीब चलकर आसमान को भेद देने की चाहत दिखाने वाला कर्तब.
पहली बार राफेल बना शो स्टॉपर. (PTI)चलने से पहले कुछ फुटनोट्स -
वर्टिकल चार्ली में सब फाइटर जेट रोल करने लगता है. तब अमूमन उसे एंटी क्लॉकवाइज़ घूमते देखा जाता है. माने अगर आप कॉकपिट में बैठे हैं तो बाईं तरफ घूमना. अगर आपमें से कोई फाइटर पायलट रहा है, तो ज़रूर बताइएगा कि ऐसा क्यों होता है. क्लॉकवाइज़ रोल्स क्यों नहीं होते.
दूसरी चीज़ ये कि कई बार वर्टिकल चार्ली करते हुए जेट बहुत ऊंचा उठ जाता है. ऐसे में उसे और विज़िबल बनाने के लिए, थोड़ा और दिलचस्प बनाने के लिए फ्लेयर छोड़े जाते हैं. जो धुएं से बड़े सुंदर स्पाइरल बनाते हैं. लेकिन गणतंत्र दिवस पर अमूमन फ्लेयर्स का इस्तेमाल नहीं होता. क्या सुरक्षा कारणों से होता है, अगर आप सही कारण जानते हैं, तो हमें बताइएगा.
वैसे आप यूट्यूब पर हैं, और नहीं हैं, तो यूट्यूब पर जाकर देख सकते हैं कि करतब दिखाने के मामले में रशियन जेट्स का कोई सानी नहीं है. भारतीय वायुसेना के सुखोई 30 एमकेआई और मिग 29 रूसी विमान ही हैं. कहा जाता है कि दुनिया में सिर्फ यही दो विमान हैं जो पुगाचेव्स कोबरा या कोबरा मनूवर पूरा कर सकते हैं. इसमें जेट कोबरा की आकृति बनाकर कुछ देर उड़ता है. बहुत मुश्किल करतब माना जाता है.
और आखिर में, गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयां.



















