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नेहरू के समय कोरियाई युद्ध से महंगाई बढ़ी तो भारत ने क्या किया?

भारत में LPG Crisis के बीच, PM Modi ने पूर्व प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru के एक भाषण का जिक्र करके नई बहस छेड़ दी है, इसमें नेहरू ने कहा था कि बाहरी हालात भारत की अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं.

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पीएम मोदी ने कहा कि नेहरू ने महंगाई के लिए कोरिया जंग को जिम्मेदार ठहराया था. (फाइल फोटो: आजतक)

वेस्ट एशिया में चल रही जंग का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखाई दे रहा है. ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को बंद कर दिया है. जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है. सप्लाई रुकने की वजह से भारत समेत कई देशों में कच्चे तेल और LPG को लेकर संकट खड़ा हो गया है. 

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जाहिर है विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल गया है. कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने मोदी सरकार को घेरा है. इस बीच, प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक भाषण का जिक्र करके नई बहस छेड़ दी है. इसमें नेहरू ने कहा था कि बाहरी हालात भारत की अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं.

13 मार्च को असम में एक रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस को भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू का वह भाषण जरूर सुनना चाहिए, जिसमें उन्होंने महंगाई के लिए उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच लड़ाई को जिम्मेदार ठहराया था. 

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पीएम ने कहा,

"पंडितजी ने एक बार 15 अगस्त को लाल किले से कहा था कि उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच युद्ध के कारण भारत में महंगाई बढ़ गई… आज कांग्रेस लोगों को गुमराह कर रही है. दुनिया देख रही है कि वैश्विक संकटों का किस तरह का असर होता है.”

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इससे पहले भी बीजेपी सरकार कई बार नेहरू के इस भाषण का जिक्र कर चुकी है. लेकिन नेहरू ने कोरियाई युद्ध के बारे में क्या कहा था? उस समय भारत की आर्थिक स्थिति कैसी थी? और कोरियाई युद्ध पर भारत ने क्या प्रतिक्रिया दी थी? यह जानने की कोशिश करेंगे.

साल 1951. देश को आजाद हुए चार साल बीत चुके थे. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में नेहरू ने कहा, “आजादी को बनाए रखने के लिए हमेशा चौकस रहना जरूरी है और जो कोई भी सतर्क नहीं रहता, वह आज की इस कठोर और बेरहम दुनिया में निश्चित रूप से खत्म हो जाएगा.” 

नेहरू ने आगे कहा, 

"लोग बढ़ती कीमतों, कालाबाजारी और ऐसी ही दूसरी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. ये दिक्कतें दो वजहों से पैदा हुई हैं- पहली वे वजहें जो हमारे काबू से बाहर हैं, जैसे कोरियाई युद्ध; और दूसरी, वे वजहें जिन्हें हम खुद काबू कर सकते हैं. काला बाजारी दूसरी श्रेणी में आती है और किसी भी सरकार को इसे कड़ाई से रोकने की कोशिश करनी चाहिए."

उस समय भारत की आर्थिक स्थिति कैसी थी? 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पहली पंचवर्षीय योजना (1951-56) की शुरुआत में देश के सामने कई बड़ी समस्याएं थी. जैसे-शरणार्थी संकट, खाद्य संकट और बढ़ती महंगाई. नेहरू से पहले, तत्कालीन वित्त मंत्री सीडी देशमुख ने भी कोरियाई युद्ध का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था, 

“यह दौर काफी चिंताजनक रहा है. देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ रहा है. इस साल असम में आए भूकंप की वजह से यह और भी बढ़ गया है…इस बीच, कोरिया में चल रही जंग की वजह से हालात बुरी तरह बिगड़ गए हैं.”

इन सबके बावजूद, भारत ने इस मुश्किल दौर में न सिर्फ देश की गिरती अर्थव्यवस्था को संभाला, बल्कि कोरिया युद्ध को शांत कराने में भी बड़ी भूमिका निभाई. इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के 1958 के एक पेपर में पहली पंचवर्षीय योजना को सफल बताया गया. इसमें कहा गया,

“पहली योजना में, नेशनल इनकम में 11-12 परसेंट की बढ़ोतरी की उम्मीद थी, प्लान के खर्च में कमी के बावजूद असल बढ़ोतरी 18 परसेंट से ज्यादा थी."

इसके अलावा, इस (पहली) योजना में भारत ने 3.6% की जीडीपी वृद्धि हासिल की, जो लक्ष्य (2.1%) से कहीं ज्यादा थी.  

कोरिया युद्ध में भारत की एंट्री

कोरियन प्रायद्वीप पर 1910 से लेकर 1945 तक जापान का शासन था. दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के साथ ही कोरिया भी उसके कब्जे से निकल गया. द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होते ही कोल्ड वॉर की शुरुआत हो गई. जिसमें आमने सामने थे, सोवियत रूस और अमेरिका. दोनों ने आपस में तय किया कि कोरिया को आधा-आधा बांट लेंगे.

अगस्त 1945 में कोरिया के बीचोबीच लकीर खिंच गई. अमेरिका के पास गया साउथ का हिस्सा. यानी, साउथ कोरिया. सोवियत के पास आया नॉर्थ का हिस्सा. यानी, नॉर्थ कोरिया. दोनों ही देश अपने-अपने हिस्सों को कंट्रोल कर रहे थे. लेकिन 1950 में, उत्तर कोरिया ने साउथ कोरिया पर आक्रमण शुरू किया.

साल 1950 में जब कोरिया युद्ध शुरू हुआ, तब भारत को आजाद हुए महज 3 साल हुए थे. इसके बावजूद भारत ने अपनी फौज भेजी. लड़ने के लिए नहीं, बल्कि शान्ति के लिए. भारत ने अपनी सेना की मेडिकल कोर की एक टुकड़ी (60वीं पैराशूट फील्ड एंबुलेंस) भेजी. ताकि युद्ध में घायल लोगों की मदद हो सके. 

भारत ने कई बार ब्रिटेन की मदद से समझौता कराने की कोशिश की. उसने लगातार मध्यस्थता की कोशिश की और नवम्बर 1952 में संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पेश कर दिया, जो पास भी हो गया. इस प्रस्ताव के तहत एक आयोग का गठन होना था. जिसका नाम था न्यूट्रल नेशंस सुपरवाइजरी कमीशन (NNSC). इसकी अध्यक्षता कर रहे थे, भारतीय सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल केएस थिमैया. इस आयोग ने युद्धबंदियों की अदलाबदली का काम किया.  

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इस युद्ध में भारतीय सैनिकों के योगदान को कोरिया के लोग 21वीं सदी में भी याद करते हैं. खासकर मेडिकल कोर की सेवाओं को. इस युद्ध में घायल होने वाले आम नागरिकों को अमेरिकी सेना की मदद नहीं मिलती थी. ऐसे में इन लोगों की मदद भारतीय सेना की मेडिकल कोर ने की. उन्होंने कोरिया में 4 अस्पताल बनाए, कोरियन डॉक्टर्स को ट्रेन किया और साथ में घायलों का इलाज़ भी. 

इस वजह से कोरिया में इन भारतीय सैनिकों को विशेष उपाधि मिली- ‘एंजेल्स इन मैरून बैरे’ यानी मैरून टोपी वाले फ़रिश्ते. इस युद्ध में योगदान के लिए 60वीं पैराशूट फील्ड एंबूलेंस के सैनिकों को दो महावीर चक्र और 6 वीर चक्र दिए गए. वहीं जनरल थिमैया को पद्म भूषण से नवाजा गया.

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