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दहेज के लुटेरों, 'मेहर' देते वक्त ही शरीयत क्यों याद आती है?

शरीयत को लबादा बनाकर अपनी मर्ज़ी से ओढ़ने वालों शर्म करो.

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फोटो क्या देखते हो गिरेबान झांको. ये तो Symbolic Image है.
मेहर. लड़की की बात नहीं कर रहा हूं. उस रकम की बात कर रहा हूं जो मुसलमानों में दूल्हा निकाह होने पर अपनी दुल्हन को देता है. ये रकम या तो निकाह के फ़ौरन बाद दी जाती है या जब लड़की चाहे तब ले सकती है. मगर तय होती निकाह से पहले है. ये तय होना इतना आसान नहीं होता जितनी आसानी से मैंने लिख दिया. तू-तू मैं-मैं होती है. दलीलें दी जाती हैं. शरीयत की बात होती है. हैसियत की बात होती है. कहा जाता है कि लड़के की इतनी हैसियत नहीं तो मेहर इतना क्यों. और इसी दौरान दो खानदानों में नफरत पनप जाती है. मतलब शादी तो होती है लेकिन मेहर के झगड़े की खटास लेकर. और ये खटास लड़की के लिए तानों की वजह बन जाती है कि उसके घर वालों ने मेहर के लिए कितना हंगामा किया था. मेहर तय होते वक्त लड़की वालों को बदअक्ल बताया जाता है. उन्हें जाल में फंसाया जाता है कि ये तो बदअक्ल हैं जो मेहर की रकम के लिए झगड़ रहे हैं. अरे जिसने बेटी दे दी, तो फिर मेहर का क्या.
हैरानी तब होती है जब लड़के वालों को किसी बात में शरीयत याद नहीं आती. बस याद आती है तो मेहर की रकम बंधवाते वक्त. ऐसे हो जाते हैं जैसे इनसे बड़ा कोई मौलवी या पाक-ओ-पाकीजा नहीं. अगर ये न होते तो इस्लाम की जड़ें हिल गई होतीं. ऐसे ऐसे तर्क देते हैं जैसे इस्लाम बस इनको कंधों पर ही टिका है. और ऐसा दबाव बनाया जाता है कि चंद रुपयों के मेहर ही लड़की वालों को बंधवाने पड़ते हैं. हालांकि अगर देखा जाए तो मेहर की रकम लड़की के लिए कुछ भी नहीं होती है पूरी जिंदगी बिताने के लिए. फिर भी एक सहारा होती है. जिसको लड़के वाले कम से कम बंधवाना चाहते हैं.
जब लड़की का रिश्ता तय हो जाता है. तो लड़के की पसंद और न पसंद का पिटारा भी खुल जाता है. ये पसंद वाली लिस्ट इत्ती तगड़ी होती है कि बेटी का होना लोग बोझ समझ बैठते हैं. और ये पसंद बताने वाले लड़के वो होते हैं जो कभी घर में पसंद की सब्जी भी पकवा कर नहीं खा पाते. और घर से बाहर ये ही बताते हैं कि आज कोरमा खाया, और आज बिरयानी खाई. और हां, बेटे ने अगर कुछ अपनी मर्ज़ी की डिमांड घर में कर दी तो मां-बाप के डायलॉग ऐसे होते हैं, ' नालायक करता कुछ नहीं, और डिमांड ऐसे करता है के जैसे सब कुछ कमा के घर में इसने ही रखा है.'
इतना ही नहीं अगर बेटा जवाब दे दे तो कहते हैं, करना न करतूत लड़ने को मज़बूत.' मगर ये ही मां-बाप जब बेटे के लिए दुल्हन लेने जाते हैं तो इनका मुंह लड़की के घर वालों के सामने उसी नालायक बेटे के लिए ऐसे फटता है कि बस पूछो मत. अगर उन मां बाप का बस चले तो लड़की का पूरा घर ही सिर पर उठा लाएं. इस वक्त इन्हें शरीयत याद नहीं आती.
बारात की बात होती है. बोल दिया जाता है. हमारे दो सौ बाराती आएंगे. या 3 सौ आदमी आएंगे. अगर लड़की वाले कहें कि थोड़े कम बाराती ले आना तो वही शान बघारते हुए कहेंगे. अजी माशाल्लाह से कुनबा ही इतना बड़ा है. और फिर हमारा लोगों से इतना मिलना जुलना है. लड़के के दोस्त हैं. तो अब आप ही बताओ. कम बाराती कैसे लाएं. किसे मना करें. मना करेंगे तो हमारे रिश्तेदार नाराज हो जाएंगे. इस वक्त लड़के वालों को लड़की वालों की हैसियत नजर नहीं आती. हां उस वक्त अपनी हैसियत जरूर याद आ जाती है जब मेहर की बारी आती है. फिर मिमयाते हैं, जी... हमारी तो इतनी हैसियत ही नही. कोई नाराज न हो जाए इस वजह से बारात में किसी को छोड़कर नहीं जाएंगे. लेकिन नई-नई रिश्तेदारी होने के बावजूद लड़की वालों की नाराजगी के बारे में नहीं सोचेंगे. लंबी चौड़ी बारात लेकर जाएंगे. चाहे लड़की वालों की हैसियत हो या न हो. और अगर फिर लड़की वालों की तरफ से खातिरदारी में नमक भी कम रह जाए तो लड़के का फूफा अलग तांडव करेगा. फुफो (बुआ) की जबान लंबी हो जाएगी. खालू (मौसा) अलग बड़बड़ाएगा. तब लड़के वालों को नहीं लगेगा कि वो कितनी बदअक्ली दिखा रहे हैं.
खाने को बुरा बताने लगेंगे. न शरीयत याद आएगी और न सुन्नत. हां अगर लड़की वाले मेहर की बात करेंगे तो जरूर लगेगा. देखो तो सही पूरी लड़की दे दी और मेहर के चंद पैसों के लिए झगड़ रहे हैं. मतलब अगर वो मेहर की बात भी करें तो उनका वो बात करना झगड़ना नजर आता है. दहेज मांगना, हर बात में अपनी चलाना. अपने नए-नए रस्मो रिवाज बताकर लड़की वालों से वसूली करना. लड़के वालों को दादागीरी या रंगदारी मांगने जैसा नजर नहीं आता.
शरीयत के मुताबिक मेहर-ए-फातमी होते हैं. जिसके तहत मौजूदा दौर में तकरीबन 150 तोला चांदी या इसकी रकम बनती है. मेहर-ए-फातमी मतलब जब पैगंबर मोहम्मद साहब की बेटी फात्मा का निकाह हजरत अली से हुआ तो मेहर की रकम उस दौर के हिसाब से तय की गई. ये रकम मौजूदा दौर में बेहद कम है. इसलिए ही लड़के वालों को मेहर के वक्त शरीयत याद आती है. कहा जाता है कि मेहर-ए-फातमी बांध लो. लेकिन उन्हें ये याद नहीं रहता कि दहेज का लेनदेन नहीं हुआ था. दहेज मांगना तो लड़के वालों का जन्मसिद्ध अधिकार टाइप दिखता है. दहेज लेते वक्त उनकी शरीयत दहेज में मिले संदूक में बंद हो जाती है. और संदूक की चाभी पता नहीं कहीं खो जाती है. शरीयत को एक लबादा समझ बैठे हैं. जब चाहा ओढ़ लिया और जब चाहा उतार फेंका. शर्म करो शर्म.

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