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क्या है UBI स्कीम, जिसमें मोदी सरकार 10 करोड़ लोगों को हर महीने पैसे दे सकती है

15 लाख तो नहीं, लेकिन जान लीजिए कि कितनी रकम मिल सकती है हर महीने...

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. सांकेतिक तस्वीर.
धार्मिक कथा सुनी है आपने? कथा खत्म होने के बाद प्रसाद बांटा जाता है. बचपन में इस कथा में बहुत दिलचस्पी नहीं थी. बस इंतजार रहता था कि कथा खत्म हो और प्रसाद बंटे. खैर मोदी कथा यानी नरेंद्र मोदी की इस सरकार का भी आखिरी अध्याय यानी पांचवां साल चल रहा है. इंतजार खत्म होने वाला है. अब प्रसाद की बारी है. मोदी सरकार बहुत से लोगों को प्रसाद दे सकती है. नाम होगा- यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी यूबीआई. सरकार इस स्कीम को लागू करने की सोच रही है. किसानों के खाते में कुछ पैसे अलग से ट्रांसफर करने की प्लानिंग है. आम चुनाव से पहले जनता-जनार्दन को लुभाने का मोदी सरकार का ये सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है.
क्या है ये स्कीम? इस स्कीम के तहत देश के हर शख्स को 2,000 से 2,500 रुपए तक हर महीने दिए जा सकते हैं. पीएम नरेंद्र मोदी 27 दिसंबर को इस पूरी योजना का प्रेजेंटेशन देखेंगे. अगर सब ठीक रहा, तो शायद 15 जनवरी तक स्कीम का ऐलान हो जाए. फिलहाल देश के 10 करोड़ लोगों को इस स्कीम में शामिल करने का इरादा है. मोदी सरकार इस स्कीम पर बीते दो साल से काम कर रही है. नोटबंदी के बाद से ही इस स्कीम को लॉन्च करने की योजना थी. मगर नोटबंदी के नतीजे सरकारी अनुमान के मुताबिक न आने की वजह से सरकार ने इसे कुछ वक्त के लिए टाल दिया था. मगर आम चुनाव के मद्देनजर इस स्कीम को लागू करने पर अब गंभीरता से विचार हो रहा है.
पोस्टर- यूपी बीजेपी के फेसबुक पेज से

क्यों बनी ये योजना? साल 2016-17 के आर्थिक सर्वे में सरकार को सबसे पहले इस स्कीम को अपनाने की सलाह दी गई थी. राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने मैनिफेस्टो में इस योजना को अपनाने का वादा किया था. विपक्ष इन दिनों किसानों की कर्जमाफी के लिए मोदी सरकार की जबरदस्त घेराबंदी कर रहा है. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका पहले ही लग चुका है. ऐसे में इस योजना से भाजपा को काफी राहत मिल सकती है. लोगों के खाते में नकद पैसे आने से विपक्ष '15 लाख रुपए' वाली बात पर पीएम की उतनी खिंचाई नहीं कर पाएगा. पीएम नरेंद्र मोदी पर आरोप लगते रहे हैं कि साल 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने लोगों को 15-15 लाख रुपए देने का वादा किया था. हालांकि इसकी सच्चाई क्या है, ये आप नीचे विडियो में देख सकते हैं.

कैसे मिलेगा पैसा? इस योजना को लागू करने के लिए आधार नंबर का इस्तेमाल किया जाएगा. योजना में शामिल शख्स के बैंक खाते को आधार नंबर से लिंक किया जाएगा. और फिर सरकार जो भी पैसा देगी, उसे सीधे लाभार्थी के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. ये कुछ वैसा ही होगा, जैसे अभी घरेलू गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी ट्रांसफर होती है. लेकिन इस स्कीम के लागू हो जाने के बाद हर तरह की सब्सिडी मिलनी बंद हो सकती है.
किसानों के लिए प्लान क्या होगा? किसानों के खाते में अलग पैसा डालने की योजना है. इसके लिए मोदी सरकार ने तेलंगाना और झारखंड सरकार की किसान कर्जमाफी स्कीम पर रिपोर्ट तैयार कराई है. तेलंगाना सरकार किसानों का कर्ज माफ न करके उनको फसल बोने से पहले 4,000 रुपए की मदद करती है. किसान दो फसल बोएगा, तो उसे साल में 8,000 रुपए की सरकारी हेल्प मिल जाती है. तेलंगाना सरकार किसानों को फ्री में बिजली भी देती है. झारखंड सरकार ने भी हाल में इसी तरह की योजना लॉन्च की है. इन दोनों सूबों की इन स्कीमों को काफी सराहा जा रहा है.
स्कीम का विचार कहां से आया? यूनिवर्सल बेसिक इनकम का सुझाव लंदन यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर गाय स्टैंडिंग ने दिया था. इनकी अगुवाई में इंदौर के पास 8 गांवों में पांच साल के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया. इन गांवों की 6,000 की आबादी के बीच 2010 से 2016 के बीच इस प्रोजेक्ट को परखा गया. इसके तहत 500 रुपए हर महीने गांव वालों के बैंक खाते में डाले गए. साथ ही बच्चों के खाते में 150 रुपए जमा कराए गए. इन 5 साल में ज्यादातर लाभार्थियों ने इस स्कीम के जरिए अपनी आमदनी बढ़ा ली. इस सफल प्रयोग के बाद प्रोफेसर गाय स्टैंडिंग ने खुद दावा किया था कि मोदी सरकार इस स्कीम को लागू करने के लिए गंभीर है. जो लोग पहले मजदूरी करते थे, बाद में वे खेती करने लगे. इससे उनका खुद का फायदा हुआ, साथ ही खेती को भी लाभ हुआ.
यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना पर काम कर रही है मोदी सरकार. सांकेतिक तस्वीर. रॉयटर्स.
यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना पर काम कर रही है मोदी सरकार. सांकेतिक तस्वीर. रॉयटर्स.

किन लोगों को मिलेगा लाभ? शुरुआत में इस स्कीम में आर्थिक सर्वे 2011 के आधार पर लोगों को शामिल किया सकता है. मोदी सरकार ने बीपीएल सूची को आधार न बनाकर आर्थिक सर्वे 2011 को जन कल्याणकारी योजनाओं का आधार बनाया है. आर्थिक सर्वे साल 2011 की जनगणना के साथ ही किया गया था. इसमें गरीबों की गिनती अलग से की गई थी. इसमें करीब 10 करोड़ लोग शामिल हैं. वैसे रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे सी रंगराजन की अगुवाई में साल 2014 में बनी कमेटी के सर्वे को भी योजना का आधार बनाने की चर्चा है. इसके मुताबिक शहरों में 1407 रुपए और गांव में 972 रुपए हर महीने कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर माना जाता है. आसान भाषा में कहें तो शहरों में 47 रुपए रोजाना और गांव में 32 रुपए से कम कमाने वाले ही गरीब माने जाते हैं.
क्यों करना चाहती है सरकार? इस स्कीम को लागू करके सरकार लोक कल्याण की दूसरी योजनाओं और सब्सिडी को खत्म करने की ओर बढ़ रही है. एक अनुमान के मुताबिक सरकार अभी जीडीपी का 4 से 5 फीसदी सब्सिडी पर खर्च कर रही है. नई योजना में ये खर्च एक फीसदी घटकर 3 से 4 फीसदी ही रह जाएगा. यूबीआई लागू होने के बाद सरकार धीरे-धीरे सब्सिडी को भी खत्म कर सकती है. यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम और सब्सिडी दोनों एक साथ नहीं चलेंगी. इस स्कीम के लिए पैसे का इंतजाम सरकार माइनिंग और बड़े प्रोजेक्ट पर सरचार्ज लगाकर जुटा सकती है.


वीडियोः मुख्यमंत्री बनते ही कमल नाथ ने किसानों की कर्जमाफी का फैसला लिया

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