अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूं ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूं इक न इक रोज कहीं ढूंढ ही लूंगा तुझको ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूं
ये लड़का सोशल मीडिया का अक्षय कुमार बन गया है
वीडियो देखोगे तो आपको अक्षय कुमार ही नजर आएगा. 21 साल में ही कॉल सेंटर में काम किया, वेटर भी बना और सिक्योरिटी गार्ड भी.
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फोटो - thelallantop
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ये लाइनें शायर राहत इंदौरी की हैं, मगर इस जुनूनी लड़के पर एकदम फिट बैठती हैं. ख्वाहिश है. मुश्किलें हैं. जज़्बा है. उम्मीद है. लेकिन मंजिल न जाने कहां हैं. ये लड़का अपने जूनून में इतना मग्न है कि उसका संघर्ष फ़िल्मी लगता है. अपनी चाहत को पाने के लिए इस लड़के ने घर छोड़ा. एक होटल में वेटर बना. फिर सिक्योरिटी गार्ड भी बना. लेकिन उम्मीद की डोर को नहीं टूटने दिया. इस उम्मीद को बरक़रार रखने के लिए अक्षय कुमार बन गया. अपने अंदाज को अक्षय कुमार के अंदाज से बदल डाला. अक्षय की हर अदा को अडॉप्ट कर लिया. 21 साल का ये लड़का एक्टिंग करना चाहता है. हीरो बनना चाहता है. इसलिए अक्षय के गानों को अपने ऊपर शूट करके ये लड़का फेसबुक पर डालता है. आप खुद देख लीजिये इस हीरो को. हुबहू अक्षय कुमार है.


12वीं करने के बाद दीपक ने अपने पापा को मनाना शुरू कर दिया. ये मुश्किल था. दीपक कहते हैं कि मैंने उन्हें अपना फैसला सुना दिया था करूंगा तो सिर्फ एक्टिंग उसके सिवा कुछ नहीं कर पाऊंगा. वरना मैं अकेले ही मुंबई चला जाऊंगा. और वो मेरी जिद के सामने हार गए. किसी ने सलाह दी कि मुझे दिल्ली जाना चाहिए और पहले थिएटर सीखना चाहिए. दिल्ली गया और डीयू से ग्रेजुएशन का प्राइवेट फॉर्म भर दिया. और एक थिएटर ज्वाइन कर लिया.
दीपक की बड़ी बहन जेएनयू में पढ़ाई कर आरही हैं. और छोटा भाई 12th कर रहा है.
पहले दीपक खुद ही वीडियो शूट करते थे. अब घर आने पर छोटा भाई कैमरा संभाल लेता है तो मुंबई में दोस्त. अभी दीपक के पास संसाधनों की कमी है. शायद आपका प्यार उसको कामयाबी तक पहुंचा दे.ये वीडियो दीपक ने खुद ही शूट किए हैं
दीपक के बाकी अंदाज़ इस लिंक पर देख सकते होदीपक कुमार
बेवकूफों तुम जिसका मज़ाक उड़ा रहे हो, उस शख्स से सीखो 'हीरो' कैसे बनते हैं

मंजिल को पाना आसान नहीं होता. 21 फ़रवरी 1995 में यूपी के जिला चंदौली में पैदा हुए दीपक कुमार को ये बात अच्छे से पता है. उनके पापा एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में नौकरी करते हैं. दीपक बताते हैं, ' 10th क्लास तक उनके घर टीवी नहीं था. होता भी कैसे. क्योंकि पापा को लगता था कि टीवी शराब की तरह है. जिसका नशा बच्चों को ख़राब कर देगा. पड़ोसी अंकल के घर टीवी देखते थे. वो भी पापा से छिपकर. कई बार पिटाई हुई, लेकिन टीवी की आदत पड़ गई थी.'दीपक ने बताया, '10th करने के बाद बनारस भेज दिया गया, ताकि मैं पढ़ाई कर सकूं और टीवी देखने की लत छुट जाए. पढ़ाई उनके लिए मायने रखती थी. जिद करके पापा से कंप्यूटर मंगवा लिया था. चुपके से हेडफ़ोन लगाकर फ़िल्में देखता. शर्मीला बहुत था. इसलिए बंद कमरे में ही हीरो की एक्टिंग करता. डांस करता. पापा का डर होने के बावजूद पढ़ाई की तरफ ध्यान न लगाकर एक्टिंग करने का सपना पाल बैठा पता ही नहीं चला. शायद इसके पीछे ये भी था कि क्लासमेट मुझे अक्षय कुमार के नाम से पुकारने लगे थे. पता नहीं इस बात में कितनी सच्चाई थी कि मैं साइड पोज़ में अक्षय कुमार लगता हूं.'

12वीं करने के बाद दीपक ने अपने पापा को मनाना शुरू कर दिया. ये मुश्किल था. दीपक कहते हैं कि मैंने उन्हें अपना फैसला सुना दिया था करूंगा तो सिर्फ एक्टिंग उसके सिवा कुछ नहीं कर पाऊंगा. वरना मैं अकेले ही मुंबई चला जाऊंगा. और वो मेरी जिद के सामने हार गए. किसी ने सलाह दी कि मुझे दिल्ली जाना चाहिए और पहले थिएटर सीखना चाहिए. दिल्ली गया और डीयू से ग्रेजुएशन का प्राइवेट फॉर्म भर दिया. और एक थिएटर ज्वाइन कर लिया.
दीपक की बड़ी बहन जेएनयू में पढ़ाई कर आरही हैं. और छोटा भाई 12th कर रहा है.
दीपक ने बताया, 'मार्शल आर्ट सीख रहा था. लेकिन उसको कंटिन्यू नहीं रख पाया, क्योंकि सुबह 4 बजे मार्शल आर्ट के लिए उठाना पड़ता. फिर थिएटर. आराम नहीं मिल पाता था. बीमार पड़ गया. पैसों की दिक्कत हुई. 17 साल का ही था कॉल सेंटर में काम किया लेकिन पैसे नहीं मिले.'टक्करें खाने के बाद कुछ हासिल नहीं हुआ. कुछ लोगों के साथ काम किया. लेकिन सिर्फ कैमरा ही संभाला. कैमरे के सामने आने का मौका नहीं मिला. फिर खुद ही दीपक कुमार ने कैमरा संभाल लिया. एक जगह ट्राईपोड पर कैमरा फिट किया और गाना चलाकर डांस शुरू कर दिया. शूट करने के बाद मोबाइल एप से ही एडिट किया और फिर उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया. लोगों को पसंद आने लगे. तारीफ मिली तो हौसला बढ़ गया. अक्षय कुमार के गानों पर परफॉर्म करके वीडियो बनाने लगा. और अपने सपने को जीना शुरू कर दिया. भले ही अभी पैसा नहीं मिलता हो, जो खर्च के लिए बेहद ज़रूरी है. लेकिन एक सुकून है , जो उम्मीदों को कायम किए हुए है.
जब एक सिक्योरिटी कंपनी में काम किया.
दिल्ली से पढ़ने के बाद दीपक मुंबई चले गए और वहां पैसों की ज्यादा किल्लत हुई. दीपक ने बताया, 'पापा से दो बार पैसे मंगा चुका था. फिर मैं शादियों में वेटर बनके काम करने लगा. रात को वेटर बनकर 500 रुपये कमा लेता था. लेकिन कई बार शादियों में बहुत बुरा सलूक किया गया. इसलिए उसे छोड़ दिया और फिर एक सिक्योरिटी कंपनी में काम किया. क्योंकि उसी बिल्डिंग में अनिल कपूर का प्रोडक्शन हाउस था.'
दीपक कहते हैं, ' पहले पापा बुरा कहते थे, मगर अब जब वीडियो देखते हैं. तो कहते हैं मेहनत करो. तुम कर सकते हो. पता नहीं इस बात में बाप की मोहब्बत है या फिर मैं कर सकता हूं. ये तो वक्त ही बताएगा. मेरी वीडियो देखकर जो लोग तारीफ करते हैं वो मुझे हौसला देते हैं.'
अपने सपने को हासिल करने में दीपक दीवानगी की हदों से गुजर रहे हैं. हम भी उम्मीद करते हैं. उन्हें जल्दी मंजिल मिले. भले ही दीपक को अभी बड़ी कामयाबी न मिली हो लेकिन उनकी कहानी हमें इतना ज़रूर बताती है. संघर्ष से हारना नहीं चाहिए. शायद मंजिल इम्तिहान ले रही हो. क्योंकि संघर्ष होंगे तो मंजिल की उम्मीद भी होगी.
पहले दीपक खुद ही वीडियो शूट करते थे. अब घर आने पर छोटा भाई कैमरा संभाल लेता है तो मुंबई में दोस्त. अभी दीपक के पास संसाधनों की कमी है. शायद आपका प्यार उसको कामयाबी तक पहुंचा दे.
ये वीडियो दीपक ने खुद ही शूट किए हैं
दीपक के बाकी अंदाज़ इस लिंक पर देख सकते हो
दीपक कुमार
बेवकूफों तुम जिसका मज़ाक उड़ा रहे हो, उस शख्स से सीखो 'हीरो' कैसे बनते हैं
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