“उद्धव ठाकरे के पास दो विकल्प हैं. 1- राज्यपाल कोटे से उनके नाम की सिफारिश कर दी जाए और वो विधान परिषद के सदस्य बन जाएं. 2- 28 मई को छह महीने पूरे होते ही उद्धव इस्तीफा दे दें. एक-दो दिन के भीतर ही राज्यपाल की सहमति से दोबारा मुख्यमंत्री चुन लिए जाएं. इस तरह उन्हें फिर छह महीने का वक्त मिल जाएगा.”सुभाष कश्यप साफ कर देते हैं कि इन दोनों में से कोई भी तरीका नैतिकता के लिहाज से सही नहीं है. फिर भी कम अनैतिक तरीका पहला वाला ही है. और एक बात. इन दोनों विकल्पों में एक बात डिसाइडिंग फैक्टर रहेगी कि राज्यपाल क्या चाहते हैं? उनका स्व-विवेक क्या कहता है? तो क्या महाराष्ट्र सरकार ये विकल्प नहीं देख रही? जवाब है कि देख रही है, एक्शन शुरू भी हुआ है. डिप्टी सीएम अजित पवार ने 9 अप्रैल को कैबिनेट की बैठक की और उद्धव ठाकरे का नाम राज्यपाल कोटे से विधान परिषद भेजने की सिफारिश की. ये सिफारिश अब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास है. फैसला होना अभी बाकी है. और फिर दूसरा विकल्प अपनाने का तो अभी समय ही नहीं आया है. तब तो उद्धव के नाम को राज्यपाल मंज़ूरी दे ही देंगे? ये इतना भी आसान नहीं है. मामला अदालत तक पहुंच चुका है. महाराष्ट्र बीजेपी के नेता रामकृष्णन पिल्लई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका लगाई है. कहा है कि महाराष्ट्र कैबिनेट ने उद्धव के नाम को एमएलसी के लिए नॉमिनेट करने का जो फैसला लिया है, उस पर स्टे लगाया जाए. वजह दी है- जिस बैठक में ये फैसला लिया गया, उसकी अध्यक्षता उद्धव ने नहीं, बल्कि डिप्टी सीएम अजित पवार ने की थी. इस नाते बैठक और इससे निकले फैसले लीगल नहीं हुए. हालांकि कोर्ट ने कह दिया है कि राज्यपाल की तरफ से कोई फैसला आने तक कोर्ट इसमें दख़ल नहीं देगा. इसी तरह के दो दिलचस्प वाकये.. बड़े नामों से जुड़े दो ऐसे वाकये ध्यान आते हैं, जब किसी का मंत्री पद इसलिए ख़तरे में आ गया, क्योंकि वो तय समय में किसी सदन की सदस्यता हासिल नहीं कर सका. 1- 1993 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष प्रणब मुखर्जी को नरसिम्हा राव सरकार में वाणिज्य मंत्री पद की शपथ दिलाई गई. तब मुखर्जी किसी सदन के सदस्य नहीं थे और उन्हें छह महीनों के भीतर संसद का सदस्य बन जाना था. बंगाल से वे राज्यसभा के उम्मीदवार भी बन गए. लेकिन तब मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन ने यह कहते हुए राज्यसभा चुनाव स्थगित कर दिया, 'जब तक सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट नहीं कर देता, तब तक मैं देश में कोई चुनाव नहीं होने दूंगा.' प्रणब दा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. 2- 17 अप्रैल, 1999 को वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई. लोकसभा भंग हो गई. भंग लोकसभा में समता पार्टी के खगड़िया से सांसद शकुनी चौधरी राजद में शामिल हो गए. शकुनी चौधरी को ऑबलाइज़ करने के लिए राबड़ी देवी ने उनके बेटे सम्राट चौधरी को राज्य मंत्रिपरिषद में शामिल कर लिया. सम्राट किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. छह महीने बीत गए. और नवंबर 1999 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सूरज भान ने सम्राट चौधरी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया. जब पीवी नरसिम्हा राव और एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे, तो वे भी संसद के किसी सदन के सदस्य नहीं थे. इसी तरह जब लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तो वे भी किसी सदन के सदस्य नहीं थे. इन सभी ने बाद में छह महीने के भीतर किसी न किसी सदन की सदस्यता हासिल की. अब बारी उद्धव की है. अगर 28 मई तक भी उद्धव किसी सदन की सदस्यता हासिल नहीं कर पाए, तो राज्यपाल के पास दूसरी पार्टी को बहुमत साबित करने का मौका देने या नया मुख्यमंत्री चुनने का पूरा अधिकार रहेगा.
महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे कैबिनेट की 5 अनोखी बातें, अजित पवार बने उप मुख्यमंत्री














