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अगर सपा-बसपा एक होते हैं तो बीजेपी का क्या होगा?

सपा-बसपा अपने गठबंधन से कांग्रेस को क्यों दूर रखना चाह रहे हैं?

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गठबंधन के बाद चुनाव के समीकरण बदल गए हैं.

23 मई 2018. एचडी कुमारस्वामी कर्नाटक के 23वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे. शपथग्रहण समारोह का मंच देखते-देखते विपक्ष की एकता का मंच बनकर उभरा. लेफ्ट से लेकर मायावती तक विपक्ष का हर जाना-पहचाना चेहरा मंच पर मौजूद था. खेमों में बंटे विपक्ष के एकजुट होने के पीछे पिछले महीनों की कई घटनाएं काम कर रही थीं.

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पहली घटना थी, गुजरात विधानसभा चुनाव. कांग्रेस ने बीजेपी के सबसे मजबूत किले में कड़ी चुनौती दी थी. इसके बाद राजस्थान में दो लोकसभा और एक विधानसभा के लिए उपचुनाव में बीजेपी को बुरी तरह से पटखनी दी. इधर, मार्च में फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा और बसपा गठबंधन के सामने भी बीजेपी बुरी तरह से खेत रही. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडी (एस) से लगभग दोगुनी सीट होने के बावजूद मुख्यमंत्री के पद पर कांग्रेस ने अपना दावा छोड़ दिया था. इसने विपक्ष के सामने दो चीजों को साफ़ तरीके से रखा. पहला, कि कांग्रेस में अब भी लड़ाई का दम-खम बचा हुआ है. दूसरा, यह कि 2018 की कांग्रेस में गठबंधन को लेकर 2009 सी अकड़ नहीं रही है. इसके बाद यह कयास लगने शुरू हो गए कि 2019 का लोकसभा चुनाव 1977 जैसा हो सकता है. 1977 में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ पूरा विपक्ष एक हो गया था और इंदिरा खुद की सीट नहीं बचा पाई थीं.

कांग्रेस की दावेदारी

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जनवरी 2017. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ रही थीं. कांग्रेस के खाते में कुल 105 विधानसभा सीटें गईं. इनमें से वो महज 7 सीटों पर कामयाबी हासिल कर सकी. उस समय यह कहा गया कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के इतने बुरे प्रदर्शन की एक वजह कांग्रेस के साथ गठबंधन करना भी रहा. इस गठबंधन की असली परीक्षा हुई मार्च 2018 में. फूलपुर और गोरखपुर की लोकसभा सीट पर उपचुनाव होने थे. कांग्रेस गठबंधन के तहत अपने लिए नेहरु की विरासत के नाम पर फूलपुर की सीट मांग रही थी. लेकिन अब तक अखिलेश 'यूपी को यह साथ पसंद है.' के गाने से उकता चुके थे. उन्होंने कांग्रेस की बजाए बसपा के साथ गठबंधन किया और दोनों सीटें जीतने में कामयाब रहे. कांग्रेस ने दोनों जगह अपने उम्मीदवार उतारे, जिनकी जमानत भी नहीं बच पाई.


कुमारस्वामी का शपथग्रहण विपक्षी एकता का मंच बन गया था.
कुमारस्वामी का शपथग्रहण विपक्षी एकता का मंच बन गया था.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौधरी चरण सिंह के उभार के बाद से कमजोर होनी शुरू हो गई थी. 1989 में नारायण दत्ता तिवारी सूबे के वो आखिरी मुख्यमंत्री थे जिनके खीसे पर कांग्रेस का बिल्ला टंगा हुआ था. राम मंदिर आंदोलन, कांशीराम और मुलायम सिंह एकसाथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में उभरे. यह कांग्रेस के बेस वोट पर तीन तरफा हमला था. बीजेपी ने कांग्रेस के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाई. मुलायम सिंह मुस्लिमों को अपने साथ ले जाने में कामयाब रहे. कांशीराम ने दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में लामबंद करके कांग्रेस की कमर तोड़ दी. पिछले तीन दशक से कांग्रेस सूबे में लकवाग्रस्त हालत में हैं. 2009 का साल कांग्रेस में हुई आखिरी जुम्बिश के तौर पर दर्ज है. मुलायम सिंह यादव ने इस साल कल्याण सिंह को सपा में शामिल कर लिया. मुस्लिम मतदाताओं ने नेताजी की समझा दिया कि बाबरी मस्जिद की यादें उनके जेहन में ताजा हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 20 सीटों पर कामयाबी हासिल हुई.

क्या कांग्रेस के बिना गठबंधन संभव है?

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2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 9 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही थी. 2009 में यह आंकड़ा 20 पर पहुंचा. हालांकि इसके लिए कांग्रेस से ज्यादा मुलायम सिंह यादव को श्रेय दिया जाना चाहिए. अब एक अखबार की खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच गठबंधन लगभग तय हो चुका है. अखबार की मानें तो इस फॉर्मूले के तहत सपा को 80 में से 37 सीटें मिलने जा रही हैं. वहीं 38 सीटें बसपा के खाते में जा रही हैं. तीन सीट अजीत सिंह की पार्टी रालोद को देने की बात हो रही है. वहीं दो सीटों पर आपसी समझदारी से कोई उम्मीदवार नहीं उतारे जाने की बात कही जा रही है. ये दो सीटें गांधी परिवार की परंपरागत सीटें अमेठी और रायबरेली हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव को 'मोदी लहर' के तौर पर दर्ज किया जाएगा. इस चुनाव में बीजेपी को छोड़कर जिस पार्टी को जितना वोट पड़ा, उसे उस पार्टी के बेस वोट तौर पर रेखांकित किया जा सकता है. अगर 2014 के लोकसभा के चुनाव के आंकड़े देंखे तो सपा उत्तर प्रदेश में कुल पांच सीटें जीतने में कामयाब रही थी. 30 ऐसी सीटें थीं जहां सपा त्रिकोणीय मुकाबले में दूसरे स्थान पर रही. 34 ऐसी सीटें ऐसी थीं जहां बसपा दूसरे नंबर पर रही. हालांकि उसे एक भी सीट नहीं हासिल हुई. कांग्रेस ने अपनी 2 परंपरागत सीटों पर जीत दर्ज की थी. इसके अलावा 6 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही थी. ऐसे हालत में अगर कांग्रेस को इस गठबंधन से दूर रखा जाए तो कांग्रेस की कुल सीटों की जोड़ में कोई खास फर्क पड़ता दिखाई नहीं देता.


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल-अखिलेश के साथ की बहुत बात हुई थी.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल-अखिलेश के साथ की बहुत बात हुई थी.

अगर 2014 के ही आंकड़े देखे जाएं तो सपा और बसपा के साथ लड़ने पर भी बीजेपी को 28 लोकसभा सीटों पर साफ़ बढ़त दिखाई देती है. अगर कांग्रेस भी महागठबंधन में शामिल हो जाती है तो यह आंकड़ा 23 पर पहुंच सकता है. आंकड़ों का खेल होने के बावजूद राजनीति सरल गणित नहीं हैं. यहां दो और दो की जोड़ हमेशा चार नहीं होता है. 2014 के आंकड़ो के हिसाब से गोरखपुर, फूलपुर और कैराना तीनों जगह बीजेपी को सपा और बसपा के साझा वोट से ज्यादा वोट मिले थे. उपचुनाव के नातीजों ने आंकड़ो के गणित को पूरी तरह से उलटकर रख दिया.

1989 से भारत ने गठबंधन सरकार का दौर देखा है. पिछले चार साल को छोड़ दिया जाए तो पिछले तीन दशक से सत्ता के केंद्र में गठबंधन ही रहे हैं. सपा-बसपा सहित तमाम क्षेत्रीय दल यह जानते हैं कि अगर 2019 में खिचड़ी लोकसभा आती है तो यह उनके लिए सत्ता के शीर्ष पर बैठने का सबसे सुनहरा मौक़ा है. मुलायम सिंह और मायावती लंबे समय से प्रधानमन्त्री बनने की हसरत पाले बैठे हैं. ऐसे में दोनों ही दलों को यह पता है कि 2019 की मई में, जिसके खाते में जितनी ज्यादा सीटें होंगी, वो प्रधानमंत्री की कुर्सी के उतने ही करीब होगा. बीजेपी के खिलाफ गठबंधन करना अखिलेश और मायावती की वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा खुद को बचाए रखने का सवाल है. ऐसे में अगर कांग्रेस के साथ सीटें साझा करना दोनों को असहज कर रहा है. ये दोनों दल कांग्रेस के पाले में जाएंगे जरूर, लेकिन चुनाव के बाद. चुनाव से पहले सपा और बसपा कांग्रेस के साथ एक सुरक्षित दूरी बनाकर चल रहे हैं.



देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने मन की बात

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