गोमती नदी के 19 किलोमीटर लंबे हिस्से को ब्लू-ग्रीन कॉरिडोर के तौर पर विकसित किया जाएगा. इस कॉरिडोर को बनाने का काम 2027 में शुरू होने का अनुमान है और इसके 2035 तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है. यह प्रोजेक्ट दो चरणों में पूरा किया जाएगा. ग्रीन कॉरिडोर, ब्लू कॉरिडोर, अक्सर आप इन शब्दों से रूबरू होते हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आखिर कौन से पैरामीटर हैं जिनके आधार पर किसी क्षेत्र को ग्रीन, ब्लू या ग्रीन ब्लू कॉरिडोर घोषित किया जाता जाता है.
लखनऊ में बनेगा ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर, सिंपल भाषा में जानिए ये होता क्या है
Green Blue Corridor: लखनऊ में 19 किमी लंबा ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर बनाया जाएगा. क्या आप जानते हैं कि किसी शहर या क्षेत्र विशेष को किन शर्तों और चुनौतियों को ध्यान में रखकर ग्रीन ब्लू कॉरिडोर बनाया जाता है. समझें सारे सवालों के जवाब.


ग्रीन कॉरिडोर एक कॉमन शब्द है जिसके बारे में अक्सर ही हम-आप खबरों में सुनते रहते हैं या पढ़ते हैं. कई बार सफर के दौरान भी आपको ऐसे बोर्ड्स दिखते होंगे जहां ग्रीन कॉरिडोर होने की सूचना दी जाती है. ग्रीन कॉरिडोर पर्यावरण सुरक्षा तक सीमित नहीं है. कई बार मेडिकल इमर्जेंसी के दौरान भी इसे बनाया जाता है. आइए समझते हैं कि ग्रीन ब्लू कॉरिडोर बनाने के क्या मापदंड हैं.
'ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर' आखिर होता क्या है?एकदम सिंपल भाषा में कहें, तो ग्रीन का मतलब है हरियाली. इसमें पेड़-पौधे, वन क्षेत्र वगैरह शामिल हैं. ब्लू पानी का संकेत होता है. जैसे नदियां/झीलें या जलाशय. इन दोनों को मिलाकर बनाया गया प्राकृतिक गलियारा हो, तो उसे ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर कहते हैं. गोमती किनारे 19 किमी का लंबा क्षेत्र ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर इसलिए घोषित किया गया है, क्योंकि यहां नदी के साथ हरियाली वाला क्षेत्र भी शामिल है.
किसी भी क्षेत्र को सिर्फ जल क्षेत्र और हरियाली होने के आधार पर ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर घोषित नहीं किया जा सकता है. एनजीटी और पर्यावरण मंत्रालय ने इसके लिए सख्त नियम बनाए हैं. किसी भी क्षेत्र को ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर घोषित करने के लिए नदी की कैचमेंट एरिया से दूरी देखी जाती है. यह दूरी मैदानी, पर्वतीय वगैरह क्षेत्रों के लिए अलग-अलग है. इसके अलावा बफर ज़ोन, पक्के निर्माण पर रोक, शहर के हीटवेव क्षेत्र वगैरह का आकलन किया जाता है. इसमें इन बातों का ध्यान रखा जाता है:
- जिस क्षेत्र के पास प्राकृतिक पानी का स्रोत हो, उसे प्राथमिक क्षेत्र चुना जाता है. इसके अलावा, एनजीटी और पर्यावरण मंत्रालय के नियमों के मुताबिक, जल निकाय के किनारे 50 या 100 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के कंक्रीट इमारत का निर्माण नहीं हो सकता है.
- इसके अलावा, जलाशय के 100 मीटर के दायरे में बाढ़ का उच्चतम स्तर भी मापा जाता है.
- इन सबके साथ ही उस इलाके की जैव विविधता का ध्यान रखा जाता है. उस इलाके की मिट्टी ऐसी होनी चाहिए जो आसानी से वर्षा जल को सोख सके, क्योंकि इससे भूजल स्तर बरकरार रहता है. स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण भी होना चाहिए.
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आम ग्रीन कॉरिडोर कैसे तय होता है?हरियाली और वन क्षेत्र संरक्षण को ध्यान में रखकर ग्रीन कॉरिडोर घोषित किया जाता है. यह पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जरूरी है. इसके अलावा, कई बार मेडिकल रीजन जैसे कि अंगदान वगैरह के लिए भी एक रास्ते को ग्रीन कॉरिडोर घोषित किया जा सकता है. इससे तय समय में बिना किसी रुकावट के ट्रांसप्लांट के लिए अंग पहुंच सकते हैं.
पर्यावरण विशेषज्ञों की क्या राय है?जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह (मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और नदी विशेषज्ञ) कई कार्यक्रमों और मीडिया चैनलों से बात करते हुए दोहरा चुके हैं कि रिवर फ्रंट बनाना या ग्रीन-ब्लू कॉरिडोर घोषित कर देने भर से नदियों की सेहत नहीं सुधारी जा सकती है. डॉक्टर सिंह कहते हैं कि नदियों के उद्गम स्थल से लेकर बहने वाले पूरे रास्ते में साफ-सफाई, जल प्रवाह को सुरक्षित रखना, कचरे और प्रदूषण से मुक्त रखने का जब तक कड़ाई से पालन नहीं होगा, तब तक भारत की नदियां पूरी तरह से साफ नहीं होंगी.
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