सात अक्टूबर से गोवा में संगमन शुरू हो रहा है.
साल 1993 में कानपुर से शुरू हुआ ‘संगमन’ साल 2017 में मडगांव (गोवा) पहुंच चुका है. हिंदी की सांस्कृतिक-साहित्यिक पट्टी में ‘संगमन’ की प्रतिष्ठा और अस्मिता शोर-गुल से अलग एक वार्षिक-विमर्श के रूप में है. गए 25 बरस में कानपुर, चित्रकूट, दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, धनबाद, वृंदावन, अहमदाबाद, देहरादून, सारनाथ, श्रीडूंगरगढ़, पिथौरागढ़, जमशेदपुर, नैनीताल, ग्वालियर, उदयपुर, कुशीनगर, मांडू, बरोग, चंदेरी, मंडी और नागपुर जैसी स्थानीयताओं में 21 बार संभव हो चुका ‘संगमन’ इस बरस मडगांव तक आते-आते थोड़ा बदल चुका है. वे बदलाव बेहतर माने गए हैं, जो मूल संकल्पनाओं को अक्षुण्ण रखते हैं. इस मायने में अब पूर्णरूपेण सहकारी आयोजन की शक्ल ले चुका ‘संगमन’ एक मिसाल है. हिंदी में कल्पनातीत ढंग से व्यापक और अराजक होती चली गई उत्सवधर्मिता के बीच यह जानकर ताज्जुब होगा कि ‘संगमन’ पूरी तरह से लेखकों-कलाकारों की आपसी समझ, सरोकार और सहयोग से ही अब तक संयोजित, संचालित और संपन्न होता रहा है. ढांचागत स्थायी सुविधाओं के बगैर 25 बरस से अपनी सफलताएं दुहराते आ रहे ‘संगमन’ के बारे में इसके प्रमुख संयोजक और प्रतिष्ठित कथाकार प्रियंवद बताते हैं :
‘‘संगमन का भौतिक स्वरूप एक ऐसे ढांचे से बना है जो सर्वथा नया और पारदर्शी है. इसमें किसी अध्यक्ष, सचिव और पदाधिकारी का न होना, इसका कोई बैनर न होना, इसका कोई बैंक अकाउंट या कोष न होना, इसकी कोई स्थायी या अस्थायी संपत्ति न होना इसे विशिष्ट ही नहीं, अद्भुत बनाते हैं. इसका यह प्रारूप और आंतरिक प्रबंधन इतना लचीला है कि इसे दुनिया के किसी भी हिस्से में आयोजित किया जा सकता है.’’
कथाकार प्रियंवद. बदलाव की बात यहां विशेषताएं दर्ज करवाने में रह न जाए, इसलिए यह बताते चलें कि अपने 20 संस्करणों तक ‘संगमन’ केवल हिंदी के कथाकारों का आयोजन रहा आया. अक्टूबर 2015 में नागपुर में संपन्न हुए 21वें ‘संगमन’ ने अपने स्वरूप और सरोकारों को व्यापक किया. इस व्यापकता में खुद को हिंदी से इतर भाषाओं से जोड़ा जा सके, इस प्रकार के प्रयत्न शामिल रहे. विमर्श का यह विस्तार 7 से 9 अक्टूबर के बीच हो रहे ‘संगमन’ के नए यानी 22वें संस्करण में नजर आएगा जिसमें कोंकणी, मराठी और हिंदी भाषा के रचनाकारों, बुद्धिजीवियों और पाठकों की सम्मिलित उपस्थिति रहेगी. इस बार के ‘संगमन’ का विषय ‘आरोह 2020: आकलन व दायित्व’ है. इस विषय के नेपथ्य में उपस्थित तथ्यबद्धता और लक्ष्य का उल्लेख ‘संगमन’ के 22वें संस्करण के लिए जारी पत्रक में कुछ यूं है :
‘‘भारतीय इतिहास में 1920 के असहयोग आंदोलन का ऐतिहासिक और क्रांतिकारी महत्व है. 1917 में चंपारण सत्याग्रह के मार्फत भारतीय राजनीति और समाज सक्रिय सहभाग के पश्चात, 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत हुई जिसमें अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान और अपने अनेक आग्रहों को दरकिनार करते हुए, भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग शामिल हो गया था. इस आंदोलन ने भारत के लोकतांत्रिक मानस को गढ़ने में एक अहम भूमिका निभाई. स्त्री, युवा और वंचित समुदाय के लोगों ने इस आंदोलन को भविष्य की एक योजना के रूप में देखा था. इसलिए हम इस आंदोलन की आकांक्षाओं और सीमाओं का विस्तार विगत एक सदी में भिन्न-भिन्न रूप में देख सकते हैं.’’ 
इस पत्रक में आगे इस विषय को एक वृहद विषय का सांकेतिक शीर्षक बताते हुए कहा गया है : ‘‘इतिहास और भविष्य के अनुभवों और सपनों को, वर्तमान की आधारभूत जमीन पर तौलना अत्यंत आवश्यक है. विशेषकर एक ऐसे समय में, जब एक ओर भारत के भीतर महाशक्ति बनने की आकांक्षा का आवेग है, तो दूसरी ओर अर्जित सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत यथार्थ और आभासी सवालों से जूझते हुए हतप्रभ और चकित है. हम आज अपनी इच्छा-अनिच्छा के बगैर ऐसे सवालों के सामने खड़े हैं, जहां से अपने अतीत के अनुभवों और भविष्य की राहों का विस्तृत जायजा लेना हमारा दायित्व हो जाता है. यह केवल राजनीतिक दायित्व नहीं है, बल्कि मनुष्य होने की तमाम संभाव्यता के भिन्न-भिन्न पहलुओं को नए सिरे से जानने और समझने का दायित्व भी है और इन सबके बीच अपनी भूमिका तय करने का भी. स्पष्ट है कि दर्शन, विज्ञान, अर्थ-तंत्र, कला, समाज, मीडिया और समूचा पर्यावरण इस दायित्व के केंद्र में है. यह दायित्व हमारा स्वयं के प्रति और युवा होती पीढ़ी के प्रति भी है.’’ कथाकार रेणु के रिपोर्ताजों पर लिखते हुए कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी ने एक जगह दर्ज किया है कि घटना से कथन और संवाद का आकार बड़ा हो जाता है. इस उद्धरण के उजाले और पूर्व-उदाहरणों की उल्लेखनीय पृष्ठभूमि में ‘संगमन’ के नए संस्करण से यह उम्मीद रखना बेमानी नहीं है कि वह हिंदी में एक घटना के रूप में मौजूदा सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, वैचारिक और राजनीतिक विमर्श में कथन और संवाद के आकार को बड़ा करेगा.
* ‘संगमन’ के बारे में और जानने के लिए :
www.sangamankar.com पर जा सकते हैं.

ये अविनाश मिश्र ने लिखा है. घातक कानपुर के सरल अविनाश. शेखर के नाम से फेसबुक पर धमाल मचाए रखते हैं. हिंदी साहित्य के भविष्य हैं. पर हमारी नजर में अगर हिंदी पुरातत्व की खुदाई हो तो उसमें भी शेखर जैसे ही नजर आएंगे. बहुत मीठा बोलते हैं पर कर्कश तर्कों के साथ. किसी भी किताब का जिक्र आए तो हम इनकी तरफ देखते हैं कि इनको तो पता ही होगा. साहित्य से जुड़े हर सवाल का जवाब शेखर को माना जाता है. शेखर की खूबी ही शेखर की दुश्वारी है.
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