
प्रदीपिका सारस्वत. फ्रीलांस राइटर हैं. बीते कुछ वक्त से कश्मीर में हैं. दी लल्लनटॉप के लिए कश्मीर डायरी लिख रही हैं. आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में हालात बिगड़े हैं. हमें मीडिया के जरिए सिर्फ ये पता चल पाया है कि बुरहान मारा गया. जनाजे में हजारों लोगों की भी़ड़ जुटी. लेकिन वहां के जमीनी हालात क्या हैं, इस बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता. प्रदीपिका आज हमें बुरहान की मौत के बाद कश्मीर के हालात के बारे में बता रही हैं. जानिए बेटे बुरहान के मरने के बाद क्या बोलीं उसकी अम्मी.
छह जुलाई को कश्मीर में ईद मनाई गई. ईद के लिए मैं अपने एक दोस्त के घर त्राल गई हुई थी. त्राल को कश्मीर का कंधार कहा जाता है और इन दिनों यहां के लड़के सबसे ज़्यादा मिलिटेंसी में आ रहे हैं. बुरहान मुज़फ्फर वानी भी त्राल के ही एक गांव शरीफाबाद से था.
सात जुलाई को श्रीनगर लौटते वक्त मुझे उसका घर दिखाया गया. 15 साल की उम्र में हिज़बुल मुजाहिदीन में शामिल हो जाने वाला ये लड़का आतंक का पोस्टर बॉय था. इसके बारे में किस्से सुनाए जाते थे कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी ये बच निकलता था. इस टैक्सेवी लड़के के वीडियो, फोटो और बाकी पोस्ट्स फेसबुक और यूट्यूब पर देखे सुने जाते थे.

बुरहान के जनाजे में शामिल लोग
उसके बारे में एक थ्योरी ये भी थी कि वो आर्मी के लिए काम कर रहा था. ये थ्योरी जब उसके रिटायर्ड स्कूल हेडमास्टर पिता तक पहुंची तो उनका कहना था कि अच्छा है अगर आर्मी के लिए काम करता है तो चार दिन ज़्यादा जी लेगा. पर एक दिन पहले हम उसके चार दिन ज़्यादा जी लेने की उसके पिता की ख्वाहिश के बारे में बात कर रहे थे और अगली शाम खबर मिली कि एक घंटे चले एनकाउंटर में बुरहान और उसके दो साथी मारे गए.

शुक्रवार रात करीब नौ बजे मुझे ये खबर मिली. खबर मिलते ही लोग त्राल की ओर रवाना होने लगे. सिर्फ दक्षिणी कश्मीर ही नहीं श्रीनगर और बाकी ज़िलों से भी लोग बुरहान के गांव की ओर निकल पड़े. बाइक्स पर, गाड़ियों में, ट्रैक्टर्स में, मिनी बसों में, पिक अप गाड़ियों में या पैदल. जो जैसे पहुंच पा रहा था पहुंच रहा था. ये हर तबके के लोग थे. पढ़ने वाले लड़के. पढ़ाई के बाद भी बेरोज़गार बैठे लड़के. बिज़नेस और प्राइवेट सेक्टर के लोग. सरकारी नौकरियों से जुड़े लोग. पॉलिटिकल पार्टियों से जुड़े लोग भी. रात भर बारिश होती रही. पर इसके बावज़ूद लोग त्राल पहुंचते रहे. मस्जिदों के स्पीकर्स पर बाहर से आए लोगों के लिए खाने के इंतज़ाम के लिए मैसेज दिए जा रहे थे. इन स्पीकर्स पर आज़ादी के गीत गाए जा रहे थे.
'खुदा के दीन के लिए, ये सरफरोश चल पड़े सबी लोना, सबी लोना, अल जेहादो अल जेहाद ये दुश्मनों की गर्दनें उड़ाने आज चल पड़े किसी में इतना दम कहां कि इनके आगे डट सके'बुरहान के गांव और त्राल के बाकी इलाकों में ये लोग इकट्ठा थे. इनके लिए खाने-पीने का इंतज़ाम किया गया था. लोगों के गुस्से ने उन्हें एक दूसरे से जोड़ दिया था. पोस्टमॉर्टम और बाकी फॉर्मलिटीज़ के बाद शनिवार सुबह तीन बजे बुरहान की बॉडी उसके घर पर लाई गई. सुबह तक और भी लोग वहां पहुंच चुके थे. सुबह पहुंची भीड़ में औरतें, बच्चे, बूढ़े काफी तादाद में थे.
हर कोई बस बुरहान को छूना चाहता था, उसे आखिरी बार देख लेना चाहते थे. छह बजे उसके शरीर को ईदगाह ले जाया गया, जहां नमाज-ए-जनाजा पढ़ी जानी थी. नौ बजे तक आस पास के इलाकों, पुलवामा, अनंतनाग, बिजबिहाड़ा, अवंतीपोरा से लोग वहां पहुंच चुके थे. यहां तक कि सैंकड़ों सिख भी आखिरी बार बुरहान को छूकर अलविदा कहने के लिए पहुंचे. लाखों की इस भीड़ के अलावा कम से कम एक दर्जन एक्टिव मिलिटेंट्स भी उसे आखिरी सलामी देने आए थे. इतने ज़्यादा लोग वहां पहुंचे थे कि करीब चालीस बार लोगों ने जनाजे की नमाज़ अदा की.

पूरे कश्मीर में. खासकर साउथ कश्मीर और श्रीनगर में बच्चे युवा और लड़के सड़कों पर थे. जगह-जगह प्रोटेस्ट्स होते रहे. श्रीनगर-अनंतनाग हाइवे पर लोगों ने जगह-जगह पत्थर और लकड़ियां डाल कर रास्ता बंद कर दिया था. टायर्स और लकड़ियां जला कर लोग अपने गुस्से का इज़हार कर रहे थे.
शाम को जब मैं ईदगाह के पास बनी बुरहान की कब्र के पास पहुंची तो पिक अप ट्रक में भर कर आईं लड़कियां, शहादत के गीत गा रही थीं.
यहीं दफनाया गया है आतंकी बुरहान“मुबारक हो उस मां को जिसने एक शहीद को पैदा किया.”एक जगह सात-आठ साल के लड़कों का एक ग्रुप ‘नो रिज़ोल्यूशन-गन सोल्यूशन’ नारा लगा रहा था. जगह-जगह पुलिस और सीआरपीएफ की टीमों पर पथराव होता रहा. जवाब में सीआरपीएफ ने फायरिंग की. शनिवार शाम तक इस फायरिंग में मरने वालों की संख्या 12 थी और इस खबर के लिखे जाने तक ये टोल 19 तक पहुंच गया है.
वादी के हालात वाकई काफी खराब हो चुके हैं. लोग गुस्से में हैं. दुखी हैं. और कई बार उनके गुस्से में बेचारगी भी दिखती है. पूरी की पूरी घाटी बुरहान और बाकी दो मरने वालों के साथ खड़ी है. और इस पब्लिक सेंटिमेंट को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता.

हमारे मुल्क में कुछ लोग कश्मीर की समस्या के लिए भले ही पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा दें. पर ISI और बाकी पाकिस्तानी एजेंसियों के सक्रिय होने के बावजूद लोगों के इस गुस्से को, उनके इस तरह एकजुट हो जाने को और एक आतंकवादी के जनाजे में लाखों की संख्या में लोगों के इकट्ठा होने को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता.
कश्मीर में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया है, इसलिए ये खबर एक लोकल अखबार के दफ्तर में बैठकर लिख रही हूं. एक साथी पत्रकार ने अभी-अभी बताया है, ‘कश्मीर में मेडिकल इमरजेंसी लागू कर दी गई है.’ जैसे-जैसे यहां घायलों और मरने वालों की संख्या बढ़ती है, ‘या अल्लाह’, ‘रहम खुदायो’ जैसी आवाजें न्यूज़ रूम में सुनाई देती हैं. ‘इस वायलेंस को या तो बारिश रोक सकती है या अल्लाह,’ लोग आपस में बातें कर रहे हैं.
शुक्रवार से अब तक जो हुआ है, उसने गुस्से, केओस, करफ्यू और हड़ताल के अलावा कुछ और मुद्दे भी सामने आते हैं. कश्मीर में आज़ादी और इस्लाम अलग नहीं हैं. शनिवार शाम जब मैं बुरहान के घर पहुंची तो अब भी काफी लोग घर में मौजूद थे. बुरहान का छोटा भाई नवेद, जो कि 11वीं क्लास का स्टूडेंट है, वो घर के बाहर ही था. मुझे समझ ही नहीं आया कि उससे क्या बात करूं. कुछ देर बाद बाद मैंने उससे पूछा कि क्या मैं उसकी मां से मिल सकती हूं, क्या वो इस स्थिति में हैं?
वो मुझे घर के अंदर ले गया. घर मिलने आई औरतों से भरा हुआ था. मैं बुरहान की मां से मिली तो उनसे बात करने से पहले मैं काफी नर्वस थी. पर वो मुझे काफी शांत नज़र आईं. बोलीं,
'मेरा दूसरा बेटा भी इस्लाम की राह पर शहीद हुआ है, मुझसे ज़्यादा खुशनसीब कौन सी मां होगी.' 'इस्लाम की राह पर?' मैं हैरान थी. 'पर वो तो आज़ादी के लिए लड़ रहा ता ना?' मैंने सवाल किया. 'वो कश्मीर में इस्लामी निज़ाम कायम करने के लिए लड़ रहा था, और वो काफिरों से लड़ते हुए मारा गया.' उनका जवाब था.
जब इस सिलसिले में मैंने कश्मीर के रेप्युटेड ह्युमन राइट्स डिफेंडर और सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट खुर्रम परवेज़ से बात की, तो शुरुआत में वे इस सवाल पर काफी नाराज़ नज़र आए. उनकी नाराज़गी इस सवाल की बजाय इंडियन मीडिया पर थी. ज़ाहिर तौर पर वे कश्मीर मुद्दे पर इंडियन मीडिया के रुख से खुश नहीं थे.
बाद में उन्होंने बताया कि जिस तरह भारतीय सरकारों का रवैया शुरू से ही कश्मीर में हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे ले जाना रहा है, उसी तरह कश्मीर के रेज़िस्टेंस में इस्लाम एक ज़रूरी हिस्सा बन चुका है.
“शुरुआत में शेख अब्दुल्ला ने भी अपनी बात हज़रतबल दरगाह से ही सामने रखी थी. कश्मीरी मुसलमानों के लिए आज़ादी और इस्लाम में खास अंतर नहीं है.” मस्जिदों के स्पीकर्स पर गूंजते आज़ादी के तराने उनके जवाब की तसदीक करते हैं.
बुरहान की तस्वीरें सोशल मीडिया पर क्यों? शुक्रवार की रात बुरहान के मरने के बाद की तस्वीर पुलिस ने सोशल मीडिया पर ज़ारी की थी. ज़रा सी देर में ये तस्वीर उसकी मौत की खबर के साथ वायरल हो गई. ज़ाहिर सी बात है, लोग गुस्से में आ गए. कुछ घंटों बाद हालांकि मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया लेकिन तब तक पब्लिक सेंटिमेंट बेकाबू हो चुके थे.
यहां सवाल ये उठता है कि अगर इंटरनेट बंद इसलिए किया जाता है ताकि लोग आपस में चीज़ें और भावनाएं न बांट सकें, इनफॉर्मेशन शेयरिंग न कर सकें तो फिर इंटरनेट बुरहान की मौत के बाद तुरंत बंद क्यों नहीं किया गया. सवाल ये भी है कि जब ये बात आम थी कि बुरहान को कश्मीरी युवा जब अपने हीरो के तौर पर देखते हैं तो उसकी मौत की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर ही क्यों की गई?
इस सिलसिले में एक और थ्योरी लोगों में डिस्कस की जा रही है. वो ये कि बुरहान का एनकाउंटर स्टेज्ड था. कि उसे पहले ही मार दिया गया था. उसकी लाश को करीब से देखने वालों का कहना है कि उसे पहले ही मार दिया गया था. साथ ही ये भी कि बुरहान के साथ चला एनकाउंटर सिर्फ एक घंटे चला. बुरहान जो कि एचएम कमांडर था और उसकी कथित 'रेपुटेशन' को देखा जाए तो ये एनकाउंटर देर तक चलना चाहिए था. बुरहान को ज़िंदा क्यों नहीं पकड़ा गया, इस सवाल पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एडीजीपी, सीआईडी, एस एम सहाय ने कहा कि ‘हम अपनी सोसाइटी के युवाओं को मारना नहीं चाहते. अगर ज़िंदा पकड़ा जा सकता तो ऐसा ज़रूर किया गया होता.’
बुरहान से ज्यादा उसकी मौत ने किया नुकसान जैसा कि उमर अब्दुल्ला ने अपने ट्वीट में भी कहा, 'लोग भी ऐसा मान रहे हैं कि बुरहान सोशल मीडिया पर अपनी एक्टिविटी के ज़रिए जितने लोगों को रिक्रूट करता उससे ज़्यादा लोग उसकी मौत की वज़ह से मिलिटेंसी में आ जाएंगे.' अनंतनाग से त्राल आए गुलाम मुहम्मद ने कहा, 'कल ही कम से कम दर्जनों लड़कों ने मिलिटेंसी जॉइन की होगी.'
इसके अलावा जो हालात खराब हुए हैं, उसके बारे में जो कहा जाए कम है. हड़ताल जारी है. टूरिस्ट्स वापस लौट रहे हैं, अमरनाथ यात्रा स्थगित हो चुकी है, 19 जानें जा चुकी हैं. और न जाने कितनी जानें जाने का डर बना हुआ है. किसी को नहीं पता ये स्थिति कब तक जारी रहेगी. एडमिनिस्ट्रेशन के लोग रोना रो रहे हैं कि उन्हें पता नहीं था हालात इतने खराब हो जाएंगे.शनिवार देर शाम जम्मू कश्मीर सरकार ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के हवाले से स्टेटमेंट जारी कर पुलिस व फोर्सेज से स्टेंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर अमल में लाने की अपील की. इसके अलावा इस स्टेटमेंट में ये भी माना गया कि ज़रूरत से ज़्यादा फोर्स के इस्तेमाल की वजह से इतनी अधिक संख्या में जानें गई हैं. सूबे के इंटेलिजेंस चीफ सहाय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में माना कि मुख्यमंत्री मुफ्ती को बुरहान के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन के बारे में खबर थी.
























