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करण जौहर ने माना उनकी फिल्म बेवकूफाना थी, आप भी मान लो

'हीरो कहता है जिंदगी में एक बार प्यार होता है. और खुद ही दो बार प्यार करता है.'

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फोटो - thelallantop
'कुछ कुछ होता है' तो देखी ही होगी? कुछ लोगों ने तो कई बार देखी. जिनमें मैं भी शामिल हूं. ख़ास फेवरेट नहीं थी फिल्म, पर टीवी पर इतनी बार आई, कि डायलॉग याद हो गए थे. गिनकर 10-12 चैनल आते थे छोटे शहरों के लोकल केबल कनेक्शन पर. उनपर गिनकर 10-12 फ़िल्में. खाना खा रहे हों, होमवर्क कर रहे हों, या किताबों पर कवर चढ़ा रहे हों. बस वही डब्बा टीवी और उसपर आने वाली फ़िल्में दोपहर काटने का सबसा अच्छा तरीका थीं. जब 'कुछ कुछ होता है' आई, देश के युवा का एक ही नारा था. 'प्यार दोस्ती है.' और फ्रेंडशिप बैंड का तो ऐसा खुमार छाया कि हर स्कूल में इंतजार होने लगा फ्रेंडशिप डे का. kuch kuch hota hai बीते दिनों जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान करण जौहर ने कहा,
'कुछ कुछ होता है बड़ी ही बेवकूफाना फिल्म थी. कोई मां अपनी बेटी को आठ ख़त क्यों लिखेगी. और लिख भी दे तो आठ साल की बच्ची उन्हें पढ़ेगी कैसे? समझ भी पाएगी? लेकिन फिल्म लिखते समय इतनी लगन थी, कि वो सब ठीक लगता था.'
करण ने ये भी कहा:
'हीरो कहता है कि जिंदगी में प्यार एक बार होता है, शादी एक बार होती है. और खुद दो बार प्यार और शादी करता है. पिक्चर के बारे में सबकुछ गलत ही था. लेकिन उस समय इस भाव से फिल्म लिखी थी कि ये सब कुछ सोचा ही नहीं. जब मैंने फिल्म लिखी तब मैं 24 का था. राज कपूर और यश चोपड़ा के सिनेमा से इंस्पायर था. आज मैं कुछ कुछ होता है या कभी खुशी कभी ग़म जैसी फ़िल्में देखता हूं तो सोचता हूं कि इन्हें क्यों लिखा.'
अगर उन फिल्मों की बात करें जिन्होंने शाहरुख़ खान को वो बनाया है जो वो हैं, तो 'कुछ कुछ होता है' फिल्म उनमें से एक होगी. एक ताज़ी फिल्म, जिसमें आधुनिक कॉलेज लाइफ दिखती है. जहां इश्कबाजी खूब चलती है. जहां लड़कियां छोटी स्कर्ट पहन के आती हैं और लड़के फ्रेंडशिप बैंड बांधते फिरते हैं. ये बात अलग है कि इन कॉलेजों में कोई पढ़ाई-लिखाई नहीं होती. 90s का दौर वो समय था जब हम इस तरह की ताज़ी फ़िल्में देख रहे थे. जिसमें परिवार, मां-बाप के बजाय दोस्त और इश्क ज्यादा दिख रहे थे. ये परिवर्तन सिर्फ फिल्मों में नहीं, विज्ञापनों में भी दिख रहा था. हर प्रोडक्ट युवा वर्ग को टारगेट कर रहा था. हर जगह प्यार की जीत हो रही थी.
लेकिन जीत प्यार की हो रही थी, या पुरुष की, ये बात आज सोचने लायक है. करण कहते हैं कि एक बार उनसे शबाना आजमी ने पूछा, 'जबतक लड़की के छोटे बाल थे, हीरो को उससे प्यार नहीं हुआ. जब बाल बढ़ाकर उसने साड़ी पहन ली, उससे प्यार हो गया?' करण कहते हैं इस सवाल ने उन्हें निरुत्तर कर दिया. और उन्होंने कहा, 'मेरे पास इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है.' पूरी फिल्म हीरो के मुताबिक चलती है. उसे क्या चाहिए, उसे किससे प्यार है. प्यार उसी से होता है जो समाज की गढ़ी हुई 'औरत' की परिभाषा में फिट हो सके. 'कुछ कुछ...' फिल्म में अंजलि टॉमबॉय थी. प्रॉपर 'लड़की' होती तो राहुल को उससे पहले ही प्यार हो गया होता. लेकिन टीना सेक्सी लड़की थी, लड़कियों जैसी. लंबे बाल वाली. इसलिए राहुल, टीना के लिए अंजलि को छोड़ देगा.
राहुल को अंजलि से प्यार होगा, लेकिन तब, जब अंजलि औरत बन चुकी होगी. तब वो उसे दूसरे मर्द से छीन लाएगा. और अंजलि की खुद की कोई ओपिनियन, कोई इच्छा नहीं होगी. राहुल ने छोड़ा तो दूसरे लड़के के पास जाएगी. राहुल वापस आ गया तो उसकी हो जाएगी. ये वही दौर है जब हीरो हिरोइन का पीछा करे, उसका हाथ पकड़ ले, कलाई मोड़ दे, ब्लैंक कॉल करे, सब कुछ जायज होता था. तू हां कर, या न कर, तू है मेरी किरन. फिल्मों में हिरोइन की 'हां', या कंसेंट का कोई मतलब ही नहीं. प्रेमी का मतलब स्टॉकर. जितना अच्छा स्टॉकर, उतना अच्छा प्रेमी. और 'ना ना करते प्यार' लड़की कर ही बैठती है. लड़का जितना ज्यादा पीछा करे, लड़की के ऊपर उतना ही प्रेशर बनता है उसे हां कहने का. वरना ऑडियंस कहती, 'कितनी पत्थरदिल लड़की है, लड़का इतना प्यार करता है, फिर भी नहीं मानती.' हिरोइन का किरदार हीरो से छोटा होना आज तक आम बात है. खासकर तब, जब हीरो 'खान' जैसा कोई सुपरस्टार हो. लव स्टोरी हो या एक्शन फिल्म, पुरुष प्रधान रहती है.
अगर आज करण जौहर ये मानते हैं कि उनकी फ़िल्में एक घटिया विचारधारा पर बनी थीं, तो ये अच्छी बात है. ये इस बात का सबूत है कि फ़िल्मकार के रूप में वो मैच्योर हो गए हैं.

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