एक फिल्म आई थी 'तेरे नाम'. निहायती घटिया थी. लेकिन थी सुपर हिट. सुपर हिट थी दो कारणों की वजह से. एक, उसमें सलमान खान थे. दो, उसमें हीरो को पागलपन की हद तक प्यार था. फिल्म घटिया थी क्योंकि ये साबित करती थी कि हिंसा, किडनैपिंग और धमकियों से एक लड़की का प्यार पाया जा सकता है. फिल्म का हीरो पूरे कॉलेज का हीरो है. अमीर है, गुंडा है, बिगड़ैल है. लड़की गरीब है, सीधी है. चूंकि लड़की गरीब और सीधी है. और चूंकि वो एक लड़की है, उसका लड़के से 'पट' जाना जरूरी है. आखिर उसमें ऐसा क्या है कि उसे राधे भैया न पटा सकें. और उसकी औकात ही क्या है जो राधे भैया को 'ना' कह सके. जरूर उसके मन में छुपा हुआ प्यार होगा. जरूर वो सिर्फ अपने बाप से डरती होगी. क्योंकि जो लड़की राधे भैया से प्यार न करे, वो तो इंसान हो ही नहीं सकती. तो उसे किडनैप करेंगे. और उसका प्यार कबूल करवाएगें. वो अपना प्यार खुद चुन सके, अपनी इच्छाएं खुद नुमाया कर सके, इतनी लायक वो कैसे हो सकती है. फिर राधे भैया 'पागल' हो जाते हैं. सब राधे भैया के लिए रोते हैं. राधे भैया प्यार में पागल हुए थे न. लड़की की वजह से. राधे भैया का मानसिक संतुलन खोना आपके मन में करुणा पैदा करे, ये जरूरी है.
एक बड़े और लगातार फ्लॉप फिल्में कर रहे एक्टर ने कहा, कंगना रनोट 'साइको' हैं. लेकिन प्यार (या किसी भी कारण से 'पगलाई') कंगना के 'साइको' होने में ये जरूरी था कि आपके मन में करुणा न उपजे. आपके मन में नफरत उगे. और चूंकि कंगना एक 'साइको' का किरदार निभा चुकी हैं, पब्लिक के लिए उनकी एक 'पागल' के रूप में कल्पना करना आसान काम है. पब्लिक के लिए आसान है कि कंगना को शराब पीते, चीखते और गाली देते हुए इमैजिन करे. चूंकि कंगना अपने सेक्स संबंधों के बारे में खुल कर बोलती आई हैं, ये आसान है कि उन्हें एक सेक्स का मरीज या सेक्स के लिए तड़पती एक औरत के रूप में इमैजिन किया जाए.
कंगना ने ऋतिक को ईमेल लिखे, ऐसा बताया गया. स्क्रीनशॉट दिखाए गए. ये ईमेल झूठे हो सकते हैं. सच्चे भी हो सकते हैं. मुमकिन है ऋतिक ने इनका कोई जवाब न दिया हो. ये भी मुमकिन है कि चालाकी से ऋतिक के जवाबों को मिटा दिया गया हो. कोई सच नहीं जानता. ऐसी स्थति में हमें सच का एक वर्जन चुनना पड़ता है. और जो वर्जन मीडिया से ले कर देश ने चुना, वो ये कि स्क्रीनशॉट सच हैं. क्योंकि गलत चीजों पर जल्दी यकीन करना हमारी फितरत है. अगर इन इमेल्स में 'गलत' जैसा सचमुच कुछ रहा हो तो. ऋतिक और कंगना के मेल्स को हमने खूब भुनाया. प्रत्यूषा की मौत के बाद हमारे लिए ये सबसे मनोरंजक खबर थी.
बात पागलपन की. सिर्फ पागलपन नहीं, 'औरतों' के पागलपन की. हमारी सोसाइटी में जब एक मर्द 'पागल' होता है, वो सिर्फ एक 'पागल' होता है. एक जोकर, एक अधनंगा, बड़बड़ाता हुआ आदमी जिसपर आप हंस सकते हैं. मजाक उड़ा सकते हैं. लेकिन एक औरत का 'पागल' होना, एक 'औरत' का 'पागल' होना होता है, न कि एक इंसान का. जब औरत बड़बड़ाती है, वो खतरा बनती है. वो चुड़ैल बन जाती है. उसके अंदर भूत आ जाता है. उसे पीटना चाहिए. जला देना चाहिए. जिससे उसके अंदर आया भूत नष्ट हो जाए. मर्द का पागल होना मात्र 'एब्नार्मल' है. लेकिन औरत के पागलपन को 'एब्नार्मल' जैसे किसी शब्द में कैद नहीं किया जा सकता. उसका पागलपन 'सुपरनेचुरल' है.
ऋतिक से 'साइको' कहलाने के बाद, कंगना को चुड़ैल साबित करना अगला कदम होना चाहिए. इसलिए जरूरी है कि अध्ययन सुमन जैसा कोई व्यक्ति आए, और कंगना को चुड़ैल साबित कर सके. ये बात कि कंगना पागल है, मीडिया में एस्टेब्लिश हो चुकी थी. ज़मीन तैयार थी. अध्ययन को बस चौका लगाना था. और उन्होंने लगाया. उनकी कही बातें 2-3 दिन तक सुर्ख़ियों में रहीं. हमने टीवी पर ये भी देखा कि सलमान के शो में कैसे कंगना को 'पिशाचिनी' कहा गया. एक समाज के तौर पर हमारी पूरी कोशिश रही कि अध्ययन की बातों को हम सच मान सकें. कि कोई ऐसा सिरा मिल जाए जिसे पकड़ कर इस बात तक पहुंचा जा सके कि कंगना सचमुच काला जादू करती हैं. हमारी कलेक्टिव दिमागी भूख को शांत करने के लिए जरूरी था कि कहीं न कहीं से कुछ न कुछ तो साबित हो ही जाए. ताकि सारे तार जुड़ सकें. और हमें एक कहानी मिल सके. अच्छी कहानियों को चटखारे ले कर पढ़ना हमें अजीब सा सुख देता है.
हमारी बॉलीवुड वाली सोच तभी शांत होती है जब कहानियों को अंत मिल जाएं.
हमारे यहां एक सभासद मैडम हुआ करती थीं. नारे लगातीं. जमकर भाषण देतीं. चीखकर बात करतीं. लोग कहते, जरूर इनके पति इनकी सेक्स की आग शांत नहीं कर पाते होंगे. औरत अगर मुंहफट और बड़बोली है तो उसके बारे में ये मानी हुई बात है कि वो बिस्तर में डॉमिनेट करती होगी. जरूर जमकर सेक्स करती होगी. जरूर एक मर्द उसको पूरा न पड़ता होगा. जरूर वो मर्दों को निगल जाने की क्षमता रखती होगी. ठीक वैसे ही जैसे चुड़ैल करती हैं. ऐसे में मर्द दया का पात्र हो जाते हैं. जैसे ऋतिक या अध्ययन. लगातार गिर रही लोकप्रियता और बुरी फिल्मों की बदनामी से बचने का ये सबसे आसान तरीका है. अपनी प्रेमिका को पागल कह सिम्पथी हासिल कर लेना. इस बात का ये निष्कर्ष न निकला जाए कि कंगना ने वो ईमेल लिखे ही नहीं. या कंगना ने गालियां नहीं दीं. क्योंकि उनका कोई प्रूफ नहीं है हमारे पास. जो बात खटकती है, वो ये कि इसे पागलपन से जोड़कर क्यों देखा जाए. कंगना को पब्लिक में चुड़ैल तो पुकारा जा ही चुका था. इंतजार इस बात का था कि उनका बहिष्कार कर उनका करियर खत्म कर दिया जाए. लेकिन अफ़सोस, ऐसा हुआ नहीं. क्योंकि एक अच्छी चुड़ैल की तरह कंगना ने मुंह खोल दिया. बीती शाम राहुल कंवल को दिए एक इंटरव्यू में कंगना ने कहा:
"मैं किसी भी चीज से शर्मिंदा नहीं हूं. शर्मिंदा होना मेरी बनावट में है ही नहीं. मुझे तकलीफ इस बात से नहीं है कि मुझे चुड़ैल बुलाया गया. मुझे तकलीफ इस बात से है कि चुड़ैल या मानसिक असुंतलन को गाली की तरह क्यों देखा जाता है. मुझे तकलीफ इस बात से नहीं है कि मेरे पीरियड के खून को पब्लिक में डिस्कस किया गया. तकलीफ इस बात से है कि पीरियड के खून को खराब क्यों माना गया."
इंटरव्यू की शुरुआत में कंगना ने कहा था, अपने 'इंस्टिंक्ट' की सुनती आई हैं वो. ये इंस्टिक्ट इमोशनल लोगों की पहचान होते हैं. उनकी पहचान होते हैं जो सोचे-समझे फैसले न ले कर दिल की सुनते हैं. जो अराजकता में यकीन रखते हैं. जो बंधते नहीं. जो एब्नार्मल या सुपरनेचुरल कहलाने में शर्मिंदा महसूस नहीं करते. जो भूत और चुड़ैल हो सकते हैं. राधे भैया वाली उसी 'तेरे नाम' में एक लड़की भी थी, साइड रोल में. जो पागल थी. लड़के जिसका रेप करना चाहते थे.
हां, कंगना, तुम चुड़ैल हो. मुझे इस बात पर गर्व है.
जब बड़ी हो रही थी तो ये डर था कि अगर फ़ेल हुई तो मुझे रंडी, डायन या पागल करार दिया जायेगा : कंगना चुड़ैल बताकर हमने 156 औरतों को मार डाला खुला ख़त: कंगना, अब थैंक यू बोलो अौर आगे बढ़ जाअो