उत्तर प्रदेश का चुनाव दिन पर दिन जटिल होता जा रहा है. नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (U) ने अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (RLD) से हाथ मिला लिया है. और उनके बेटे जयंत चौधरी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया है. इसके पहले कयास लगाये जा रहे थे कि राष्ट्रीय लोक दल का विलय समाजवादी पार्टी में हो सकता है. पर अजित सिंह ने इनकार कर दिया था.
उत्तर प्रदेश की संसदीय सीटों ने भारत को कई प्रधानमंत्री दिये हैं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, चौधरी चरण सिंह और अब नरेंद्र मोदी. पर चौधरी चरण सिंह को छोड़कर इनमें से किसी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति नहीं की है. चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया. ये प्रदेश हमेशा दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करता रहा.
जयंत चौधरी की जड़ें कांग्रेस से आ रही हैं, चौधरी चरण सिंह की नेतागिरी से
हापुड़ के चरण सिंह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही एक्टिव हो गये थे. दो बार जेल भी गये. उसी दौरान किसानों की समस्याओं को उठाना शुरू कर दिया. गोविंद बल्लभ पंत जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब चरण सिंह पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी और फिर रेवेन्यू मिनिस्टर के रूप में लैंड रिफॉर्म का काम देख रहे थे. पर इनका वक्त आया 1959 में. जब इन्होंने नागपुर कांग्रेस में प्रधानमंत्री नेहरू की सोशलिस्ट लैंड पॉलिसी का विरोध किया. कि को-ऑपरेटिव लैंड पॉलिसी इंडिया में नहीं चलेगी. इससे इनकी स्थिति कांग्रेस में तो कमजोर हो गई. पर इनकी अपनी राजनीति चमक गई. ये किसानों के नेता बन गये. वैसे किसान जो सरकारी पॉलिसी का फायदा उठाकर उभर रहे थे और जिनको एक नेता की जरूरत थी, उनको चरण सिंह मिल गये.

चौधरी चरण सिंह
चरण सिंह ने कांग्रेस का सामना करने के लिये जाति का एक फॉर्मूला AJGAR लिया. मतलब अहिर, जाट, गुज्जर और राजपूत. ये फॉर्मूला गुलाम भारत में दिये सर छोटू राम का फॉर्मूला था. इसका मतलब था कि ये सारी जातियां क्षत्रिय वर्ग से जुड़ी मानी जाती हैं. इसलिये इन सबको एक साथ रहना चाहिये.
1967 में चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दिया. और अपनी अलग पार्टी भारतीय क्रांति दल बना ली. राम मनोहर लोहिया के चेले रहे. राज नारायण के राजनीतिक मित्र. तो उसी साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बन गये. 1974 में इनको भारतीय लोक दल का नेता चुन लिया गया. ये दल सात पार्टियों को मिलाकर बना था. इंदिरा गांधी के विरोध में. 1975 में इमरजेंसी के दौरान जेल भी गये.
जब इमरजेंसी खत्म हुई तो चुनाव हुये. इंदिरा के विरोध में बनी जनता पार्टी को जीत हासिल हुई. भारतीय लोक दल इस पार्टी का बड़ा हिस्सा था. पर पॉलिटिक्स के चलते चरण सिंह को प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया. हालांकि डिप्टी प्रधानमंत्री और डिफेंस मिनिस्टर जरूर रहे. फिर 1979 में राजनीति के ही चलते इनको प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला. 24 दिन के लिये. जीके का प्रश्न बन गये. कि एकमात्र प्रधानमंत्री जो संसद का मुंह भी नहीं देख पाये. 1987 में इनकी मौत हो गई. इनकी राजनीति कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही. कभी पक्ष में, कभी विपक्ष में.
पर अजित सिंह ने हर सरकार में अपनी जगह बनाई
पर इनके बेटे अजित सिंह ने अपनी अलग राजनीति शुरू की. लोक दल (A) के प्रेसिडेंट रहे. इनकी कोई विचारधारा नहीं थी. 1989 में ये पहली बार लोकसभा पहुंचे. वी पी सिंह की सरकार में मिनिस्टर ऑफ इंडस्ट्री रहे. फिर 1991 के चुनाव में फिर लोकसभा पहुंचे. और अबकी पी वी नरसिंहा राव की सरकार में मिनिस्टर ऑफ फूड रहे.

अजित सिंह
1996 में फिर लोकसभा पहुंचे. पर 1998 में हार गये. उसके बाद राष्ट्रीय लोक दल के नाम से अपनी पार्टी बना ली. 1999, 2004, 2009 में भी जीते. 2001-03 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मिनिस्टर ऑफ एग्रिकल्चर रहे. 2011 में अजित सिंह ने मनमोहन सिंह की सरकार जॉइन कर ली. मिनिस्टर ऑफ सिविल एवियेशन रहे.
अब बारी थी लंदन से पढ़े जयंत चौधरी की
कैसा होता है किसी प्रधानमंत्री का नाती होना? ये जयंत चौधरी से बेहतर कौन बता सकता है? वो नाती, जो दादा के प्रधानमंत्री बनने के ठीक 6 महीने पहले पैदा हुआ था.

जयंत चौधरी
उसके बाद अजित सिंह ने अपने बेटे जयंत चौधरी को आगे बढ़ाना शुरू किया. पिताजी आईआईटी से पढ़े थे. बेटा लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से पढ़ा. 2009 में जयंत मथुरा से लोकसभा पहुंचे थे. हालांकि 2014 में हेमा मालिनी से हार गये.
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के साथ जयंत चौधरी भी युवा नेताओं में गिने जा रहे थे. अमेरिका में पले-बढ़े जयंत इन्वेस्टमेंट बैंकर हुआ करते थे. गिटार बजाना और गाना गाने वाले नौजवान थे. वेस्टर्न उत्तर प्रदेश से नेता हुये, जहां पर जाति को लेकर बहुत पंगा है. पर जयंत ने एक पंजाबी लड़की चारु सिंह से शादी की है. चारु भी 2017 के चुनाव में कैंडिडेट होंगी.

चारु चौधरी
जयंत अपने पापा के बजाय दादा के बारे में ही बात करते हैं. नाम में भी चौधरी जोड़ लिया. काम में हर जगह दादा की ही लीगेसी बढ़ाते हैं. संसद में रहते हुये लैंड एक्विजिशन बिल लेकर आये. 2011 में जब दिल्ली के किसानों ने दिल्ली लैंड एक्विजिशन बिल के खिलाफ प्रदर्शन किया तो जयंत चौधरी इसके पक्ष में खड़े हुये थे.
2014 में लोकसभा प्रचार करते हुये जयंत ने 'बढ़ो विकास की ओर' पदयात्रा शुरू की थी. जिसमें उनके पापा अजित सिंह का नामो-निशान नहीं था. लेकिन दादा चरण सिंह के बड़े-बड़े पोस्टर लगे हुये थे. हालांकि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाटों का वोट इनको नहीं मिला. बीजेपी को चले गये वोट.
सबसे मजेदार बात ये है कि जयंत चौधरी और अखिलेश यादव दोनों ही उस लोहिया की राजनीति संभाल रहे हैं, जिन्होंने वंशवाद के खिलाफ झंडा खड़ा किया था.
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