Opinion: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग छोड़ें, सीधे PM मोदी से उन्हें हटाने की डिमांड करें लेकिन कैसे?
जिस मंत्री को आप आज नहीं हटा सकते, उसे उस लाइन के लिए बचाकर रखें जहां आपके पास पूरी ताकत होती है- वोटिंग बूथ की लाइन. उसका इस्तीफा उसकी मर्जी है. उसे हटाना आपकी मर्जी है. अगर आप इंतजार नहीं कर सकते, तो जिसे आपने चुना है, उससे जवाबदेही मांगें.
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धर्मेंद्र प्रधान (दाएं) के इस्तीफे पर अड़े प्रदर्शनकारी. (PTI)
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यह लेख युवाओं को आग्रह करता है कि वे नेताओं से इस्तीफा मांगने के बजाय अपने चुने हुए सांसदों के माध्यम से आरोपों और मांगों को संसद में दर्ज कराएं।
लेख का संदर्भ है कि राजनीतिक नेताओं के पद छोड़ने का निर्णय उनकी निजी मर्जी का विषय होता है और बिना औपचारिक प्रक्रिया के केवल प्रदर्शन करना प्रभावी राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है।
इस प्रस्तावित प्रक्रिया का प्रभाव यह होगा कि मांगें संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज होंगी जिससे अधिकारियों पर दबाव बढ़ेगा और लोकतांत्रिक तरीकों से जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
20 जुलाई 2026 (अपडेटेड: 20 जुलाई 2026, 10:51 AM IST)
इस्तीफा देने का दौर खत्म हो चुका है
इस्तीफे की मांग करना बंद करें. इस्तीफा अपनी मर्जी से दिया जाता है, और अपनी मर्जी से दिए जाने वाले कामों के लिए शर्म की जरूरत होती है. भारतीय राजनीति में शर्म ने कई चुनाव पहले ही अपनी मर्जी से रिटायरमेंट ले लिया था. आज के नेता से इस्तीफे की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे किसी नेता से यह उम्मीद करना कि वह लोगों को बांटने का काम न करे. और वह ऐसा नहीं करेंगे, धर्मेंद्र प्रधान तो बिल्कुल नहीं.
उन्हें पद से हटाने की मांग करें. एक मंत्री असल में प्रधानमंत्री की मर्जी से काम करता है, और नाराजगी पूरी तरह से प्रधानमंत्री के हिस्से में जाती है. अपनी मांग बॉस से करें. बॉस काम करता है आपकी यानी वोटर की मर्जी से, जो हर 5 साल में रिन्यू होता है. यही कमांड की चेन है. इसे खींचें. अब प्रश्न है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले क्या करें?
आपके और बॉस के बीच आपका अपना कर्मचारी खड़ा है. वो है सांसद (Member of Parliament), जिसे आपने सीधे चुना है. उस कर्मचारी से काम करवाएं. उनके ऑफिस तक मार्च करें, यह ज्यादा असरदार होगा. क्योंकि यह पूरे देश में होगा, ना कि सिर्फ दिल्ली के हाइड पार्क जैसे कुछ चुनिंदा इलाके तक सीमित रहेगा. आपके आंदोलन को 'राष्ट्रव्यापी' होने का दर्जा मिलेगा.
उन्हें मजबूर करें कि वे लोकसभा में आपकी मांग को रिकॉर्ड पर लाएं. जोश-ओ-खरोश में लगाया गया नारा तो हवा में गायब हो जाता है, लेकिन संसद में दर्ज मांग हमेशा के लिए कार्यवाही का हिस्सा बन जाती है और सही समय पर किसी को शर्मिंदा करने के लिए इंतजार करती है. सांसद यह दावा नहीं कर सकता कि उसने आपको रिप्रेजेंट किया है. फॉर्मल भाषा की जरूरत होती है क्योंकि डेमोक्रेसी एक सिस्टम है, और सिस्टम अपने आप में फॉर्मल होते हैं.
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प्रोटेस्ट करें, बिल्कुल करें. लेकिन पेपरवर्क के साथ प्रोटेस्ट करें. अपने प्लेकार्ड के साथ एक लिखी हुई मांग भी सौंपें. बिना दस्तावेज के विरोध का मतलब सिर्फ शोर-शराबा है. इस शोर को नजदीकी पुलिस स्टेशन गैर-कानूनी घोषित कर सकता है और पार्टी इसे खारिज कर सकती है. लिखित कागज के बिना 'युवाओं की मांग' महज 'मांग कर रहे युवाओं के झुंड' में सिमट जाती है. फेफड़ों की ताकत कम हो जाती है. इस कागज-प्रधान सिस्टम में पेपर बच जाता है.
याद रखें कि लोकतंत्र शब्द किसके साथ आता है- प्रतिनिधि यानी रिप्रेजेंटेटिव के साथ. एक रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी में आपको अपने चुने हुए प्रतिनिधि के जरिए अपनी बात रखनी चाहिए, ना कि खुद को 'जनता' का प्रवक्ता बताने वाले के जरिए. देश की स्व-घोषित आवाजों का उतना ही आधिकारिक वजन होता है, जितना स्वयंभू बाबाओं का.
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स्वयंभू बाबाओं के अनुयायी होते हैं जो उनके लिए जान भी दे सकते हैं, लेकिन बाबाओं के फायदे के लिए. कुछ स्वार्थी, भीड़ जुटाने वाले और लोकलुभावन बातें करने वाले लोग होंगे जो आपकी पीठ पर सवार होकर अपनी अहमियत साबित करेंगे.
आप घर चले जाएंगे. वे भी घर चले जाएंगे. सिस्टम तब तक नहीं बदलेगा, जब तक आपको असली तरीके पता ना हों. सिस्टम आपकी बात तभी सुनता है जब आप उसके दिए गए माइक्रोफोन से बोलते हैं. माने, आपका चुना हुआ प्रतिनिधि, आपका वोट.
(PTI)
जिस मंत्री को आप आज नहीं हटा सकते, उसे उस लाइन के लिए बचाकर रखें जहां आपके पास पूरी ताकत होती है- वोटिंग बूथ की लाइन. उसका इस्तीफा उसकी मर्जी है. उसे हटाना आपकी मर्जी है. अगर आप इंतजार नहीं कर सकते, तो जिसे आपने चुना है, उससे जवाबदेही मांगें. वह सबके सामने बिना दिखे मजे कर रहा है. तो खाली हवा में बातें ना करें.
किसी खास व्यक्ति से सीधे बात करें. उससे साफ-साफ मांग रखें. आपकी आम असहमति को आम असहमति ही माना जाएगा. तो, आपके जुनून और जोश के लिए शाबाशी. ऐसा पहले भी हुआ है. आगे भी होगा. भले ही वह नाकाम इंसान इस्तीफा दे भी दे, कुछ हल नहीं निकलेगा, सिवाय आपके गुस्से को शांत करने के. गांजा भी तो यही करता है.
चीज़ों को यहां से देखें. लाल झंडे वालों ने अपनी कल्पनाओं को बढ़ाने के लिए ग्रीन स्टफ का इस्तेमाल किया है. अबआगे बढ़ें. उम्मीद है कि इससे कुछ निकलेगा. लेकिन, उम्मीद कोई स्ट्रैटेजी नहीं है. बस एक छोटी सी याद दिलाने वाली बात है.
आपके पास दो ऑप्शन
अब आपके पास दो ऑप्शन हैं- ऊपर लिखी बातों को 'कोट अनकोट जस्टिफिकेशन' मानकर खारिज कर दें. व्हाट्सऐप अंकल की बकवास, बोरिंग संघी बातें, कुछ गालियां देकर अच्छा महसूस करें. या फिर सोच-समझकर उस मकसद का समर्थन करें जिसे आप चाहते हैं.
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जिस सरकार का आप विरोध करना चाहते हैं, उसका विरोध करें. लेकिन इसके लिए जो जरूरी है, वह करें. अपनी भावनाओं की कद्र करें और उसके लिए सब कुछ दांव पर लगाएं. इसमें बहुत कुछ लगेगा, इसलिए सब कुछ देने के लिए तैयार रहें. अगर आप किसी नेता की तलाश में हैं, तो आप खुद नेता बनने के लिए तैयार नहीं हैं. तो, नेता आपको जहां भी घुमाने ले जाए, वहां चले जाएं. खुश रहें.
हक आपका, तो सबूत भी आपको देना है
किसी को यह कहने का मौका ना दें कि प्रोटेस्ट करना मौजूदा सरकार की तरफ से दिया गया कोई एहसान है. ऐसा नहीं है. संविधान का आर्टिकल 19 हर नागरिक को बोलने और शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार देता है. इसके लिए किसी मेंबरशिप, भीड़ की मिनिमम संख्या या किसी की इजाजत की जरूरत नहीं होती. यह अधिकार व्यक्तिगत है. आप अकेले, एक प्लेकार्ड और दो पक्के इरादों के साथ संवैधानिक तौर पर इसके लिए परिपूर्ण हैं.
लेकिन यहां एक पेंच है. विरोध करने का अधिकार ‘व्यक्तिगत’ है, लेकिन मांग की ताकत ‘सामूहिक’ होती है. और सामूहिक ताकत के लिए साख (क्रेडेंशियल्स) की जरूरत होती है. जैसे ही आप कहते हैं कि 'युवाओं की मांग है', तो सरकार का पहला रिएक्शन कोई जवाब नहीं, बल्कि एक सवाल होता है.
सवाल ये कि कौन से युवा? कितने युवा? उन्हें किसने चुना है? भीड़ तो बस भीड़ होती है. जनादेश एक दस्तावेज होता है. सरकार कभी भी सीधे आपकी शिकायत पर हमला नहीं करेगी, क्योंकि शिकायत तो असली है. वह आपके रिप्रेजेंटेशन पर हमला करेगी, क्योंकि यही वह दावा है जिसे आपने साबित नहीं किया है.
इसलिए इसे साबित करें. भीड़ को एक तरह से निर्वाचन क्षेत्र में बदलें. सिर्फ फॉलोअर्स नहीं, बल्कि सिग्नेचर इकट्ठा करें. अगर यूनियन, यूनिवर्सिटी कमेटियां या कोचिंग-सेंटर के व्हाट्सऐप ग्रुप ही आपकी संसद है, तो वहां प्रस्ताव पास करें. सांसदों के जरिए ज्ञापन सौंपें ताकि आपकी मांग सिर्फ इंस्टाग्राम रील्स तक ही सीमित ना रहे, बल्कि देश के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बने.
जब लाखों परीक्षार्थी कागज पर अपना नाम लिखते हैं, तो 'युवाओं का एक झुंड' एक वोटर बेस बन जाता है. वोटर बेस एक ऐसी चीज है जिसे किसी भी मंत्री का बॉस नजरअंदाज नहीं कर सकता. क्या होगा अगर आपका सांसद आपकी बात ना सुने?
खैर, अगर आप अपने सांसद से अपनी बात नहीं मनवा सकते, तो आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार खुद झुकेगी? आपने कोशिश की तो आपका सांसद जरूर सुनेगा. क्योंकि राजनीति में उसका भविष्य सीधे आपके वोट से जुड़ा है.
जंतर-मंतर पर जरूर बैठिए. लेकिन याद रखिए कि इस साइट पर बैठने के लिए कागज पर आपको परमिशन दी जाती है. इसलिए आपकी डिमांड के लिए कागजी सबूत (पेपर ट्रेल) जरूरी है. परमिशन की मियाद खत्म होने के बाद भी कागजी सबूत आपकी सुरक्षा करता है. युवाओं के लिए आवाज कोई भी उठा सकता है. लेकिन, साबित करें कि युवाओं ने ही आपको आवाज उठाने के लिए कहा था.
और उस बैंड के बारे में एक बात जो आपकी बारात में शामिल हुआ है. कामरेड आ गए हैं, लाल झंडे और क्रांतिकारी डफली साथ में, आपके धरने को एक कल्चरल इवनिंग में बदलने के लिए तैयार हैं. म्यूजिक का मजा लीजिए, लेकिन लिरिक्स पर ध्यान दीजिए.
उन झंडों के पीछे की आइडियोलॉजी ने कभी उस डेमोक्रेसी पर भरोसा नहीं किया जिसका आप अभी इस्तेमाल कर रहे हैं. उनकी विचारधारा का सिद्धांत आपकी संसद को 'बुर्जुआ टॉकिंग शॉप' (अमीर लोगों की बकवास करने की जगह) कहती है, और जहां भी उन्हें पूरी सत्ता मिली, मॉस्को से बीजिंग तक, सबसे पहले अगला चुनाव ही बलि चढ़ा.
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यह देखना अजीब है कि उनकी गायक-मंडली एक ऐसे प्रोटेस्ट में परफॉर्म कर रही है जिसकी एकमात्र मांग यह है कि संसद ज्यादा मेहनत से काम करे. लाल झंडे वाले आपकी भीड़ पर विश्वास करते हैं, आपके संविधान पर नहीं. और उनकी मौजूदगी सरकार को उसका पसंदीदा रास्ता देती है.
जैसे ही जाने-पहचाने झंडे स्टेज पर आते हैं, आपका पेपर लीक उनका पैम्फलेट बन जाता है. आपकी एग्जाम की शिकायत को आइडियोलॉजिकल थिएटर का नाम दे दिया जाता है और मंत्री के बचाव करने वाले आपको जवाब देना बंद कर देते हैं और उनके बारे में बताने लगते हैं.
उनके इंद्रधनुषी विचार, कुणाल कामरा के जोक्स, सेक्स और वायलिन. आप परीक्षा ठीक करवाने आए थे, क्रांति के लिए ऑडिशन देने नहीं. माइक अपने पास रखें, मांग अपने पास रखें और अपने प्रोटेस्ट का कॉपीराइट भी अपने पास रखें.
प्रोटेस्ट करने का अधिकार नागरिकता के साथ मुफ्त मिलता है. गंभीरता से लिए जाने का अधिकार लिखकर कमाना पड़ता है. तो इसे लिखकर हासिल करें. लिखे हुए शब्दों की कीमत उन मौकापरस्त लोगों से कहीं ज्यादा है, जो किसी मंत्री के जमीर की लाश को सूंघकर दावत करने और किसी को उपवास करवाने के लिए उड़कर आ गए.
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
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