30 साल से ज्यादा लंबी यात्रा में दिल्ली का जंतर मंतर (Jantar Mantar History) ऐसे कई छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शनों का गवाह रहा है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ का एक कोना. असहमति की एक लंबी और छायादार सड़क. इन दिनों भी एक प्रोटेस्ट को लेकर जंतर मंतर चर्चा में है. लेकिन 'जंतर मंतर' का आविष्कार सिर्फ विरोध प्रदर्शनों या धरनों के लिए नहीं हुआ था. सदियों पहले यह एक दूरगामी वैज्ञानिक सोच का नतीजा था. कल्पनाओं में आकार लेने से लेकर अस्तित्व के साकार होने और फिर ऐतिहासिक धरोहर बनने के अपने लंबे सफर में जंतर मंतर कई कहानियां सुनाता है. तो आइए आज आपको भी सुनाते हैं कहानी इसी जंतर मंतर की, जो शायद कभी इतने बड़े-बड़े प्रदर्शनों को स्थान नहीं दे पाता अगर दिल्ली के बीचोबीच पांच लाख किसान और उनके गायों ने कब्जा ना किया होता.
तारे गिनने के लिए बना जंतर मंतर कैसे बना दिल्ली में 'विरोध प्रदर्शनों' का सबसे बड़ा ठिकाना?
Jantar Mantar History: जंतर मंतर पर चल रहे प्रोटेस्ट की आज देश ही नहीं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चर्चा हो रही है. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि एक समय में इस जगह का निर्माण तारों की गणना के लिए हुआ था.


दिल्ली का जंतर-मंतर ना ही कोई मकबरा है और ना कोई मंदिर. ना तो इसमें मुगल शैली की सजावट है और न ही हिंदू मंदिरों में मिलने वाले धार्मिक प्रतीक. ना ही इसके ऊपर गुंबद हैं और ना कोई बारीक जालीदार नक्काशी. वास्तुकला के लिहाज़ से यह भारतीय उपमहाद्वीप की पारंपरिक स्थापत्य परंपरा से कुछ अलग-सा लगता है. लाल चूने के पलस्तर से रंगा यह स्मारक आकार में पूरी तरह ज्यामितीय है. ज्यामितीय यानी जियोमैट्रिकल. पहली नज़र में यह अपने समय से आगे की चीज़ लगता है यानी मध्यकालीन के बजाए आधुनिक वास्तुकला का कोई नमूना.
Janta Mantar का इतिहास है दिलचस्पजब इस इमारत को हम 18वीं सदी के शुरुआती दौर की ऐतिहासिक परिस्थितियों में रखकर देखते हैं तब इसका वास्तविक उद्देश्य समझ आने लगता है. ये वो समय था जब राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, वैज्ञानिक जिज्ञासाएं और ज्ञान को लेकर कई बहसें चल रही थीं और विचार एक-दूसरे से टकरा रहे थे. दिल्ली का यह जंतर मंतर, आमेर के राजपूत शासक सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई पांच वेधशालाओं में सबसे पहला था. वेधशाला का मतलब Observatories. बाद में जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी ऐसी वेधशालाएं बनाई गईं. दिल्ली स्थित जंतर मंतर का निर्माण 1724 में पूरा हुआ था. इसे शाहजहानाबाद के दक्षिण में बनवाया गया और उस समय के मुगल सम्राट के लिए एक उपहार के रूप में देखा गया.
कुछ विद्वान इसे पूरी तरह भारतीय खगोल विज्ञान की परंपरा का हिस्सा मानते हैं. कुछ इसे समरकंद की वेधशालाओं और इस्लामी खगोलीय परंपराओं से जोड़कर देखते हैं. वहीं कुछ शोधकर्ताओं को इसमें यूरोप का प्रभाव भी नजर आता है.
'जंतर मंतर' नाम कैसे पड़ा?Enroute Indian History के लिए एक लेख 'Why Jantar Mantar Was More Than Just an Observatory' में श्रेया कंबोज लिखती हैं कि सवाई जय सिंह द्वितीय की सभी पांच वेधशालाओं को आज आमतौर पर 'जंतर मंतर' कहा जाता है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जयपुर रियासत के आधिकारिक अभिलेखों में यह नाम मिलता ही नहीं है.
'Sawai Jai Singh and His Astronomy' के लेखक वी.एन. शर्मा के अनुसार, दस्तावेज़ों में लगातार 'जंत्र' शब्द का प्रयोग मिलता है. यह संस्कृत से निकला शब्द है, जिसका अर्थ खगोलीय उपकरणों से जुड़ा है. आज जो शब्द चलन में है यानी 'जंतर' संभवतः 'जंत्र' या 'यंत्र' का बोलचाल वाला रूप है, जबकि 'मंतर' या तो तुक मिलाने के लिए जोड़ा गया होगा, जैसा कि हिंदुस्तानी भाषा में अक्सर होता है, या फिर यह 'मंत्र' शब्द से जुड़ा हो सकता है, जिसका अर्थ 'पवित्र उच्चारण' या 'जादुई शब्द' होता है.
दिलचस्प बात यह भी है कि दिल्ली की वेधशाला के लिए 'जंतर मंतर' नाम का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख दो सौ वर्ष से भी पहले मिलता है. 1803 में इस स्थल का दौरा करने वाले मेजर विलियम थॉर्न ने अपने विवरण में इस नाम का इस्तेमाल किया था. इससे यह संभावना बनती है कि 'जंतर मंतर' शब्द सबसे पहले दिल्ली में स्थानीय रूप से प्रचलित हुआ. बाद में यही नाम जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी की अन्य वेधशालाओं के लिए भी इस्तेमाल होने लगा.
एक विवाद से पड़ी ऐतिहासिक इमारत की नींवदिल्ली की वेधशाला के निर्माण की कहानी 1719 में मुगल दरबार में हुए एक विवाद से जुड़ी हुई है. उस समय हिंदू और मुस्लिम ज्योतिषी इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे थे कि सम्राट मुहम्मद शाह के लिए किसी सैन्य अभियान पर निकलने की कौन सी तारीख़ सबसे शुभ होगी. इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सवाई जय सिंह द्वितीय थे, जिन्हें खगोल विज्ञान और गणित में गहरी दिलचस्पी थी. जय सिंह का मानना था कि उस समय इस्तेमाल किए जा रहे छोटे उपकरणों से सटीक माप नहीं मिलती है. इसी वजह से उनके मन में एक वेधशाला बनाने का विचार आया. उन्होंने सम्राट मुहम्मद शाह से इसके लिए अनुमति मांगी.
अब सवाल ये आता है कि आखिर सम्राट ने अपने एक अधीनस्थ शासक को राजधानी के भीतर इतनी बड़ी और भव्य वेधशाला बनाने की अनुमति क्यों दी. दिल्ली में वेधशाला बनवाने की जय सिंह की योजना को इस तरह भी देखा जा सकता है कि वो सीधे मुगल सत्ता को चुनौती दिए बिना, विज्ञान के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव को अपनी रियासत की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाना चाहते थे. दूसरी ओर, सम्राट के भी अपने राजनीतिक कारण थे. उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में शुभ-अशुभ मुहूर्तों और ज्योतिषीय मान्यताओं का गहरा प्रभाव था. साम्राज्य की स्थिरता को भी कई बार धार्मिक अनुष्ठानों और ग्रह-नक्षत्रों से जोड़कर देखा जाता था. इसलिए ग्रहों की स्थिति का सटीक ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था.
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जय सिंह ने अपनी किताब में निर्माण की वजह बताईजय सिंह ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'ज़ीज़-ए-मुहम्मद शाही' में 1018 तारों की एक नई और बिल्कुल सटीक सूची दी थी. कच्छवाहा राजपूतों की सूर्यवंशी परंपरा से जुड़े जय सिंह स्वयं को सूर्य देव और भगवान राम का वंशज मानते थे. उनकी किताब 'ज़ीज़-ए-मुहम्मद शाही' की शुरुआत ही इस बात से होती है कि वे इन वेधशालाओं का निर्माण भारतीय पंचांग प्रणाली को और ज्यादा सटीक बनाने के उद्देश्य से कर रहे हैं ताकि धार्मिक अनुष्ठानों और कृषि से जुड़े कार्यों के लिए आवश्यक खगोलीय गणनाएं और अधिक विश्वसनीय हो सकें.
अब जंतर-मंतर में बने कुछ विशालकाय यंत्रों की बात भी कर लेते हैं. पहला है- सम्राट यंत्र, जिसे 'सर्वोच्च उपकरण' कहा जाता है, मूल रूप से पारंपरिक सूर्यघड़ी का एक विशाल रूप था, जिसे अत्यंत सटीक समय मापने के लिए बनाया गया था. वहीं 'राम यंत्र' और 'जय प्रकाश यंत्र' जैसे उपकरणों के जियोमैट्रिकल स्ट्रक्चर में वैदिक यज्ञ वेदियों यानी यज्ञ करने के लिए बनाई गई वेदियों की झलक दिखाई देती है. इसके अलावा षष्ठांश यंत्र, दक्षिणोत्तर भित्ति, मिश्र यंत्र, आगरा यंत्र भी हैं. सबका अलग-अलग काम है.
इस्लामिक दुनिया से लेकर यूरोप तक की छापजय सिंह की इस खगोलीय परियोजना पर इस्लामी दुनिया का भी गहरा प्रभाव दिखाई देता है. समरकंद और मराघा जैसी मशहूर वेधशालाओं की परंपरा और 'ज़ीज़-ए-सुल्तानी' जैसी खगोल विज्ञान की किताबों का उस समय काफी असर था. दिल्ली जंतर मंतर के कम से कम दो उपकरण- 'राम यंत्र' और 'सम्राट यंत्र'- समरकंद की वेधशाला के उपकरणों से काफी मिलते-जुलते हैं.
Enroute Indian History के अपने लेख में श्रेया कंबोज लिखती हैं कि यूरोपीय खगोलीय ज्ञान के साथ जय सिंह का संवाद सबसे जटिल था. यह संवाद मुख्य रूप से मुगल दरबार में सक्रिय जेसुइट मिशनरियों के जरिए से हुआ था. इनमें फादर इमैनुएल डी फिगुएरेदो सबसे खास थे. उन्होंने गणित और खगोल विज्ञान से जुड़े विषयों पर जय सिंह को सलाह दी. जय सिंह ने फिगुएरेदो को लिस्बन भेजा ताकि वह यूरोप से खगोल विज्ञान की नई-नई जानकारियां और आंकड़े लेकर आएं. इसके बदले जय सिंह ने अपने राज्य में मिशनरी गतिविधियों के लिए चर्च स्थापित करने की अनुमति दी.
1734 तक फ्रांसीसी जेसुइट इस काम में प्रमुख भूमिका निभाने लगे और बाद में जर्मन पादरियों ने तकनीकी सहायता का जिम्मा संभाला. फिर भी जय सिंह ने यूरोपीय ज्ञान को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं किया. उन्होंने भारतीय, इस्लामी और यूरोपीय खगोलीय तालिकाओं की तुलना की और कई अंतर पाए. हालांकि उनके पास दूरबीनें उपलब्ध थीं लेकिन जय सिंह ने उन्हें अपनाने का फैसला नहीं लिया. 'ज़ीज़-ए-मुहम्मद शाही' में उन्होंने लिखा कि उनकी गणनाएं नंगी आंखों से किए जाने वाले ऑब्जर्वेशन्स पर आधारित हैं, क्योंकि 'दूरबीन सामान्य व्यक्ति के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होती.' तो इस तरह यूरोपीय प्रभाव सिर्फ गणितीय रहा, उपकरणों में यह नहीं आया.
दिल्ली का जंतर मंतर ईंटों के मलबे की चिनाई और लाल चूने के पलस्तर से बनाया गया था, जो 18वीं सदी की राजपूत वास्तुकला में आम सामग्री थी. जहां अधिक सटीकता की जरूरत थी, वहां संगमरमर का इस्तेमाल किया गया ताकि टिकाऊपन और स्पष्टता बनी रहे. जंतर मंतर का निर्माण खगोलविदों, गणितज्ञों और कुशल राजमिस्त्रियों ने मिलजुल कर किया. इसी सहयोग ने इन उपकरणों को सदियों तक सटीक और मजबूत बनाए रखा. आज जंतर मंतर केवल एक वैज्ञानिक स्थल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्मारक भी है. यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल माना है, जो दिखाता है कि भारत के ज्ञान और स्थापत्य इतिहास में इसकी खास जगह है.
जंतर मंतर कैसे बना प्रदर्शनों का ठिकानालेकिन जंतर-मंतर का एक स्वरूप और है. इतिहास की इस कहानी से बिल्कुल जुदा. बिल्कुल अलग. आज का जंतर-मंतर वेधशाला के परिसर से बाहर तक फैला है और हर तरह के विरोध और असहमतियों को स्थान देता है.
एक प्रोटेस्ट साइट के रूप में जंतर-मंतर की कहानी शुरू होती है साल 1993 से. हालांकि इसके लिए न कोई अध्यादेश जारी हुआ और न ही कोई आधिकारिक घोषणा की गई. फिर भी टॉल्स्टॉय रोड को अशोका रोड के गोलचक्कर से जोड़ने वाली पेड़ों से घिरी ये सड़क धीरे-धीरे नई दिल्ली की ऐसी जगह बन गई, जहां धारा 144 लागू नहीं होती थी. तो इस तरह 1993 में देश की राजधानी को असहमति और विरोध जताने के लिए एक नया अड्डा, एक नया सार्वजनिक स्थल मिल गया जिसका नाम था- जंतर मंतर.
ये वो वक्त था जब दक्षिण और पूर्व की तरफ दिल्ली का इतना विस्तार नहीं हुआ था. विरोध प्रदर्शनों के लिए लोग बोट क्लब पर जमा हुआ करते थे. यहां से जनपथ, राजपथ और संसद भवन साफ दिखाई देता था, इसलिए यह प्रतिरोध और जनआंदोलनों का एक प्रमुख केंद्र था. इसी दौरान देश में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन जोर पकड़ रहा था. केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, जो 1988 के एक बड़े आंदोलन से पहले ही परेशान और सतर्क हो चुकी थी. ऐसे माहौल में सरकार ने बोट क्लब पर सभाओं और प्रदर्शनों के आयोजन पर रोक लगा दी.
1988 का वो आंदोलन और सरकार का ये प्रतिबंध ही आगे चलकर वह पृष्ठभूमि बनी, जिसके बाद जंतर मंतर धीरे-धीरे दिल्ली में विरोध और धरना-प्रदर्शनों की सबसे महत्वपूर्ण जगह बन गया.
1988 का किसान आंदोलन
क्या था वो आंदोलन? 1988 का आंदोलन महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने चलाया था. कहा जाता है कि करीब पांच लाख किसान और उनके मवेशियों ने दिल्ली की रफ्तार को पूरी तरह रोक दिया था. किसान पहले राजघाट पहुंचे और फिर बोट क्लब पर डट गए. आखिर में उन्होंने बैलगाड़ियों के साथ इंडिया गेट के लॉन पर डेरा डाल दिया और कई हफ्तों तक वहीं जमे रहे.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, उस समय संसद मार्ग थाने में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने कहा, 'वो पूरा आंदोलन हमारे लिए किसी बुरे सपने जैसा था. उस दौर की दिल्ली की कल्पना कीजिए- एक शांत शहर, बहुत कम गाड़ियां, और बेहद साफ-सुथरी और व्यवस्थित सड़कें. फिर अचानक हर तरफ आपको किसान और गायें दिखाई देने लग जाएं.' इस आंदोलन के आगे राजीव गांधी सरकार को झुकना पड़ा और किसानों की 35 सूत्रीय मांगें मानने के लिए मजबूर होना पड़ा.
लेकिन बाद की सरकारों को यह महसूस हुआ कि विरोध-प्रदर्शनों की जगह पर कुछ नियंत्रण होना चाहिए. उस समय जंतर मंतर इसके लिए सबसे उपयुक्त जगह लगा. यह संसद के करीब तो था, लेकिन इतना बड़ा नहीं था कि वहां बहुत बड़ी भीड़ जमा हो सके. इसके अलावा जंतर मंतर की बनावट भी ऐसी थी कि उसके एंट्री और एग्जिट पॉइंट्स सीमित थे, इसलिए वहां व्यवस्था संभालना बोट क्लब की तुलना में आसान था.
शुरुआत में थोड़े-थोड़े लोग आने लगे और फिर यह सिलसिला एक बड़ी धारा में बदल गया. प्रदर्शनकारी जंतर मंतर पहुंचने लगे. कई लोग अपने घरों से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके आते थे और जब तक संघर्ष जारी रखने का हौसला रहता, यही जंतर मंतर उनका घर बन जाता था. वे इस उम्मीद से आते थे कि कोई उनकी बात सुनेगा.
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समय के साथ जंतर मंतर पर प्रदर्शन की जगह बदलती गईद इंडियन एक्सप्रेस के 2018 के एक लेख के अनुसार, वास्तु संरक्षण विशेषज्ञ और Jantar Mantar: Maharaja Sawai Jai Singh’s Observatory in Delhi नाम किताब की लेखिका अनीशा शेखर मुखर्जी यह मानती हैं कि विरोध स्थलों को शहर के केंद्र से दूर ले जाना दरअसल शहर के 'खंडित' होते जाने की प्रवृत्ति को दिखाता है. वो कहती हैं, 'मूल रूप से जंतर मंतर का इलाका शाहजहानाबाद (आज की पुरानी दिल्ली) से बाहर था. 1857 के विद्रोह के बाद जब अंग्रेजों ने शाहजहानाबाद के लोगों को शहर से बाहर निकाल दिया था, तब यह इलाका उनके लिए शरणस्थली बना था. लेकिन जब एडविन लुटियंस नई दिल्ली की योजना बना रहे थे, तब उन्होंने पहले से मौजूद बस्तियों और लोगों को लगभग नजरअंदाज कर दिया. नई राजधानी आम लोगों के लिए नहीं बनाई गई थी. वही सोच आज भी दिखाई देती है.' मुखर्जी यह भी कहती हैं कि सड़क पर होने वाले प्रदर्शन कभी भी ऐतिहासिक वेधशाला के लिए खतरा नहीं बने. हाल के वर्षों में केवल 2009 की किसान रैली के दौरान ही प्रदर्शनकारी वेधशाला परिसर के भीतर गए थे. इतिहासकार सोहेल हाशमी के अनुसार, समय के साथ जंतर मंतर के भीतर भी विरोध की जगह लगातार छोटी होती गई.
सूखे के कारण कर्ज में डूबा किसान हो, निर्भया के लिए इंसाफ की मांग हो, लोकपाल का आंदोलन हो, खुद को कागजों पर जिंदा साबित करने की लड़ाई हो, पहलवानों का धरना हो या फिर पेपर लीक के खिलाफ लाठी खाते छात्र, इतने वर्षों की यात्रा में जंतर-मंतर ने विरोध की कई आवाजों को सुना. कुछ आंदोलन धीरे-धीरे खत्म हो गए, जबकि कुछ ने देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी. इन आंदोलनों का भविष्य कुछ भी रहा हो लेकिन इन सभी की आवाज में सुर एक ही था- 'हमारी बात को सुना जाए. लोकतंत्र में हम भी ज़रूरी हैं'.
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