जिस तारीख हमारी आजादी की कहानी का पहला लफ्ज़ लिखा गया था. उसी तारीख को लफ्जों का एक भड़भड़ा देनेवाले गट्ठर की मालकिन भी पैदा हुई थी. साल 1915 था. तारीख 15 अगस्त. इस्मत चुगताई आज जिंदा होतीं तो 101 बरस, तीन दिन की होतीं. इस्मत आपा का जन्मदिन भले ही बीत गया हो, लेकिन आपा का जन्मदिन हम लोग हफ्ता भर चलाएंगे. इस्मत आपा वाले हफ्ते में हम आपको उनकी वो कहानियां पढ़ाएंगे, जो आपको इंटरनेट पर इस ब्रांच के अलावा कहीं भी पढ़ने के लिए नहीं मिलेंगी. आज हमको एक आलोचनात्मक लेख इस्मत का फ़न पढ़वा रहे हैं. इसे लिखा है वारिस अलवी ने. ये जल्द ही छपने वाली इस्मत आपा किताब का एक हिस्सा है. इस किताब का संपादन सुकृता पॉल कुमार और अमितेश कर रहे हैं. किताब को छापने और यहां ये हिस्सा सबसे पहले मुहैया कराने का क्रेडिट जाता है वाणी प्रकाशन को. बहरहाल, अब आप 'इस्मत का फ़न' पढ़िए.. इस्मत चुग़ताई की मौत के साथ उर्दू कहानी का चौथा और आख़िरी स्तम्भ भी गिर गया. मंटो, बेदी, कृष्ण चन्दर और इस्मत चारों ने मालामाल कर दिया था उर्दू कहानी को. उनके समय में जीने का मतलब था हर घड़ी अच्छी कहानियों के चमकते सितारों से आंख-मिचौली खेलना. इस्मत का भी क्या ज़माना था, क्या रोब-दाब था, क्या तन्तना था. असकरी साहब जैसा मग़रूर आदमी टें बोल जाता था बीवी के सामने. बात यह थी कि जिसने भी इस्मत की कहानियों को पढ़ा फिर वह वैसा रहा ही नहीं जैसा कि पढ़ने से पहले था. यह बात हम दूसरे लिखने वालों के बारे में भी कह सकते हैं, लेकिन इस्मत के बारे में इसलिए ज़्यादा सही है कि यह तब्दीली हम में और दूसरों में फ़ौरन महसूस की जा सकती थी. मंटो, बेदी और कृष्ण चन्दर हमारे जज़्बात और एहसासात में जो बदलाव लाये वह धीमा, ख़ामोश और दूरगामी था. जिन चीज़ों के बारे में हम में हमदर्दियां पैदा कीं वह ज़रा दूरी पर थीं. मज़दूर, किसान, क्लर्क, कोचवान, खोंमचे वाला, तवायफ़, यह सब जवानी के दिनों में हमसे दूर हमारी घरेलू फ़िज़ा से दूरी पर थे. लेकिन इस्मत तो ख़ुद घर का भेदी साबित हुई. जिन लड़कियों, औरतों, नौकरानियों और मर्दों के बारे में लिखती, वह सब तो हमारे घर ही का हिस्सा थे. जो कुछ हमारी नज़रों के सामने था उससे हम इतना परिचित थे कि एक पुरानी तस्वीर की तरह उसे हम देखते ही नहीं थे. जिसे मैंने इस्मत का रोब-दाब और तन्तना कहा है वह यही है कि हमें एक गाउदी की तरह गर्दन पकड़कर तस्वीर के सामने ले जाती है, तस्वीर को झटकती है और तस्वीर में हमारी नाक घुसेड़ कर कहती है कि ज़रा देखो ये हैं तुम्हारी बहनें जो चीथड़ों में अपनी जवानी छिपाये झेंपती फिरती हैं. यह है नन्ही की नानी, यह है बिच्छो फूफ़ी, यह है कल्लू की मां, ये हैं तुम्हारी भाभियां जिन्हें जब देखो बच्चों को दूध पिलाती नज़र आती हैं. ये हैं घर की चमरख़ औरतें जिन्होंने मुसल्ला पकड़ लिया है. ये हैं जायदाद हड़प कर जाने वाले मर्द, नौकरानियों को भंभोड़ने वाले और बच्चों पर बच्चे पैदा करने वाले. ये हैं बच्चों से खुदबुदाते घर जहां बच्चों को प्यार और बचपन नसीब नहीं होता. जवान लड़कियों को खुली हवा, आज़ादी और तालीम नसीब नहीं होती. औरतें एक-दूसरे को जली-कटी सुनाती हैं और जलन की आग में जलती हैं. इसके बावजूद ये लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में शरीक हैं. मुहब्बत के रिश्ते में बंधे हुए हैं. ये हैं मुस्लिम मिडिल क्लास के द्वन्द्व और महरूमियां, उसकी घुटन, उसके सुख और उसका रख-रखाव. यह है उसका पराक्रम और उसकी क़ुर्बानी. उसकी अय्यारियां और उसका ख़ुलूस, उसका दुख-दर्द और सुख, उसकी ट्रेजिडी-ट्राजिडी-कॉमेडी, आंसू और क़हक़हे. इस्मत हमें ये तस्वीरें हंस-हंस कर दिखाती हैं, लोट-पोट होकर ज़हर में बुझे तीर चलाकर. बड़ी हमदर्दी और दर्दमंदी से, बड़ी एसफ़्फ़ाकी, नफ़रत और हिक़ारत से. भावनाओं के कितने तूफ़ान हैं. चेतना की कितनी नर्म, मद्धिम और तेज़ लहरें हैं इस ठहरी हुई मिडिल क्लास की द्वन्द्व से भरी हुई ज़िन्दगी में. कैसी रस्म-परस्ती और खोखली धार्मिकता है, अन्धविश्वास का कारख़ाना है. ख़ानदानी इज़्ज़त और शराफ़त का झूठा नशा है. बेचारगी, बेबसी और कलेजे को मसोस कर रख देने वाली घुटन है. शादी की बलि पर जवान लड़कियों की आहुति है. मर्दों का वह लोभ और लालच कि दहेज के बिना कुंवारी का हाथ नहीं थामते. औरत की वह मजबूरी कि मर्द की गुलामी के बिना ज़िन्दगी को पूरा नहीं कर पाती.
ज़िन्दगी में रूह फूंकने वाली ताक़तों का इनकार, जिस्म की नाक़द्री, बदन के तक़ाज़ों की ज़िल्लत. सौन्दर्य और ख़ुशियों से ज़िन्दगी की महरूमी, फूहड़पन, बदसूरती के अंबार. इस्मत की बग़ावत पूर्ण थी, बुनियादी थी. यानी मध्यमवर्ग की सच्ची तस्वीर, उसकी ओर दर्दमन्दाना रुख़ और उसके खिलाफ़ मुकम्मल बग़ावत.इन तीन तत्त्वों से इस्मत की फ़नकाराना शख़्सियत का ख़मीर उठा था. अपनी प्रभावी कहानियों के ज़रिये उस शख़्सियत के बहुत गहरे प्रभाव मेरी नस्ल के पाठकों पर पड़े. मिडिल क्लास की डांवाडोल ज़हनियत के बारे में तरक़्क़ी पसन्द लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. उसका कुछ असर नहीं हुआ. किसी नौजवान ने ख़ुद को डी-क्लास नहीं किया, बल्कि तरक़्क़ी पसन्द नौजवान तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ते ही गये. फिल्मों में उनकी कामयाबी, उनके लिए सियासी फ़ायदों से छोटे शहरों और क़स्बों के नौजवानों को कोई जलन नहीं हुई बल्कि उनकी तरक़्क़ी पर उन्हें खुशी हुई क्योंकि उनके साथ कोई दुश्मनी नहीं थी. इन नौजवानों की लड़ाई का मैदान खुद उनका घर था और उनके घर और क़स्बे का दकियानूसी समाज था. जो लोग अपना गांव या शहर छोड़कर दिल्ली, बम्बई या कलकत्ता चले गये उनके मनोवैज्ञानिक व्यक्तित्व में भूतपूर्व देशभक्त का भावनात्मक कम्पन नॉस्टैलजिया के रंग बिखेरता जैसा कि सरदार जाफ़री की ख़ूबसूरत नज़्म ‘अवध की ख़ाके-हसीं’ से ज़ाहिर है. गांव की सादगी और शहर के बनावटी द्वन्द्व को पेश करतीं, जिसकी अभिव्यक्ति अख़्तरुल ईमान की नज़्म ‘एक लड़का’ में हुई है, प्रकृति के रूमान के रंग बिखेरतीं जिनसे कृष्ण चन्दर की कहानियां रंगीन हैं. या सीधे-सादे ग़रीब लोगों के सुख-दुख की धूप-छांव को भीगे-भीगे भावनात्मक अन्दाज़ में पेश करतीं जो उस समय के अधिकांश लिखने वालों का आम तरीक़ा था. इस अन्दाज़ से अगर कोई पूरी तरह बचा हुआ था तो वह मंटो था. उसके यहां न गांव, न छोटे शहरों, कस्बों का नॉस्टैलजिया था, न प्रकृति की ओर लौट चलो का अभियान. लाहौर, अमृतसर, दिल्ली और ख़ासतौर पर बम्बई उसके शहर थे. उसकी शख़्सियत, उसके वजूद और उसकी चेतना ने इन शहरों की फ़िज़ाओं को अपने रोम-रोम में बसा लिया था. उसे कभी भी किसी शहर में अजनबी, अकेला और अपनी ज़मीन से कटे हुए का एहसास नहीं हुआ. हर शहर उसका स्वाभाविक घर था. चूंकि उसका सरोकार इनसानी फ़ितरत, आदमी की नफ्श्सी नफ़िसयात और यौन सम्बन्ध थे, (तवायफ़ लाहौर की हो या दिल्ली की, दलाल अमृतसर का हो या दिल्ली का, कुली कोचवान, मूंगफली वाला कहीं का भी हो, उसकी हक़ीक़त में नज़रें उसके वजूद की गहराइयों में उतर जाती थीं.) इसलिए किसी विशेष तबक़े या कस्बे की तहज़ीबी फ़िज़ाओं की उसे ज़रूरत नहीं पड़ती थी. इसमें प्रकृति और गांव का नॉस्टैलजिया या देहात की सादगी की भावनात्मक यादें कोई एहसास नहीं जगातीं. इसी कारण वह अपनी कहानी को ज़्यादा से ज़्यादा नंगा करता गया, बनाव-सिंगार, तहज़ीबी रंग, भावनात्मक और नज़ाकत के एहसास से साफ़ करता गया. दूसरा पूरा फ़नकार बेदी था. उसके यहां गांव हैं लेकिन गांव का नॉस्टैलजिया और गाँव का रूमान नहीं, गांव की ख़ूबसूरती है लेकिन गांव की रूह नहीं, गांव की सादगी है लेकिन पत्तों के नीचे साँप की सरसराहट भी है. बूढ़ी, क़ुरबानी देने वाली औरतें हैं लेकिन वह आदर्श नहीं. आर्किटाइप हैं और एक टाइप की सच्ची तस्वीर कशी में आर्किटाइप की गहराई भर देना आर्ट का कमाल है. तीसरी पूरी फ़नकार इस्मत है. इसमें नॉस्टैलजिया नहीं लेकिन भावुकता है. लिजलिजी भावुकता नहीं बल्कि बेरहम भावुकता जो ‘चौथी के जोड़े’ की जगह आंसू पीकर कफ़न फाड़ती है. यही बेरहम भावुकता जो बिच्छो फूफ़ी की रचना करती है, ‘नन्ही की नानी’ की तस्वीर बनाती है, ‘दोज़ख़ी’ लिखती है. मध्यमवर्ग के वह तमाम किरदार पैदा करती है जिन्हें तबक़ाती हालात ने मोहताज और बेचारा बनाया, उनके स्वाभाविक तक़ाजों को रौंदा और कुचला, उनकी भावनाओं और भावुकता में ज़हर घोला, उन्हें एक हरी-भरी, भरी-पूरी इनसानी ज़िन्दगी से महरूम रखा. उनकी शख़्सियत को तोड़-मरोड़ कर उन्हें हास्यास्पद, कड़वे-कसैले किरदारों में बदल दिया लेकिन उनकी मुहब्बत को, उनकी बची-खुची इनसानियत को ख़ानदान के दूसरे लोगों से उनके लाग-लगाव को, उनकी मुहब्बत और नफ़रत के रिश्तों को पूरी तरह से तबाह नहीं कर सका. इन किरदारों को इस्मत ने कुछ ऐसे कलात्मक करिश्मे से जीती-जागती तस्वीरों के तौर पर हमारी कल्पना का हिस्सा बना दिया कि हम तो यह देखकर हैरान रह गये कि वह तो पहले से हमारे ख़ानदानों में बूढ़ी नानियों-दादियों, ख़ालाओं-फूफियों, चाचाओं-फूफाओं और बहनों-भाइयों के तौर पर मौजूद हैं. इस्मत ने हमें सबसे बड़ा धक्का दिया जो सिर्फ़ आर्टिस्ट ही दे सकता है. पहचान का धक्का, मानूसियत ने जिन लोगों को बेचेहरा कर दिया था, इस्मत ने अपने नाख़ूनों को फिर से उभारा. जैसे ही गै़र को देखा, नज़र अपने आप पर पड़ी. हम यूँ हैं और इस माहौल में क्या कर रहे हैं. ख़ुद की पहचान तो नहीं क्योंकि यह बहुत अर्थपूर्ण है और इसकी तहदारी ‘जानने’ की हदों को छूती है. ख़ुद को जानने की इस्मत ने न सिर्फ़ भुस भरे हुए बिजूकाओं में चिनगारी रोशन की है बल्कि अपनी कहानियों और नावेलों से उस चिनगारी को लगातार हवा देती रही. वरना चिनगारियाँ धार्मिक दर्शनों, सियासी आदर्शों और खानदानी मेल-जोल में ठंडी पड़ जाती हैं, आदमी बिजूका का बिजूका ही रहता है, खानदानी इज़्ज़त का रखवाला, समाज का सुकून, अतीत की बड़ाई बयान करने वाला, अच्छे दिनों के ख़्वाब देखने वाला वह बिजूका जो अपने ही घर और समाज में बच्चों, औरतों और बूढ़ों पर ख़ामोश ज़ुल्म, नज़र न आने वाली नाइन्साफ़ी, अन्दर से खोखला करती हुई दीमक और ऊपर से ज़िन्दगी का गला घोंटती हुई रस्म-रिवाज की ज़ालिम उंगलियों को देख नहीं पाता. इस्मत गुद्दी पकड़कर धक्का देती है. देखो! वरना तुम भी रेंगते हुए कीड़े ही रहोगे. इसीलिए कहता हूं, बहुत दबदबा था बीवी का, जो एक बार उसके असर में आ गया, ज़िन्दगी भर न निकल सका. उसे अन्दरूनी कोशिश और बाहरी जतन, इनकार और बग़ावत की जंग का असीर कर दिया. मैं नहीं कहता कि अच्छा आर्ट अपने ऐक्शन में पैदा होता है या होना चाहिए लेकिन बड़ा आर्ट हमें डिस्टर्ब करता है, ख़लल पैदा करता है. भीतरी जंग और कोशिशों को आरम्भ करता है और इसे जारी रखता है. और किसी भी सतह पर धर्म और दर्शन की तसल्लियों से नहीं बहलता. आदमी को कभी आराम का शिकार नहीं होने देता. नॉस्टैलजिया, नज़ाकत और भावुकता की भारी बोझिल और भीगी रुतों से हड्डियों में कमज़ोरी और आंखों में नींद की लहर पैदा नहीं होने देता. इसका नशा तेज़ शराब की तरह होता है, जो आग बनकर पूरे बदन में दौड़ जाता है और आदमी तजर्बे की चिलचिलाती धूप में सच्चाई से आँखें चार करने, उसे समझने और फिर उसे बदलने को तैयार हो जाता है. इस जंग में उसे कामियाबी भी हासिल हो जाती है और नहीं भी होती. लेकिन वह ख़ुद अन्दर से बदल जाता है और यही उसकी ज़िन्दगी का हासिल होता है. उन नौजवानों ने ख़ुद को डी-क्लास नहीं किया लेकिन अपनी क्लास के ख़िलाफ़ लड़ते रहे. उन्होंने घर नहीं छोड़ा क्योंकि उन्हें जेल को घर में बदलना था, पांव की बेड़ियां काटनी थीं और बेज़बानों की ज़बान पर लगे तालों को तोड़ना था. इस्मत, बेदी, मंटो और कृष्ण चन्दर, फ़ैज़, राशिद और अख़्तरुल ईमान के करीब जो लोग आये उनका एक ज़हन बना जो क़ौमी, वतनी, इलाक़ई और ख़ानदानी शॉविनिज़्म से दूर था, पुराने अक़ीदों और अन्धविश्वासों के फन्दों से आज़ाद था. अतीत की महानता और अतीत-मोह दोनों का इनकारी था. समय, इतिहास तक़दीर के ज़ुल्म से इनकार करता था. मौत की अन्धेरी शक्तियों के ख़िलाफ़ और ज़िन्दगी की रचनात्मक ताक़तों का परस्तार था. पारम्परिक विचार चाहे वह धार्मिक हों या राजनैतिक, उसकी गुलामी से इनकार करने वाला और विचारों की आज़ादी का गीत गाने वाला था. यह वह दौलत थी जिसके लिए मेरी नस्ल के नौजवान हमेशा इन फ़नकारों के एहसानमन्द रहे. उनके गहरे और मुक़दस प्रभाव से हम उम्र भर निकल न पाये. जब हम देखते हैं कि हमारे ज़हनों को ढालने में इन लोगों का असर इक़बाल से भी ज़्यादा है तो फ़न की दर्शन पर जीत का अन्दाज़ा होता है. इसीलिए एक इमेज, एक किरदार और एक तजर्बे की रचना वह काम कर जाती है जो एक पूरा व्यवस्थित चिन्तन नहीं कर पाता. यह कोई ताअज्जुब की बात नहीं कि अदब में इस्मत का जितना दबदबा रहा उतना शोर भी रहा. उनकी कहानियां बदनाम हुईं, उनपर मुक़दमे भी चले लेकिन कहानियों के चर्चों से ऐवाने-अदब गूँजता रहा. हैरत की बात यह है कि इस्मत पर सबसे ज़्यादा पेशेवर आलोचकों ने नहीं बल्कि रचनाकारों ने लिखा. इसलिए इस्मत पर बहुत कम लिखा गया. ऐसा लगता है कि आलोचक डर गये थे, सहम गये थे. नग्नता और यौन के अलावा बात को कहां से बढ़ावा दें, उनकी समझ में नहीं आता था. इस्मत के सामने सब आलोचक बौने बने ‘लिहाफ़’ और ‘तिल’ का ज़िक्र करके खी-खी करते नज़र आते हैं. मंटो पर लिखते समय खी-खी नहीं करते, आँखें निकालते हैं. कृष्ण चन्दर ने ग़लत नहीं कहा कि इस्मत का नाम आते ही मर्द कहानीकारों पर दौरे पड़ने लगते हैं. इस्मत पर कृष्ण चन्दर, मंटो और पितरस ने लिखा. मजनूं गोरखपुरी और मौलाना सलाहुद्दीन अहमद ने लिखा, ज़ोए अंसारी ने लिखा, सफ़िया अख्तर और ख़लीलुर्रहमान आज़मी ने लिखा. इन लोगों की हैसियत तारीफ़ी है, आलोचना नहीं. नये आलोचकों ने इस्मत की ओर कम ध्यान दिया. आमतौर पर यह कहकर टाल जाते हैं कि उनका बौद्धिक विकास रुक गया है. इस्मत इस बात का अफ़सोसनाक सुबूत है कि तरक़्क़ी पसन्द फ़नकारों को तरक़्क़ी पसन्द आलोचकों की ओर से कोई इनसाफ़ नहीं मिला. वजह यह है कि फ़न हमेशा नज़रिये से बड़ा होता है और मार्क्सीय आलोचना की कसौटी पर मार्क्सीय फ़नकार भी पूरा नहीं उतरता और नयी आलोचना तो हक़ीक़त पसन्द आर्ट की डाइनामिक्स समझने की सलाहियत भी गंवा बैठी. यह बात तो सभी मानते हैं कि इस्मत की रचनात्मक शक्ति का राज़ उसकी ज़बान और उसकी शैली में है. हक़ीक़त यह है कि इस्मत का अन्दाज़ उसी पर समाप्त हो जाता है. इस्मत से पहले यह अन्दाज़ न किसी के पास था और न उसके बाद किसी को नसीब हुआ, और न आइन्दा कोई फ़नकार इसे पैदा कर सकेगा. इस्मत की शैली प्रकृति का एक फिनॉमेना था, एक अजूबा था जो धूमकेतु की तरह सदियों में कभी नज़र आता है. इस्मत का रंग बिल्कुल आंख के रंग की तरह है लेकिन इसमें अगर क़बाइली ख़ूबियां देखना चाहें तो ये ख़ूबियां एक ख़ास कबीले यानी दोआबे के इर्द-गिर्द रहने वालों की उर्दू ज़बान की भाषाई ख़ूबियों से बना है. औरतों और मर्दों की अलाहिदगी की वजह से उर्दू में ‘बेगमाती ज़बान’ ने अपने मुहावरों और लोकोक्तियों, क्रियाओं, विशेषणों और एक ख़ास तरह के ठस्से की वजह से एक अलग बोली की तरह तरक़्क़ी पायी और हमारी औरत-कहानीकार स्वाभाविक रूप से इसी ‘ज़बान’ का प्रयोग करती रही हैं. लेकिन इस्मत ने इस ‘ज़बान’ का प्रयोग निष्क्रिय रूप में करने के बजाय क़ुदरती तौर पर किया है. निष्क्रिय ज़बान का अर्थ है कि जैसी भाषा मिली, वैसी ही प्रयोग करना और भाषा की ऐसी पाबन्दी करना कि केवल भाषा और मुहावरों के जौहर दिखाने के अलावा फ़नकार का कोई दूसरा काम नहीं है. ‘क़ुदरती’ तौर पर भाषा के प्रयोग का मतलब है भाषा की बुनियाद औरतों की बोली न रहकर उर्दू ही रहे ताकि भाषा की अपनी शान क़ायम रहे, और इसमें वह ज़नानापन न पैदा हो जो औरतों के मुहावरों की पायलों की झंकार का परिणाम होता है. इस्मत के यहां एक जुमला भी ऐसा नज़र नहीं आता जो ‘बेगमाती’ मुहावरों के कड़े से कड़ा बजाकर उठता हो. फिर इस्मत को न केवल ‘बेग़माती’ उर्दू बल्कि आम तबक़े की बोली-ठोली, उनके लाने-ताने से, गालियों और कोसनों पर गै़रमामूली क़ुदरत हासिल थी. यही नहीं बल्कि बोली-ठोली बम्बई की हो, फ़िल्मी दुनिया की हो, हैदराबाद की हो, इस्मत उस पर क़ुदरत हासिल कर लेती हैं और दोआबे की करख़न्दारी उर्दू के साथ मिलाकर बेगमाती उर्दू की पाजेब पर उसका ऐसा रंग चढ़ा देती हैं कि पता ही नहीं चलता कि यह रंग इस्मत के यहाँ कौन-सा अन्दाज़ पैदा कर रहा है. इस्मत की विशेष शैली के पीछे एक बहुत ही ख़ास ताक़त और सृजनात्मक ज़हन काम कर रहा है. उस ज़हन का बुनियादी काम औरत की मिथक को तोड़ना-फोड़ना, औरत के बारे में बड़े और रूमानी विचारों को तोड़ना. डी मेथोलोजाइजे़शन, डी रोमेन्टीसाइजे़शन और डी ग्लोरीफ़िकेशन. यह काम इस्मत ने इतने बड़े पैमाने पर किया है कि इस तरह की औरत ख़ुद यूरोप में नज़र नहीं आती. इस्मत को यौन सम्बन्धित कहानीकार कहते हैं लेकिन इस्मत के यहाँ यौन का कोई ऐसा मिथक नहीं है जो लॉरेन्स ने बनाया. मंटो के यहां भी नहीं है. इससे ये दोनों लॉरेन्स से कम नहीं हो जाते, भिन्न ज़रूर दिखाई देते हैं. वीमेन्स लिब मूमेंट वालों को औरत के बारे में लॉरेन्स में जो क़ाबिले-एतराज़ बातें नज़र आयीं वह इस्मत और मंटो में नज़र नहीं आयेंगी, क्योंकि मंटो और इस्मत का बुनियादी सरोकार औरत को यौन-वस्तु से अलग एक इनसानी रूप देना है. इस मक़सद के लिए ज़रूरी था कि मर्द के बनाये समाज में औरत के बारे में मर्द के बनाये हुए दृष्टिकोण पर चारों ओर से हमला किया जाये. और हक़ीक़त कश्त भी यही है कि जानवरों की तरह जैविक सतह पर आबादी बढ़ाने की ख़ातिर सम्भोग करने के अलावा हमारे सभी यौन-पाखण्ड बनाये हुए और समाज पर थोपे हुए हैं, स्वाभाविक नहीं. चाहे वह इज़्ज़त और पाकीज़गी और शर्म-हया का विचार हो, मर्द की मर्दानगी और औरतपन की समस्या हो, औरत की पिंडलियों की तराश और सीने का गुदाज़ हो, सब में एक विशेष समाज के बनाये हुए यौन- पाखण्ड का अमल-दख़ल ज़्यादा है, स्वाभाविक कम. हम उन्हें स्वाभाविक समझते हैं, यही इस बात की दलील है कि आदमी की यौन-सरगर्मियाँ नस्ल को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं बल्कि यौन अपनी दूसरी सरगर्मियों में भी ज्यादा व्यवहारी हो सकती है. उदाहरण स्वरूप आनन्द के लिए यौन जिसका कोई ओर-छोर नहीं इसलिए इसकी निगरानी और समझ ज़रूरी हो जाती है ताकि औरत केवल एक काम की वस्तु बन कर न रह जाये, जिनसे हज़ारों साल से मर्दाना अहम की तुष्टि और औरत की ज़िल्लत हो रही थी. इन्हें नयी रोशनी में परखा जाता. इस्मत बस यही काम करती है. इसीलिए आप देखेंगे कि इस्मत के यहाँ बच्चे, नौजवान लड़कियां, ग़रीब नौकरानियां, अधेड़ बेवायें, बूढ़ी नानियाँ, हर साल बच्चे जनने वाली भाभियाँ, मोटी होती हुई किसी समय की हसीनायें, पेशा करातीं शरीफ़ घरों की औरतें, कोने-खुदरे में पड़ी बेसहारा औरतें, गर्म-आवारा मुलाज़मायें, शादी की ज़ंजीरें, बच्चों की बेड़ियां, औरतों की आपस में जलन और ज़ुल्म यह सब ज़्यादा है और डांस का रूमान, बदन का नग़मा, भावुकता की उड़ान, आलिंगन के पल के बयान न होने के बराबर है. अगर यौन है भी तो ख़ाक-ख़ून में, गन्दगी में, अय्याशी में. इसलिए इस्मत को यौन ग्रसित समझना ग़लत है. दरअसल वह औरत के वजूद के आस-पास चिमटी हुई यौन-परतों को एक-एक करके उखाड़ती है ताकि उसकी इनसानियत बाहर आ सके. यही चीज़ उसकी शैली को एक करारापन, बेबाकी और बाग़ियाना सलाहियत देती है. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं हुआ कि इस्मत के यहां यौन सम्बन्धित कोई तत्त्व ही नहीं है. बेशक है और बहुत गहरा है लेकिन इसका मक़सद यौन-कहानियां लिखना, यौन सम्बन्धित गुत्थियां सुलझाना या समाज के ख़िलाफ़ बग़ावत के लिए इसे एक हथियार के तौर पर प्रयोग करना या लज़्ज़त हासिल करके अपनी बेबाकी और आज़ाद ख़याली का शोर करना नहीं है. इसलिए इस्मत की कहानियाँ उन अर्थों में यौन-कहानियाँ नहीं हैं जिन अर्थों में लॉरेन्स, फिलिप रॉथ और एरिका जांग नोबाकोव के नावेल हैं. यानी जो मर्द-औरत की यौन-अवस्थाओं, अतृप्ति और उनके परवर्जन को पेश करते हैं. इस्मत की कहानियों में जिंस के अलावा दूसरे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू होते हैं, जिनकी वजह से उनके किरदार अध्ययन के दूसरे पहलू भी रखते हैं. अज़ीज़ अहमद ‘टेढ़ी लकीर’ पर लिखते हैं. 'जिस्म की जांच-पड़ताल का इस्मत के पास एक ही ज़रिया है और वह है उसको छूना. इसलिए रशीद से लेकर टेलर तक बीसियों मर्द इस नावेल में आये हैं, सबका अन्दाज़ जिस्मी या ज़हनी स्पर्श है, स्पर्श की कैफ़ियत ज्यादातर निष्क्रिय ही होती है. इस्मत के यहां स्पर्श ही मर्द, इनसान, ज़िन्दगी और दुनिया की जांच-पड़ताल का एक ज़रिया है. रजाइयों के बादलों में अब्बास के हाथ बिजलियों की तरह कौंधते हैं और लड़कियों के गिरोह में हल्का कम्पन बिखेर जाती है. रसूल फ़ातिम के चूहे जैसे हाथ स्पर्श का अंधेरा पहलू है. धुंधला पहलू वह इश्क़ है जिसमें उसे ताज्जुब था कि लड़कियां इन गुंडों की आँखें अपनी रानों पर रेंगती हुई महसूस नहीं करतीं. स्पर्श के सिलसिले में ‘समन’ का एहसास रान पर सरसराहट महसूस करता है.'
अजी़ज़ अहमद के इस एतराज़ का जवाब मंटो ने दिया है. इस्मत और मंटो पर अज़ीज़ अहमद का रवैया कभी हमदर्दाना नहीं रहा. मंटो ने बिल्कुल सही कहा कि यह कहना कि इस्मत के यहां जांच-पड़ताल का जरिया ‘स्पर्श’ है, मुझे भी मंटो की तरह ‘स्पर्श’ पर एतराज़ है. मंटो लिखता है कि “अव्वल तो मसास (स्पर्श) कहना ही ग़लत है. इसलिए कि यह एक ऐसी क्रिया है जो कुछ देर जारी रहती है. इस्मत तो बहुत हस्सास है, हल्का-सा स्पर्श ही उसके लिए काफ़ी है.”मंटो ने अपनी ज़हानत से ‘स्पर्श’ (मसास) और लम्स में बहुत अच्छा फ़र्क़ किया है. जिस समाज में जिंस पर बहुत पाबन्दियां होती हैं वहां चाय की प्याली पर उंगलियों का छुआ जाना ही बदन में बिजली की लहर पैदा कर देता है. इसलिए रूमानी प्यार खुले समाज में होने के बजाय बन्द समाज में ज़्यादा खिलता है. जिसमें लड़के-लड़कियों के मेल-जोल पर पाबन्दियां हों. मिलन में जितनी समाजी पाबन्दियों की दीवार होगी मुहब्बत में उतनी ही शिद्दत होगी. अंग्रेज़ी में एक दिलचस्प ड्रामा है जिसमें लड़के और लड़की को क़रीब लाने के लिए दोनों के मालदार बाप जो गहरे दोस्त हैं, दोनों पर गहरी पाबन्दियां लगाते हैं. बुजुर्गों की पाबन्दियों के ख़िलाफ़ दोनों बग़ावत करते हैं और जितने पहरे बिठाये जाते हैं, उतने ही वे इश्क़ में डूबते जाते हैं. चोरी का चुम्बन ज़िन्दगी का सबसे क़ीमती चुम्बन होता है. खुले समाज में सबसे पहले हाथ रान पर ही पड़ता है या उस समाज में जहां जिन्सी घुटन ज़्यादा है, भूखी निगाहें, तरसे हुए हाथ जिन्स का खेल ही खेलते हैं. इस्मत यही बताना चाहती है कि वह समाज जो जिन्सी नज़र नहीं आता उसके अन्दर ही अन्दर यह खेल जारी रहता है. समाज में तो हर युग में जिन्सी सरगर्मियाँ बराबर रहती हैं. ऐसा नहीं पहले लोग कम यौन ग्रसित थे और हम पर यौन जुनून की तरह सवार हो गया है. हां, ऐसा ज़रूर होता है कि कभी-कभी अदब और आर्ट में यौन की अभिव्यक्ति ज़्यादा होती है, कभी कम. यौन साहित्य की काट ख़ुद उसकी अधिकता में होती है. अति पर पहुंचकर आदमी जैसे थक जाता है. नंगी-फ़िल्मों वाले सिनेमाघरों और इस तरह की मैगज़ीन का भी दिवाला निकलता है. वे भी घटती हुई तादाद का रोना रोते हैं. लेकिन अज़ीज़ अहमद का एतराज़ एक हद तक ठीक है. ‘टेढ़ी लकीर’ में जिस्मानी लम्स की तकरार ज़्यादा है. क्योंकि ‘समन’ की जिन्सी बेदारी का अनुभव एक ही ढर्रे पर चलता रहता है. अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों की वारदातें भी कसरत से हैं, जिससे इकहरेपन का एहसास होता है? बहरहाल मंटो ने अज़ीज़ अहमद का जवाब देते हुए इस्मत की शैली की कुछ विशेषताओं की तरफ़ ऐेसे इशारे किये हैं जिन्हें हम स्टाइलिस्टिक आलोचना का पहला क़दम कह सकते हैं. वह लिखता है कि इस्मत के यहां दूसरे जिस्मानी सेंस भी काम करते नज़र आते हैं, मिसाल के तौर पर सुनने और सूंघने का सेंस. आवाज़ का तो जहां तक मैं समझता हूं इस्मत के अदब से बहुत गहरा सम्बन्ध है. ‘‘घिर-घिर, फट शों, ख़श, बाहर बरामदे में मोटर भिन्ना रही थी.’’ ‘‘रेडियो को मरोड़ते रहे, खड़-खड़, शर-शर, घिर-घिर, मेरे आँसू निकल आये.’’ ‘‘टन-टन साइकिल की घंटी बजी, मैं समझ गयी एडिना आ गयी.’’ “और धम-धम, छन-छन करती बहू सीढ़ियों पर से उतरी.’’ इसी तरह सूँघने के सेंस की मंटो ने बहुत-सी मिसालें दी हैं, कुछ देखें. ‘‘और बू तो देखो, हुक्के की सड़ांध है, तोबा, उठो. सरसों का तेल आठवें दिन ही कठी-कठी जू देने लगता.’’ शब्दों के बिम्ब कलात्मक कल्पना की वह पहचान है जिससे आम लिखने वाले महरूम हैं. इस्मत के लेखन की एक और ख़ूबी है फ़िज़ा बनाना है जिससे आमतौर पर हक़ीक़त पसन्द फ़नकार दूर ही रहते हैं क्योंकि इससे रूमानियत पैदा होने का ख़तरा रहता है. इस मामले में इस्मत, मंटो और बेदी का एहतियात देखने के क़ाबिल है.
‘‘यह यहां की आबो-हवा क्या अजीब है. जैसे बड़े-गीले तौलिये में फ़िज़ा लिपटी ऊँघ रही है. थकी-थकी नींद, अंग भारी और फिसलने जैसी किसी ने सरेस लगा कर हल्का सा सुखा दिया हो.’’इस्मत की एक विशेषता यह है कि वह झल्लाहट जो उसके किरदार महसूस करते हैं, उसे वह अपने स्टाइल में बदल देती है जिससे न सिर्फ़ यह कि झल्लाहट हम तक पहुंच जाती है. बल्कि शब्दों के ज़रिये तस्वीर बनाने के साथ शब्दों की लय और जुमलों की गति सभी मिलकर उस कैफ़ियत को आपस में बांट लेते हैं.
‘‘कितना-कितना वह चिल्लाती, पछाड़ें खाती पर ज़ालिम अम्मां ऐसे ऐंठकर बाल गूंथती कि बालों की जड़ें तक हिल जातीं. उसका सर दोनों घुटनों में दबोचकर चोटी ऐसी मज़बूती से गाँठती गोया कोई गठरी कसकर बाँध रही हो. हर बल पर दांत भींचकर कोहनियां हवा में तानकर, थूक-थूककर झटके मारती कि क्या मजाल एक रोंगटा भी बाहर रह जाये. आठवें दिन दो-चार मिसकीन सी लटें ज़रा सांस लेने को बाहर रेंग आतीं और डाइन तेल की कुप्पी और कंघी लेकर पिल पड़ती.’’यह नैरेशन सिर्फ़ उर्दू भाषा में मुमकिन है, वह भी इस्मत की शैली में, उस भौगोलिक और सांस्कृतिक माहौल में जहां निचले तबक़े में कंघी-चोटी के अर्थ पहलवानी हाथ दिखाना हो. इस नैरेशन में आप यह भी देखेंगे कि जो चीज़ छोटी बच्ची के लिए तकलीफ़ देह है, मां के लिए झल्लाहट है, वह हमारे लिए इस्मत की शैली के कारण व्यंग्य की वजह बनती है. क़िस्से में तकलीफ़ और व्यंग्य के तत्त्व मौजूद हैं. इस्मत किसी तत्त्व को काटने या कम किये बिना एक ऐसा अन्दाज़ तलाश कर लेती है कि दोनों में बैलेंस बना रहता है. इस्मत की एक बेहतरीन कहानी ‘नींद’ है. इसमें लगभग बीस तरह से इस्मत ने नींद और जागने की कैफ़ियतों का अलग-अलग जगह आँखें बोझल कर देने और नींद उचाट कर देने वाला बयान किया है. इस्मत की भाषा में वही शिद्दत, वही नोकीलापन, तेज़तर्रारी, शोख़ी, अधम शोर, भगदड़ और रफ़्तार नज़र आती है जो ज़िन्दगी और उसकी हरारत से भरी रचना की विशेषता होती है. जुमले एक-दूसरे का पीछा करते हैं. शब्द एक-दूसरे पर गिरे पड़ते हैं. फिर जुमले साँप की तरह सरसराने, फुंकारने, बलखाने और पलटकर डंक मारने लगते हैं. इस्मत की भाषा किसी जगह ठहरती नहीं, बयान धुन्ध में लिपटी हुई झील का ठहरा हुआ पानी नहीं बनता. अंधेरे का बयान भी जगर-मगर करता है. ख़ामोशी का बयान भी बोलता है. मौत के ज़िक्र में भी कफ़न फाड़ने की किल-ख़राश आवाज़ है. इसीलिए घुटन, ठहराव और मुरझाती हुई कलियों के बयान के बावजूद इस्मत की कहानियाँ बीमार दिल को बिठाने वाले, उदास करने और दिमाग़ पर फ़ालिज गिराने वाले अनुभव नहीं बनते. ऐसे अनुभवों को आदमी भुला देता है. दोबारा गुज़रते हुए भी उसे हौल आता है. दुख के चित्र बनाने वालों की तस्वीरों में हो, या पीप बहते हुए नासूरों का ज़िक्र, आदमी इशारे और आवाजे़ं, किरदार और जज़्बात-एहसासात एक तूफ़ान की तरह चलते और आगे बढ़ते नज़र आते हैं. ख़ुद इस्मत का बयान काफ़ी दिलचस्प है.
‘‘तन्हाई में लिखने की आदत नहीं, क्योंकि कभी नसीब ही नहीं हुई. शोर मचता होता है. रेडियो बजता होता है और बच्चे कुश्तियां लड़ते जाते हैं और मैं लिखती हूं. यही वजह है कि मेरे लेखों में दौड़-सी आ जाती है. लस्तम-पस्तम, भागम-भाग मची रहती है.’’इस्मत की इन स्टाइलिस्टिक ख़ूबियों पर ज़ोर देने से यह गुमान पैदा हो सकता है कि उनकी इस ख़ूबी में मैनरिज्म का ऐब भी पैदा हो गया हो. क्योंकि उनकी कहानियों के किरदारों का परिवेश और झगड़ा चाहे बदल जाये शैली यही रहेगी. इस्मत के साथ ऐसा नहीं हुआ. इसीलिए मैंने उसकी भाषा को दोआबे की भाषा कहा है और औरतों की बोली को उसका एक हिस्सा. इस्मत पर यह आरोप ग़लत है कि वह अपनी कहानियों में अलीगढ़ और उसके आस-पास के मुस्लिम मध्यवर्ग में क़ैद हैं. जी नहीं, वह वहाँ से बाहर निकलकर जब बम्बई गयीं तो उनकी कहानियों का थीम और बैक ग्राउण्ड बदला और उसकी वजह से उनके नैरेशन, भाषा और शैली में भी तब्दीली आयी. आप कह सकते हैं कि यह तब्दीली बहुत मामूली सी थी. मैं कहूंगा बहुत नाज़ुक थी. कारण यह है कि इस्मत की लगभग सभी कहानियां, फ़र्स्ट पर्सन में लिखी गयी हैं, इसलिए ज़ाती लहज़ा और आपबीती का नज़रिया उनकी शैली और हास्य-व्यंग्य को हर कहानी में साथ लाता है. बेशक हर कहानी पर इस्मत की शैली की मुहर लगी होती है लेकिन हर कहानी में नाज़ुकता फ़र्क़ भी होता है लिहाज़ा ‘गेंदा’ और ‘नीरा’ के अन्दाज़ में बिल्कुल निचले तबक़े की मुनासिब सी चीजे़ं, धूल, बुरादा, गन्दगी, खपरैल, मैले-कुचैले बच्चे, मैले-चीकट कपड़े, उनके खुरदरे स्पर्श, बिसांध, मुनमुनाहटों और मुनमुनाहटों की आवाजे़ं, जिन्सी इशारे, गालियां, मारपीट, बोली-ठोली और इस तबक़े के विशेष मुहावरे और इस तरह की बीसियों चीज़ों के कारण यह वह शैली नहीं रहती, जो ख़ालिस मुस्लिम मिडिल क्लास की है जिसमें सहमी-शरमाई, बदन चुराती लड़कियां, कॉलेज में पढ़ने वाले यौन ग्रसित लड़के, अन्धविश्वास, रस्मो-रिवाज और शर्म-हया का ख़याल रखने वाली नानी-दादियाँ, खूसट नौकरानियाँ और बच्चे पैदा करके उन्हें प्यार न दे सकने वाले सरकारी नौकर जो घर में कम और बाहर ज़्यादा इज़्ज़तदार हैं, बच्चे पैदा करने वाली भावजें, इधर-उधर हाथ मारने वाले चचेरे-ममेरे भाई, उनकी चमरख मांएं और क़ाबिले-नफ़रत बाप जो पूरे कुनबे से इस उम्मीद पर कि लड़की को ब्याह ले जायेंगे और पूरे मुल्क को उम्मीद और वहम में छोड़कर दुनिया से चले जाते हैं. इन कहानियों की तर्ज़ गेंदा से बिल्कुल अलग है. यहां भाषा-शैली की रगों में व्यंग्य का ऐसा ज़हर फैला हुआ है, ग़म और गुस्से के ज्वालामुखी को इस तरह क़ाबू में रखा गया है और आंसुओं के सैलाब के आगे ऐसा बांध बांधा गया है कि कहानी पढ़ते हुए आदमी महसूस करता है कि वह सान पर रखी हुई शैली की धार पर चल रहा है. यह ‘चौथी का जोड़ा’ का अन्दाज़ है, जो इश्क़ पर ज़ोर नहीं कि इसी तबक़े की हास्यात्मक अक्कासी करने वाली कहानी से अलग है, जो इसी तबक़े की घुटन का शिकार नौजवान लड़कियों के जिन्सी जंजाल के ‘जाल’ से अलग है. इस तरह का काम नन्ही की नानी, बिच्छो फूफ़ी और कल्लो की माँ जो इसी तबक़े की कहानियाँ हैं की शैली जो कहीं आयरनी लिए हुए है और कहीं मनोवैज्ञानिक शैली, तो कहीं व्यंग्यात्मक अन्दाज़ है. ‘शादी’ में उच्च वर्ग, ‘चट्टान’ में नवदौलतिया तबका, ‘बेकार’ में शहरी मिडिल क्लास, ‘लिहाफ़’ में लुटा हुआ जागीरदार तबक़ा यार में ‘ग्लैमर’ की दुनिया, प्रीत और नींद में वह ऊपरी मिडिल क्लास जो उच्च वर्ग की रियायतों से मिडिल क्लास के बन्द समाज से निकल कर ऊपरी समाज के खुले माहौल में आ तो जाता है जिसका मूल्य बीवियों को पहले रखैल और फिर तवायफ़ बनकर चुकाना पड़ता है. इन सभी कहानियों की शैली इस्मत की दूसरी कहानियों से बिल्कुल अलग है क्योंकि इन कहानियों की मनोवैज्ञानिक और भावात्मक तहदारी एक अर्थ में चाहे फर्स्ट पर्सन में हो, एक ऐसे अन्दाज़ का तक़ाज़ा करती हैं जो ज़्यादा से ज़्यादा ऑबजेक्टिव हो और हर सिचुएशन में व्यंग्य, ड्रामा और पैराडाक्स को हर क़िस्से के भावात्मक कम्पन और हर किरदार की गहरी ट्रेजिडी को गिरफ़त में लेने की सलाहियत रखता हो. इस्मत न सिर्फ़ अपनी सभी कहानियों बल्कि एक ही कहानी के विभिन्न टुकड़ों में और कभी-कभी केवल दो-चार शब्दों में एक नयी कैफ़ियत, नयी लय, भाव, हास्य और व्यंग्य का अनोखा ज़ायक़ा कुछ इस तरह भर देती हैं कि उनके किसी वाक्य पर उदासी के रंग का आभास नहीं होता. उनके हर वाक्य और संवाद की एक नयी आन-बान है. और पढ़ने वाले को कभी उकताहट नहीं होती. यही कारण है कि डिकेन्स की प्रोज़ और ग़ालिब के शेरों की तरह इस्मत की कहानी बार-बार पढ़ी जाती है और मज़ा देती है चाहे उसमें मंटो और बेदी की कहानी की तरह तहदारी न हो. लेकिन स्टाइलिस्टिक्स के माहिरों का ध्यान अगर इस्मत की ओर होता तो वे देखते कि इस्मत की बेमिसाल शैली में अध्ययन के लिए एक दुनिया मौजूद है. दुर्भाग्य से इस्मत ने यह शैली ऐसे लोगों के दरमियान पेश की जिनके पास सिरे से कोई शैली ही नहीं थी. हज़ारों में किसी के पास अपनी शैली होती है, बाक़ी तो पारम्परिक भाषा में ही अपना रंग भरकर काम निकालते हैं. ज़रूरी नहीं कि अपनी विशेष शैली वाला कहानीकार ही सबसे बड़ा कहानीकार हो. इसलिए जेन आस्टिन या वर्जीनिया वुल्फ़, जार्ज इलियट, हार्डी या डिकेन्स से बड़ी नहीं हैं या इस्मत और कुर्रतुलएन हैदर, बेदी और मंटो से बड़ी नहीं हैं. कहानी लिखने के लिए और भी बहुत चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है. इस्मत का हास्य बोध इस्मत की कहानियों का पहला संग्रह ‘कलियां’ है. इसमें दस कहानियां और छह ड्रामे हैं. कहानियों में भी ‘बचपन’ और ‘उफ़ ये बच्चे’ निबन्ध जैसे हैं. इन आठ कहानियों में ‘पर्दे के पीछे से’ लड़कियों की ताक-झांक और नोक-झोंक की मामूली कहानी है, संवाद के अन्दाज़ में लिखी गयी है. पता नहीं क्यों यह कहानी और संग्रह ‘चोटें’ की कहानी ‘झिरी में से’ जब मैंने सोलह-सत्तरह बरस की आयु में पढ़ी थी तब से अब तक इस्मत को कई बार पढ़ने के बावजूद अब भी सबसे पहले शुरू करता हूँ, लेकिन दोनों को कभी पूरा नहीं पढ़ पाता. कहीं न कहीं, कोई न कोई वाक्य फलाँग ही जाता हूँ. वैसे अगर मैं एक आलोचक के तौर पर अपनी नुमाइश करना चाहूँ तो यह कह सकता हूँ कि ‘झिरी में से’ पर एली रॉब ग्रे के नोवलों का असर है. लेकिन, पाठकों को ऐसी बातें बताने का मुझे कोई शौक़ नहीं. सीधी-सी बात यह है कि दोनों कहानियों में मुझे कोई दिलचस्पी पैदा न हो सकी. पहली कहानी तकनीक के कारण और दूसरी कंटेंट की वजह से. कहानी नैरेशन होने की वजह से अगर संवादों में लिखी जाये तो उसमें ठहराव पैदा होने का ख़तरा बढ़ जाता है, जैसा इस कहानी में हुआ है. कहानी ‘झिरी में से’ में इस्मत दिलचस्पी, आश्चर्य, व्यंग्य और ख़ूबसूरती के तत्त्व पैदा न कर सकीं. ‘बचपन’ और ‘उफ़ ये बच्चे’ का ज़िक्र मैं शुरू में ही कर देना चाहता हूँ और साथ ही ‘हीरोइन’ और ‘बावर्ची’ का भी. ये इस्मत के लेख हैं. मुमकिन है कि उन्होंने कुछ और भी लिखे हों ये चारों बहुत दिलचस्प हैं. ‘बचपन’ तो सेंस ऑफ़ ह्यूमर की बेहतरीन मिसाल है और रशीद अहमद सिद्दीक़ी, पितरस और मुश्ताक़ यूसुफी के लिए नमूना भी बन सकता है. बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि उर्दू के अब तक के इंशाइयों में यह बेमिसाल है. आमतौर पर जो बाक़ायदा हास्य लेखक हैं उनमें यह रवानी हमेशा नहीं रहती. इस लेख की ख़ूबी यह है कि वह हक़ीकत निगारी की सतह को नहीं छोड़ता, इसमें हास्य लेखन के सभी तत्त्व मौजूद हैं. सामने की हक़ीक़तें कश्तें जैसे मंजन घिसना, मुँह धोना, तौलिये से मुंह पोंछना, नाश्ता करना, मास्टर साहब का पढ़ाने आना, इमला लिखवाना, खुला पाकर बच्चों को दोपहर में एक कमरे में लिटा देना, गुड़िया खेलना, मौलवी साहब का क़ुरान पढ़ाने आना, पूरे दिन बड़ी आपा की ये न करो, वह न करो की रट और रात को सब बिस्तरों में क़ैद, आवाज़ लगाने पर पाबन्दी लेकिन हँसी है कि आये ही चली जाती है. बस यही क़िस्से और यही बातें हैं जिससे इस लेख का ख़मीर उठता है. न बात बढ़ाने की गुंजाइश न लतीफ़ागोई का मौक़ा. इस छोटे से दायरे में आदमी लेखों के तोता-मैना क्या उड़ायेगा. मामूलीपन और सामने की बातों का यह हाल कि एक क़िस्सा या एक बात ऐसी नहीं जो मुस्लिम मिडिल क्लास के हर बच्चे को पेश न आयी हो. यहाँ कल्पना की उड़ान भी नहीं जिसके ज़रिये वह कहानी में जानी-पहचानी चीज़ों को अजनबी बनाकर पेश करता है. सादगी ऐसी कि वह ख़ुद कहती है कि भई यह था हमारा बचपना. सुबह उठे मंजन घिसा, मुँह धोया, मास्टर साहब के पास सबक़ पढ़ा और भूख लगी, आपा से खाना माँगा तो हथेली पर अंगारा रखने की धमकी मिली. हक़ीक़त यह है कि ‘बचपन’ उन लेखों में एक है जिनका बनाव-सिंगार क़ुदरत ख़ुद करती है. यहाँ क़ुदरत का मतलब इनसानी आदतों और व्यवहार से है जो एक ख़ानदान के लोग एक-दूसरे के साथ करते हैं. ‘बावर्ची’ दूसरा लेख है जिसे उर्दू के हास्य लेखों में अलग स्थान दिया जा सकता है. बावर्ची का आर्ट ‘बचपन’ से बिल्कुल भिन्न है. इसमें सादगी नहीं, गहराई है. माहौल भी अपर मिडिल क्लास का है. इसीलिए ‘बावर्ची’ पी.बी. वुड हाउस के बावर्ची की तरह कम बोलता है. और रखरखाव वाला है जिसकी वजह से ऊंची सोसाइटी का यह जोड़ा अपने ही घर में फूँक-फूँककर नेवाला चबाता है और मेहमानों की तरह रहता है. ‘बचपन’ में शोर-शराबा, जूतम-पैज़ार और डाँट-डपट है लेकिन बावर्ची में ख़ामोशी और वह हास्य है जो बावर्ची के पकवानों की तरह तहदार, पेचीदा और चकरा देने वाला है. इसीलिए इसमें मसालों का वह मिश्रण और धीमी आँच है जिनसे बावर्ची के वह खाने तैयार होते हैं जिन्होंने एक सभ्य घर को मध्ययुगीन दुखों का क़ैदखाना बना दिया है. इन दुखों को घरवाला और उसकी बीवी जो इस लेख का नैरेटर हैं, सब्र से बर्दाश्त करते हैं. हद यह है कि खाने-पीने की लज्ज़त के लिए जो बावर्ची रखा गया है उसी के कारण त्याग की भावना, मशीनों का ज़ुल्म और दुनिया के मिटने का एहसास उस व्यंग्य को अन्धकार मुक्त सौन्दर्य बनाता है. इस्मत का तीसरा बेमिसाल लेख ‘हीरोइन’ है. ऐसे लेख अंग्रेजी में हेज़ल्ट, चार्ल्स लैम्ब और वर्जीनिया वुल्फ़ ने लिखे हैं. लेखन की क्रिया में इन तीनों की रूह इस्मत में आ गयी है. इस लेख में अदबी समझ, समाजी चेतना और आलोचनात्मक सोच-समझ का ऐसा मिश्रण है कि उर्दू इंशापरदाज़ों और आलोचकों के लिए आज भी जलने के लिए काफ़ी है. वह जिनकी ज़िन्दगी अदब और समाज के बख़िये टांकते गुज़री इस लेख को देखते हैं तो समाज के लट्ठे के बड़े-बड़े पायजामों में उनकी आलोचना की खपच्चियों जैसी सूजी-मारी टांगें कांपने लगती हैं.
हीरोइन में इस्मत ने उर्दू अदब की हीरोइन के ज़रिये सामाजिक परिदृश्य, औरत-मर्द के बदलते हुए रिश्तों और उनके अदब पर पड़ते प्रभाव को समझने की कोशिश की है. ‘फ़सान-ए-आज़ाद’ की औरत को देखकर उस समय का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि वह यह है उस समय की चर्चित औरत, जो सभ्य, पढ़ी-लिखी और दिलचस्प तवायफ़ थी. ‘गर्दिशे-रंगे-चमन’ में कुर्रतुलएन हैदर ने इस्मत के इस जुमले का दस्तावेज़ी सुबूत दिया है कि सभ्य पढ़ी-लिखी औरत का बाइज़्ज़त ज़िन्दगी गुज़ारने का एक रास्ता इसी आयरनी में है.फ़नकारों के लिखे हुए लेखों की तरह इस लेख में भी विचारों की अभिव्यक्ति सूक्ष्म रूप में हुई है. प्रतीकों और बिम्ब बनाने की सतह पर भी. ‘फ़सान-ए-आज़ाद’ की तवायफ़ को शिकस्त देकर प्रेमचन्द की गृहस्थन दबे पाँव, घूँघट काढ़े, क़दम- क़दम पर पैर चूमती, माथे टेकती अदब में रेंगने लगी. चौराहे के नल को गन्दा कर लोगों ने अपने घरों में कुएं खोदना शुरू किये, ‘घर में नल लग गया तो मीठे पानी की कुइयों को ऐसा भुलाया कि अन्धी होकर साँपों और कनखजूरों का स्थान बन गयी और अब वक़्त पड़ा तो उसी के किनारे प्यासी ज़बानें लटकाये हाँफ रहे हैं. यही नहीं बल्कि म्यूनिसपलिटी से कहकर सफ़ाई कराने पर तुले हुए हैं. मगर यह अन्धा कुआँ दोबारा कारआमद होने से पहले ही बड़ी मेहनत चाहता था. इसलिए बाग़ियों की हिमाकत में बोल पड़ा. पुकार-पुकार कर उसने दुनिया के उस ज़ख़्म को दिखाया जो नासूर बनकर सज उठा था.’ लेख का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह है जहां इस्मत औरत और उसके पेशे का ज़िक्र करती है. इस पैराग्राफ़ में कितने नावेल और कहानियों की आवाजें सुनायी देती हैं. अज़ीम बेग़ की ‘शरीर बीवी’ प्रेमचन्द की ‘गृहस्थन’ और ख़ुद इस्मत की कहानी ‘बेकार’ की डाइन, सब का निचोड़ इन लाइनों में आ गया है.
‘‘तो यह कमाऊ हीरोइन जिस्मानी और दिमागी ऐतबार से चाक़-चौबन्द बिल्कुल लुटेरों की तरह चारों तरफ़ हाथ मारने लगी. अब तो मज़ाक़ की हद हो गयी. खै़र कोनैन खिलाती थी, थप्पड़ लगाती थी तो कोई बात न थी. ये तो औरत के नख़रे हुए, चौकीदारी करती थी. ज़रा-सी बात पर टेसुए बहाने लगती थी. हर वक़्त सवार रहती थी, तो क्या था, थी तो अपनी मोहताज. अपनी बिल्ली भी कभी पंजा मार बैठती है मगर ख़र-ख़र करके फिर अपना नर्म-नर्म जिस्म पैरों से रगड़ कर मना भी लेती है. ख़राब है तो क्या, है तो अपनी, हमीं से तो माँगकर इतराती है. हमारी ही जेबों से इठला-इठला कर पैसे निकालती है. लेकिन यह बिल्कुल मर्दानावार, आर्थिक दुनिया में ख़म ठोंककर जो ख़ुद अपनी कमाई कर खसोट ले जाती है. यह तो सरासर डाका है. नतीजा यह कि बड़ी जल्दी यह हीरोइन ‘डाइन’ बन गयी.’’ये तो इस्मत के लेख हुए लेकिन इस्मत ने जिस वक़्त लिखना शुरू किया उस समय कहानी में रंगा-रंगी बहुत थी. समाजी ज़िम्मेदारी का एहसास तो लेखकों में शुरू से ही था, नज़ीर अहमद और राशिदुल खै़री के समय से लेकिन वह इतना मुखर नहीं था, जितना कि पाँचवीं और छठी दहाई में हुआ. दूसरे विश्वयुद्ध, बंगाल का अकाल, आज़ादी की लड़ाई, बँटवारा और दंगों की वजह से कहानीकार का चेहरा स्वाभाविक तौर पर संज़ीदा हो गया था और होंठों से हंसी ग़ायब हो चुकी थी. एक समय की पत्रिकाओं में हास्य-व्यंग्य के अंक प्रकाशित होते थे. उर्दू का यह सुनहरा दौर समाप्त हो चुका था. हास्य से ज़्यादा व्यंग्यकार नज़र आते थे जिनमें चिड़चिड़ापन नुमायां था. नार्मल हालत में अदब का मिज़ाज रंगारंग होता है. फ़नकार बहुत-सी चीज़ें हल्के-फुलके मूड में भी लिखता है जिसका मकसद हँसने-हँसाने और गुदगुदाने का जादू जगाना था या अपनी कला का प्रदर्शन होता है. कहानी की बहुत-सी क़िस्में ऐसी हैं जिनमें वह कहानी लिखता है. मिसाल के तौर पर शिकार की कहानी, सफ़र की कहानी, रूमानी कहानी और साइंसी कहानी. बहुत-सी तकनीक ऐसी हैं जिनके प्रयोग में उसे आनन्द आता है जैसे आश्चर्य वाला अन्त, स्टीम आफ़ कांशसनेस की तकनीक, पत्र और डायरी की तकनीक, कैमरे की आंख की तकनीक, चीज़ों के ज़रिये कैफ़ियत बयान करने की तकनीक, कभी पुरानी शैली या उसकी पैरोडी लिखने की तकनीक और इसके अलावा बहुत से तरीक़े हैं. बेशक फ़नकार की बड़ाई उसकी रचनाओं में निहित है लेकिन एक बड़े फ़नकार के यहाँ ख़ालिस आर्ट भी ऐसा जादू जगाता है कि चिन्तन और कल्पना की जगह कल्पना के जादू से ही हमें आश्चर्यचकित कर देता है. इसीलिए इब्सन का प्रशंसक होने के बावजूद बर्नाड शॉ की ख़्वाहिश यही थी कि वह शेक्सपियर के ड्रामे जैसी कोई चीज़ लिखे, जो निरी जादूगरी है. मोपासां की हौलनाक कहानी आर्ट का ऐसा ही नमूना है, फ़ैज़ की नज़्म जादूगरी की ऐसी ही मिसाल है. मंटो की कहानी ‘फुंदने’ भी शैली के इसी जादू की अभिव्यक्ति है. सुरेन्द्र प्रकाश की कहानी ‘दूसरे आदमी का ड्राइंग रूम’ भी घुलते-मिलते लफ़ज़ी बिम्बों का नमूना है. इन बातों की तरफ़ ध्यान दिलाने का मतलब यह है कि आमतौर पर हम अपनी आलोचना में गम्भीर हो जाते हैं और हमें अदब में दर्शन की ऐसी चाट पड़ गयी है कि जब तक लिखने वाले की कोई चीज़ खुद हमारे ज़ेहन के कबाड़खाने में धूल खाते ट्रेड यूनियन-दर्शन की तरह दर-दर की भीख की पैग़म्बरी को नहीं जगाती, हम उस पर नज़र नहीं करते. इस्मत पर लोगों ने इस कारण भी नहीं लिखा कि साम्राज्य के ख़िलाफ़ बग़ावत हो तो सोशियोलॉजी, कल्चर, मज़हब वगैरह में सर खपाना पड़ता है और उर्दू का आलोचक ऐसी खपत के लिए काँधों पर सर रखकर नहीं फिरता कि सरफ़रोशी की तमन्ना बड़ी बात है, उसे क़लम की तलवार को बरहना करने और लेखन की सरहदों की पहरेदारी पर उकसाता है. इसीलिए हमारे फ़नकारों की छोटी रचनाएँ हमेशा नज़रअन्दाज़ की जाती रही हैं चाहे वे आला दर्जे़ की ही क्यों न हों. इस्मत की इन छोटी चीज़ों में ‘उफ़ ये बच्चे’, ‘सफ़र में’, ‘शौहर की ख़ातिर’ और ‘नन्ही सी जान’ शामिल हैं. ‘नन्ही सी जान’ तकनीक की जादूगरी और संवाद लेखन का बेमिसाल नमूना है. उर्दू में इस तरह की दूसरी कहानी नज़र नहीं आती. एक कहानी बलवन्त सिंह ने लिखी थी जो ‘आजकल’ में प्रकाशित हुई थी. नाम याद नहीं रहा लेकिन संवाद ज़ाहिरा तौर पर सम्भोग करते हुए जोड़े के मालूम होते थे लेकिन हक़ीक़ीत में औरत के कान में दर्द था जिसकी तीमारदारी शौहर कर रहा था. ‘नन्ही सी जान’ में लगता यह है कि कमसिन नौकरानी ने बच्चा जना और उसे मारकर, जिस नौकर से उसका पेट था, की क़मीज़ में लपेटकर बाग़ में गड्ढा खोदकर चुपके से गाड़ दिया. इस क़िस्से का पूरे घर में शोर है. घर की बीवियां, जवान लड़कियां, नौकर-चाकर सभी हैरान हैं कि देखें अब्बाजान आते हैं तो क्या होता है. वह बहुत सख़्त आदमी हैं. बहरहाल अब्बाजान आये तो राज़ खुला कि मुर्ग़ी का बच्चा था जो रसूलन के हाथों दड़बा बन्द करते हुए दरवाजे़ में दबकर मर गया. इस कहानी की एक और ख़ूबी यह है कि एक बार पढ़ने और अंजाम का पता चल जाने के बावजूद, उसे दूसरी बार पढ़ने में इसलिए आनन्द आता है कि घर की औरतों की डाँट-डपट, नौजवान लड़कियों की ढकी-छिपी दिलचस्पी, नौकरों के आपस में ताने और जूतम-पैज़ार इस्मत की विशेष शैली में अपना अलग सौन्दर्य रखते हैं. हैरत में डालने वाले अंजाम के माहिर कहानीकार मोपासां और ओ. हेनरी, सब के सब आकर्षक शैली के मालिक थे. यह चीज़ उनकी आश्चर्य भरी कहानी को साहित्यिक सौन्दर्य प्रदान करती है. कहानी ‘उफ़ ये बच्चे’, ‘बचपन’ जितनी ही ख़ूबबसूरत है. फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि उसकी बुनावट में कहानी का तत्त्व अधिक है. व्यंग्य बच्चों की वह शरारत है जो भुगतने वाले के लिए परेशानी का कारण और तमाशबीन के लिए आनन्द और आश्चर्य. तन्हाई और सुकून की आरज़ूमन्द औरत जो इस कहानी की नैरेटर है, के सामने एक पत्रिका में उन पांच जुड़वां बच्चों के चित्र हैं जो डिब्बों की तरह एक पंक्ति में सजे हैं. “ ‘पाँच’ मैंने चपटी नाकों को छंगुलिया से गिनते हुए सोचा, एकदम दूसरा ख़याल आया. शाबाश है बच्ची तेरे जीवड़े पर, तेरा ही बूता था. कोई और दाल की होती तो साँस भी न लेती. पाँच! पूरे पांच मोजज़ा है.” ‘एकदम’ और ‘सांस भी न लेती’ की दाद दीजिए. फिर चुन्नू की कुतिया ने भी बच्चे दिये थे. घर के हर कोने में मोटे-मोटे पिल्ले कूँ-कूँ करते फिरते थे. और फिर वह थी मीनू शैतान की खाला. लिपिस्टिक, पाउडर, क्रीम सब लतपट कर दे, क़लम तोड़े, ग़ुस्सा तो बहुत आये. इस्मत की यही ख़ूबी है कि ग़ुस्सा आता है तो आने देती है. हर भाव को ऊपर तक पहुँचाती है. ज़ालिम इतनी है कि जो भाव भी आतंक मचाता है उसका तमाशा मजे़ से करती है, न अदब न लिहाज़. समझ में ही नहीं आता कि किस टाइप की थी ये औरत. यह पैराग्राफ़ देखिए. ‘‘ऐ है, कैसी बेदर्दी से मारती है. ऐ. अपना ख़ून है, अपना ख़ून! ख़ून! दस बच्चों की मां की औलाद होने की यही सज़ा है. घर क्या है, मोहल्ले का मोहल्ला है. मरज़ फैले, वबा आये, दुनिया के बच्चे पटापट मरें मगर क्या मजाल कि यहां एक भी टस से मस हो जाये. हर साल घर माशा अल्लाह अस्पताल बन जाये. पतीलियों साबूदाना पक रहा है. सेरों कुनेन आ रही है. फोड़े-फुंसी के ज़माने में मरहम का ख़र्च दाल-रोटी से ज़्यादा. जिस कमरे में देखो पुड़े, मचाये और मरहम की डिबियां. टांगें सड़ रही हैं, बुखार चढ़ रहे हैं, लेने के देने पड़े हैं और यह लीजिए बीमारी गयी और वह चचेड़ियों की तरह फुरहरी लेकर खड़े हो गये. फिर ऐसा पलीह-पलीह कर खाया कि चार दिन में फिर हमारे सीने पर कोदों दलने के लिए वही कसी हुई तोंद में और मुगदर जैसी टांगें मौजूद! सुनते हैं दुनिया में बच्चे भी मरा करते हैं! मरते होंगे, क्या ख़बर!’’ पता नहीं इस पैराग्राफ़ में खौलते हुए स्फ़्फ़ाक़ जज़्बे को एहसास या शैली का कौन-सा केमिकल एक्शन इतना ख़ूबसूरत बनाये हुए है. हास्य का यह रंग उर्दू के तमाम हास्य लेखकों से अलग है क्योंकि हास्य के पास अगर व्यंग्य का डंक न हो तो इतनी ज़हरनाकी और तेज़ाबियत वह बरदाश्त नहीं कर सकता. लेकिन इस पैराग्राफ़ में व्यंग्य का डंक नहीं है. व्यंग्य वहां होता है जहां सुधार की इच्छा हो या सुधार मुमकिन हो. दस बच्चों का कुनबा न रहे तो यह हास्य कहाँ से पैदा होगा. गोया जो कुछ है उसकी हक़ीक़त में ही हास्य है. ज़हर में ही अमृत है. जलाने वाले तेज़ाब में ठंडा मरहम है. रचना का यह वही केमिकल तत्त्व है जो आलोचना की गिरफ़्तर में कभी नहीं आता. यहीं फ़नकार एक कीमियागर, एक जादूगर, एक बहुत बड़ा करिश्मा साज़ नज़र आता है. फ़नकाराना कलाकारी का विश्लेषण करने की पेशेवराना मजबूरी से आलोचक एक पल के लिए ग़ाफ़िल हुआ कि करिश्मा मोजज़े में बदल जाता है. इस्मत के यहां हास्य-व्यंग्य लेखों के रंगारंग रूप हैं. जैसे ‘ढीठ’ आठ पृष्ठों का एक संवाद है. ‘वह’ और ‘मैं’ के बीच जिसमें ‘मैं’ उसकी मंगेतर है. यह ड्रामा नहीं क्योंकि इसमें कोई ऐक्शन नहीं. बहस है, तकरार है, झगड़ा है, बात बनती-बिगड़ती और सिमटती है. यह संवाद नुकीलेपन और धारदार कँटीले वार्तालाप की जगमगाती रचना है. इसमें मर्द की औरत पर बरतरी के सभी रूप औरत की गै़रमामूली ज़हानत, व्यंग्य और चर्ब-ज़बानी के निशाने पर है. मर्द का हर वार ख़ाली जाता है और औरत के लफ़ज़ी दाँव-पेंच से वह ख़ुद को हमेशा असहाय पाता है. ‘ढीठ’ भी इस्मत की बेहतरीन रचनाओं में है. ‘शौहर की ख़ातिर’ और ‘सफ़र में’ दो लेख ऐसे हैं जो दूसरे लेखों की सतह के नहीं हैं लेकिन अपना अलग लुत्फ़ रखते हैं. इस्मत के हास्य का नाम आते ही अज़ीम बेग़ चुग़ताई का ख़याल आता है. बहरहाल वह अपने समय के प्रसिद्ध हास्य लेखक और इस्मत के भाई थे. यानी हास्य उनका ख़ानदानी विरसा था, ख़ून में रचा-बसा था. यह बात बस यहीं तक सीमित है, बाकी इस्मत ही इस्मत है. इस्मत ने कोई भी लेख ख़ालिस हास्य के नज़रिये से नहीं लिखा. उनके समय के लेखकों ने भी लेख लिखे हैं. कृष्ण चन्दर के हास्य लेखों के अलग से संग्रह प्रकाशित हुए. मंटो के हास्य-व्यंग्य लेख जर्नलिस्टिक हैं जो अख़बार की तरह ही जल्दी बासी हो जाते हैं. कृष्ण चन्दर बातों में हँसाते हैं, उन पर पहले हँसी आती थी अब नहीं आती. यह हास्य की ट्रेजिडी है कि ज़िन्दगी के आदाब बदलते ही उनका रंग फीका पड़ जाता है. इस्मत का हास्य उसके व्यक्तित्व का लाज़िमी हिस्सा है. उसकी शख़्सियत इतनी तेज़ाबी, ज़हर-नाक और बाग़ियाना थी कि हास्य ही उसे लिखने के लायक बना सकता है. ‘टेढ़ी लकीर’ उर्दू का बड़ा नावेल है लेकिन बड़ा कारनामा इसलिए नहीं बन सका क्योंकि इसमें तेज़ाबियत का तत्त्व इतना अधिक है कि हास्य का तत्त्व उसे कम नहीं कर पाता. इस्मत उर्दू की सबसे अधिक ग़ुस्से से भरी कहानीकार है और उसका गु़स्सा, गु़स्सा ही रहता है. एक बेबस, कमज़ोर अपनी जिंस में कैश्द, एक कुचली हुई औरत का यह गु़स्सा कभी ट्रेजिडी के हीरो की शान में नहीं बदल पाता, जो मशीनों की कलाई मरोड़े, इनसानी ताक़तों को ललकारे और दुनिया में एक शोर मचा दे. औरत फिर मर्द के मुक़ाबले में कमज़ोर ही रह जाती है. वैसे भी हार्डी कीज्मे के अलावा विश्व के फ़िकशन में औरत का और कोई किरदार ट्रेजिडी की हीरोइन न बन सका. औरत के बहुत से दर्दनाक रूप हैं लेकिन उनमें दर्द का तत्त्व बहुत ज़्यादा है. बेदी औरत के और मंटो आम इनसान के ग़म की गहरी खाइयों को पथरीली निगाहों से देखने में कामियाब हुए हैं. उर्दू का एक ही शायर ग़ुस्से में इस्मत के बराबर है और वह है राशिद. दोनों ग़ुस्सावर और बाग़ी हैं. ‘ईरान में अजनबी’ की प्रस्तावना में पितरस ने यह बात कही थी कि राशिद ग़ुस्से में सिर्फ़ अपनी ही क्यारी के गुलाबों को उखाड़ फेंकता है. ‘टेढ़ी लकीर’ की ‘समन’ और इस्मत का बचपन बल्कि जवानी भी इसी गु़स्से और झुँझलाहट की ओर इशारा करता है. ऐसी भावुकता जो पत्थर को भी ख़ून के आंसू रुलाये और ऐसा हास्य जो हौलनाकी की इन्तहा को पहुंचकर जब हास्यास्पद बन जाती है, तब जन्म लेती है. इस फुंकारती हुई, अपनी ही आग में जलती हुई शख़्सियत के आख़िरी जज़्बाती सहारे हैं. ऐसे सहारे जो उसकी शख़्सियत को रचनात्मक काम करने के लायक़ बनाते हैं. काग़ज़ आँसुओं से भीगा और क़हकहों से भरा हो तो क़लम की आग से जल जायें. ‘नन्ही की नानी’ का पूरा आर्ट इन्हीं दोनों के फ़्यूज़न का परिणाम है. मरने के बाद नन्ही की नानी जब ख़ुदा के सामने जाती है तो एक औरत की ज़िन्दगी की ऐसी ज़िल्लत देखकर ख़ुद ख़ुदा की आंखों से ख़ून के आंसू बहने लगते हैं. लेकिन नन्ही की नानी की ज़िन्दगी में कैसी हौलनाकी छिपी है और यह कितनी हास्यास्पद बन गयी है कि पूरी कहानी क़हक़हों से भर जाती है. हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी हँसी की हर लहर अपने पीछे ख़ून की लकीर छोड़ती जा रही है. क्लोरोफार्म में बसे हुए उस ख़ंजर की तरह जिससे दंगाई राह चलते आदमी का पेट चाक कर देता है और उसे ख़बर भी नहीं होती और वह चलता रहता है. इस्मत के आर्ट का यही कमाल है. क्लोरोफार्म में बसा हुआ नश्तर. इस अर्थ में इस्मत के हास्य का रंग तबक़ाती हक़ीक़त पसन्दाना है. बेबाक़ और झूठी शराफ़त, शर्मो-हया और बुज़ुर्गी के प्लास्टर मंक दरारें पैदा कर देने वाला है. इसमें नफ़ासत, शराफ़त और मुस्कराहट की वह ख़ूबी नहीं है जो सुरक्षित और सभ्य माहौल में तबीयत की नज़ाकतों को सँवारने से पैदा होती है. यहाँ तो भरी महफ़िल में कुर्ता ऊँचा करके बडे़-बड़े सीने के नाश्तेदान पर बच्चों को चिपकाने वाली औरतें हैं. सूरज की आड़ में झरझरी लुंगी पहने खड़े हुए वह बूढ़े मर्द हैं जिन्हें आर-पार देखकर खूसट बुढ़ियाओं के वज़ू टूटते हैं. ट्रेन में सोया हुआ वह आदमी है जिसकी काली रानों पर से धोती ख़तरनाक हद तक खिसक रही है. उन बड़ी-बूढ़ियों की नसीहतों के मुहावरों और कहावतों से भरे दफ़्तर के दफ़्तर हैं जो जवान होती हुई लड़कियों के सीनों को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं. उन बदन चुराती हुई लड़कियों का अनादर जिनके मैले महरमों को उनके भाई नौकरों के गन्दे जांघिये समझते हैं. हगते-मूतते दिन-रात पेट का तन्दूर भरते हुए उन यतीम बच्चों की फशैज है जिनके माँ-बाप ज़िन्दा हैं. उन औरतों के कोसने और गालियां हैं जिनकी कुंवारी बेटियों के पेट रह गया है और वह मर्द हैं जो चारों तरफ़ मुँह मारते रहते हैं लेकिन हर साल बच्चा घर में ही पैदा करते हैं. इस्मत के यहाँ हास्य ज़िन्दगी की ऐसी ही कड़ुवाहटों को आर्ट में बदल देने का रासायनिक तत्त्व है. यह रासायनिक तत्त्व उसके फ़न की रगों में दौड़ते हुए ख़ून का हिस्सा है. उसकी भाषा-शैली एक-एक शब्द के चयन और लय, क्रिया और गति की हास्य-व्यंग्यात्मक तहदारी ‘लहजे के उतार-चढ़ाव’ वाक्यों के तोड़-मरोड़ में ऐसी पैवस्त है कि उसकी अलग से पहचान भी मुमकिन नहीं है. उर्दू के कहानीकारों के यहाँ इस मिज़ाज और उसके फ़न का कोई ऐसा लाज़िमी हिस्सा नहीं जैसा कि इस्मत के यहां है. इसीलिए इस्मत की ग़मनाक कहानियों को भी हम ट्रेजिडी के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा अँधेरी कॉमेडी ही कह सकते हैं. फ़न की यही विशेषता इस्मत को सबसे अलग करती है. इस्मत के नान फ़िकशनल लेखों में कृष्ण चन्दर, मंटो और अज़ीम बेग़ चुग़ताई पर उसके ख़ाके भी शामिल हैं. मंटो और कृष्ण चन्दर पर मामूली रेखाचित्र हैं क्योंकि उनमें ज़हर की कडुवाहट नहीं जो केवल इस्मत के क़लम का डंक दे सकता है. यह ज़हर ‘दोज़ख़ी’ में इस्मत ने अपने भाई अज़ीम बेग़ चुग़ताई के ख़ाके में उतार दिया है. यह उर्दू का अजीबो-ग़रीब ख़ाका है जिसे आप जितनी बार पढ़ेंगे उतनी बार बौखलाकर-हड़बड़ाकर रह जायेंगे. इसका कारण यह कि इस ख़ाके का पेचीदा और जज़्बाती सिस्टम ख़ुद को हमारे जज़्बाती सिस्टम में पेचीदगी पैदा कर हमें उलझन में डाल देता है. आदमी जब किसी जानलेवा बीमारी में होता है तो जो कुछ वह था, नहीं रहता. एक अर्थ में वह उसका गै़र हो जाता है. अपना होने के बावजूद वह गै़र बन जाता है. बीमारी से नफ़रत ख़ुद बीमार से बेज़ारी में बदल जाती है. मरीज़ की तीमारदारी करते-करते घर वाले थक जाते हैं. आदमी जब ज़िन्दा लाश बन जाये तो ज़िन्दा लोगों से उसके सरोकार नहीं रहते. अपनी तरफ़ इसी बेपरवाही को समाप्त करने के लिए बीमार के तक़ाजे़ बढ़ जाते हैं. इन तक़ाज़ों से ख़ानदान के लोगों में झुँझलाहट पैदा हो जाती है. इस झुँझलाहट से लड़ने का बीमार के पास कोई हथियार नहीं होता. इसीलिए वह अन्दर ही अन्दर खौलता रहता है और जहाँ भी उससे किसी ने भी थोड़ी नरमी दिखायी तो उसी नर्म गोशे से अन्दर का ज्वालामुखी फट पड़ता है. बाहर से संगीन दीवार में दरार पड़ जाती है. ख़ानदान के लोगों की व्यस्तता के दायरों में दरारें पैदा करने का यह मनोवैज्ञानिक हर्बा उसके बहुत काम का लगता है. बीमारी ने लोगों को उससे दूर कर दिया था. फ़सादी बनकर वह लोगों के बीच पहुँच गया. बिना डंक के कीड़े को कोई देखता भी नहीं. लेकिन जब बिच्छो दालान में नज़र आ जाये तो चारों ओर भगदड़ मच जाती है. बीमार से लगाव न सही, लाग तो है. एक सम्बन्ध तो कशयम है. बीमार नफ़रत बर्दाश्त कर सकता है मगर उपेक्षा नहीं क्योंकि यह उसके लाश होने का एहसास दिलाती है. वह समझता है कि वह उपेक्षित है तो वह है ही नहीं. न होने के एहसास से बचने के लिए और ख़ुद के होने का सुबूत देने के लिए वह हिंसा का सहारा लेता है. चीख़ता, चिल्लाता है, चीज़ें पटकता है. वह इतना नाक़ाबिले-बर्दाश्त हो जाता है कि लोग उसकी मौत की आरज़ू करने लगते हैं. बीमार दूसरों के लिए रोग बन जाता है जिससे नजात की ख़्वाहिश ऐलानिया होने लगती है. और जब वह मर जाता है तो वह एक तकलीफ़देह रोग की तरह भुला दिया जाता है और बीमारी से पहले जैसा वह था उसी सूरत में लोग उसे याद कर रोने लगते हैं. यह भिन्न, पेचीदा और उलझे हुए जज़्बात का वह ताना-बाना है जिससे इस्मत ने ‘दोज़ख़ी’ लिखा है. इस्मत का तजरबा कितना गहरा और नज़र कितनी पैनी थी कि वह समझे और लिखे न जाने के योग्य सिचुएशन का चैलेंज क़ुबूल करती थी. इसका अन्दाज़ा ‘दोज़ख़ी’ से होता है और ऐसा लगता है कि कुछ कारणों से बड़े कुनबे में लम्बी बीमारी के भावुक और मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध ख़ास तौर पर उसे आकर्षित करते थे. इसीलिए संग्रह ‘चोटें’ में एक कहानी ‘बीमार’ है जो ‘दोज़ख़ी’ से कमतर दर्जे़ की है लेकिन इससे गहरी समानता रखती है. ‘दोज़ख़ी’ की एक ख़राबी यह है कि उसमें उन क़िस्सों किश्स्सों की कमी लगती है जो इस्मत के बयानों के लिए उदाहरण का काम करते. जैसे फ़सादी के रूप में अज़ीम बेग़ ने क्या खेल खेले या उन्होंने जब दुखदायी रूप अख़्तियार किया तो उसके दृश्य क्या थे?
इसका विस्तार ख़ाक़े में नहीं है लेकिन ‘दोज़ख़ी’ का यह केन्द्रीय ख़याल उस ज़िन्दादिल हास्य लेखक को बीमारी ने तोड़ दिया लेकिन उसे तोड़ न सकी, बड़ी होशियारी से उभर कर सामने आता है जबकि ‘बीमार’ रेखाचित्र न होने के बावजूद इसके थीम को ख़ाके से ज़्यादा खुला होना चाहिए लेकिन उसका केन्द्रीय थीम उभर कर सामने नहीं आता. पता नहीं चलता कि कौन-सी बात बताने के लिए इस्मत ने यह कहानी लिखी है. शायद लेखिका की यही दिलचस्पी रही हो कि बीमारी में आदमी गै़र बन जाता है और उसके सम्बन्ध बदल जाते हैं.
अली असग़र के हलक़ में तीर घुसा और मैंने रोना शुरू कर दिया




















