
विवेक आसरी
यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.


यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.
लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरे यूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक आसरी. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको.
वादे के मुताबिक वो लाए हैं 'डाक यूरोप' की आठवीं किस्त. फिल्म देखकर आए हैं 'टेरर- यॉर वर्डिक्ट', जो सिर्फ पांच देशों में रिलीज हुई थी. लेकिन, इस फिल्म में जो बहस दिखाई गई है, वो पूरी दुनिया में हो रही है और वो पूरी दुनिया के लिए है. आप भी शरीक होइए.
आतंकवादी एक प्लेन को हाईजैक कर लेते हैं. प्लेन में 164 लोग सवार हैं. आतंकवादियों ने धमकी दी है कि उस प्लेन को एक फुटबॉल स्टेडियम में क्रैश करा देंगे. फुटबॉल स्टेडियम में तब मैच चल रहा है. 70 हजार लोग मैच देख रहे हैं. प्लेन क्रैश होता है तो हजारों लोग मारे जाएंगे. आतंकवादी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. वो प्लेन को स्टेडियम की ओर ले जा रहे हैं. क्या उस प्लेन को हवा में ही मार गिराना चाहिए? 164 लोगों की जान लेकर हजारों जानें बचाई जा सकती हैं.
जर्मन फिल्म 'टेरर- यॉर वर्डिक्ट' का नायक इन्हीं सवालों से जूझता है. पिछले हफ्ते ये फिल्म जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, स्लोवाकिया और चेक रिपब्लिक में दिखाई गई. फिल्म में ये फैसला एक जेट पायलट लार्स कोख पर छोड़ दिया जाता है कि अगवा विमान को गिराया जाए या नहीं. कोख विमान को गिरा देता है. इस फैसले के लिए उस पर मुकदमा चलता है. पूरी फिल्म में मुकदमे की कार्रवाई है. दोनों तरफ से तर्क-वितर्क होते हैं. दोनों तरफ की दलीलें होती हैं. और फिर एक अनोखी बात होती है. बिना फैसला सुनाए ही फिल्म खत्म हो जाती है.

इसके बजाय टीवी पर फिल्म देख रहे दर्शकों से कहा जाता है कि वो फैसला दें. लोगों ने फोन के जरिए वोट किया और फैसला दिया. ऐसा शायद पहली बार हुआ कि लोग असल में किसी फिल्म का हिस्सा बने. किरदार भले ही काल्पनिक थे, लेकिन नायक की किस्मत का फैसला असल में लोगों पर छोड़ दिया गया. और लोगों ने क्या जवाब दिया?
कुछ हजार लोगों को बचाने के लिए कुछ सौ को मार दिया जाना सही है या नहीं, ये बहस जर्मनी में 15 साल से चल रही है. 11 सितंबर 2001 के न्यूयॉर्क में हमले के बाद यहां एक कानून पास किया गया था. जर्मन सरकार देश को 9/11 जैसे हमलों से बचाने के लिए कानून लाई थी. उस कानून में ऐसे विमान को मार गिराए जाने का हक दिया गया था, जो हजारों लोगों की जान ले सकता है. लेकिन, कानून बस एक साल रहा, क्योंकि उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई.

उस कानून के विरोधियों का तर्क था कि ये कानून मानवीय गरिमा के खिलाफ है. उनका कहना था कि आपने कैसे तय किया कि प्लेन में सवार कुछ सौ लोगों की जान की कीमत स्टेडियम में बैठे कुछ हजार लोगों की जान से कम है? आपने ये कैसे तय किया कि उन कुछ सौ लोगों के मारे जाने से उनके परिजनों को जो दर्द होगा, वो उन हजारों लोगों के परिजनों से कमतर होगा?
कोर्ट विरोधियों के तर्क से सहमत थी, इसलिए कानून रद्द कर दिया गया. लेकिन, बहस जारी रही. अब 'टेरर- यॉर वर्डिक्ट' के जरिए बहस आमजन तक पहुंची. पांच देशों के लोगों ने फिल्म देखी और फिर वोट करके विमान गिराने वाले पायलट को निर्दोष करार दिया. 86.9 फीसदी लोगों ने कहा कि विमान को गिराने का कोख का फैसला सही था. मुझे लगता है वोट करने वाले ये सारे लोग खुद को स्टेडियम में बैठे लोगों की जगह देख रहे होंगे, न कि उस विमान में सवार लोगों की जगह. न कि विमान यात्रियों के अपनों की जगह. मेरी दिलचस्पी ये जानने में है कि उन 164 लोगों के अपने किसे वोट देंगे, अगर सच में कभी ऐसा हुआ तो...
फिल्म का ट्रेलर
https://www.youtube.com/watch?v=8haeyTkA4wg