दुबई-कतर जैसे ड्रोन हमलों का भारत के पास है कोई 'तोड़'? हवाई सुरक्षा का मेगा प्लान तैयार!
Iran-US-Israel War: सवाल सीधा है-हमला अगर खाड़ी में हुआ, तो हम इंडियावालों को क्यों चिंता हो? जवाब भी उतना ही सीधा-सादा है. चिंता है क्योंकि युद्ध की तकनीक सीमाएं नहीं देखती. जो हथियार आज दुबई या कतर में इस्तेमाल हुआ है, वही कल दक्षिण एशिया में हो सकता है. ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लो-फ्लाइंग हथियार अब युद्ध की नई सच्चाई हैं.
.webp?width=210)
आजकल की दुनिया में जंग सिर्फ टैंकों और तोपों से नहीं लड़ी जा रही. आजकल 'गेम' बदल गया है. पड़ोसी मुल्क हों या फिर समुद्री लुटेरे, अब सब छोटे-छोटे, सस्ते और खतरनाक ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.
हाल ही में दुबई और कतर जैसे देशों पर हुए हमलों ने दुनिया भर की फौज की नींद उड़ा दी है. ये ऐसे हमले थे जिन्हें रडार अक्सर पकड़ नहीं पाता क्योंकि ये जमीन के इतने करीब उड़ते हैं कि 'नजर' से ओझल रहते हैं.
जंग खाड़ी में हो रही है तो भारत क्यों सतर्क है?दुबई और कतर में हुए हमले बताते हैं कि अब सुरक्षा का पैमाना बदल गया है. एक मामूली सा ड्रोन, जिसकी कीमत एक कार से भी कम हो सकती है. वो करोड़ों की रिफाइनरी को राख कर सकता है. हेडलाइन पढ़कर आपमें से कई लोग ये सोच रहे होंगे कि अगर ये आग खाड़ी में लगी है, तो दिल्ली, मुंबई या विशाखापट्टनम को इससे क्या लेना-देना?
आसान भाषा में कहें तो सवाल सीधा है-हमला अगर खाड़ी में हुआ, तो हम इंडियावालों को क्यों चिंता हो? जवाब भी उतना ही सीधा-सादा है. चिंता है क्योंकि युद्ध की तकनीक सीमाएं नहीं देखती. जो हथियार आज दुबई या कतर में इस्तेमाल हुआ है, वही कल दक्षिण एशिया में हो सकता है. ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लो-फ्लाइंग हथियार अब युद्ध की नई सच्चाई हैं.
हमें चिंता क्यों होनी चाहिए? इस सवाल का जवाब छिपा है 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसी हालिया घटनाओं और हमारी भू-राजनीतिक हालातों में. पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान और चीन की तरफ से जम्मू-कश्मीर और पंजाब बॉर्डर पर ड्रोन के जरिए हथियार और ड्रग्स भेजने के मामले कई गुना बढ़ गए हैं.
ये सिर्फ तस्करी नहीं, बल्कि एक 'ट्रायल रन' है. अगर दुश्मन का एक ड्रोन सीमा पार कर सकता है, तो कल को सैकड़ों का 'स्वाम' (झुंड) किसी सैन्य बेस को निशाना बना सकता है.
हमें इसलिए तैयार रहने की जरूरत है क्योंकि भारत के पास 'स्ट्रैटेजिक एसेट्स'-जैसे तेल रिफाइनरी, परमाणु संयंत्र और घनी आबादी वाले शहर-बहुत हैं, जिन्हें दुश्मन कम लागत में बड़े हमले का निशाना बना सकता है.
भारत की सर्जिकल कार्रवाई के बाद सीमा पार से ड्रोन गतिविधियां बढ़ गई थीं. सुरक्षा विशेषज्ञ इसे केवल तस्करी नहीं, बल्कि 'प्रतिक्रिया समय' (Response Time) की टेस्टिंग भी मानते हैं. यानी दुश्मन यह देख रहा है कि हमारी चौकसी कितनी तेज है.
भारतीय सेनाएं जब दो तरफा तैयारी की बात कर रही होती हैं तो उनका इशारा असल में उन दो खतरों की ओर होता है, जो मुल्क पर हमेशा मंडराते रहते हैं.
पाकिस्तान: इनके पास बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल क्षमता है और ड्रोन टेक्नोलॉजी में ये तेजी से निवेश कर रहे हैं.
चीन: इनके पास हाइपरसोनिक हथियारों पर तेज प्रगति है और लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता है.
ये भी पढ़ें: पाकिस्तान के ड्रोन कितने खतरनाक और भारत की तैयारी कितनी मजबूत? पूरा खेल समझिए
हमला किन तरीकों से हो सकता है?अब तक हमने ये जाना कि मुल्क को खतरा हो सकता है. और उस खतरे की दिशा क्या हो सकती है. मगर सबसे बड़ा सवाल ये कि उस खतरे का चेहरा कैसा होगा. दूसरे शब्दों में कहें तो किस रूप में उस खतरे का सामना हमसे हो सकता है.
जब हमें खतरे का अहसास होता है, तो अक्सर हम सिर्फ मिसाइलों के बारे में सोचते हैं, लेकिन आधुनिक युद्धक्षेत्र 'मल्टी-डोमेन' (Multi-domain) है. हमला सिर्फ ऊपर से नहीं, हर दिशा से आ सकता है.
बैलिस्टिक मिसाइल: सबसे पहले बैलिस्टिक मिसाइलें आती हैं, जो अंतरिक्ष की सीमा तक जाकर बेहद तेजी से गिरती हैं. तकनीकी भाषा में कहें तो ये ऊंचाई पर जाकर Mach 5 (आवाज की रफ्तार से पांच गुना) से अधिक गति से गिरती हैं. 1000 किमी की दूरी 8 से 12 मिनट में तय कर सकती हैं.
क्रूज मिसाइल: फिर हैं क्रूज मिसाइलें, जो जमीन के साथ चिपक कर उड़ती हैं. ये सबसोनिक (आवाज से धीमी) भी हो सकती हैं और सुपरसोनिक (आवाज से तेज) भी. और अब तो हाइपरसोनिक मिसाइलों का युग है, जो रडार के लिए एक 'बुझो तो जानें' पहेली जैसी हैं.
क्रूज़ मिसाइलें जमीन या समुद्र के पास चिपक कर उड़ती हैं, जिससे रडार इन्हें देर से देख पाता है.
सुपरसोनिक/हाइपरसोनिक: सुपरसोनिक Mach 1 से तेज और हाइपरसोनिक Mach 5 से अधिक गति पर चलती हैं. ये प्रतिक्रिया समय (रिस्पॉन्स टाइम) को बेहद कम कर देती हैं.
ऑपरेशन सिंदूर के वक्त भारत के सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का कहर पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया ने देखा था.
ड्रोन/कमाकाजी: कम लागत, झुंड में हमला और रडार से बचने में माहिर. ये हवाई खतरों का सबसे खतरनाक रूप हो सकते हैं.
फाइटर जेट: आजकल ऐसे कई फाइटर जेट मौजूद हैं. जो बियॉन्ड विजुअल रेंज वालीे एयर-टू-सरफेस मिसाइलों से हमला करने में सक्षम हैं. यानी दिखाई देने से पहले ही मिसाइल का हमला.
ये सभी खतरे अलग-अलग ऊंचाई और गति पर आते हैं, जिन्हें एक ही रडार या एक ही मिसाइल से रोकना नामुमकिन है.
रडार का कवच: खतरे को देखना ही पहली जीत हैखतरा किस तरह का हो सकता है ये जान लिया. अब जानते हैं कि उसे पहचानेंगे कैसे. क्योंकि खतरे को रोकने के लिए उसे समय रहते 'देखना' जरूरी है. यहीं रोल आता है ‘रडार’ का.
रडार या (RADAR) यानी Radio Detection and Ranging. आसान भाषा में कहें तो एक ऐसी तकनीकी- जो रेडियो तरंगों (radio waves) का उपयोग करके दूर स्थित वस्तुओं जैसे विमान, जहाज, मिसाइल या बादलों की स्थिति, दिशा, गति और दूरी का सटीक पता लगाती है.
यह एक सक्रिय संवेदन उपकरण है, जो तरंगें भेजकर और उनके परावर्तन (echo) को मापकर काम करता है. और हमें आसमान से आने वाले खतरों से आगाह कर देता है. DRDO की रडार सिस्टम रिपोर्ट और भारतीय वायुसेना के मुताबिक भारत के पास मौजूदा समय में 'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम' की कई परतें हैं.
ग्राउंड रडार ('अश्वनी' और 'रोहिणी')
'अश्वनी' और 'रोहिणी' जैसे ग्राउंड-आधारित रडार भारत की जमीनी सुरक्षा की पहली और सबसे भरोसेमंद आंखें हैं. ये रडार 200 से 400 किमी की लंबी दूरी तक आकाश में किसी भी हलचल को ट्रैक करने में सक्षम हैं, जिससे दुश्मन के विमानों या मिसाइलों के आने की खबर सेना को बहुत पहले मिल जाती है.
इनकी उन्नत तकनीक जमीन पर स्थित होकर भी आसमान के ऊंचे और मध्यम स्तर के खतरों को रीयल-टाइम डेटा में बदल देती है, ताकि सुरक्षा एजेंसियां बिना किसी देरी के जवाबी कार्रवाई की योजना बना सकें.
AWACS ('नेत्र' - Airborne Warning and Control System)
AWACS, विशेष रूप से भारत का स्वदेशी 'नेत्र' सिस्टम, एक उड़ता हुआ कमांड सेंटर है जो आसमान में ऊंची उड़ान भरते हुए 360-डिग्री के दायरे में लगातार निगरानी करता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी ऊंचाई है, जिससे यह जमीन पर लगे रडार की 'ब्लाइंड स्पॉट' को भी आसानी से देख लेता है.
जैसे कि पहाड़ों या इमारतों की ओट में छिपकर उड़ने वाले लो-फ्लाइंग ड्रोन्स या क्रूज मिसाइलें. यह न केवल खतरे को पहचानता है, बल्कि हवा में ही हमारे फाइटर जेट्स को दुश्मन की लोकेशन का सटीक निर्देश देकर 'एयर बैटल' में बढ़त दिलाता है.
अब बात करते हैं उस 'सुरक्षा चक्र' की जो एक-एक खतरे को अलग तरीके से हैंडल करता है. ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (SIPRI) ‘भारत का डिफेंस अपडेट’ (India's Defence Update) रिपोर्ट में इस बाबत विस्तार से बताता है.
ड्रोन अटैक का तोड़ (कायनेटिक और नॉन-कायनेटिक)ड्रोन छोटे होते हैं, इसलिए उन पर बड़ी मिसाइल चलाना 'मक्खी मारने के लिए तोप' जैसा है. यहां काम आते हैं 'सॉफ्ट-किल' और 'हार्ड-किल' विकल्प. 'सॉफ्ट-किल' में हम इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स का इस्तेमाल करते हैं जो ड्रोन के सिग्नल को काट देते हैं, जिससे वह गिर जाता है.
'हार्ड-किल' में लेजर गन (Directed Energy Weapons) का इस्तेमाल हो रहा है, जो सीधे ड्रोन को जला देती है. भारत ने 'ड्रोन-डोम' (Drone Dome) तकनीक पर काफी निवेश किया है.
बैलिस्टिक मिसाइल का मुकाबलाइसके लिए भारत का सबसे भरोसेमंद हथियार है 'बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस' (BMD) प्रोग्राम. इसमें 'पृथ्वी' इंटरसेप्टर मिसाइल है, जो दुश्मन की मिसाइल को अंतरिक्ष में ही नष्ट कर सकती है. यह सिस्टम इतना सटीक है कि यह उड़ती हुई गोली को दूसरी गोली से मारने जैसा है.
क्रूज, सुपरसोनिक और हाइपरसोनिकइनके लिए हमारा 'ब्रह्मास्त्र' है S-400 ट्रायम्फ. यह रूस से आया सिस्टम एक साथ कई टारगेट को ट्रैक और हिट कर सकता है. साथ ही हमारा स्वदेशी 'आकाश' (Akash) मिसाइल सिस्टम है, जो मीडियम रेंज में क्रूज मिसाइलों और फाइटर जेट्स को रोकने में सक्षम है.
फाइटर जेट्स का मुकाबलाअगर दुश्मन का जेट अंदर घुसता है, तो हमारे Su-30 MKI और Rafale हवा में मुकाबला करने के लिए तैयार रहते हैं. एयर डोमिनेंस के लिए हम दुश्मन को सीमा के अंदर आने से पहले ही खदेड़ने की रणनीति रखते हैं.
समुद्री रास्ता
नेवी के पास 'बाराक-8' (Barak-8) मिसाइल सिस्टम है जो जहाजों को मिसाइल हमलों से बचाता है. साथ ही, तटीय रडार नेटवर्क पूरे समुद्र को कवर करता है.
परमाणु हमला
इसके लिए भारत का 'न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी' प्रोटोकॉल है. हमारा 'नो फर्स्ट यूज' का सिद्धांत और 'सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी' (अगर हम पर हमला हुआ, तो हम पलटवार करने के लिए सुरक्षित हैं) ही सबसे बड़ा बचाव है.
मिनट दर मिनट रिस्पॉन्स टाइमलाइनमुल्क पर खतरा किस दिशा से आ सकता है, हमने ये जान लिया. किस-किस रूप में आ सकता है ये भी पता कर लिया. और उनकी तोड़ कैसे करेंगे इसका अंदाजा भी लगा लिया.
मगर सबसे बड़ा सवाल की जब खतरा आवाज से भी तेज रफ्तार से हमारी तरफ बढ़ा चला आ रहा हो, तो उसे पहचानने और तबाह करने में हमें कितना वक्त लगेगा.
एक चार्ट के जरिए समझते हैं कि किस तरह के खतरे पर हमारा रिस्पॉस टाइम क्या होगा.
| खतरे का प्रकार | पहचान (Distance/Time) | इंटरसेप्शन का समय |
| बैलिस्टिक मिसाइल | 30-60 सेकंड | 6-10 मिनट |
| क्रूज मिसाइल | 100 किमी / 7-8 मिनट | 2-3 मिनट (सुपरसोनिक) |
| ड्रोन | 20-50 किमी | 3-10 मिनट |
सोर्स: Missile Defense Agency; Missile Defense Advocacy Alliance
भारत का एयर डिफेंस सिस्टम: एक नजर मेंबात अब भारत के एयर डिफेंस की हो ही रही है तो लगे हाथों एक नजर इस बात पर भी डाल लेते हैं कि मुल्क के तरकश में एयर डिफेंस के कौन-कौन से तीर मौजूद हैं.
S-400 Triumf (रूस)
यह दुनिया के सबसे घातक एयर डिफेंस सिस्टम में से एक है, जो 400 किमी की दूरी तक के हवाई खतरों को पहचानने और नष्ट करने में सक्षम है. यह एक साथ कई लक्ष्यों (जैसे फाइटर जेट्स, मिसाइलें और ड्रोन्स) को ट्रैक कर सकता है और अलग-अलग रेंजेस के लिए विभिन्न मिसाइलों का उपयोग करता है. इसकी खासियत यह है कि यह स्टील्थ विमानों को भी रडार में पकड़ सकता है, जिससे यह दुश्मन के लिए एक अभेद्य दीवार बन जाता है.
Akash Missile System (स्वदेशी)
'आकाश' पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से विकसित मीडियम-रेंज की मिसाइल प्रणाली है, जो 30 से 45 किमी के दायरे में दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को मार गिराती है. इसकी गति Mach 2.5 (ध्वनि की गति से ढाई गुना) है और यह एक साथ कई लक्ष्यों को इंगेज करने की क्षमता रखती है. चूंकि यह मोबाइल लॉन्चर पर आधारित है, इसलिए इसे युद्ध के दौरान किसी भी स्थान पर बहुत तेजी से तैनात किया जा सकता है.
Barak-8 (भारत-इजरायल)
'बाराक-8' एक अत्याधुनिक लंबी दूरी की सरफेस-टू-एयर मिसाइल (LRSAM) है, जिसे भारतीय नौसेना और वायुसेना दोनों के लिए विकसित किया गया है. यह 360-डिग्री कवरेज प्रदान करती है, यानी यह हर दिशा से आने वाली मिसाइलों, विमानों और ड्रोन्स को नष्ट कर सकती है.
इसकी 100 किमी की रेंज इसे समुद्री युद्धपोतों और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों की रक्षा के लिए एक अनिवार्य कवच बनाती है.
QRSAM (Quick Reaction Surface-to-Air Missile)
जैसा कि नाम से पता चलता है, QRSAM को 'क्विक रिस्पॉन्स' यानी बिजली जैसी फुर्ती के साथ दुश्मन के हमले को रोकने के लिए बनाया गया है. यह 30 किमी की मारक क्षमता वाली मिसाइल Mach 4.7 की तेज गति से उड़ती है, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता.
यह पूरी तरह से मोबाइल है और चलते-फिरते वाहन से भी फायर की जा सकती है, जो इसे दुश्मन के अचानक होने वाले हवाई हमलों के खिलाफ सबसे प्रभावी बनाती है.
SPYDER (Surface-to-air Python and Derby)
SPYDER एक क्विक-रिएक्शन डिफेंस सिस्टम है, जो दुश्मन के विमानों, हेलिकॉप्टरों और ड्रोन्स को बहुत कम ऊंचाई पर भी मार गिराने में माहिर है. यह 'Python-5' (इंफ्रारेड गाइडेड) और 'Derby' (रेडियो फ्रीक्वेंसी गाइडेड) मिसाइलों का उपयोग करती है, जो इन्हें हवा में ही खोजने और नष्ट करने में सटीक बनाती हैं. इसकी 20 से 50 किमी की मारक क्षमता इसे जमीनी हमलों के खिलाफ एक बहुत ही भरोसेमंद ढाल बनाती है.
BMD (Ballistic Missile Defence)
यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा कवच है जिसे बैलिस्टिक मिसाइल हमलों को विफल करने के लिए बनाया गया है. इसमें PAD (Prithvi Air Defence) 80 किमी की ऊंचाई पर मिसाइलों को रोकता है, जबकि AAD (Advanced Air Defence) 30 किमी की निचली ऊंचाई पर सुरक्षा की दूसरी परत बनाता है.
यह सिस्टम अंतरिक्ष और वायुमंडल के बाहरी छोर पर दुश्मन की परमाणु मिसाइलों को नष्ट करने की क्षमता रखता है, जो भारत की सुरक्षा की आखिरी और सबसे शक्तिशाली दीवार है.
200 ड्रोन्स का झुंड: सबसे कठिन चुनौतीहवाई हमलों और खासकर ड्रोन हमलों में सबसे बड़ी चिंता वाली बात होती हैं 'सैचुरेशन अटैक' की स्थिति. यानी एक साथ, एक ही वक्त में और एक ही जगह पर बहुत सारे ड्रोन से हमला कर देना.
मान लीजिए अगर 200 ड्रोन एक साथ 50 किमी दूर से आएं, तो इसे 'सैचुरेशन अटैक' की स्थिति कहते हैं. ऐसे में हर ड्रोन पर मिसाइल खर्च करना नामुमकिन है.
मगर भारत ने इसका भी तोड़ निकाल रखा है. इसके लिए हमारी रणनीति तीन चरणों में है:
इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से सिग्नल काटना (Soft-Kill)
यह सुरक्षा की पहली और सबसे महत्वपूर्ण परत है. इसमें दुश्मन के ड्रोन और उसके कंट्रोल स्टेशन के बीच के रेडियो सिग्नल को शक्तिशाली जैमर्स के जरिए ब्लॉक कर दिया जाता है. जैसे ही ड्रोन का संपर्क टूटता है, वह या तो हवा में ही रास्ता भटक कर गिर जाता है या सुरक्षित मोड में अपने शुरुआती बिंदु पर लौटने की कोशिश करता है, जिससे वह हमले में नाकाम हो जाता है.
लेजर या माइक्रोवेव से ड्रोन को जलाना (Directed Energy Weapons)
जब जैमर्स काम नहीं करते, तब 'डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स' का उपयोग किया जाता है. लेजर गन प्रकाश की गति से अदृश्य बीम छोड़ती है, जो ड्रोन के स्ट्रक्चर या उसके सेंसर्स को सेकंडों में जलाकर राख कर देती है.
वहीं, 'हाई-पावर माइक्रोवेव' (HPM) पूरे झुंड के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट्स को एक साथ 'शॉर्ट-सर्किट' कर उन्हें एक ही झटके में हवा में ही बेजान कर देती है.
गन सिस्टम का उपयोग और मिसाइल का सीमित इस्तेमालछोटे और सस्ते ड्रोन्स पर महंगी मिसाइलें खर्च करना आर्थिक रूप से नुकसानदेह है, इसलिए 'एंटी-एयरक्राफ्ट गन' और 'ऑटोमैटिक कैनन्स' सबसे प्रभावी साबित होते हैं. इन गन सिस्टम्स को रडार से जोड़ा जाता है जो एक साथ सैकड़ों गोलियां फायर करके 'बुलेट वॉल' बना देते हैं, जिससे झुंड में आ रहे ड्रोन्स टकराकर नष्ट हो जाते हैं.
मिसाइलों का इस्तेमाल तभी किया जाता है जब दुश्मन का कोई बड़ा विमान या मिसाइल छिपी हो, ताकि कीमती संसाधनों को बचाकर रखा जा सके.
सोर्स: RAND Corporation Drone Swarm Study; DRDO Directed Energy Program
अब आते हैं कि एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती कहां-कहां करना है, इसके क्या नियम हैं. जब सुरक्षा की बात आती है, तो भारत अब अपनी तैयारी को तीन लेयर में बांट चुका है:
आम नागरिकों की सुरक्षा
घनी आबादी वाले शहरों को बचाने के लिए 'आकाश' मिसाइल सिस्टम तैनात किए जा रहे हैं. ये मोबाइल यूनिट्स हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर किसी भी शहर के पास तैनात किया जा सकता है. इनकी खासियत है कि ये एक साथ कई ठिकानों को ट्रैक कर सकते हैं. आम नागरिकों के लिए 'एयर रेड सायरन' नेटवर्क और आपदा प्रबंधन का प्रोटोकॉल 2026 में पूरी तरह से रीयल-टाइम डेटा से जुड़ चुका है.
प्रमुख प्रतिष्ठानों की सुरक्षा (रिफाइनरी, पावर प्लांट, सैन्य अड्डे)
महत्वपूर्ण स्थानों के लिए 'पॉइंट डिफेंस' सिस्टम है. यहां 'क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल' (QRSAM) का इस्तेमाल होता है. इसकी रिस्पॉन्स स्पीड इतनी तेज है कि दुश्मन का मिसाइल लॉन्च होते ही यह सक्रिय हो जाता है. यह सिस्टम खास तौर पर ऐसी जगहों के लिए है जहां दुश्मन 'स्वाम अटैक' कर सकता है.
हाई-वैल्यू वीवीआईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल
अंत में, वीवीआईपी सुरक्षा. यहां 'SPG' के पास 'ड्रोन-डोम' (Drone Dome) तकनीक है. यह सिस्टम 360 डिग्री कवर देता है. अगर कोई भी संदिग्ध चीज वीवीआईपी काफिले के आसपास दिखती है, तो यह अपने आप उसे 'सॉफ्ट-किल' (सिग्नल जैमिंग) या 'हार्ड-किल' (लेजर/गन) कर देता है. ये प्रोटोकॉल बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के, एआई (AI) द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं ताकि रिस्पॉन्स टाइम नैनो-सेकंड में हो.
ये भी पढ़ें: समुद्र में बनेगी पाकिस्तान-चीन के मिसाइलों की कब्रगाह, भारत बना रहा खतरनाक मिसाइल शील्ड
असली जंग 'समय' से हैआधुनिक युद्ध में वही जीतेगा जो खतरे को जल्दी पहचानेगा और फुर्ती से जवाब देगा. भारत ने अपनी सुरक्षा की परतें तो मजबूत कर ली हैं, लेकिन अब सवाल यह नहीं कि हमला होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि अगर हमला हुआ तो हमारी प्रतिक्रिया कितनी तेज होगी.
वीडियो: क्या है S-400 मिसाइल सिस्टम, जिसे रूस से खरीदने के लिए भारत ने अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया है। दी लल्लनटॉप शो|Episode 292

.webp?width=60)

