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डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक सलमान भाई के फैंस जैसे हैं

सचिन देव वर्मा, कैलीफोर्निया से बता रहे हैं वहां के आम किस्से और पॉलिटिक्स का हाल.

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फोटो - thelallantop
14729236_10154690755784204_2955122850593465201_nसचिन देव वर्मा, उरई के हैं. अरवाइन, कैलीफोर्निया में रहते हैं. जेएनयू से भौतिकी पढ़ गए हैं. और अभी पोस्टडॉक्टोरल स्कॉलर हैं यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया में. तो सचिन कैलीफोर्निया से हमारे लिए वहां के मजेदार किस्से, इतिहास, राजनैतिक हालात लिख भेजेंगे. साथ में हर वो चीज जो आप पढ़ना चाहें. तो ये पहली बार है, दी लल्लनटॉप पर. आपकी ओर बढ़ाते हैं.
  प्रशांत महासागर के तट पर, लॉस एन्जेल्स और सैन डिएगो के बीच ऑरेंज काउंटी का एक छोटा सा बेहद खूबसूरत शहर अरवाइन. एक तरफ नीला समंदर है तो दूसरी तरफ हरी पहाड़ियां. और प्लान तो इतना अच्छे से किया है कि अगर चंडीगढ़ का परदादा समझ लोगे तो शायद कोई नाइंसाफी नहीं होगी. प्रसिद्ध है यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया कैंपस की वजह से. इतिहास कहता है कि, प्रीहिस्टोरिक मैन 12,000 साल पहले यहां पर थे, या शायद 18,000 साल पहले भी, और भी बहुत सारी जगह रहे होंगे. तक़रीबन 2000 साल पहले गैब्रिएलीनो इंडियंस यहां आये थे और दर्ज़नों गांव बना के जीवन-यापन किया करते थे. नेटिव अमेरिकन की बहुत दुःखभरी दास्तान है, फिर कभी पढ़ाएंगे. बहरहाल, उतना पीछे नहीं जाते हैं.
बात है 1894 की जब जेम्स अरवाइन जूनियर ने रियल एस्टेट की 'दी अरवाइन कंपनी' बनाई. उस समय की कीमत थी $150,000, और 110,000 एकड़ जमीन, वो भी समंदर किनारे. सुनने में आता है कि अरवाइन साहब जुए में हारी हुई रकम चुकाने के लिए 'लगूना बीच' दे दिए थे. सोचो! जुए में भले हार गया हो, लेकिन बंदा विज़नरी था, उसने दी अरवाइन कंपनी का ऐतिहासिक सिविक डिजाईन शुरू किया. सन 1959 में, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया ने दी अरवाइन कंपनी को एक नए कैंपस के लिए जमीन खरीदने का ऑफर दिया. कहते है कि दी अरवाइन कंपनी ने एक डॉलर, जी हां! एक डॉलर में 1,000 एकड़ जमीन यूनिवर्सिटी बनाने के लिए दे दी थी. आप सोच रहे होंगे कि दी अरवाइन कंपनी कितनी बड़ी दानवीर थी. रही होगी, हमे क्या पता. हमे तो बस इतना पता है कि यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, अरवाइन कैंपस के चारों तरफ, दी अरवाइन कंपनी के ही अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्सेस हैं. हजारो-हजार औरतें और आदमी रहतें हैं उनमे और लगभग $1500 का 1 BHK अपार्टमेंट मिलता है. इसीलिए बोले थे कि बंदा विज़नरी था. अब समझे!
एक समय कैलिफ़ोर्निया का फास्टेस्ट ग्रोइंग शहर अरवाइन आज की तारीख में 100,000 से ज्यादा जनसंख्या वाले अमेरिका का शहरों में सबसे सुरक्षित शहर है. पूरे शहर में या तो कंक्रीट दिखेगी या फिर हरियाली, और बहुत हरियाली. भौगोलिक तौर पे रेगिस्तानी इलाका है आज कल लेकिन उसके बावजूद घास का एक-एक इंच कायदे से मेन्टेन किया हुआ रहता है, हमेशा. रिक्लेम्ड वाटर से सिचाईं होती है हर रात, पूरे शहर की. यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, अरवाइन कैंपस की ख़ूबसूरती के क्या कहने. अगर आप कभी JNU गए हो तो आप समझ सकते हैं कि कैसा होगा, उसी की झलक दिखाई देती है यहां के कैंपस में, रिंग रोड, हरियाली और जीव-जंतु वग़ैरह. अगर आपको याद आये कि हैंगओवर-3 पिच्चर में एलन जब जिराफ़ लेकर जा रहे होते हैं तो वो UCI के रस्ते पे होते हैं. ओशीन'स एलेवेन में जब डैनी ओशीन और उनकी टीम 'पिंच' चुराते हैं, वो सीन यहां की गिलेस्पी न्यूरोसाइंस रिसर्च फैसिलिटी में फिल्माया गया था. और भी इस तरह के कई वाक़ये हैं. ख़ैर, पढ़ाई-लिखाई वालो के लिए बहुत अच्छी जगह है. आपने अध्धा यानि सेमेस्टर सिस्टम तो सुना ही होगा, जिसको लेकर DU के बहुत से बच्चे परेशान हो गए थे कि लो अब तो साल में दो बार पढ़ना पड़ेगा एग्जाम देने के लिए. यहां बच्चे चार बार पढ़ते हैं, क्योंकि पउआ, माने कि क्वार्टर सिस्टम चलता है यहां, चार बार फाइनल एग्जाम होते है उसके अलावा चार बार मिड-टर्म. तो अगर सीरियसली पढ़ना चाहते हो तो यहां आ सकते हो. अच्छी जगह है.
अमेरिकन यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ने वाले लोग ज्यादातर अपने अपने में ही रहते हैं, और खुले तौर पे ज्यादा राजनीतिक विचार-विमर्श नहीं करते हैं. लेकिन हमने फिर भी जितने लोगो से जब कभी भी चर्चा की है तो ऐसा लगता है कि पढ़े लिखे सेंसिबल लोग आमतौर पर डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन नहीं करते. इसका मतलब ये क़तई न समझा जाये कि वे हिलेरी क्लिंटन का समर्थन करते हैं. हो सकता है करते हों, लेकिन ऐसा जरुरी नहीं है. अब ये कुछ ऐसी ही बात है कि जैसे सुर्ख़ काले के बगल में काम काला रख दो तो वो उजला उजला ही लगता है. ऐसा ही कुछ है ट्रम्प और हिलेरी की तुलना करना. लोग करें भी तो क्या करें, प्रेसीडेंट तो कोई न कोई चुनना ही है. तो अगर दोनों ही बेकार हैं तो जो कम बेकार है उसी को समर्थन देना ठीक माना जायेगा. हिलेरी के बारे में बात करना कुछ ज्यादा रोमांचक नहीं है.
ट्रम्प की बात और है. रोमांच कूट कूट के भरा है. एक भी डायलॉग ऐसा नहीं मारता है वो कि आप नज़रअंदाज़ कर सके. ट्रम्प के समर्थक सलमान खान के फैंस की तरह हैं. जिस तरह सलमान कितनी भी वाहियात पिच्चर बना दे, उसके समर्थक 100 करोड़ का आंकड़ा तो ऐसे ही पार करा देते हैं, भाई के नाम पे. उसी तरह ट्रम्प कितनी भी वाहियात बात बोल दे, उसके समर्थक भी तहेदिल से समर्थन करते हैं. जैसे कि अभी कुछ दिनों पहले एक जुमला चल निकल था 'ग्रैब हर बाई दी पुसी' जिसके लिए बहुत से लोग ट्रम्प को आड़े हाथ लिए थे. लेकिन ट्रम्प के समर्थक रैलीज में अपनी टी-शर्ट पे 'ग्रैब मी बाई दी पुसी' स्लोगन लिख के खूब समर्थन दिए थे. ट्रम्प के समर्थकों के लिए ट्रम्प ऐसा कद्दावर नेता है कि सिर्फ वो ही अमेरिका को फिर से ग्रेट बना सकता है, भगवान है वो उनका और उसकी हर बात सही है, हर बात. चाहे वो कुछ दिन बाद खुद ही क्यों न मुकर जाये. तटस्थ दृष्टिकोण से अगर चुनाव को एक परीक्षा की तरह देखा जाए तो हिलेरी एक मुस्तैद परीक्षार्थी की तरह है, अपने अनुभव के कारण, और ट्रम्प एक ऐसा परीक्षार्थी है जिसको लगता है कि उसको सब कुछ बहुत अच्छे से आता है और वो ही टॉप करने वाला है. समर्थकों की ताक़त को देखते हुए मामला टक्कर का दिखाई पड़ता है, और डेमोक्रेसी में कुछ भी हो सकता है.

रोज़-ए-हश्र देखेंगे कि अंजाम क्या होगा आखिर अमेरिकन प्रेसीडेंट का नाम क्या होगा

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