The Lallantop

प्राइवेट स्कूल्स बच्चों को सभ्य, समझदार बनाना छोड़कर बाकी सब कुछ कर रहे हैं

स्कूल्स नहीं एजुकेशन की दुकानें हैं ये.

Advertisement
post-main-image
इंडियन एजुकेशन सिस्टम में बदलाव सख्त ज़रूरी हैं.
ये आर्टिकल हमें श्रेया ने लिखकर भेजा है. श्रेया लल्लनटॉप की रेगुलर पाठक हैं. लखनऊ में रहती हैं. किसी मुद्दे पर परेशान होती हैं तो उस पर लिख देती हैं. हम छाप देते हैं. इस बार श्रद्धा शिक्षा व्यवस्था पर  लिखा है श्रेया ने.

'Children should be taught how to think, not what to think' - Margaret Mead.

Advertisement
कभी यह कथन पढ़ा था. लेकिन मेरे मन में इसकी सार्थकता आज के समय में कुछ ज़्यादा है. शायद इसलिए क्योंकि बोलने की आज़ादी या सोचने की आज़ादी, फॉर दैट मैटर, पर छिड़ी जंग को साक्षात् देख रही हूं. बात बच्चों की हो रही थी, और जब उनकी सोच का प्रश्न आता है तो ज़हन में सबसे पहले स्कूलों का ख़्याल आता है. और स्कूल के नाम पर भी सरकारी स्कूल नहीं, 'स्टैंडर्ड' वाले प्राइवेट स्कूल्स. लेकिन इन प्राइवेट स्कूलों के राज में शिक्षा की क्या छीछालेदर है, ये शायद ही किसी से छिपा है. बच्चों को सामाजिक तौर पर समझदार या सभ्य बनाने के सिवाय यहां सब कुछ होता है. इनका सारा सेशन बच्चों को किताबी कीड़ा बनाने और इंजीनियरिंग या डॉक्टरी की रेस के लिए उक़साने में ही ख़र्च हो जाता है, या कहिए इनके लिए कम ही पड़ जाता है. तो बच्चे की समझदारी तो यहां इस बात से तय होती है कि उसे न्यूटन के लॉज़ रटे हैं या नहीं. कॉमर्स या आर्ट्स स्ट्रीम तो जैसे इनके लिए वजूद में ही नहीं है. मैंने खुद बारहवीं तक की पढ़ाई एक नामचीन, इंग्लिश मीडियम के प्राइवेट स्कूल से ख़त्म की है जिसकी वेबसाइट पर जाएं तो तमाम ताम-झाम के बीच यह भी पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में इसकी 11 शाखाएं हैं. एक नई दिल्ली में भी है और एक डिग्री कॉलेज भी है. यह सब कुछ शिक्षा का व्यापारीकरण नहीं तो और क्या है? हालांकि व्यापार के मामले में आपने बिज़नेस एथिक्स जैसा तो कुछ सुना ही होगा. तात्पर्य यह कि इस व्यापार का, व्यापारी के अलावा अगर आम आदमी का भी भला हो तो कुछ अच्छा हो. और ऐसा मैं क्यों कह रही हूं, आपको आगे समझाने की कोशिश रहेगी. ढेर सारी शाखाएं, अच्छी स्कूल यूनिफॉर्म, स्कूल के संस्थापक का देश-विदेश में नाम होना, यह सब कुछ धरा का धरा रह जाता है जब यह पता चले कि असल में स्कूल्स भेड़ें पैदा कर रहे हैं. किसी को अलग सोचने या अलग करने का अधिकार ही नहीं है. यहां बच्चा कॉमर्स या आर्ट्स पढ़ने से डरता है क्योंकि स्कूल में उसे लूज़र कह कर बुली होने का डर रहता है. सच बताऊं तो डर तो मुझे भी था इस बात का, जब मैं कॉमर्स पढ़ने का सोच रही थी. अपने स्कूल में मैं उन चार-पांच बच्चों में आती थी जो स्कूल के हर कार्यक्रम में माइक पे बड़बड़ करने के लिए हमेशा उतावले रहते थे. यही कारण था कि जब भी स्पीच देने की बात होती थी टीचर्स निश्चिंत से मुझे कह देते थे. उस रोज़ भी जब स्कूल में हिंदी दिवस मनाया जाना था तो मेरी हिंदी की टीचर ने मुझे ही चुना असेंबली में स्पीच देने के लिए. लेकिन जो भयावह था वो तो अभी आने वाला था. हुआ कुछ यूं था कि अपनी स्पीच में मैंने हिंदी माध्यम के स्कूलों की घटती लोकप्रियता, इंग्लिश मीडियम स्कूलों के बढ़ते प्रचलन और इसके कारण मां-बाप पर पड़ते प्रेशर की भी बात की थी. लेकिन यह बात जैसे ही उन टीचर को मालूम पड़ी उन्हें यह बात प्रिंसिपल तक ले जाने की ज़रूरत महसूस हुई. फलस्वरूप, मेरी स्पीच का उतना हिस्सा मुझे बोलने से मना कर दिया गया. आख़िर इंग्लिश मीडियम स्कूल्स की इज़्ज़त जो दांव पर थी. कितने दिखावे की बात थी फिर, वो हिंदी दिवस का मनाया जाना. और उससे भी बुरा था एक बच्चे की सोच का कुचला जाना. यह केवल पहली और आख़िरी बार नहीं था. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर मैंने जितनी बार स्पीच दी हर बार इस बात को पूरी तरह से पक्का किया जाता था कि देश की आलोचना कतई न हुई हो. आलम यह कि अगर देश से एक अंतरिक्ष यान दागा गया हो तो उसकी दस बार प्रशंसा से गुरेज़ नहीं लेकिन जहां जात-पात या धार्मिक असहिष्णुता से फैली सामाजिक असमानता या कहिए बढ़ते अपराधों की बात कर दी वहां स्कूल के हेड की भौहें तन जाती थीं. मेरा कहना है कि जब हर सिविक्स की क्लास में टीचर रटवाता है कि 'इंडिया इज़ द लार्जेस्ट डेमोक्रेसी' तो साथ ही यह क्यों नहीं सिखाता कि सरकार की, उसकी नीतियों की लगातार आलोचना करते रहना डेमोक्रेसी का सबसे ज़रूरी या कहिए अभिन्न अंग है? क्यों चीज़ें केवल अक्षरशः रटवा दी जाती हैं? रोज़ की ज़िंदगी में उनके क्या मायने हैं, ये कोई क्यों नहीं बताता? मेरी स्पीच से हर बार उस हिस्से को क्यों हटवा दिया जाता था जिसमें देश के दूसरे पहलू पर बात की गई होती थी. और यक़ीनन यह केवल एक स्कूल का हाल नहीं है. मार्गारेट के विचारों को न जाने कितने स्कूल्स तिलांजलि दे चुके हैं. उस वक़्त यह सब मेरी समझ से बिल्कुल परे था. कुछ कम समझ थी तब, शायद इसीलिए जैसा कहा गया वैसे किया मैंने. आज सोचती हूं तो लगता है कि जो हुआ, डरावना था और बहुत ग़लत भी. मेरे लिए प्राइवेट स्कूलों द्वारा शिक्षा के फैलाए गए इस बाज़ार की सार्थकता को समझ पाना बड़ा मुश्किल है. उस शिक्षा का फायदा ही क्या जो अपनी बुद्धी ही चलने न दे. किसी के लिए शाम के ढलते सूरज की ख़ूबसूरती एजुकेशन का बहुत बड़ा हिस्सा है तो यहां किसी को पीरियोडिक टेबल रटवाने से ही फुर्सत नहीं है. जाते-जाते एक बात और बताऊं? को-एजुकेशन की कवायद करने वाले ये सारे स्कूल केवल कथित तौर पर ही को-एड रह गए हैं. यहां लड़के और लड़कियों के बीच तो LoC खींच दी गई है. और बाकी की निश्चिंत मॉरल साइंस के पाठ से आ जाती है (क्योंकि सेक्स एजुकेशन से तो तौबा है न). मैं इस बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक रखती हूं कि जब तक लड़के-लड़कियां एक दूसरे को, उनकी परेशानियों को आपस में नहीं समझेंगे तब तक आप चाहे जितना मॉरल साइंस के पाठ पढ़ा लीजिए लेकिन एक दूसरे की इज़्ज़त करना इनके लिए बहुत मुश्किल होगा. इस बात को मैं दावे के साथ इसलिए कह सकती हूं क्योंकि अपने स्कूल के आख़िरी दो सालों में मैंने इस बात को बहुत नज़दीक से महसूस किया है. मेरा स्कूली शिक्षा में बहुत विश्वास है और इसीलिए मेरा ऐसा मानना है कि अगर स्कूल ही में लड़के-लड़कियों में एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावनाएं, बराबरी की भावनाएं नहीं विकसित की जाएंगी तो समाज से आप क्या अपेक्षा रखते हैं ? आख़िर समाज हमसे ही तो है. क्या स्कूल्स, जिनके पास बच्चों के दिमाग के विकास की, उनकी समझ, उनके व्यक्तित्व के विकास की ज़िम्मेदारी है, उनसे हम इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा रख सकते हैं? नहीं, बिल्कुल भी नहीं. क्योंकि हमारे बड़े बुज़ुर्ग कह गये हैं: इंसाफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के यह देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के.
Video: ऑस्कर्स 2019 की मस्ट वॉच फिल्म रोमा के तीन ताकतवर सीन

Advertisement
Advertisement