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इन झगड़ों ने बॉलीवुड को बंबई की सड़कों पर पैदल घुमाया है

सन 1986 के उस दिन की रोशनी में पाइरेसी और सेंसर बोर्ड के बीच बंधी रस्सी को देखो. बॉलीवुड 'अभिव्यक्ति की आजादी कानून' के सहारे उस पर डोल रहा है.

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फोटो - thelallantop
उड़ता पंजाब देख आए? या घर में ही देखी. किसी दोस्त से पेनड्राइव में जुगाड़कर. आशा नहीं विश्वास है कि मल्टिप्लेक्स तक जरूर गए होगे देखने. जो नहीं गए और घर बैठे देख ली उनका भी भगवान भला करे. देखो पाइरेसी कानून में भले अपराध हो. लेकिन ऊपरवाले के घर तो ये गुनाह में गिना नहीं जा रहा. काहे कि सबको मनोरंजन करने का हक है. कम पैसों में हो कि ज्यादा. लेकिन फिल्ममेकर्स को चपत टोरेंट आने के बाद नहीं लगी. न 15- 15 की डीवीडी गंधा जाने से लगी थी. जिसकी एक डिस्क में 5 फिल्में ठूंस के बेच लेते थे लोग. उसके भी बहुत बहुत पहले से खेल चल रहा है. जिसके खिलाफ पूरा बॉलीवुड एक बार एक साथ सड़क पर आ गया था. चलो बताते हैं उस जमाने की पाइरेसी की ट्रिक और बॉलीवुड के सबसे बड़े प्रोटेस्ट के बारे में. 21 अक्टूबर सन 1986 की सुबह बंबई शहर की गलियों में बॉलीवुड के टॉप सेलिब्रिटीज ने पैदल मार्च किया. वो भी एक दो नहीं. लगभग सारे के सारे जाने माने फिल्मी चेहरों ने. पहले ये वीडियो देख लो. उस जमाने की पूरी याद ताजा हो जाएगी. जब आवाज के साथ जादू करना भी बड़ा आर्ट था. ये वीडियो उस प्रोटेस्ट की रिकॉर्डिंग नहीं एक ऐड है. टाइम वीडियोज का. https://www.youtube.com/watch?v=o51yWAAZXyM इस मौके पर जितनी शक्लें तुमने उस जमाने की फिल्मों में देखी होंगी वो सब थे. दिलीप कुमार, राज कपूर, धर्मेंद्र, सुनील दत्त, जीतेंद्र, संजय दत्त, सनी देओल, अनिल कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, ऋषि कपूर, जैकी श्रॉफ, रणधीर कपूर, शशि कपूर, कुमार गौरव, संजय खान, देव आनंद, राजेश खन्ना, राज बब्बर, हेमा मालिनी, तनूजा, मीनाक्षी शेषाद्री, स्मिता पाटिल, टीना मुनीम, माधुरी दीक्षित, फरहा नाज, किमी काटकर, अरुणा इरानी, जीनत अमान, अमृता सिंह, अनीता राज, डिंपल कपाड़िया, पद्मिनी कोल्हापुरी, पूनम ढिल्लों, बिंदू, मंदाकिनी और बहुत सारे लोग थे. मरहूम स्मिता पाटिल की प्रेगनेंसी का आठवां महीना चल रहा था. लेकिन पाइरेसी के खिलाफ जंग में वो फरहा नाज का सहारा लेकर चल रही थीं.
उस दौर को 30 साल होने वाले हैं. इतने सालों में कुछ खास नहीं बदला है. फिल्मी पंडित उस दौर को बॉलीवुड फिल्मों का काला इतिहास कहते हैं. क्योंकि एक तो नोटिस करने लायक फिल्में नहीं बन रही थीं. मसाला फिल्मों पर जोर था. जो बनती भी थीं उनकी वीडियो कैसेट दन्न से मार्केट में आ जाती थी. जैसे आज के जमाने में किसी के पास थोड़ी सी स्क्रू ड्राइवर पकड़ने की समझ और थोड़ा पैसा आता है. तो वह मोबाइल और कंप्यूटर रिपेयरिंग की दुकान खोलता है. तब के जमाने में वही हाल वीडियो कैसेट बनाने वालों का था. जिसके पास ठीकठाक पैसा आ जाता था. वो सस्ती चाइनीज तकनीक वाला वीडियो कॉपी मशीन मंगा लेता था. और धकापेल कैसेट तैयार होने लगती थी. हालांकि लोवर और लोवर मिडिल क्लास के लिए वो कैसेट और कैसेट प्लेयर खरीदना भी एक सपने सरीखा ही होता था. लेकिन जो फिल्म देखने हॉल तक जा सकते थे उनको वो कैसेट में मिल जाता था. और वो बैठके पूरी फैमिली के साथ घर में ही एंजॉय करते थे.
यूपी बिहार के गांव देहात में शादी ब्याह मुंडन में या तो नौटंकी होती थी. या वीसीआर चलता था. पुरानी पीढ़ी नौटंकी की शौकीन थी. नए लोग वीसीआर पर रात भर फिल्म देखना पसंद करते थे. हमारे बड़े भाई साहब थे. वो रात में सूसू करने उठते. ढाई किलोमीटर दूर से भी वीसीआर चलने की आवाज आती तो साइकिल उठाके निकल जाते थे. ये जलवा था उस जमाने में पाइरेसी का. देखने वालों को पता भी नहीं था इसका नाम. तब सिर्फ पाइरेसी थी. अब सेंसर बोर्ड भी है. हर तरह के लोगों की भावनाएं हैं जो आहत हो सकती हैं. ये समझो कि बहुत ऊंचे पर बंधी एक रस्सी है. जिस पर बॉलीवुड चल रहा है. उसके हाथ में बैलेंस बनाने के लिए एक बांस है. 'अभिव्यक्ति की आजादी कानून' नाम का. उसका बैलेंस जहां बिगड़ता है. फिल्म डब्बे में चली जाती है. फिल्मकार सड़क पर आ जाता है.

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