
मध्य प्रदेश की एक कृषि उपज मंडी.
मौतों का काउंटडाउन
चौथी मौत 1 जून, 2018 को सिवनी जिले की सिमरिया कृषि उपज मंडी में एक किसान की मौत हो गई. पास के सिंरदई गांव के रहने वाले सोहनलाल मंडी में अपनी फसल बेचने पहुंचे. मंडी में ट्रॉली से माल उतारने वाले हम्माल (पल्लेदार) कम संख्या में थे. ऐसे में सोहनलाल खुद ही अपनी फसल की बोरियां उतारने लगे. जून का महीना. बेतहाशा गर्मी. तेज धूप. करीब 70 बोरियां उतारने के बाद सोहनलाल को तेज प्यास लगी. लगा गला सूख रहा है. उन्होंने गटागट पानी पिया और गश खाकर गिर गए. लोग फटाफट लादकर उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. वो बेहोशी मामूली नहीं थी. उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया था. मतलब दिल की धड़कन ही रुक गई.
अब गेंद प्रशासन के पास आई. उसने सफाई दे दी. कहा कि मंडी का माल खरीद वाला ऑनलाइन पॉर्टल खुल नहीं रहा था. सोहनलाल के पास खरीद का मैसेज भी नहीं था. फिर भी वो अपना अनाज लेकर मंडी चले आए. प्रशासन का कहना है कि मौत हार्ट अटैक से हुई है. और फिर ये सफाई दे चुकने के बाद हमेशा की तरह मुआवजे का ऐलान कर दिया गया. मुआवजा, जो कि किसान सोहनलाल के घरवालों को मिलेगा.
तीसरी मौत 24 मई की बात है. शाजापुर जिले की अकोदिया मंडी से एक किसान के मरने की खबर आई. 49 वर्षीय सिद्धनाथ किराये की गाड़ी से अपनी चने की फसल लेकर मंडी पहुंचे थे. उन्हें मंडी का गेट बंद मिला. गेट बंद था, सो ट्रॉली मंडी के अंदर नहीं घुस सकती थी. सिद्धनाथ को खुद ही बोरे को उठाकर विक्रय केंद्र तक ले जाना पड़ा. उन्होंने कुछ ही बोरे उठाकर रखे थे कि एकाएक बेहोश होकर गिर गए. आसपास के लोगों ने उनको अस्पताल पहुंचाया. वहां से उन्हें शुजलापुर रेफर किया. रास्ते में ही उनकी मौत हो गई. डॉक्टरों ने कहा कि उनको लू लग गई थी. जिस वजह से उनकी मौत हो गई. कागजों पर मौत का दोष भले लू के माथे हो, लेकिन असली कसूर तो सरकारी व्यवस्था का है. उसका कोई जिक्र नहीं आया कहीं.

शाजापुर के मृतक किसान सिद्धराम
दूसरी मौत 22 मई की घटना है. यहां राजगढ़ जिले में नरसिंहगढ़ नाम की एक जगह है. यहां एक कृषि उपज मंडी है. 38 बरस के किसान ओमप्रकाश पाटीदार ने फसल बेचने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था. सरकार की तरफ से फसल खरीदी के लिए उन्हें 20 मई की तारीख दी गई. वो तय तारीख पर मंडी पहुंच गए. यहां अपना अनाज लेकर बैठे रहे. फसल बेचने के लिए उन्हें अपनी बारी आने का इंतजार था. 20 मई से 22 मई आ गई. इंतजार इंतजार ही रहा. फिर इससे पहले कि उनका नंबर आता, ओमप्रकाश गुजर गए. एकाएक उनकी तबीयत बिगड़ी और वो बेहोश होकर गिर पड़े. वहीं उनकी मौत हो गई.
पहली मौत 17 मई की तारीख. विदिशा के लटेरी की अनाज मंडी. 65 साल के उमराव सिंह अपनी फसल बेचने के लिए नंबर आने का इंतजार कर रहे थे. उन्हें 13 मई की तारीख मिली थी. 13 बीती, 14 बीता, 15 गुजरा, 16 आया और 17 मई भी. मगर 18 मई आने से पहले उमराव सिंह खुद गुजर गए. वो अपनी चने की फसल बेचने मंडी आए थे. मगर मंडी का ये बुरा हाल कि अनाज तुलवाने का काम चार दिन में भी पूरा नहीं हुआ. पांचवे दिनज सुबह मंडी में इंतजार करते हुए ही उमराव सिंह बेहोश होकर गिर पड़े. उन्हें पास के अस्पताल ले जाया गया. वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था. इलाज मिलने से पहले इंसान मर गया. इंसान लिखूं कि कहूं किसान मर गया.

मौत होने के बाद किसान के शव को ले जाते परिजन.
फसल खरीद का पीक सीजन चल रहा है इन चार किसानों की मौत ये दिखाने के लिए बहुत है कि इन मौतों के पीछे सबसे बड़ी वजह सरकारी लापरवाही है. फसल की खरीद से पहले किसानों के नंबर लगते हैं. जिस किसान का नंबर होता है, उसे मेसेज आ जाता है. वो मंडी में फसल लेकर पहुंच जाते हैं. मगर सिस्टम मक्खन तो है नहीं. फसल खरीद के लिए बनाए पॉर्टल में गड़बड़ियां आ रही हैं. इसकी वजह से नियमित खरीद नहीं हो पा रही है. एक दिन की खरीद पूरी होने में दो-तीन दिन तक लग रहे हैं. इसके चलते अगली तारीख वाले किसान मंडी में आ जाते हैं और उन्हें अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है.
बारी आने में देरी होती है, तो वहीं रुककर इंतजार करते हैं किसान अपनी बारी का इंतजार करते हुए वहीं मंडी में रुक जाते हैं. ऐसा इसलिए कि फसल मंडी तक लाना हंसी-खेल नहीं है. इसमें लागत लगती है. अधिकतर किसान किराये के साधन से फसल लेकर बाजार आते हैं. दोबारा किराया न देना पड़े, इसलिए वो अपना माल मंडी या आस-पास उतार लेते हैं. नंबर नहीं आने पर वहीं इंतजार करना उन्हें बेहतर लगता है. किसानों की आफत बस माल बेचने तक खत्म नहीं होती. कई ऐसे मामले भी आए हैं कि जहां फसल बेचने के 10 दिन बाद तक किसानों को पेमेंट नहीं मिला है.

नई फसल बाजार में आ जाने के बाद भी किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हो रहा. (फोटो-एपी)
गर्मी जानलेवा हो सकती है, इन चारों के मामले में यही हुआ बहुत सी जगह मंडियों में पीने के पानी तक का इंतजाम नहीं होता. जेठ का महीना आ गया है. चिलचिलाती धूप होती है. बैठने के लिए सही इंतजाम न होने के कारण किसान गर्मी में परेशान होते रहते हैं. ये गर्मी ही उनकी तबीयत खराब होने का कारण बनती है. इस गर्मी की वजह से डिहाइड्रेशन, लू लगना, हीट स्ट्रोक जैसी चीजें हो सकती हैं. जो कि कई बार जानलेवा साबित होती हैं.
पहले की मौतों से कोई सबक नहीं सीखा? रत्तीभर भी नहीं? मुख्यमंंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था. कि किसानों के लिए मंडियों में सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी. लेकिन ये चार मौतें मुख्यमंत्री के वादे का थर्मामीटर हैं. एक और भी बात है. पानी, बैठने के लिए शेड जैसी बुनियादी चीजों की कमी तो है ही. लेकिन पिछली तीन मौतें देखने के बाद भी प्रशासन के दिमाग में इतनी सतर्कता नहीं आई कि मंडियों के आस-पास कोई मेडिकल सुविधा उपलब्ध करा दे. ताकि इस तरह की इमरजेंसी वाली स्थिति में जरूरी इलाज दिया जा सके. कि इलाज करने में देर न हो. गर्मी के महीने और फसल बेचने के पीक सीजन को देखते हुए इतना तो किया ही जा सकता है.
मंदसौर में पिछले साल हुए किसान आंदोलन में पांच किसानों की गोली लगने से मौत हो गई थी. तब गोली ने जान ली थी. उसकी जिम्मेदार भी सरकार थी. अब ये जो चार मौतें हुई हैं, उसके पीछे भी सरकारी लापरवाही है. सोशल मीडिया पर फिटनेस चैलेंज देने वाले नेताओं को मंडियों में आकर किसानों के साथ गर्मी में छह दिन इंतजार करके देखना चाहिए. पता लगेगा कि असली चैलेंज और असली फिटनेस क्या होती है.
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