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मैं नास्तिक हूं मगर मुझे नास्तिक सम्मेलन से दिक्कत है

नास्तिकता धर्म न बन जाए, संभालो यारों!

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फोटो - thelallantop
हर हिन्दुस्तानी फैमिली का एक रूल होता है. बच्चा जब कुछ समझने-बूझने लगता है, तो उसे चीज़ें सिखाई जाती हैं. हालांकि सिखाई तो हर जगह जाती हैं लेकिन यहां एक पर्टिकुलर चीज की बात हो रही है. भगवान में विश्वास. जैसे हम सभी पैदा होते हैं तो वेजिटेरियन होते हैं. फिर हम अपनी परवरिश, आस-पास के माहौल के हिसाब से वेजिटेरियन या नॉन-वेजिटेरियन बन जाते हैं. कहने का मतलब ये है कि इन सभी बातों में हमारे परिवार का माहौल सबसे ज़्यादा इन्फ्लुएंस करता है. ऐसा ही कुछ हाल भगवान में विश्वास करने का है. बच्चों को भगवान के बारे में बताया जाता है. हमें भी बताया गया था. बच्चों को भगवान की पूजा करने की सीख दी जाती है. एक ऐसी शक्ति के बारे में बताया जाता है, जिसकी इजाज़त के बिना दुनिया में कुछ भी नहीं पैदा हो सकता. सार ये कि हम सभी आस्तिक पैदा होते हैं. और फिर हम स्कूल जाना शुरू करते हैं. बिना अपने मां-बाप की अंगुली पकड़े सड़क पार करने लगते हैं. स्कूल में साइंस पढ़ते हैं. फ़िल्में देखते हैं. किताबें पढ़ते हैं. बाहर की दुनिया देखते हैं. और एक बहुत ज़रूरी काम करते हैं. सवाल करते हैं. खुद से. और इसी क्रम में हम नास्तिक हो जाते हैं. नास्तिक बनने के लिए सवाल करना ज़रूरी होता है. आप नास्तिक तभी बनते हैं, जब आप खुद से सवाल करना शुरू करते हैं. जब आप आस्था में लॉजिक ढूंढना शुरू करते हैं. उस लॉजिक को नदारद पाते हैं तो नास्तिक बन जाते हैं. हर नास्तिक इसी तरीके से नास्तिक बनता है. नास्तिक बनने के लिए आपको किसी से भी प्रभावित होने की ज़रूरत नहीं होती है. वो धर्म में होता है. किसी का नास्तिक होना उसकी अपनी समझ और अपने आप से सवाल पूछने की क्षमता को ही दिखाता है. मैं एक नास्तिक हूं. मैं बचपन में स्कूल जाने से पहले भगवान के पैर छूता था. अच्छे नम्बर आते थे तो थैंक यू भगवान कहता था. लेकिन ये ज़्यादा दिनों तक नहीं चला. मैंने भगवान से ब्रेकअप कर लिया. और ये समझ लिया कि मेरे साथ होने वाली हर अच्छी और बुरी चीज़ मेरे किये कामों का ही फल है. और ये फल अध्यात्म वाला फल नहीं है. ये साइंस वाला फल है. यानी रिऐक्शन. मेरे ऐक्शन्स से मुझे एक रिऐक्शन मिलता है. मेरे साथ होने वाली अच्छी या बुरी चीज़ें मेरे किये ऐक्शन्स का रिऐक्शन हैं. बस. कोई भगवान नहीं है. और हां, ये मेरा मानना है. आप आस्तिक हों तो मुझे आपसे कोई द्वेष नहीं. आप अपना कार्यक्रम चालू रखिये. बस मुझे ज्ञान मत दीजियेगा. मेरी मां ने भी मुझे ज्ञान नहीं दिया. और ये सबसे अच्छी बात है. दूसरी क्लास में था तो मां ने हर सुबह सूर्य को जल चढ़ाने की बात कही. मैंने मान ली. अच्छे नंबर चाहिए थे. रोज़ सुबह नहाकर सूरज को देखते हुए बरामदे में एक लोटा जल गिरा देता था. लेकिन फिर एक दिन जब मां से रोज़ एक लोटा पानी बर्बाद होने की बात कही तो उन्होंने कह दिया, "तो मत करो." बस. मेरी मां ने, एक नम्बर की धार्मिक मां होने के बावजूद, मुझसे एक बार भी वैसा दोबारा करने को नहीं कहा. और यही आगे भी होता रहा. जब मैंने रूद्राक्ष की माला पहननी बंद कर दी. तब भी. और जब मैंने नॉन-वेज खाना शुरू कर दिया, तब भी. मेरी मां आज भी बिना नागा पूजा करती है. मुझसे अब नहीं कहती. मैं उनसे कुछ नहीं कहता.

मुझे उनके धार्मिक होने से कोई परहेज़ नहीं है. और उसकी वजह है उनका किसी भी इंसान को किसी भी तरह की चोट न पहुंचाने का एहतियात बरतने की आदत.

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मुझे अगरबत्ती, धूपबत्ती यहां तक कि मॉर्टीन के धुंए में दस मिनट भी रहने से ज़ुकाम हो जाता है. मैं अगर पूजा वाले कमरे में मौजूद होता हूं तो वो वहां अगरबत्ती या धूपबत्ती नहीं जलती. क्यूंकि उनका भगवान अगरबत्ती में नहीं रहता. आपका भगवान कहां रहता है, मुझे नहीं मालूम. किसी का किताबों में रहता है, किसी का कर्मकांडों में, किसी का नारियल में, किसी का दाढ़ी में, किसी का बुर्के में. मगर नास्तिक होना सिर्फ़ एक बात मांगता है. आप भगवान को नहीं मानते हैं. ये सबसे सरल परिभाषा है नास्तिकता की. इसमें भी अब कई प्रकार होने लगे हैं. आप भगवान में किन प्रकारों से विश्वास नहीं करते हैं, सब उस पर डिपेंड करता है. हाल ही में एक सम्मेलन प्रस्तावित हुआ. नास्तिकों का सम्मेलन. मथुरा में. जहां कृष्ण पैदा हुए. पर्सनली, मुझे इससे काफ़ी तकलीफ़ हुई. मुझे नास्तिकता भी एक धर्म सा बनता दिखाई दिया. सबसे पहली बात, जब नास्तिकों का सम्मेलन करना था तो एक ऐसी जगह पर क्यूं किया, जहां आस्तिकों की इतनी श्रद्धा है. ये वही बात हो गयी कि मैं ज़बरदस्ती अपने ही घर में नवरात्रि के दिनों में हांडी चिकन खाऊं, तब जबकि मेरे घर में किसी ने व्रत रक्खा हुआ है. इसे उकसाना नहीं तो क्या कहेंगे? और हां, मुझे देश के संविधान ने नवरात्रि में चिकन खाने का उतना ही अधिकार दिया हुआ है, जितना मेरे घरवालों को व्रत रखने का. ये कौन सी नास्तिकता है जिसने आस्तिकों को उंगली करने का अधिकार दे दिया? वहीं आस्तिकों का विरोध कुछ हद तक (सिर्फ़ कुछ ही हद तक) जायज़ दिखा, मगर उनका अग्रेशन और मार-पिटाई उतना ही बेवकूफ़ाना, जितना एक आतंकी का किसी बाजार में अपनी छाती से कुछ किलो आरडीएक्स चिपकाकर फट जाना.
हम सभी ने धर्म के नाम पर आतंकवाद को होते हुए देखा है. आधी से ज़्यादा दुनिया इससे जूझ रही है. पूरी दुनिया इस वक़्त सबसे ज़्यादा प्रभावित इसी एक चीज़ से है. मगर मैं किसी भी ऐसे वैज्ञानिक के बारे में नहीं जानता जिसने किसी बिल्डिंग में इसलिए प्लेन घुसा दिया क्यूंकि लोग ग्रेविटेशनल वेव्स के कॉन्सेप्ट पर विश्वास नहीं कर रहे थे. हम नास्तिकों का ये है कि हमें बचाव नहीं करना होता. हम प्रूव करते हैं.
मगर इस बार नास्तिकों को उस सम्मेलन का बचाव करना पड़ा. न जाने क्यूं. कहने लगे कि ऐसा सम्मेलन नास्तिकता को कोई धर्म नहीं बना देगा. मुझे उल्टा लगता है. मुझे यकीन है कि धर्म की शुरुआत भी ऐसे ही की गयी होगी. शुरुआत बस एक सम्मेलन से होती है. एक ग्रुप से. एकजुट हुई भीड़ से. लोग मिलते हैं. एक दूसरे से प्रभावित होते हैं. और यही प्रभाव, यही जुटी भीड़, किसी पंथ, किसी धर्म की पहली सीढ़ी होती है. लोगों को जोड़ने की आड़ में कब एक विचारधारा फैल जाती है, मालूम नहीं चलता. नियम बन जाते हैं. कायदे-कानून बन जाते हैं. फिर एक इंसान को इसलिए रख लिया जाता है जिससे वो ये देखता रहे कि इन नियमों की अनदेखी न हो रही हो. और फिर ऐसे ही एक अंदरूनी सरकार बनती है. कतई नॉन-डेमोक्रेटिक सरकार. धर्म में इससे अलग क्या होता है? वेटिकन सिटी में इससे अलग क्या हो रहा है? तमाम मंदिरों के ट्रस्ट्स में इससे अलग क्या हो रहा है? आप कहां अलग हैं, सरकार? सम्मेलनों का हमेशा एक नेता होता है. जिसने सारी व्यवस्था की होती है. लोग मिलते हैं, नेता की अगुवाई में. उसकी चिरौरी की जाती है. सम्मेलन हुआ हो या न हुआ हो, उसकी बाइट जाती है. वो सब कुछ बन जाता है. धर्मगुरु. नास्तिकता का धर्मगुरु. वही जो कभी नेता बना था. एक बात बताइए, किस बात का नेता? आप नास्तिक हैं. आप भगवान को नहीं मानते. वो नेता भी नास्तिक है. वो भगवान को नहीं मानता. किस हिसाब से वो आपसे ऊपर हो गया? मतलब ये शायद पहली दफ़ा हो रहा होगा, जब किसी चीज में विश्वास न रखने वाले दो लोगों में एक बड़ा और एक छोटा हो रहा हो. अविश्वास तो एक समान ही होता है न? ऐसा नहीं होता कि आपकी अमुक चीज में विश्वास न रखने की फ्रीक्वेंसी नेता जी के विश्वास न रखने की फ्रीक्वेंसी से कम है. नास्तिकता की पहली शर्त सवाल करना होती है. और फिर लगातार सवाल करते ही रहना. दूसरी, किसी से भी प्रभावित न होना. नास्तिक जितना ज़्यादा ऑर्गनाइज़्ड होकर इकट्ठे होंगे, उनके लिए घातक होगा. वो एक साथ, एक पंथ बनाकर खड़े हो जायेंगे. किसी भी पंथ की क्या दशा होती है, हमें मालूम है. बौद्ध धर्म एक बड़ा उदाहरण है. नास्तिकों की सबसे बड़ी ताकत अलग रहने में है. और हां, नास्तिकों का नेता अगर कोई है तो वो या तो अव्वल दर्जे का खलिहर है, या कोई इन्ट्रेस्ट छुपा हुआ है. वरना एक नास्तिक के पास और भी गम हैं ज़माने में सम्मेलन के सिवा.
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