खिलाड़ियों को बनाते वक्त कुदरत कोई अलग से मैटरीयल नहीं लगाती है. खिलाड़ी भी आम लोगों की तरह आस्तिक, नास्तिक और अंधविश्वासी होते हैं. और जब दांव पर करोड़ों लोगों की उम्मीदें लगी हों, खिलाड़ी पर युद्ध जैसा दवाब हो तो साम-दाम-दंड-भेद और जादू-टोना सबकुछ आजमाया जाता है. ये सब निकल कर बाहर नहीं आता लेकिन अंदर ही अंदर सारी नहीं तो बहुत सारी टीमें टोने-टोटके आजमाती हैं. हमारे यहां ही नहीं यूरोप के बड़े-बड़े क्लब और फुटबॉल वर्ल्ड कप की आयोजन समिति तक ये सब करती हैं. कोच, फिजियो, मसाजर, डायटिशियन रखने तक तो ठीक है लेकिन पाकिस्तान की हॉकी टीम के पैवेलियन में काले जादू का जानकार भी रहता था.
पाकिस्तानी टीम एक काले इल्म के माहिर को अपने साथ रखती थी
और वह पैवेलियन से मैच देखता था

इकबाल नाम के इस वशीकरण-विशेषज्ञ का ज़िक्र भारत के पूर्व गोलकीपर मीर रंजन नेगी ने अपनी आत्मकथा में किया है. मीर रंजन नेगी को भारत-पाकिस्तान एशियाड मैच के विलेन की तरह पेश किया गया था. चक दे इंडिया में शाहरूख खान का रोल इन्हीं मीर रंजन नेगी पर आधारित है.

1981-82 में विश्व कप से पहले भारत-पाक की हॉकी टेस्ट सीरिज का ज़िक्र करते हुए मीर रंजन नेगी ने लिखा है,’एक बार लाहौर में ट्रेनिंग सेशन चल रहा था. उसी दौरान हमने महसूस किया की हम चल-फिर भी नहीं पा रहे हैं. हमने इकबाल को पहली बार देखा कि कुछ दूरी पर वह जंतर-मंतर कर रहा है. जब हमने उससे पूछा तो उसने मुस्कुराकर कहा, कुछ नहीं है. हां, मैं अगर चाहूं तो तुम सब को पेड़ पर चढ़ा दूं.’
भारत की टीम से उसकी अगली मुलाकात कराची में होती है. बकौल मीर रंजन नेगी, भारत ने उस संघर्षपूर्ण मैच में 3 पेनल्टी स्ट्रोक हासिल किए. पेनल्टी स्ट्रोक यानि सिर्फ गोलकीपर के सामने से गोल मारना था. गुरमेल सिंह जो रोज़ाना 400-500 स्ट्रोक का कड़ा अभ्यास करते थे उस दिन 2 पेनल्टी स्ट्रोक मिस कर गए और तीसरा पेनल्टी स्ट्रोक एसएस सोढी बाहर मार गए. उस वक्त इकबाल पैवेलियन में बैठकर मैच देख रहा था.
पाकिस्तान की टीम जहां भी जाती इकबाल साथ रहता था. मुंबई, दुबई, लाहौर हर जगह. दिसंबर 1981 विश्व कप की एक घटना का ज़िक्र करते हुए मीर रंजन नेगी लिखते हैं, ‘दोनों टीमों को कोलाबा के प्रेसीडेंट होटल में ठहराया गया. हम अपने कमरे की खिड़कियों से इकबाल की हरकतें देखा करते थे और बिना किसी कारण ड्यूटी पर तैनात वेटर अपनी कमीज़ और ब्लेजर उतारते थे. पाकिस्तानी खिलाड़ी सम्मोहित वेटरों की हरकतें देखकर हंसते थे. एक रोज़ नाश्ते पर हमारी मुलाकात इस रहस्यमयी व्यक्ति से होती है. उसने डींग मारी कि लाहौर में एक मैच में उसने ऐसा कुछ किया कि लोग पेड़ों पर चढ़ने लगे.’
1982 एशियन गेम्स भारत-पाक हॉकी फाइनल से एक दिन पहले इकबाल नेशनल स्टेडियम दिल्ली पहुंच जाता है. खुद मीर रंजन नेगी के शब्दों में, ‘मैं उसे देखकर चौंक गया. उसने मेरे सामने आकर हैलो कहा और मिलने के लिए हाथ बढाया. उससे हाथ मिलाकर मुझे अजीब सा लगा. मेरे मुंह में झाग आने लगा.’

सौजन्य: ट्रिब्यून इंडिया
भारत वह फाइनल मैच 1-7 से हार गया और कहा तो ये भी जाता है कि उसी दिन भारत की हॉकी खत्म हो गई
. इस मैच के बाद नेगी का कैरियर भी खत्म हो गया. 1982 से ‘चक दे इंडिया’ के रिलीज़ तक मीर रंजन नेगी को लोग 'देशद्रोही, बिका हुआ' जैसे कटाक्ष सुनाते थे. लोग जान के पीछे ऐसे पड़े कि इनकी शादी के दिन बिजली बोर्ड के कुछ कट्टर हॉकी प्रेमियों ने घर की बिजली तक काट दी.
अपनी आत्मकथा में नेगी ने एक-दो अस्वाभाविक घटनाओं का जिक्र और किया है. भारतीय फॉरवर्ड लाइन में केरल के खिलाड़ी साबू विर्की के साथ भी एक अज़ीब हादसा हुआ था. निहायत ही शांत और शरीफ साबू विर्की 3 वर्ल्ड कप और एक ओलंपिक में भारत की ओर से खेले हैं. इनके बारे में मीर रंजन नेगी लिखते हैं,'एक टूर्नामेंट के दौरान उसकी जीभ बाहर आ गई. जैसे उस पर किसी का असर हुआ हो. वह अधिकारियों से लड़ बैठा और टीम से निकाल दिया गया.’ हालांकि साबू विर्की टीम में वापिस लौटे और 1998 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक भी जीता.

नेगी अब अपने दिवंगत बेटे की याद में हॉकी कोचिंग के लिए 'अभी फाउंडेशन' चलाते हैं
एक और घटना के बारे में पूर्व गोलची नेगी बताते हैं कि कुआलाम्पुर जूनियर विश्व कप के दौरान एक रात 2 बजे कोच हरेंद्र सिंह जागे और सीधे मैदान में चले गए. वहां किसी वूडू विशेषज्ञ की मदद से विरोधी टीम के टोटके को काटा.
इकबाल जब पाकिस्तानी टीम के साथ रहा तब का प्रदर्शन भी देख लिया जाए. उन दिनों पाकिस्तान ने 3 बड़े हॉकी टूर्नामेंटों में भाग लिया और तीनों में ही जीत मिली. वर्ल्ड कप 1981-82, एशिया कप 1982 और फिर एशियन गेम्स 1982. तब पाकिस्तान बड़ी मारक हॉकी खेल रहा था. ये इकबाल का नहीं पाकिस्तान के खिलाड़ियों की शानदार फॉर्म का कमाल था. हर टीम की तरह उसके बाद पाकिस्तान टीम का भी खेल उस शानदार जुग के बाग नीचे गया. अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए कह दीजिए या किसी और वजह से ज्यादातर टीमें ऐसे टोटके तब भी करती थीं और आज भी करती हैं. इसका कारण भी है.
इतनी मेहनत के बाद बड़े टूर्नामेंट्स में पहुंची टीमों में अंतर बहुत कम रह जाता है. अंपायर का एक फैसला आपके खिलाफ चला जाए या कोई खिलाड़ी ऐन मौके पर फाउल कर दे या कैच छोड़ दे या पेनल्टी दे दे तो आपकी सारी मेहनत मटियामेट हो जाती है. जिसे किस्मत कहते हैं वह अपनी आदिम अवस्था में नज़र आने लगती है. मेहनत के बाद इस अनिश्चितता के फैक्टर को खत्म करने के लिए टीमें अपनी ओर से कोई कमी नहीं छोड़तीं और जीत पक्की करने के लिए टोने-टोटके तक करती हैं.
इससे पहले की आप इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि अनपढ दक्षिण एशियाई ही ऐसा करते हैं तो आप को बता दें दुनिया के हर बड़े खेल और हर बड़ी लीग में ऐसा होता है. जहां जितना बड़ा खेल, उतना बड़ा दवाब और उतने ही तरीकों की कोशिशें. पढ़े-लिखे जर्मनी में 2006 वर्ल्ड कप आयोजन समिति ने वूडू विशेषज्ञ की मदद लेकर सफल आयोजन के लिए टोटके करवाए थे. इंग्लिश प्रीमियर लीग फुटबॉल के खिलाड़ी और टीम अधिकारी जूजू करवाने अफ्रीका पहुंच जाते हैं. अफ्रीका के काले जादू वाले पैसा भी खूब पिटते हैं. पिछले सीज़न खबरें उड़ी थीं कि यूरोप के एक बड़े क्लब के अधिकारी एक काले जादू के जानकार के यहां पहुंच गए, उसने मैच जीतवाने के लिए 50,000 यूरो मांग लिए. खेल में नायक और खलनायक बनने के लिए एक पल की देर होती है. बहुत कुछ खिलाड़ी के हाथ में नहीं होता और उस बहुत कुछ की भरपाई के लिए हर तरह से कोशिश की जाती है, साम-दाम-दंड-भेद और काला जादू.
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