लेकिन यही बंपर गार्ड आपकी और सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जान का दुश्मन बन सकता है. इसीलिए सरकार का मानना है कि बंपर लगाने पर रोक लगा देनी चाहिए. इसका क्या, क्यूं, कैसे वगैरह हम आपको बता दे रहे हैं. ताकि आप चालान कटने से पहले तय कर सकें कि बंपर रखना है या नहीं.

ऑस्ट्रेलिया में दूर-दूर तक सीधी सड़कें होती हैं, जिन पर कंगारू के चले आने का खतरा होता है.
लोहा मढ़ने का आइडिया था किसका?
किसका, ये नहीं मालूम. लेकिन था किसी ऑस्ट्रेलियन का ही. बात ऐसी है कि ऑस्ट्रेलिया में जनता है कम. दूर-दूर तक इंसान का नामोनिशान नहीं. तो ज़्यादातर इलाका वीरान है. इसलिए वहां सड़कें बनीं तो वो ज़्यादातर सीधी बनीं. जंगल में, रेगिस्तान में और घास के मैदानों में भी. अब जब सड़क सीधी और खाली होगी, तो लोग गाड़ियां तेज़ चलाने लगे. और यहीं गड़बड़ होने लगी. वो ये कि दिन में सब ठीक रहता था. पर रात के वक्त लगातार एक्सिडेंट होने लगे. हर बार ड्राइवर बताते कि तेज़ रफ्तार में भागते कंगारू एकदम से गाड़ी के सामने आ जाते. तब कोई ऑप्शन नहीं होता और गाड़ी या तो 6 फीट लंबे और 90 किलो तक भारी कंगारू से भिड़ती और अच्छा खासा डेंट पड़ता, या किस्मत से ब्रेक पर पैर पड़ता और गाड़ी फिसलकर एक्सिडेंट का शिकार हो जाती. लोग ज़ख्मी होते, कंगारू मरते.

ऑस्ट्रेलिया में एक कार एक्सिडेंट में मारा गया कंगारू. (फोटोः डेली मेल)
वैज्ञानिकों ने बताया कि ये सब मरी हेडलाइट के चक्कर में हो रहा है. कंगारू रात में तेज़ रोशनी से आकर्षित होते हैं. अब कंगारू को गाड़ी से बचना सिखाया नहीं जा सकता. रात में गाड़ी चलाते वक्त हेडलाइट भी बंद नहीं की जा सकती. तो करें क्या?
इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए 1980 के दशक में किसी को सूझा कि गाड़ी के आगे स्टील का मज़बूत जंगला लगा दिया जाए. इससे टक्कर के दौरान कंगारू का जो हो, सो हो, इंसान पक्का बच जाएंगे. और यही हुआ भी. क्रैश बार या बुल बार या बंपर ऑस्ट्रेलिया भर में प्रसिद्ध हो गए. चूंकि ये दिखते भी माचो थे, तो दुनिया भर में प्रसिद्धि पा गए. पहले आम लोगों ने अपनी गाड़ियों में लगाए, फिर पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियों ने भी. क्योंकि डेंट और पेंट तो क्रैश गार्ड से बचते ही हैं.

तो फिर दिक्कत क्या है?
एक 'मज़बूत' कार आपकी सुरक्षा को कमज़ोर करती है. एक बेहद मज़बूत कार, जिस पर टक्कर के वक्त एक डेंट न पड़े, आपके लिए घातक साबित हो सकती है. और ये पूरा मामला है फिज़िक्स का. फिज़िक्स का एक उसूल है जो टक्कर के मामले में लगता है - कॉन्टैक्ट टाइम. इसके मुताबिक दो चीज़ें टकराते वक्त जितनी कम देर के लिए भिड़ें, टक्कर उतनी ही ज़बरदस्त होती है. भिड़ने का टाइम होता है कॉन्टैक्ट टाइम. ये जितना ज़्यादा होगा, उतना ही झटका धीरे लगेगा. ये वैसा ही है जैसे आपका दोस्त आपको एकदम से गधा कह दे, तो आपको बहुत बुरा लगेगा. लेकिन अगर वो यही बात घुमा-घुमा कर वक्त लगाकर कहे तो आप उतना बुरा नहीं मानेंगे. फिज़िक्स भी इस मामले में कुछ ऐसे ही चलता है. अगर कार के किसी चीज़ से टकराने का वक्त बढ़ा दिया जाए, तो टक्कर कुछ धीरे लगेगी.
तो कार के आगे और पीछे क्रंपल ज़ोन बनाए जाते हैं, जो टक्कर के वक्त अंदर धंस जाएं. अंदर धंसने में जो वक्त लगता है, वो टक्कर का कॉन्टैक्ट टाइम बढ़ा देता है. इससे गाड़ी में बैठे लोगों तक पहुंचने वाला झटका कुछ कम हो जाता है. इसी क्रंपल ज़ोन में गाड़ी का एयरबैग सेंसर भी होता है, जो इस बात का हिसाब लगाता है कि टक्कर है कितनी ज़ोरदार और क्या एयरबैग खोलने की ज़रूरत पड़ेगी.
कार के आगे बना क्रंपल ज़ोन इस तरह टक्कर के झटके को सोखता है.दिक्कत ये है कि क्रैश गार्ड बहुत मज़बूत होते हैं. वो अंदर नहीं धंसते. वो क्रंपल ज़ोन को ढंके होते हैं, तो वो भी नहीं धंसते. इससे टक्कर के मामले में कॉन्टैक्ट टाइम बढ़ नहीं पाता और टक्कर का पूरा झटका अंदर तक बैठे लोगों तक आ जाता है. क्रैश गार्ड से क्रंपल ज़ोन में लगे एयरबैग सेंसर का गणित भी बिगड़ जाता है. वो टक्कर मापकर तय नहीं कर पाता कि एयरबैग खोले कि नहीं. तो क्रैश गार्ड के चलते झटका भी ज़्यादा लगता है और उससे निपटने के लिए एयरबैग भी नहीं खुल पाते.
सड़क पर चल रहे लोगों का दुश्मन है क्रैश गार्ड
क्रैश गार्ड सड़क पर चल रहे दूसरे लोगों के लिए भी खतरा बढ़ाते हैं. अगर कोई इंसान कार से टकरा जाए तो क्रंपल ज़ोन उसे लगने वाली चोट कम करती हैं. लेकिन क्रैश गार्ड ऐसा होने नहीं देते. उलटा वो गाड़ी के आगे आए इंसान पर पूरी ताकत के साथ चोट करते हैं. कई लोगों की जान सिर्फ इसलिए चली जाती है कि वो क्रैश गार्ड से टकराए. ज़्यादा खतरा बच्चों को होता है क्योंकि क्रैश गार्ड सीधा उनके सिर पर चोट करता है.

क्रैश गार्ड बच्चों के लिए ज़्यादा हानिकारक होते हैं क्योंकि सीधे उनके सिर पर चोट करते हैं.
दुनियाभर में तमाम कोशिशों के बाद भी क्रैश गार्ड्स पर बैन नहीं लग पाया है. इसमें एक अड़चन खुद कार मालिक हैं, जो डेंटिंग-पेंटिंग के खर्चे से इतना डरते हैं कि एक बार में क्रैश गार्ड लगाकर सुरक्षित हो जाना चाहते हैं. लेकिन असल दबाव उन कंपनियों की तरफ से है, जो क्रैश गार्ड बनाती हैं.
7 दिसंबर, 2017 को केंद्र सरकार ने देश के सभी राज्यों के प्रधान सचिवों के नाम से एक आदेश जारी किया. इसमें राज्यों से कहा गया था कि वो गाड़ियों पर अवैध तरीके से लगाए गए क्रैश गार्ड के लिए लोगों का चालान काटना शुरू करे. इस लेटर में केंद्र ने कहा कि क्रैश गार्ड मोटर विहिकल एक्ट की धारा 52 के तहत अवैध हैं. धारा 52 कहती है कि गाड़ी में रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) में लिखी चीज़ों के अलावा (माने ओरिजनल पार्ट्स के अलावा) स्पेयर पार्ट्स नहीं लगाए जा सकते.

केंद्र सरकार का क्रैश बार को बैन करता आदेश.
दिल्ली में इसकी शुरुआत होने भी वाली थी. लेकिन क्रैश गार्ड बनाने वाली एक कंपनी केंद्र के आदेश खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट चली गई. कोर्ट में इस कंपनी ने कहा कि क्रैश गार्ड धारा 52 के तहत नहीं आते हैं क्योंकि वो एक गाड़ी की सुरक्षा के लिए लगाए जाते हैं. कंपनी ने कोर्ट में ये भी कहा कि क्रैश गार्ड बैन करने का फैसला बिना कोई 'वैज्ञानिक सर्वे' किए लिया गया.
लेकिन ये बात सच नहीं है. 90 के दशक में ही जर्मनी की ट्रांसपोर्ट रिसर्च लैब में हुई एक रिसर्च ने बता दिया था कि क्रैश गार्ड के चलते सड़क हादसों में सामान्य से ज़्यादा लोगों की जान जाती है. 1994 में हुई इस रिसर्च में सामने आया था -
''...क्रैश गार्ड (बुल बार) कम रफ्तार पर भी जान ले सकते हैं. 20 मील (33 किलोमीटर) प्रति घंटा की रफ्तार से चल रही बिना क्रैश गार्ड की कार से टकराने पर 95% बच्चे बच जाएंगे. क्रैश गार्ड लगाने पर यही कार 20 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पर जानलेवा चोट पहुंचाएगी. कुछ बच्चों की जान तो 16 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पर ही चली जाएगी...''

जर्मन रिसर्च के नतीजे दुनियाभर में छपे भी थे.
तो कुल जमा बात यही है कि क्रैश गार्ड हर तरह से एक गैर ज़रूरी चीज़ है जो आप अपनी गाड़ी से हटा लें तो खुद भी सुरक्षित रहेंगे और दूसरों के लिए भी खतरा नहीं बनेंगे.
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