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सर्फ एक्सेल के ऐड में रंग फेंक रहे बच्चे हमारे हैं, इन्हें बचा लीजिए

इन्हें दूसरों की कद्र न करने वाले हिंसक लोगों में तब्दील न होने दीजिए.

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ये सर्फ एक्सल के होली वाले ऐड के स्क्रीनशॉट हैं.
हमारे एक पड़ोसी बड़े गुस्सैल थे. बीपी हाई रहता था उनका. ऐसा कोई दिन न जाता था जब किसी से लड़ न पड़ते हों. जितनी बार भी लड़कर वापस आते थे. अपना कोई न कोई नुकसान कर आते थे. कभी बिजनेस क्लाइंट हाथ से निकल जाता था. कभी खुद की नाक से खून बह जाता था. हमेशा नौकरी खतरे में रहती थी. पर हर बार उनकी पत्नी उन्हें बचा लेती थीं. मिन्नतें कर उन्हें दूसरों के कॉलर से छुड़ा लेती थीं. वो अंकल को अंकल से बचाती रहीं. हमेशा.
ऐसे बहुत से लोग हैं जो हमें बचा लेते हैं. ट्रैफिक में दो लड़ते हुए लोगों को छुड़ा लेते हैं. स्कूल में दो लड़ते हुए दोस्तों को शांत करा देते हैं. रिश्ते बचा लेते हैं.
PP KA COLUMN
सर्फ एक्सेल के नए होली वाले ऐड में क्या होता अगर बच्ची बीच में न आती. इबादत करने जा रहे बच्चे पर रंग पड़ता. और चूंकि इबादत साफ़ और धुले कपड़ों में करने का रिवाज है, बच्चा नमाज़ न अदा कर पाता. शायद गुस्से में छत पर सबके साथ जबरन होली खेल रहे बच्चों से लड़ पड़ता. चूंकि वो अकेला था, मुमकिन है वो पिटकर आ जाता. मुमकिन ये भी है कि वो रोते हुए भाग जाता. दोनों ही वाकयों में वो बुली होता.
पर हमें इससे फर्क नहीं पड़ता. होली के त्यौहार पर हमारा एक ही मकसद होता है. सबको रंग लगाना. हर हाल में. बिना ये समझे-जाने कि अगला इसके लिए तैयार है या नहीं.
मैं हमेशा ऐसे इलाकों में रही हूं जहां खूब रगड़कर होली खेली जाती है. बच्चे यही सीखते हुए बड़े होते हैं कि किसी को न छोड़ना. ये किसी को न छोड़ने वाला ऐटीट्यूड कब हिंसा में बदल जाता है, मालूम नहीं पड़ता. यही हिंसा कब शोषण और यौन शोषण में बदल जाती है, मालूम नहीं पड़ता. कहने का अर्थ ये नहीं है कि जो भी इस वक़्त सर्फ एक्सेल के ऐड के खिलाफ बोल रहे हैं, वो यौन शोषण को बढ़ावा दे रहे हैं. अर्थ बस इतना है कि जबरन रंग लगाने वाले ऐटीट्यूड में एक बड़ी समस्या है. जिसके बारे में हम सोचते नहीं.
छत पर होली खेलते ये बच्चे बड़े हो जाते हैं. सड़क पर से निकलने वाली लड़कियां बड़ी हो जाती हैं. और होली के पहले या बाद के दिन वे चाहे नौकरी करने जा रही हों. या कॉलेज में पढ़ने जा रही हों. उन्हें पिचकारी और गुब्बारे मारे जाते हैं. और पानी पड़कर पारदर्शी होते उनके कपड़ों को देखकर आनंद लिया जाता है. कैंपस में उनका हाथ पकड़ उनके मुंह पर रंग लगा दिया जाता है. बिना उनसे पूछे कि अगले पुरुष के स्पर्श से वो सहज हैं भी, या नहीं.
सब कहते हैं, बुरा न मानो, होली है. भाभी-देवर, जीजा-साली और तमाम डबल मीनिंग मजाक कभी-कभी अच्छा लगता है. अगर दोनों पार्टियां सहमत हों. पर भाई हमारी फिल्मों और गीतों ने तो हमें यही बताया कि कि होली न खेलने वाले या वाली की न में भी हां है.
पर इस बार मसला लड़की या लड़के होने का नहीं. धर्म का है. होली को लेकर हमारी समझ ये है कि सबको खेलना चाहिए. धर्म-जाति-लिंग भुलाकर. ऐसे में होली खेलने से बचता हुआ बच्चा 'स्पॉइल स्पोर्ट' लगता है. पर बच्चे को क्या चाहिए, इससे किसी को मतलब नहीं है.
देखने में वे बच्चे बेहद मासूम लगते हैं जो एक मुसलमान बच्चे के साथ होली खेलना चाहते हैं. पर जो सोच उनको बड़ा कर रही है, वो मासूम नहीं है. वो सोच असल में ये हैं कि अगर यहां रहते हो, इस सड़क से निकलते हो, तो हमारे गुब्बारे बर्दाश्त करने ही पड़ेंगे. जैसे आजकल एक बड़ा समुदाय कहा करता है, इस देश में रहना है तो भारत माता की जय तो बोलना ही पड़ेगा.
सोशल मीडिया पर सर्फ एक्सेल को बॉयकॉट करने की अपील करने वालों का कहना है कि क्या मुसलमान का बच्चा एक दिन हमारे त्यौहार में शामिल हो जाता. तो कुछ घट जाता? क्या उसका धर्म ख़त्म हो जाता. अरे जनाब आप बताइए, 100 में से एक व्यक्ति पर रंग नहीं पड़ता, तो क्या आपका धर्म ख़त्म हो जाता?
जो पढ़कर सबसे ज्यादा डर लगा, वो ये कि ये ऐड लव जिहाद को बढ़ावा दे रहा है. लव जिहाद तो अपने आप में एक नफरत फैलाने वाला कॉन्सेप्ट हैं. ऊपर से उसे बच्चों के रेफरेंस में देखना और भी खतरनाक है. एक बच्ची को, एक बच्चे की मदद करते देख उसे प्रेम संबंध कहना. कम से कम कहूं तो ये नीच बात है. ये वही कुंठित सोच है जो बचपन से ही लड़कियों और लड़कों को एक-दूसरे से इतना अलग रखती है, कि वे कभी एक नॉर्मल दोस्ती में ढल ही नहीं पाते. उन दोनों के बीच की दोस्ती हमेशा हमारे मॉरल स्ट्रक्चर पर खतरे की तरह मंडराती रहती है.
एक बार फिर से ऐड देखिए. इसलिए नहीं कि ये ऐतिहासिक है. या ये ऐड फिल्म्स की दुनिया को बदल देगा. इसलिए नहीं कि ये कोई वर्क ऑफ़ आर्ट है. इसलिए देखिए कि आप जान पाएं कि अगले से इजाज़त लेने से न आपका पौरुष घटता है. और न ही आपका धर्म खतरे में पड़ता है.
मैं ऐड में उस बच्ची को देखती हूं. शायद ये साल 2019 न होता. और धार्मिक विवादों से इतना रंग हुआ न होता. तो इस विज्ञापन के मायने कुछ और होते. आज कुछ और हैं. ये किसी सेक्युलरिज्म का दिखावा मात्र नहीं है. ये एक पॉलिटिकल स्टेटमेंट है. कि बिगड़े हुए माहौल में भी एक नन्ही बच्ची हमेशा रहेगी हमें अपने पूर्वाग्रहों और बेवजह के क्रोध से बचाने के लिए.

मैं बड़ी होकर ये बच्ची बनना चाहती हूं.




वीडियो- सर्फ एक्सल का ऐड पसंद करने वाले उसमें ये कमियां नहीं देख पाए!

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