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अमरीका के दुश्मन मरते तो ये मशहूर मैगज़ीन अपने कवर पर लाल क्रॉस बना देती थी

ऐसा पांच बार हुआ, बस एक बार स्याही बदली थी.

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मशहूर अंतरराष्ट्रीय मैगजीन 'टाइम' 7 मई, 1945 को छपी थी. लेख का नाम था- हाऊ द वर्ल्ड लर्न्ड ऑफ हिटलर्स डेथ. टाइम का ये कवर फोटो ऑइकॉनिक है.
30 अप्रैल, 1945. जमीन के नीचे एक बंकर. इस बंकर के अंदर दो लाशें. एक मर्द. एक औरत. मर्द की आंखें खुली थीं. पथराई हुई थीं. सामने वाले को भ्रम होता. कि शायद उसे घूर रही हैं. हम हिटलर की बात कर रहे हैं. जब हिटलर के मरने की खबर आई, तो लोगों को समझ ही नहीं आया कि क्या महसूस करें. उस इंसान के मरने पर खुशी जताएं. कि उसकी इतनी आसान मौत का मातम मनाएं. आज हिटलर के मौत की बरसी है. उसने आत्महत्या की थी.
हिटलर और उसकी गर्लफ्रेंड इवा. कुछ करीबियों का दावा है कि आत्महत्या से कुछ दिन पहले ही दोनों ने शादी कर ली थी. बंकर के स्टडी रूम में हिटलर के ठीक बगल में सोफे पर इवा भी मरी पड़ी थी.
हिटलर और उसकी गर्लफ्रेंड इवा. कुछ करीबियों का दावा है कि आत्महत्या से कुछ दिन पहले ही दोनों ने शादी कर ली थी. बंकर के स्टडी रूम में हिटलर के ठीक बगल में सोफे पर इवा भी मरी पड़ी थी.

अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मनों के लिए एक खास स्टाइल इस तारीख पर हम आपको टाइम मैगजीन के एक ऐतिहासिक लेख के कुछ हिस्सों का अनुवाद पढ़ा रहे हैं. टाइम की ये प्रति हिटलर की मौत के बाद छपी थी. तारीख थी- 7 मई, 1945. इसके कवर पर हिटलर की तस्वीर थी. अपनी ट्रेडमार्क मूंछ के साथ. तस्वीर के ऊपर लाल रंग से एक क्रॉस का निशान बना था. ईसाई धर्म वाला होली क्रॉस नहीं. वो जो गलत का निशान होता है. वो क्रॉस. ये प्रति और उसके ऊपर छपी ये फोटो, बहुत मशहूर है. टाइम ने अपने बाद के कुछ अंकों में भी ऐसा किया. किसी बेहद क्रूर इंसान के मरने पर. जिसके मरने पर लगता है कि चलो, इंसानियत का दुश्मन मर गया. जैसे ओसामा बिन लादेन.
बस एक क्रॉस से कितना कुछ कहा जा सकता है.
बस एक क्रॉस से कितना कुछ कहा जा सकता है. ये क्रॉस टाइम मैगजीन का मशहूर स्टाइल है. ऐसे लोग जिन्हें अमेरिका अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, उनके मरने (खत्म होने) पर ये कवर इस्तेमाल करता है टाइम (फोटो: टाइम मैगजीन)

बस पांच बार ऐसा कवर फोटो लगाया है टाइम ने हिटलर की मौत के कुछ वक्त बाद अगस्त, 1945 में टाइम ने दोबारा ऐसा ही कवर निकाला. नागासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद. इन हमलों के बाद ही जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया. चूंकि जापान के झंडे में लाल रंग है, सो इस बार क्रॉस का रंग लाल नहीं रखा गया था. इसे काले रंग का कर दिया गया. करीब 60 साल बाद टाइम मैगजीन ने सद्दाम हुसैन को फांसी चढ़ाए जाने के बाद ये 'रेड एक्स' वाला कवर लगाया. अब तक मैगजीन पांच बार ये कवर स्टाइल इस्तेमाल कर चुकी है. चार बार लाल रंग का क्रॉस और एक बार काले रंग का क्रॉस.
ये प्रति आई थी जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए जाने के बाद. इस हमले में बर्बाद होने के बाद जापान ने सरेंडर कर दिया था (फोटो: टाइम मैगजीन)
ये प्रति आई थी जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए जाने के बाद. इस हमले में बर्बाद होने के बाद जापान ने सरेंडर कर दिया था. ये दूसरी बार था जब टाइम ने ऐसा कवर बनाया था (फोटो: टाइम मैगजीन)

नीचे पढ़िए अनूदित अंश: जिंदा या मुर्दा. अडॉल्फ हिटलर को दफनाया जा चुका है. उसी मलबे में, जिसमें उसका 'थर्ड राइक' (नाजी जर्मनी) दफ्न हुआ. स्टॉकहोम से खबर आई कि हिटलर को हैमरेज हुआ. हैमबर्ग रेडियो ने कहा कि फिर वो राइक चांसलरी के अपने कमांड पोस्ट में गिर गया. यहीं से खबर आई कि ऐडमिरल कार्ल डोएनटिज हिटलर का उत्तराधिकारी बना है. ये भी खबर आई कि गेस्टापो के प्रमुख हेनरिक हिमलर ने हिटलर को बंदी बना लिया था. इनमें से जो भी हुआ हो या न हुआ हो, इतना तय है कि अडॉल्फ हिटलर की राजनीति मिटा दी जा चुकी है. खत्म कर दी गई है. अगर हिटलर सच में मर गया है, तो दुनिया के ज्यादातर इंसानों की उम्मीद सच साबित हुई है. ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि दुनिया के इतने लाखों-करोड़ों लोगों ने मिलकर इतनी शिद्दत से किसी इंसान के मरने की दुआ की हो.
उसके मरने की दुआ मांगने वाले दुनिया के ये सारे लोग भी अगर हिटलर की ही तरह हिंसक होते, उसकी ही तरह बदला लेने की भावना में यकीन रखते होते, तो वो यही मनाते कि वो अभी कुछ दिन और जिंदा रहे. ये दुनिया हिटलर को मारने का कोई भी इतना क्रूर तरीका नहीं खोज सकती थी, जितने क्रूर हिटलर की जिंदगी के वो आखिरी लम्हे होंगे. जब उसके सामने ये साफ हो गया था कि वो हार रहा है. गैर-जर्मन लोगों के खिलाफ उसने जो जंग छेड़ी थी, वो पूरी तरह से हार गई. हिटलर दावा करता था कि नाजी जर्मनी हजार सालों तक चलेगा. वो ही नाजी जर्मनी उसकी आंखों के सामने धूं-धूं करके जल गया. इसके शहर बर्बाद हो गए. जो देश यूरोप का अजेय मुल्क था, उसके इस ऐतिहासिक पतन की आवाज वहां मर रहे लोगों की चीखों में साफ सुनाई दे रही थी. इस बर्बादी की आवाज उन तोप के गोलों में भी सुनाई दे रही थी, जो कि पॉइंट-ब्लैंक रेंज से इसकी इमारतों को निशाना बना रहे थे.
ये प्रति सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़ाए जाने के बाद आई थी (फोटो: टाइम मैगजीन)
ये प्रति सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़ाए जाने के बाद आई थी (फोटो: टाइम मैगजीन)

हजार साल बाद भी एक बात पक्के तौर पर याद रखी जाएगी. उस छोटे से कद के शैतान आदमी की कहानी लोग हमेशा याद रखेंगे. लोग याद रखेंगे कि यूरोप पर एकछत्र राज कायम करने की ख्वाहिश में किस तरह एक इंसान एकदम गिरे, एकदम छिछले तरीके अपनाकर ऊपर उठा. किस तरह एक इंसान ने दुनिया के इतिहास को बदलने की कोशिश की. 20वीं सदी में लेनिन के अलावा शायद ही किसी ने इतिहास में इतना बड़ा बदलाव लाने की कोशिश की हो.
इंसानी इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो. आधुनिक इतिहास में तो कभी ऐसा नहीं हुआ. कि जब एक इतना छोटा, इतना तुच्छ शैतानी सोच वाला इंसान इतने महान देश का सर्वेसर्वा बन बैठा हो. नौटंकी कहकर उसे खारिज कर देना नामुमकिन था. जितनी यातना उसने लोगों को दी, जितनी तबाही वो लेकर आया, उसकी गिनती करना इंसानों के बस की बात नहीं है. उसके हाथों बर्बाद किए गए, मारे गए लोगों की लाशें पूरे यूरोप में छितरी हुई हैं. स्तालिनग्राद से लेकर लंदन तक लाशें बिछी हैं. कितने इंसान मारे गए, इसकी गिनती कर पाना कभी मुमकिन नहीं हो सकेगा. हिटलर ने अपनी जो राजनैतिक विचारधारा बुनी थी, वो इतना ताकतवर हो गया था कि उसे खत्म करने के लिए बाकी पूरी दुनिया को आपस में हाथ मिलाना पड़ा.
ये है आतंकवादी अबु मुसाब अल-जरकावी. इसी ने ISIS शुरू किया था. साल 2004 में. ये जॉर्डन का रहने वाला था, लेकिन फिर इराक चला गया था. उसके साथ कई लड़ाके भी गए. ये सब अमेरिकी और ब्रिटिश फौज से लड़ने वहां पहुंचे थे (फोटो: टाइम मैगजीन)
ये है आतंकवादी अबु मुसाब अल-जरकावी. इसी ने ISIS शुरू किया था. साल 2004 में. ये जॉर्डन का रहने वाला था, लेकिन फिर इराक चला गया था. उसके साथ कई लड़ाके भी गए. ये सब अमेरिकी और ब्रिटिश फौज से लड़ने वहां पहुंचे थे (फोटो: टाइम मैगजीन)



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