Submit your post

Follow Us

यदि हिटलर ने पूरे विश्व में युद्ध थोपा तो चर्चिल ने भी भारत पर गरीबी थोपी

आज अडोल्फ़ हिटलर (20 अप्रैल, 1889 - 30 अप्रैल, 1945) ने आत्महत्या की थी. इतिहास के सबसे बुरे आदमी ने. दुनिया को आज तक के सबसे भीषण युद्ध में झोंकने का श्रेय भी उसे ही जाता है - द्वितीय विश्व युद्ध. उसी ने जर्मन शासित यूरोप में कंसंट्रेशन कैंप खोले. उसी के चलते पूरे यूरोप में लाखों लोग मारे गए, जिसमें से अधिकांश यहूदी थे. रूस के लाखों और अपने लाखों सैनिकों को मार डालने का भी वही दोषी है. केवल एक आदमी इतने सारे अपराध कैसे कर सकता है? क्या मोटिवेशन था? और क्या हमने जो जाना है, वो पूरी तरह सत्य है? क्यूंकि इतिहास तो विजेताओं द्वारा लिखा जाता है न?

एक प्रोपोगेंडा खड़ा करने के लिए कितने शोध की, कितने पूर्वावलोकन की आवश्यकता होती है? कितने संसाधन चाहिए होते हैं बातों को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने के लिए? कितनी लॉजिकस्टिक लगती है सच को झूठ बनाने में? और क्या करना होता है दंत कथाओं को इतिहास बनाने के लिए और हम सबको उस बदले हुए, तोड़े मरोड़े इतिहास के ऊपर विश्वास करवाने के लिए?

इस सबको जानना है तो द्वितीय विश्व युद्ध और उसके बाद की परिस्थितियों की केस स्टडीज़ मौज़ू हो जाती हैं.

एक ज़ेन कोआन है कि यदि जंगल में कोई पेड़ गिरता है और वहां पर कोई न हो तो क्या पेड़ के गिरने की आवाज़ होगी? कैसे पता चलेगा जहाज के डूबने का कारण, तब जबकि जहाज में बैठे सारे लोग मारे जा चुके हों और जहाज भी अब तक अप्राप्य हो?

सच है कि सूरज से धरती तक की दूरी मापने के लिए इंच टेप की आवश्यकता नहीं होती, अनेकों वैज्ञानिक विधियों और विविध गणनाओं द्वारा यह नापी जा सकती है. लेकिन इस दूरी को मापने में किसी संस्था का कोई निजी हित निहित नहीं होता. या होता भी है तो भी वो किसी दूसरी संस्था, या व्यक्ति के हितों का हनन नहीं करता. अस्तु हम जानते (या कम-से-कम मानते तो) हैं कि जानकारी बिल्कुल ठीक होगी.

कैसा हो कि एम. आई. टी. एक माप लेकर आये और हावर्ड दूसरी? भा. ज. पा. एक माप लेकर आये और कांग्रेस दूसरी, डेमोक्रेट्स एक माप लेकर आये और रिपब्लिकन्स दूसरी, रशिया एक माप लेकर आये और अमेरिका दूसरी? और तब हम किसी एक पर विश्वास करने से पहले किसी तटस्थ स्रोत की ओर मुखातिब होते हैं, और हमें होना चाहिए भी.

फ्रेंक्लिन डी रूज़वेल्ट
फ्रेंक्लिन डी रूज़वेल्ट

तो हम द्वितीय विश्व युद्ध में इतने बायस्ड कैसे हो गए? क्यूं हमने एक ही पक्ष की बात सुनी, क्यूं हमने सात-आठ दशकों तक ‘एक्सिस’ के लिए कान बंद किये रहे? लगातार?

ग़लती हमारी नहीं है: इसमें ग़लती हमारी नहीं है कि हम एक ही पक्ष को जानते हैं. दरअसल हमारे कान कभी बंद नहीं थे और न ही सत्य के प्रति हमारी खोज में कोई उदासीनता आई थी. कारण कुछ और थे. और कई थे. उन कई कारणों में से दो ऐसे बड़े कारण हैं जिसके वजह से हमने हिटलर को इतिहास का सबसे बुरा इंसान समझ लिया और चर्चिल, रूज़वेल्ट को बाइज्ज़त बरी कर दिया:

# 1) जर्मन का अपराधबोध

जब जर्मनी प्रथम विश्व युद्ध हारा था तो उसके नागरिकों में जिस भावना का संचार हुआ वो थी – अपमान की. उन्हें लगा कि वे इस युद्ध को जीत सकते थे. उन्हें लगा कि उनके अपने राजनेताओं ने ही उन्हें धोखा दिया है. उन्हें ये भी लगा कि फ्रांस ने उन्हें बेईज्जत किया है और सबसे ज़्यादा जो उन्हें लगा वो ये था कि केवल जर्मनी को ही इस युद्ध के लिए दोषी ठहराया गया है और प्रतिबंध लगाये गए हैं जबकि वो, अर्थात जर्मनी, अकेला दोषी नहीं था.

अब उपर्युक्त जितनी भी बातें जर्मनी को और उसके नागरिकों, उसके हितैषियों के लोगों को लगीं उनमें से कितनी सही थीं या कितनी ग़लत ये बहस का मुद्दा हो सकता है. लेकिन इस बात में दो राय नहीं कि प्रथम विश्व युद्ध हार जाने के बाद जर्मनी बहुत बुरी तरह से अपमानित महसूस कर रहा था. इसी अपमान ने हिटलर को जन्म दिया, इसी अपमान ने एक्सट्रीम एंटी-सिमेंटिक विचारों को जगह दी. इसी अपमान ने नाज़ी पार्टी को जर्मन के आम नागरिक को द्वितीय विश्व युद्ध के लिए आवश्यक आत्मबल दिया.

वहीँ दूसरी तरफ़ द्वितीय विश्व युद्ध हार जाने के बाद स्थितियां बिल्कुल अलग हो गयी थीं. जर्मनी और एक्सिस-पावर के युद्ध हार जाने बाद जगह जगह से कंसंट्रेशन कैम्पस की ख़बरें आने लगीं, यहूदियों के नरसंहार और होलोकॉस्ट से जर्मनी का आम नागरिक खुद को नहीं जोड़ना चाह रहा था. तब जबकि एक दिन पहले तक पूरा जर्मनी नाज़ी विचारों का समर्थक था अलगे ही दिन सबने खुद को उस विचारधारा से अलग कर दिया और हिटलर के साथ अपने जुड़ाव के ऐसे हर एक और किसी भी सबूत को मिटाने की पुरजोर कोशिशें कीं.

विंस्टन चर्चिल
विंस्टन चर्चिल

जर्मनी के एक प्रसिद्ध बिजनेसमैन ने अपने पूर्वजों के बचाव में कहा,’ये सत्य है कि वो नाज़ी थे, मगर उस वक्त कौन नहीं था?’

सीमेंस, बेयर, ह्यूगो बॉस, वोल्सवैगन जैसी ढ़ेरों छोटी बड़ी कम्पनियों से लेकर नीत्शे जैसे प्रसिद्ध लोगों तक पर नाज़ी विचारधार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन करने के आरोप गाहे-बगाहे लगता रहा है. सवाल ये नहीं है कि आरोप सही हैं अथवा ग़लत, बात ये है कि कोई भी इस बात को स्वीकार न तो करना चाहता था, न चाहता है. और स्वीकार करता भी है तो एक भूल की तरह, एक क्षमाप्रार्थी सरीखा. कोई भी व्यक्ति संस्था या देश इस बात पर गर्व नहीं महसूस करता कि अतीत में उनका नाम हिटलर से, नाज़ी से, होलोकॉस्ट से जुड़ा था. और गर्व होना भी नहीं चाहिए.

यानी जहां प्रथम विश्व युद्ध के बाद एक आम जर्मनी अपमानित महसूस कर रहा था, अस्तु बहिर्मुखी हो गया था; वहीँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वो ग्लानी का अनुभव करने लगा और अन्तर्मुखी हो गया. जहां प्रथम विश्व युद्ध ने बदले की भावना को जन्म दिया वहीं द्वितीय ने आत्ममंथन की. जहां प्रथम विश्व युद्ध के बाद ‘अपने साथ हुए’ दुर्व्यवहार को वो सबको बताना चाहता था वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ‘अपने द्वारा किये’ दुर्व्यवहार को छुपाना.
और इस ग्लानी के चलते वो चुप रहा, उसका पक्ष लेने वाले चुप रहे, नेशनलिस्ट पार्टी जर्मनी में हारती रही और जर्मन-राजनीति में हाशिये पर आ गयी और हाशिये में ही रही. आप पर नाज़ी का समर्थन करने पर या उनके पक्ष में ‘सच’ बोलने पर भी चहुंमुखी प्रतिबंध लग गए. और ये प्रतिबंध वैधानिक ही नहीं नैतिक और आत्मिक तक के माइक्रो लेवल के थे. इतने और इस-इस तरह कि प्रस्तुत लेख विश्व युद्ध के कई दशकों के बाद भी किसी जर्मनी पत्रिका में प्रकाशित न हो.

America On WW2
आज भी वर्ल्ड वार – 2 में अमेरिका को मिली जीत की आइकॉनिक फोटो मानी जाती है ये

जब कुओरा में प्रश्न पूछा जाता है,’वर्तमान में जर्मनी नागरिक द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में कैसा महसूस करते हैं?’ तो उसके उत्तर में नेटिव जर्मन्स के जवाब, यदा ‘वी हेव मूव्ड ऑन(हम उन बातों से आगे बढ़ गए हैं)’ या ‘हमारे पूर्वजों की सज़ा हमें क्यूं मिले’ सिद्ध करते हैं कि ‘वो’ अतीत स्वर्णिम नहीं था और उसे भुला दिया जाना चाहिए.

जर्मनी में जो राष्ट्रवाद नाज़ी-एरा में फल फूल रहा था वो द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् इस तरह से धूल-धूसरित हुआ कि जर्मन की फुटबॉल टीम (कल्पना कीजिये फुटबॉल टीम) यदि वर्ल्ड कप जैसा भी कोई इवेंट जीत के आये तो देश में लगभग सन्नाटा पसरा रहता.

तो उस स्थिति में जब अपने बचाव के लाले पड़ रहे थे तो नाज़ियों का, हिटलर का, उनकी विचारधाराओं और और कृत्यों का कौन समर्थन करता, और क्यूं करता? और जब कोई बोल ही नहीं रहा था तो हम क्या सुनते? कैसे सुनते? तो हमने हिटलर के पक्ष को नहीं सुना.

# 2) इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा गया है

विडंबना देखिए कि उपर्युक्त कथन (अधिकतर स्रोतों के अनुसार) विंस्टन चर्चिल का है, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख विजेताओं में से एक था. और ये बात (कथन नहीं) अपने आप में आत्म व्याख्यात्मक है.

'सेविंग प्राइवेट रेयान' का एक दृश्य
‘सेविंग प्राइवेट रेयान’ का एक दृश्य

# सेविंग प्रायवेट रायन अपने ओपनिंग सीन के लिए जानी जाती है. यह आधे घंटे तक चलने वाला सीन है जिसमें युद्ध की विभीषिका को अविस्मरणीय तरीके से फिल्माया गया है. डी-डे, अर्थात 6 जून 1944 की सुबह, अमेरिकी सैनिक अपने ‘नॉर्मंडी आक्रमण’ अभियान के अंतर्गत ओमाहा तट पर लैंड करते हैं. इसे एलाईड फोर्सेज द्वारा ऑपरेशन नेपच्यून कूटनाम दिया जाता है. भीषण नरसंहार होता है और इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दर्शक अपनी कुर्सी पर चिपके रहते हैं.

शिंडलर’स लिस्ट
शिंडलर’स लिस्ट

# शिंडलर’ज़ लिस्ट अपने इमोशनल क्लाइमेक्स सीन के लिए विश्व विख्यात है कि कैसे ऑस्कर शिंडलर नामक एक जर्मन व्यवसायी इस बात को लेकर दुखी होता है कि यदि उसने अपने एश-ओ-आराम में से कुछ और रूपये बचाए जाते तो वो कुछ और यहूदियों को भी होलोकॉस्ट से बचा सकता था.

दोनों फिल्मों में समानता ये है कि ये युद्ध की विभीषिका (क्रमशः प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) को बड़े ही अच्छे ढंग से प्रदर्शित करती हैं और वॉर-मूवीज की किसी भी लिस्ट में ऊंचे पायदानों में आती हैं.

इनमें एक और समानता ये है कि दोनों फिल्में स्टीवन स्पीलबर्ग द्वारा निर्देशित हैं, वही स्पीलबर्ग जिनको जुरासिक पार्क और बैक टू दी फ्यूचर के लिए भी जाना जाता है. स्पीलबर्ग एक यहूदी हैं.

वर्तमान में, और काफ़ी समय से विश्व स्तर के ज़्यादातर मिडिया ब्रांड्स और सोशल साइट्स यहूदियों के अधीन हैं. ज्यादातर आर्थिक संस्थान यहूदियों के हैं. वैश्विक राजनीति में यहूदी सबसे ऊंचे पदों पर हैं. तो जानकरियों के प्रवाह में यहूदियों का कितना हस्तक्षेप होगा यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है.

वहीं जर्मनी या जापानी नहीं अंग्रेजी विश्व की प्रमुख भाषा है. हॉलीवुड की फिल्मों और अमेरिका और बी.बी.सी. की डाक्यूमेंट्रीज़ में द्वितीय विश्व युद्ध के केवल एक पक्ष को दिखाया जाने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्यूंकि हमें पता है कि इतिहास विजेताओं का, विजेताओं द्वारा और विजेताओं के लिए लिखा जाता है.

# आदर्श स्थिति क्या होनी चाहिए

हमें जानना चाहिए कि नाज़ियों में क्या अच्छा था और एलाईज़ में क्या बुरा. हो सकता है कि सच जानने के बाद आपका पक्ष बदल जाए. हमें जानना चाहिए कि क्या डंकिर्क हिटलर की एक ग़लती थी या युद्ध टालने का मैत्री जेस्चर? हमें सवाल पूछने चाहिए कि पोलैंड के साथ हुई संधि के चलते, यदि इंग्लैंड ने जर्मन पर युद्ध घोषित किया तो रूस पर क्यूं नहीं? यदि भविष्य के नरसंहार के चलते नागासाकी और हिरोशिमा जस्टिफाईड हैं तो भविष्य के ‘प्रत्यक्ष’ डर के चलते जर्मन का रूस पर आक्रमण क्यूं नहीं?

ऐसे ही कई सवाल जो अभी तक या तो पूछे ही नहीं गए या इतने दबे स्वरों में कि इनका उत्तर मिलना, कम से कम अभी तक तो, असंभव ही था. ये सवाल पूछे जाने चाहिए और इनके उत्तर मिलने चाहिए. ’डी-क्लासिफाइड’ उत्तर.

# भारत की वीयर्ड सी तटस्थता

द्वितीय विश्व युद्ध में कुछ हारने वाले देश थे – जर्मनी, इटली, जापान आदि; कुछ जीतने वाले देश थे – रूस, इंग्लैंड, अमेरिका आदि; कुछ तटस्थ देश भी थे – स्विट्ज़रलैंड, आयरलेंड सरीखे. लेकिन भारत शायद एक मात्र ऐसा देश था जो (जिसके खुद के कोई हित साधन प्रयोजन न होने के बावजूद) दोनों पक्षों से लड़ रहा था. इसे क्या कहा जाय? तटस्थता?

द्वितीय विश्व युद्ध की कुछ यादगार फ़ोटोज़ में से एक
द्वितीय विश्व युद्ध की कुछ यादगार फ़ोटोज़ में से एक

ट्रिविया: ‘तीसरी दुनिया के देश’ गरीब या विकासशील देशों को नहीं कहा जाता है, दरअसल उन देशों को कहा जाता है जो विश्व युद्ध में तटस्थ थे. यानी भारत, जो बेशक दोनों तरफ़ से लड रहा था लेकिन स्वयं में तटस्थ था, के साथ साथ स्विट्ज़रलैंड जैसा विकसित देश भी ‘परिभाषा के अनुसार’ तीसरी दुनिया का देश है.

बहरहाल, हम भारतियों को जानना ही चाहिए चर्चिल का असली चेहरा और हिटलर के पक्ष को भी. हम क्यूं ग्लानी महसूस करें, सत्य जानने और स्वीकार करने में? हमने तो नहीं मांगी थी वॉर आख़िर.

यदि सुभाष चन्द्र बॉस के जीवन से जुडी कुछ क्लासिफाईड चीज़ें हमारे जर्मन या जापान के साथ के सम्बन्धों के विषय में जानकरी देती हैं और इसलिए ही उन्हें डी-क्लासिफाइड नहीं किया जा रहा तो हमें उन्हें तुरंत डी-क्लासिफाइ करना चाहिए. आख़िर ,’उस समय नाज़ी कौन नहीं था?’ कौन नहीं बंट गया था दो पक्षों में? और उस अजीब से दौर में हमें अपना पक्ष चुनने की आज़ादी क्यूं नहीं हो?

क्या एक भारतीय होने के नाते हमारे द्वारा ये सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि यदि हिटलर-प्रायोजित जर्मन और पोलैंड के होलोकॉस्ट के चलते उसे दुनिया के लिए सबसे बुरा इंसान कहा जाता है तो चर्चिल-प्रायोजित बंगाल के अकाल के चलते उसे भारत के लिए सबसे बुरा इंसान क्यूं नहीं कहा जाना चाहिए? यदि जर्मनी ने पूरे विश्व में युद्ध थोपा तो इंग्लैंड ने भी भारत पर गरीबी थोपी. हमें इतिहास को नकार के ‘मूव ऑन’ होने की न कोई बाध्यता है न ही हमें होना चाहिए.

कहना अतिश्योक्ति न होगा कि भारत न होता तो शायद युद्ध के परिणाम कुछ और होते, या इतना तो होता ही कि परिणाम तक पहुंचने के रास्ते अलग होते. थोड़े और मुश्किल.

हिटलर और सुभाष चंद्र बोस
हिटलर और सुभाष चंद्र बोस

हम प्रिविलेज्ड हैं कि ग्लानि न महसूस करें लेकिन हमारा हक़ है कि हम विक्टिम महसूस करें. उस युद्ध के लिए जिसमें हमारे तटस्थ होने के बावजूद हमारे संसाधनों का हमारे लोगों का दोहन किया जा रहा था. बुरी तरह से.

हम नहीं जानते कि हमने ग़लत दुश्मन को हराया या नहीं मगर हम ये भी तो नहीं जानते कि क्या (अपनी इच्छा के लगभग विरुद्ध) हमें ग़लत दोस्त के गले लगने के तो बाध्य नहीं होना पड़ा?

# अंततः

अब हैं कुछ डॉक्यूमेंट्रिज़ यू ट्यूब और अन्यत्र, जैसे वर्ल्ड डीफिटेड दी रॉंग एनिमी(विश्व ने ग़लत दुश्मन को हराया), दी ग्रेटेस्ट स्टोरी नेवर टोल्ड (एक महान कथा जो कभी नहीं बताई गयी), हैलस्ट्रोम आदि. होने को इन वीडियोज़ को देखने के बाद लगता है कि इसमें भी चीज़ें नाज़ी-समर्थन में बढ़ा चढ़ा कर या सुविधानुसार कमतर कर दिखाई या बताई गयी हैं. मगर ऐसा ही तो दूसरे पक्ष के ‘सत्य’ (कथित) के साथ भी सम्भव हो सकता है. इसे ही तो प्रोपोगेंडा कहते हैं.

ये सही है कि किसी एक की ग़लती पर पर्दा डालने के लिए किसी दूसरे की ग़लती नहीं गिनाई जा सकती, लेकिन ये भी तो सही है कि एक पक्ष की ग़लती को इतना बड़ा कर दिया जाय कि दूसरे पक्ष की सारी ग़लतियां नहीं छुप जाएं और प्रथम पक्ष के कुछ बेहतरीन कार्य भी.


मैं हिटलर ने जो किया उसे जस्टिफाई नहीं कर रहा, किया भी नहीं जा सकता. लेकिन मेरा मानना है कि बाकियों का किया हुआ भी सबके सामने आना चाहिए… आना ही चाहिए…


ये भी पढ़ें:

सेकंड वर्ल्ड वॉर अच्छे से समझने के लिए ये 9 धांसू फ़िल्में अच्छे से देख डालो

‘डनकर्क’: वो वॉर मूवी जिसमें आम लोग युद्ध से बचाकर अपने सैनिकों को घर लाते हैं

आज तक के सबसे कुख्यात नरसंहार के ऊपर बनी ये 6 फ़िल्में मस्ट वॉच हैं

दुनिया में फिर कभी वैसी जंग हुई ही नहीं, जैसी हाइफा में भारतीय सैनिकों ने लड़ी थी


Video देखें:

फसल काटने से इनकार करने पर दलित युवक की पिटाई वाले वीडियो की सच्चाई

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.