Submit your post

Follow Us

इन 6 बेहतरीन फिल्मों का नामोनिशान न होता तो अच्छा होता

कोई घटना, कोई व्यक्ति या कोई सिद्धांत कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा इस बात से भी लग सकता है कि उसके कितने नाम प्रचलन में हैं. होलोकॉस्ट, कंसंट्रेशन कैंप, घेटो, शोआ(प्रलय) दुनिया के सबसे कुख्यात नरसंहार के ढ़ेरों नामों में से कुछेक प्रचलित नाम हैं. आज हिटलर ने आत्महत्या की थी. उसे ही इस कुख्यात नरसंहार का दोषी माना जाता है. न वो होता, न ये नरसंहार होते, न ये फ़िल्में होती, जिनकी बात हम करने जा रहे हैं.

दूर से देखने पर हम सही और ग़लत आसानी से चुन सकते हैं, लेकिन उस वक्त के हालात ऐसे थे जिसमें सही और ग़लत के बीच में कोई दीवार नहीं रह गयी थी. ग़लत और घृणित के बीच भी नहीं. जीतने का उन्माद अपराध-बोध पर हावी हो गया था. किन्तु जब उन्माद की धूल छंटने लग गयी तो जो नज़ारा दिखा वो ताउम्र के, पुश्तों के, रतजगों का कारण बना. साठ लाख लोगों के खून और प्रताड़नाओं से लाल हुए अपने इतिहास को देख पाना असम्भव था, और आंख बंद कर लेने का विकल्प नहीं था.

मानवीय त्रासदी की इस थीम पर सैकड़ों हॉलीवुड और वैश्विक फ़िल्में बनी हैं. इतनी कि ‘होलोकॉस्ट‘ अपने आप में एक विधा हो चुकी है. जिस पर बनी हर फ़िल्म आपको इतिहास के और करीब ले जाती है और मानवता की असफलता के काले अध्यायों को आपके सामने खोल के रख देती है. इनमें से चंद फ़िल्में चुनना, न चुनी गयी फिल्मों के साथ अन्याय होगा. होलोकॉस्ट, दरअसल ‘वर्ल्ड वॉर द्वितीय’ नामक विधा से अलग विधा है. इसमें या तो द्वितीय विश्व युद्ध है ही नहीं या है भी तो नेपथ्य में.

आइये इस लेख के माध्यम से होलोकॉस्ट को मुख्य थीम रखकर अलग-अलग अन्य प्रमुख-विधाओं की छः सबसे बेहतरीन फिल्मों का काउंटडाउन करते हैं:

# 6 – दी बॉय इन दी स्ट्रिपड पज़ामाज़ (धारीदार पैजामे वाला लड़का)

अमेरिका | 2008 | 1:34 घंटे | विधा – बाल फ़िल्म, ड्रामा, फॅमिली | आई. एम. डी. बी. रेटिंग – 7.8

जब हालिया ट्रांसफर हुए अपने फौजी पिता के साथ ब्रूनो भी एक नई जगह पहुंचता है तो जो सबसे पहली चीज़ उसे खटकती है वो है – उसके रोशनदान से दिखने वाली धारीदार पैज़ामा पहले हुए किसानों की बस्ती. दरअसल वो किसानों की बस्ती नहीं एक कंसंट्रेशन कैंप है जिसकी चिमनी में से काला धुआं निकलता है. जो, दर्शक जानते हैं कि, ज़िन्दा इंसानों के जलने का है.

काफ़ी दिनों तक आठ साल के बच्चे ब्रूनो का कोई दोस्त नहीं बन पाता. कारण – आस पास कोई उसका हम उम्र है ही नहीं जिससे दोस्ती हो. बहरहाल, ब्रूनो एक दिन ‘एक्सप्लोर’ करने के उद्देश्य से कंसंट्रेशन कैंप की तार-बाड़ी तक पहुंच जाता है, जहां उस पार उदास और भूखे बैठे एक हम-उम्र यहूदी बच्चे(शम्यूल) से उसकी दोस्ती हो जाती है. और आगे की कहानी इनकी मासूम दुनियां की कहानी है.

फ़िल्म में कई सब-प्लॉट्स भी हैं जैसे – ब्रूनो की मां का कंसंट्रेशन कैंप की सच्चाई जानने के बाद ब्रूनो के पिता से तीखी नोंक-झोंकों का दौर. घर में पढ़ाने आ रहे टीचर और एक सैनिक से प्रेम के चलते ब्रूनो की बहन पर पड़ता नाज़ी प्रभाव. ब्रूनो के घर का काम करने के लिए कैंप से आने वाला एक यहूदी जो पहले डॉक्टर था. एक सैनिक जिसे फ्रंट में इसलिए भेज दिया जाता है क्यूंकि उसके पिताजी देश छोडकर भाग गये थे. ब्रूनो की दादी और ब्रूनो के पिता के बीच का रिश्ता जो राजनैतिक असहमतियों के कारण कुछ कड़वाहट भरा है.

कहानी बहुत सिंपल है और इसमें कंसंट्रेशन कैंप का कोई वीभत्स दृश्य नहीं हैं (बस शम्यूल की आंख की चोट को छोडकर). इसलिए और साथ ही दो हम-उम्र बच्चों की दोस्ती के चलते ये फ़िल्म बाल-फ़िल्म कही जा सकती है.

आठ वर्ष के लड़के के लिए सब कुछ सर-रियल होता है. उसे जो बताया जाता है उसके पास उस पर विश्वास करने के सिवा कोई चारा नहीं होता. उसे नफ़रत पढ़ाई जाती है, घृणा करना रटाया जाता है. ऐसा नहीं है कि बड़े ये सब जानबूझ कर रहे हैं. कौन अपने बच्चों को जानबूझकर ये सब सिखाएगा? दरअसल माता-पिता और अध्यापक भी कथिक ‘संकट’ के दौर में आठ वर्ष के बच्चे सरीखे हो गये हैं. शायद उससे भी निरीह. क्यूंकि बच्चा कम से कम सच को ‘एक्सप्लोर’ तो करना चाहत है. वो ढूंढना चाहता है एक ‘अच्छा यहूदी’. एक ऐसी चीज़, जो अध्यापक की, उसके पिता की और उसकी बहन की नज़र में मिलनी असम्भव है.

यहूदी शम्यूल कंसंट्रेशन कैंप के भीतर
यहूदी शम्यूल कंसंट्रेशन कैंप के भीतर

मेमोरेबल कोट – बच्चों की मासूमियत से दर्शकों को अंदर तक हिला देने वाला ब्रूनो का ये कथन:
वो एक बार एक डॉक्टर हुआ करता था, लेकिन आलू छिलने की ख़ातिर उसने अपना वो सब कुछ त्याग दिया.


# 5 – यूरोपा यूरोपा

फ्रांस | 1990 | 1:52 घंटे | विधा – कमिंग ऑव एज, बायोग्राफी, सर्वाइवल, सटायर | आई. एम. डी. बी. रेटिंग – 7.7

‘कमिंग ऑव एज’ अमेरिकन मूवीज़ की ऐसी विधा है जिसमें किशोर से नायक बनने की दास्तां पर्दे पर दिखाई जाती है. ऐसी फिल्मों में अक्सर ‘एक्शन’ यानी कुछ होने की बजाय डायलॉग या नायक के भीतर चल रहे आंतरिक मोनोलॉग पर ज़ोर दिया जाता है. ऐसी फिल्में, ज़ाहिर तौर पर, किसी ख़ास ‘पीरियड’ में सेट होती हैं और इनकी कहानियों के विषय विशेष रूप से किशोर होते हैं.

इस मायने में यूरोपा यूरोपा को भी ‘कमिंग ऑव एज’ कहा जा सकता है. एक यहूदी किशोर – सोलोमन किस तरह से सभी प्रकार के खतरों से (ज़्यादातर सौभाग्यवश या चतुराई के कारण, न कि लड़कर) सर्वाइव करता है इसका चित्रण करते हुए फ़िल्म सोलोमन के अंतर्द्वंद को दर्शाती है. यह अंतर्द्वंद कई जगह मुखरित हो जाता है.

जैसे कि – जब उसे कोशर भोजन उपलब्ध नहीं होता, जब उसकी ट्रेन कंसंट्रेशन कैंप से गुजरती है, जब उसक भाई खो जाता है, जब उसे अपनी सच्चाई छुपाने हेतु अपने शरीर को भी छुपाना पड़ता है, जब उसका पाला एक समलैंगिक से पड़ता है, जब उसकी प्रेमिका अपने नाज़ी-प्रेम के चलते उससे दूर हो जाती है और जब वो अपनी प्रार्थन नहीं कर पाता.

फ़िल्म में सभी कमर्शियल तत्व मौज़ूद हैं, फ़िल्म कई जगह व्यंगात्मक और सांकेतिक भी है. यदा – ट्रेन के लव मेकिंग के दौरान अधेड़ स्त्री का हिटलर को फेंटेसाइज़ करना; हिटलर का सर-रियल ढंग से होलोकॉस्ट के दौरान एक अलमारी में छुप जाना क्यूंकि नायक के अनुसार शायद वो भी यहूदी है; पहले स्टॉलिन और फ़िर हिटलर का नाम लेने पर ऊपर से कैंडी का गिरना; नायक का रशियन से जर्मन में और जर्मन में रशियन से अनुवाद करना; नायक, जो कि एक यहूदी है, के शरीर के बनावट की नाप लेने के बाद उसे आर्यन घोषित करना; नाज़ी सेना में एक समलैंगिक का होना; आदि.

कहानी एक होलोकॉस्ट सर्वाइवल की बायोग्राफी पर आधारित है जिसमें कुछ सिनेमेटिक लिबर्टी ली गयी है. ये एक इतिहास के छात्र के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है क्यूंकि यह कई समय और स्थानों में विभाजित है, क्रमशः : नाज़ी-जर्मनी, पोलैंड, सोवियत संघ, नाज़ी-अधिकृत सोवियत संघ, युद्ध के समय का नाज़ी-जर्मन, सोवियत अधिकृत नाज़ी-जर्मनी.

सोलोमन यहूदियों का पवित्र चिन्ह शीशे में उकेरता हुआ
सोलोमन यहूदियों का पवित्र चिन्ह शीशे में उकेरता हुआ

मेमोरेबल कोट – कार्ल मार्क्स को कोट करते हुए रशियन अनाथालय में नायक:
हम धर्म को जनता के लिए अफीम कहते हैं.


# 4 – दी पियानिस्ट (पियानो वादक)

अमेरिका | 2002 | 2:30 घंटे | म्यूजिकल, सर्वाइवल, ड्रामा, वॉर | आई. एम. डी. बी. रेटिंग – 8.5

दी प्यानिस्ट को यदि ‘शिंडलरज़ लिस्ट’ का एक्सटेनडेड वर्ज़न कहा जाए तो अनुचित न होगा. ऐसी फिल्में युद्ध के अप्रत्यक्ष दुष्परिणामों को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत करती हैं. वैसे इस चलचित्र में युद्ध इतना भी पैसिव नहीं जितना ‘ग्रेव्स ऑव फायर फ्लाईज़’ में है लेकिन इतना भी प्रत्यक्ष नहीं जितना ‘सेविंग प्राइवेट रायान’ में है.

प्रेम और कला एक दूसरे के समानार्थी हैं. दोनों ही डूब जाना मांगती हैं.

नायक डरा हुआ है, भूखा है, युद्ध से उजड़े शहर में बीचों बीच खड़ा है. और ऐसे क्षण में पियानो बजाना ‘लास्ट थिंग ऑन हिज़ माइंड’ होगी. और है भी.

प्यानो दर्शकों, निर्देशक और नायक के दिल-ओ-दिमाग से उतर गया सा लगता है. नायक को चिंता है तो बस किसी उजाड़ घर से पा गये टीन के बक्से को तोड़कर उसके अंदर भरे कैंड-फूड को खाने की.

ठीक इसी दौरान उसे मजबूरी वश पियानो बजाना पड़ता है. कांपते हाथों से, भूखे शरीर से और युद्ध की विभीषिका से भरे और डरे हुए मन से. लेकिन वो बजाता है – एक यहूदी कलाकार एक जर्मन सैनिक के समक्ष. मजबूरी अब आनंद बन जाती है. इतनी कि आनंद ओवर-फ्लो होकर उसके एक मात्र श्रोता तक जा पहुंचता है. और अतः केवल ये सीन मूवी के टाइटल की प्रासंगिकता सिद्ध कर देता है.

इस सीन में एक दर्शन है – कला मोक्ष के सर्वाधिक नज़दीक है. आप दिमाग लगा कर पियानो, ग़जल, आर्ट सीख सकते हैं और दिमाग से ही उसमें उत्तरोत्तर सुधार कर सकते हैं, लेकिन एक स्तर के बाद मन, दिमाग, शरीर, स्व – सब पीछे छूट जाता है. आप और कला में कोई अंतर नहीं रह जाता. बस कला भी छूट जाए तो आगे ‘मुक्ति’ है.

जैसे एक विडियो गेम खेलने वाला धीरे धीरे कठिन राउंड में पहुंचता है लेकिन फिर उस राउंड को क्लियर करने के लिए उसे विडियो गेम हो जाना पड़ता है. वो राउंड क्लियर करना नीत्शे के महामानव होने सरीखा है. उस समय यदि कोई उसका चुपके से सर भी काट दे तो पीड़ा नहीं होनी उसे.

और प्रेम? प्रेम भी तो शायद यही है. इसीलिए ‘हंच बैक ऑव नात्रेडॉम’ में कासिमोड़ो और नर्तकी के शरीर आपस में लिपटे पाए जाते हैं.

वैसे युद्ध और उसके क्षण भी मोक्ष के सर्वाधिक नज़दीक हैं, वे क्षण जब कारण, अभिमान, देश-प्रेम जैसी चीजें लुप्त हो जाती हैं. बस कुछ नेपथ्य के शोर हैं. गीता युद्ध के बीचों बीच ही लिखी जा सकती है. रिल्के युद्ध के ही जाया हैं.

फ़िल्म अपने कला पक्ष यानी युद्ध से बर्बाद हुए शहरों के ‘पीरियड’ सेट्स के लिए भी दर्शनीय है.

फ़िल्म के निर्देशक पोलंस्की की मां औशविट्ज़ में मारी गयीं और वे स्वयं क्राकोव यहूदी बस्ती के सर्वाइवल थे.

'दी पियानिस्ट' युद्ध से उजाड़ हुए शहरों के सेट्स के लिए भी दर्शनीय है.
‘दी पियानिस्ट’ युद्ध से उजाड़ हुए शहरों के सेट्स के लिए भी दर्शनीय है.

मेमोरेबल कोट – यह कोट जो मूलतः शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑव वेनिस’ से है:
यदि आप हमें चुभाते हैं, तो क्या हमारा खून नहीं निकलेगा? यदि आप हमें गुदगुदी करते हैं, तो क्या हम नहीं हँसेंगे? यदि आप हमें जहर देते हैं, तो क्या हम मर नहीं जायेंगे? और, यदि आप हमें ग़लत साबित करते हैं, तो क्या हम बदला नहीं लेंगे?


# 3 – शिंडलर’स लिस्ट (शिंडलर की सूची)

अमेरिका | 1993 | 3:15 घंटे | बायोग्राफी, सर्वाइवल, कल्चरल | आई. एम. डी. बी. रेटिंग – 8.9

मैनेजमेंट में कभी कभी एक काल्पनिक केस-स्टडी पढ़ाई जाती है – एक गांव जहां कोई जूते नहीं पहनता वहां दो तरह का ‘व्यापारिक’ नज़रिया हो सकता है. पहला, कि जब यहां कोई जूते नहीं पहनता तो यहां जूते बेचने का क्या लाभ. और दूसरा, कि जहां पर अभी तक कोई जूते नहीं पहनता वहां पर जूते के फ़ायदे गिनाकर अपेक्षाकृत एक बड़ी और मोनोपोलिस्टिक मार्किट खड़ी की जा सकती है.

फ़िल्म का नायक ऑस्कर शिंडलर उपर्युक्त में से दूसरे सिद्धांत पर यकीन रखने वाला एक अवसरवादी जर्मन व्यापारी है. एक व्यापारी जो युद्ध के बीच में इसलिय जर्मनी में व्यापार करना चाहता है, क्यूंकि कोई और नहीं करना चाहता. क्यूंकि वो जानता है कि ‘पी. आर.’ और ‘पैसे’ का प्रबन्धन कैसे किया जाता है और साथ ही उसे पता है कि यहूदियों के रूप में उसे केवल जर्मन में ही सस्ते (लगभग मुफ़्त में) श्रमिक मिल सकते हैं. करप्शन, चार्म और लीडरशिप स्किल्स के बल पर वो अत्यंत सफ़ल रहता है. यही अवसरवादी व्यापारी फ़िल्म के अंत में इसलिए रोता है कि वो केवल कुछ ही यहूदियों को बचा पाया. फ़िल्म एक ह्रदय परिवर्तन की सत्य-कथा है, जिसने फ़िल्म के नायक ऑस्कर को यहूदियों का मसीहा बन दिया.

विश्व विख्यात हॉलीवुड निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की इस ब्लैक एंड व्हाईट मूवी का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण सब-प्लाट कंसंट्रेशन कैंप में होने वाले अमानवीय कृत्य हैं. जो ‘वाच इट टू बिलीव इट’ की श्रेणी में आते हैं और उनके बारे में कुछ भी कहना ‘स्पॉइलर’ होगा.

ढ़ेरों ऑस्कर और अन्य वैश्विक पुरूस्कार प्राप्त करने वाली ये फ़िल्म बीसवीं सदी के अंतिम दशक की होने के बावजूद ‘श्वेत-श्याम’ है. केवल एक छोटी बच्ची को छोडकर, जिसने लाल रंग का फ्रॉक पहना है और जो निर्देशक के अनुसार ‘अवसरवाद से मानवता’ के सफ़र का सांकेतिक मूर्त रूप है.

स्पीलबर्ग खुद एक यहूदी हैं और इस फ़िल्म का निर्देशन वो पहले एक दूसरे प्रसिद्ध यहूदी निर्देशक रोमन पोलंस्की को देना चाहते थे. वही पोलंस्की जिन्होंने अंत में दी पियानिस्ट बनाई.

फ़िल्म वैश्विक स्तर पर ढ़ेरों आधिकारिक और अनौपचारिक लिस्ट्स में टॉप टेन में आती है और टाइमलेस मास्टरपीस है. यह सबसे अधिक कमाई करने वाली और सबसे महंगी श्वेत-श्याम फ़िल्म भी है. इसके विषय में कुछ भी अधिक कहना दरअसल सूरज को टॉर्च दिखाने सरीखा होगा.

केवल इस छोटी बच्ची को छोड़कर बाकी सारी फ़िल्म ब्लैक एंड वाइट है.
केवल इस छोटी बच्ची को छोड़कर बाकी सारी फ़िल्म ब्लैक एंड वाइट है.

मेमोरेबल कोट – तालमुड रब्बीनिक यहूदी धर्म का एक केंद्रीय मूलपाठ है, जिसकी एक लाइन इस फ़िल्म में प्रयोग की गयी है:
जो भी एक जीवन बचाता है, वह पूरी दुनिया को बचाता है.


# 2 – ल-वीता ऐ बेल्ला (ज़िन्दगी खूबसूरत है)

इटली | 1997 | 1:56 घंटे | रोमांस, रोमकॉम, फॅमिली, कॉमेडी | आई. एम. डी. बी. रेटिंग – 8.6

किसी अमानवीय घटना पर एक हास्य फ़िल्म बनाना न केवल मुश्किल है बल्कि साहसिक भी है. मुश्किल इसलिए कि या तो हास्य को साधने के चक्कर में हृदयस्पर्शी घटनाओं की इंटेंसिटी कमतर हो जायेंगी (जो कि अनैतिक होने के साथ साथ मूल विषय से भटकाव भी होगा) या वो फ़िल्म हास्य से इतर व्यंग की शैली में आ जाएगा या हास्य बुना ही न जा पायेगा, एक दो सीन को छोड़कर.

बोल्ड/साहसिक इसलिए कि यदि हास्य साध भी लिया जाय तो दर्शकों, फ़िल्म समीक्षकों और विभिन्न सेंसर कार्यालयों द्वारा फ़िल्म नकार दी जायेगी.

इटली की फ़िल्म ल वीता… (लाइफ इज़ ब्यूटीफुल) दोनों ही मानकों में फ्लाइंग-कलर्स के साथ खरी उतरती है. फ़िल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो एक प्रेमी और एक पिता के रूप में जीता है और अंततः (स्पॉइलर एलर्ट) एक नायक की तरह मरता है.

इसे देखते वक्त पिता-पुत्र के रिश्तों के ऊपर एक और मूवी जो ज़ेहन में आती है वो भी संयोग से इटली की है – ‘लाद्री दी बिचिकिलेता’ अर्थात साईकिल चोर.

फ़िल्म को तीन छोटे छोटे भागों में विभक्त किया जा सकता है – पहला: एक वेटर यहूदी कैसे अपनी उच्च-वर्गीय प्रेमिका को पाता है और उस दौरान क्या हास्यास्पद स्थितियां उत्पन्न होती हैं. दूसरा: यहूदियों के साथ कैम्प से बाहर हो रहा अमानवीय बर्ताव और इससे जनित हास्य. और तीसरा: कंसंट्रेशन कैंप और उसमें नायक द्वारा अपने पुत्र को बचाने के लिए की गयी जद्दोजहद. तब जबकि उसे अपने पुत्र को भी नहीं बताना कि क्या चल रहा है – इसलिए वो बच्चे को एक काल्पनिक खेल में शामिल करता है जिसमें जीतने वाले को एक ‘टैंक’ इनाम में दिया जाएगा.

कई जगह परिस्थिति जन्य हास्य हैं जैसे ऊपर से चाबी का गिरना या नायक और उसके मित्र की सोते समय की बातचीत, नायक का हमेशा नायिका के समक्ष एक आश्चर्य के रूप में प्रकट होना. नायिका को बारिश से बचाने के लिए नायक द्वारा की गयीं हास्यास्पद हरकतें, कंसंट्रेशन कैंप में अनुवादक का कार्य करना जबकि नायक को जर्मनी नहीं आती, कैंप में तरह-तरह से अपने बच्चे को बचाना आदि.

कई जगह बातों से भी हास्य उत्पन्न होता है जैसे, जब नायक गुइदो, अपने मालिक से उसका ‘राजनतिक दृष्टिकोण’ पूछता है, तो मालिक उत्तर देने की बजाय अपने दो बच्चों की ओर मुखातिब होकर उन्हें डांटकर कहता है,’बेनिटो(मुसोलिनी), एडॉल्फ! बैठ जाओ! क्षमा करना गुइदो, तुमने क्या पूछा?’

कहानी कहने का ढंग बिलकुल अलहदा और मर्मस्पर्शी है और फ़िल्म के अंत-अंत तक आपकी उदासी को मुखरित नहीं होने देता. ‘मुखरित नहीं होने देता’ से अभिप्राय ये है कि उदासी यहीं कहीं है मगर प्रत्यक्ष नहीं है, पिन्हाँ है. इसे, इस फ़िल्म को, स-परिवार देखा जाना चाहिए.

गुइदो एक पिता के रूप में जीता है और एक नायक की तरह मरता है.
गुइदो एक पिता के रूप में जीता है और एक नायक की तरह मरता है.

मेमोरेबल कोट – एक पहेली जो अन्यथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है:
यदि आप मेरा नाम लेते हैं, तो मैं गायब हो जाता हूं. मैं कौन हूँ? (उत्तर: मौन.)


# 1 – जजमेंट एट न्यूरमबर्ग (न्यूरमबर्ग का न्याय)

अमेरिका | 1961 | 3:06 घंटे | कोर्ट रूम ड्रामा, आफ्टरमैथ, हिस्ट्री | आई. एम. डी. बी. रेटिंग – 8.3

कई अन्य कारणों के अलावा ये फ़िल्म इस मायने में भी कुछ श्रेष्ठ फिल्मों में से एक हो जाती है कि एक हॉलीवुड फ़िल्म होने के बावज़ूद ये अमेरिका और द्वितीय विश्व युद्ध के एलाइड देशों से भी प्रश्न पूछने से नहीं हिचकिचाती. हम भारतीय जानते हैं कि ऐसा करना कितना मुश्किल होता है. हैश टैग अनुराग कश्यप.

यह युद्ध-अपराधियों के ऊपर एक कोर्ट रूम ड्रामा है जो आपको अंत तक अपनी सीट से बांधे रखता है. यानी एक कमर्शियल फ़िल्म के हिसाब से भी यह फ़िल्म उन्नीस नहीं है. ‘लॉ ऑव कर्मा’ (‘कर्म-फल’ शब्द से ज़्यादा कूल शब्द हो चुका है ये) अबकी नाज़ी ‘न्यायपालिका’ को कटघरे में खड़ा करता है. डिफेन्स लॉयर इस केस को बहुत ही अच्छे से लड़ता है. वो ऐसा कोई भी सिरा, कोई भी तथ्य नहीं छोड़ता जिससे आरोपी नाज़ी जज बरी हो सकें या उनकी सज़ा और उनका अपराध कम से कम करवाया जा सके. जबकि अपराधों की संख्या और अपराध की इंटेंसिटी इतनी है अपराधियों का इससे बचना नामुमकिन लगता है. और ऐसा होना पूरी मानवता के लिए दूसरा धक्का होगा. पहला – कंसंट्रेशन कैम्प, जिसकी कोर्ट में दिखाई गयी ओरिजिनल फुटेज डिफेन्स लॉयर को भी ग्लानी से भर देती है और वो कहता है,‘यदि ऐसा कुछ पेश किया गया तो मेरे लिए केस लड़ना असम्भव होगा.’

सवाल यही बाकी जाता है अंततः कि क्या युद्ध ग्रसित देश को ‘एवरीथिंग इज़ फेयर इन…’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए या एक न्यूनतम नैतिकता हर दशा में, हर देश में आवश्यक है? क्या ऊपर से आये ऑर्डर का, ह्यार्की का, निर्वहन करने पर भी दंड दिया जाना उचित है? क्या तटस्थ होना भी अपराध है?

इन सब के अलावा उधर अमेरिका के ऊपर भी दोहरा दबाव है कि एक तरफ आरोपियों को उनके कुकृत्य के लिए अधिक से अधिक सज़ा दें और दूसरी तरफ़ दो देशों में बंट चुके जर्मनी में, कोल्ड वॉर की दशा में, अपने लिए समर्थन और स्वीकार्यता जुटा सके.

इन्हीं सब द्वंदों के चलते और प्रश्नों के उत्तर ढूंढते हुए फ़िल्म अपनी परिणिति को प्राप्त होती है, लेकिन उस दौरान पूरे तीन घंटे से अधिक में आप एडिटिंग टीम को नहीं कोसते, क्यूंकि फ़िल्म लम्बी होने के बावजूद कसी हुई लगत है.

'जजमेंट एट न्यूरमबर्ग' एक कोर्ट रूम ड्रामा है जो आपको अंत तक अपनी सीट से बांधे रखता है.
‘जजमेंट एट न्यूरमबर्ग’ एक कोर्ट रूम ड्रामा है जो आपको अंत तक अपनी सीट से बांधे रखता है.

मेमोरेबल कोट – मूवी में एक नहीं कई बेहतरीन कोट्स हैं और लम्बे लम्बे मोनोलॉग, डायलॉग, लेकिन फ़िल्म में दंड को समराईज़ करता अंतिम डायलॉग:
नाज़ी जज: वे लोग… वे दसियों लाख लोग… मुझे सच में कभी नहीं पता था कि यह इस रूप में सामने आएगा.
अमेरिकी जज: जब तुमने पहली बार किसी निर्दोष को दंड दिया था तभी इसका इस रूप में आना सुनिश्चित हो गया था.


ये भी पढ़ें:

वरुण ने अमीर सांसदों से जो छोड़ने को कही है वो सैलरी आखिर है कितनी?

एमआरआई से एक आदमी की मौत के बावज़ूद आपको डरने की जरूरत क्यों नहीं है?

ड्रिंक-ड्राइव को मिक्स नहीं करते तो इंश्योरेंस-इन्वेस्टमेंट को क्यों मिक्स करते हो यार?

ये जो अजीब से नंबर आते हैं न टीवी स्क्रीन में, वो ऐंवेई नहीं हैं

इन 5 कुतर्कों के चलते आपसे लगातार हर बहस जीतते आ रहे हैं लोग

गे सेक्स को अप्राकृतिक कहने वालों को इन बंदरों के बारे में पढ़ लेना चाहिए

कैट में 20 लोगों के कैसे आ गए 100 पर्सेंटाइल, जबकि यह नामुमकिन है?


Video देखें:

क्या आपने लड़कों और लड़कियों की शर्ट में ये अंतर नोटिस किया है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

बाबा बने बॉबी देओल की नई सीरीज़ 'आश्रम' से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं!

आज ट्रेलर आया और कुछ लोग ट्रेलर पर भड़क गए हैं.

करोड़ों का चूना लगाने वाले हर्षद मेहता पर बनी सीरीज़ का टीज़र उतना ही धांसू है, जितने उसके कारनामे थे

कद्दावर डायरेक्टर हंसल मेहता बनायेंगे ये वेब सीरीज़, सो लोगों की उम्मीदें आसमानी हो गई हैं.

फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

विद्युत जामवाल की पिछली फिल्मों से अलग मगर एक कॉमर्शियल बॉलीवुड फिल्म.

फ़िल्म रिव्यू: गुंजन सक्सेना - द कारगिल गर्ल

जाह्नवी कपूर और पंकज त्रिपाठी अभिनीत ये नई हिंदी फ़िल्म कैसी है? जानिए.

फिल्म रिव्यू: शकुंतला देवी

'शकुंतला देवी' को बहुत फिल्मी बता सकते हैं लेकिन ये नहीं कह सकते इसे देखकर एंटरटेन नहीं हुए.

फ़िल्म रिव्यूः रात अकेली है

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे अभिनीत ये पुलिस इनवेस्टिगेशन ड्रामा आज स्ट्रीम हुई है.

फिल्म रिव्यू- यारा

'हासिल' और 'पान सिंह तोमर' वाले तिग्मांशु धूलिया की नई फिल्म 'यारा' ज़ी5 पर स्ट्रीम होनी शुरू हो चुकी है.

फिल्म रिव्यू- दिल बेचारा

सुशांत के लिए सबसे बड़ा ट्रिब्यूट ये होगा कि 'दिल बेचारा' को उनकी आखिरी फिल्म की तरह नहीं, एक आम फिल्म की तरह देखा जाए.

सैमसंग के नए-नवेले गैलेक्सी M01s और रियलमी नार्ज़ो 10A की टक्कर में कौन जीतेगा?

सैमसंग गैलेक्सी M01s 9,999 रुपए में लॉन्च हुआ है.

अनदेखी: वेब सीरीज़ रिव्यू

लंबे समय बाद आई कुछ उम्दा क्राइम थ्रिलर्स में से एक.