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थर्मामीटर 40 डिग्री पर महसूस होगा 48: हीट इंडेक्स क्या है जो आपके शहर को रहने लायक नहीं छोड़ रहा?

Heat Index Explained: अप्रैल के तीसरे हफ्ते में ही कई शहरों का 'फील्स लाइक' (Feels Like) टेम्परेचर 48 डिग्री को छू रहा है. क्या आपको भी तापमान से ज्यादा गर्मी महसूस हो रही है. आखिर ये 'हीट इंडेक्स' का क्या चक्कर है और क्यों ये सिर्फ पसीना नहीं, बल्कि आपकी सेहत का कबाड़ा कर रहा है?

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तापमान 40 होता है पर हमें 48 क्यों महसूस होता है?

थर्मामीटर कह रहा है 40 डिग्री टेंपरेचर, लेकिन शरीर को लग रहा है 48 डिग्री. आखिर ये 'हीट इंडेक्स' का क्या चक्कर है और क्यों ये सिर्फ पसीना नहीं, बल्कि आपकी सेहत का कबाड़ा कर रहा है. अप्रैल के तीसरे हफ्ते में ही सूरज ने अपनी आंखें ऐसी तरेरी हैं कि अभी से मई और जून का ख्याल आते ही पसीने छूट रहे हैं. 

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लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि मौसम विभाग जो तापमान बताता है, आपको गर्मी उससे कहीं ज्यादा महसूस होती है. जब आप मोबाइल पर मौसम चेक करते हैं तो वहां दो आंकड़े दिखते हैं. एक होता है 'एक्चुअल टेम्परेचर' और दूसरा होता है 'फील्स लाइक' यानी वो तापमान जो आपका शरीर वास्तव में झेल रहा है.

यही जो 8-10 डिग्री का फर्क है, वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (WMO) के मुताबिक इसे ही विज्ञान की भाषा में 'हीट इंडेक्स' कहा जाता है. ये कोई सामान्य मौसम की जानकारी नहीं है, बल्कि आपके और हमारे रहने लायक दुनिया का एक डरावना मीटर बन चुका है. भारत के कई शहरों में इस समय हालत ये है कि पारा तो 40 के आसपास है, लेकिन महसूस होने वाली गर्मी 48 डिग्री को पार कर रही है. ये वो स्थिति है जहां सिर्फ पंखा या कूलर काम करना बंद नहीं करता, बल्कि इंसान के शरीर का कूलिंग सिस्टम भी जवाब देने लगता है. 

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इस लेख में हम गहराई से समझेंगे कि ये हीट इंडेक्स आखिर बला क्या है और ये कैसे हमारे शहरों को रहने के अयोग्य बना रहा है.

हीट इंडेक्स: आसान भाषा में समझिये कि ये आपको क्यों झुलसा रहा है

साधारण शब्दों में कहें तो हीट इंडेक्स हवा के तापमान और उमस यानी आर्द्रता (Humidity) का एक घातक कॉम्बिनेशन है. जब हवा में नमी ज्यादा होती है, तो शरीर से पसीना सूखने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है. कुदरत ने हमारे शरीर को ठंडा रखने के लिए पसीने का इंतजाम किया है. पसीना जब त्वचा से उड़ता है, तो वो गर्मी खींच लेता है और हमें ठंडक महसूस होती है. लेकिन जब हवा में पहले से ही बहुत ज्यादा नमी हो, तो पसीना सूखता ही नहीं है. नतीजा ये होता है कि शरीर की गर्मी अंदर ही कैद हो जाती है.

यही वजह है कि दिल्ली की सूखी गर्मी के मुकाबले मुंबई या कोलकाता की उमस वाली गर्मी ज्यादा थकाऊ और जानलेवा लगती है. नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के हीट इंडेक्स चार्ट के मुताबिक जब हम कहते हैं कि तापमान 40 डिग्री है और ह्यूमिडिटी 70 प्रतिशत है, तो हीट इंडेक्स सीधे 50 डिग्री के ऊपर पहुंच जाता है. 

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ये वो पॉइंट है जिसे डॉक्टर 'डेंजर जोन' कहते हैं. इस स्थिति में शरीर का तापमान बैलेंस करना लगभग नामुमकिन होने लगता है और लू लगने या हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

वेट बल्ब टेम्परेचर: वो वैज्ञानिक पैमाना जिससे तय होगी आपकी जिंदगी

अब बात करते हैं उस टर्म की जिसे समझना आज के दौर में बहुत जरूरी हो गया है, वो है 'वेट बल्ब टेम्परेचर'. ये सिर्फ वैज्ञानिकों का खिलौना नहीं है, बल्कि ये वो लक्ष्मण रेखा है जो बताती है कि एक इंसान बिना किसी मशीन (AC/Cooler) के कितनी देर तक जिंदा रह सकता है. 

द लांसेट प्लेनेटरी हेल्थ जर्नल (The Lancet Planetary Health) के मुताबिक वेट बल्ब टेम्परेचर वो सबसे कम तापमान होता है जो पानी के वाष्पीकरण (Evaporation) के जरिए हासिल किया जा सकता है. अगर वेट बल्ब टेम्परेचर 35 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाए, तो स्वस्थ से स्वस्थ इंसान भी छह घंटे से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाएगा, चाहे वो छांव में ही क्यों न बैठा हो.

चिंता की बात ये है कि भारत के कई इलाकों में वेट बल्ब टेम्परेचर खतरनाक स्तर को छू रहा है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण जैसे-जैसे समुद्र का तापमान बढ़ रहा है, हवा में नमी की मात्रा बढ़ रही है. जानकारों का मानना है कि दक्षिण एशिया और खासकर भारत के मैदानी इलाके दुनिया के उन पहले क्षेत्रों में होंगे जहां वेट बल्ब टेम्परेचर इंसानी सहनशीलता की सीमा को पार कर जाएगा. ये हमारे शहरों के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है.

Heat wave
अप्रैल में ही गर्मी की भयंकर मार (फोटो- बिजनेस टुडे)

जब शरीर के अंग फेल होने लगते हैं: गर्मी का आंतरिक हमला

जब हीट इंडेक्स बढ़ता है, तो आपका शरीर किसी प्रेशर कुकर की तरह काम करने लगता है. जब बाहरी तापमान शरीर के इंटरनल टेम्परेचर (लगभग 37 डिग्री सेल्सियस) से ऊपर निकल जाता है और पसीना नहीं सूखता, तो शरीर के भीतर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती. इसका सबसे पहला असर दिमाग पर पड़ता है. आपको चक्कर आने लगते हैं, भ्रम होने लगता है और सोचने-समझने की शक्ति कम होने लगती है. इसे 'हीट एग्जॉशन' कहते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हीट एंड हेल्थ गाइडलाइन्स के मुताबिक अगर समय रहते शरीर को ठंडा न किया जाए, तो ये स्थिति 'हीट स्ट्रोक' में बदल जाती है. इसमें शरीर का तापमान 104 डिग्री फारेनहाइट के पार चला जाता है. इस लेवल पर पहुंचते ही शरीर के प्रोटीन पिघलने लगते हैं, जैसे अंडे को उबालने पर उसका लिक्विड ठोस बन जाता है. किडनी काम करना बंद कर देती है क्योंकि उसे खून फिल्टर करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलता. दिल पर दबाव इतना बढ़ जाता है कि हार्ट फेलियर की नौबत आ जाती है. ये कोई मामूली बुखार नहीं है, ये अंगों का मल्टी-ऑर्गन फेलियर की तरफ बढ़ना है.

क्या आपके शहर कंक्रीट के तवे बन चुके हैं? 'अर्बन हीट आइलैंड' का असर

भारत के महानगरों में रहने वाले लोग सिर्फ कुदरती गर्मी नहीं झेल रहे, बल्कि वो 'अर्बन हीट आइलैंड' (Urban Heat Island) के शिकार हैं. शहरों में पेड़ कम हैं और कंक्रीट के जंगल ज्यादा. सड़कें डामर की बनी हैं और इमारतें शीशे और सीमेंट की. ये चीजें दिन भर सूरज की गर्मी को सोखती हैं और रात में उसे वापस छोड़ती हैं. यही कारण है कि शहरों में रातें भी अब उतनी ठंडी नहीं रहीं जितनी पहले हुआ करती थीं.

एक तरफ पेड़ों की कमी है और दूसरी तरफ लाखों एयर कंडीशनर (AC) से निकलने वाली गर्म हवा. आप अपने कमरे को ठंडा करने के लिए जो AC चलाते हैं, वो बाहर की हवा को और ज्यादा गर्म कर देता है. 

नीति आयोग (NITI Aayog) की अर्बन प्लानिंग और क्लाइमेट रेजिलिएंस रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरों का तापमान 3 से 5 डिग्री तक ज्यादा हो सकता है. ये एक्स्ट्रा गर्मी जब हीट इंडेक्स के साथ मिलती है, तो मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास के लिए जीना मुहाल कर देती है जो 24 घंटे AC में नहीं रह सकते.

इकोनॉमी पर गर्मी की मार: भारत के विकास का पहिया सुस्त हो रहा है

गर्मी सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, ये सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा रही है. भारत की एक बड़ी आबादी कंस्ट्रक्शन, खेती और डिलीवरी जैसे कामों में लगी है जो सीधे धूप में होते हैं. जब हीट इंडेक्स बढ़ता है, तो काम करने की क्षमता यानी 'लेबर प्रोडक्टिविटी' गिर जाती है. लोग जल्दी थक जाते हैं और बीमार पड़ते हैं. 

वर्ल्ड बैंक की 'क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट ऑपर्च्युनिटीज इन इंडियाज कूलिंग सेक्टर' रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत गर्मी के कारण अपनी कुल कार्यक्षमता का 5 प्रतिशत खो सकता है, जो करोड़ों नौकरियों और अरबों डॉलर के नुकसान के बराबर है.

इसके अलावा, बिजली की डिमांड में भारी उछाल आता है. जब हर घर में कूलर और AC चलेंगे, तो ग्रिड पर लोड बढ़ेगा. इससे पावर कट की समस्या पैदा होती है, जो फिर से प्रोडक्शन को प्रभावित करती है. खेती में भी इसका बुरा असर दिखता है. अचानक बढ़ने वाली गर्मी फसलों को सुखा देती है, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते हैं और महंगाई का बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ता है. 

सरकार की तैयारी और 'हीट एक्शन प्लान' की हकीकत

भारत सरकार और राज्य सरकारों ने अब गर्मी को एक प्राकृतिक आपदा के रूप में देखना शुरू कर दिया है. नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) गाइडलाइन्स के अनुसार कई शहरों ने 'हीट एक्शन प्लान' (Heat Action Plan) लागू किए हैं. इसमें चेतावनी सिस्टम, सार्वजनिक जगहों पर पीने के पानी की व्यवस्था और अस्पतालों में विशेष हीट वार्ड बनाना शामिल है. लेकिन क्या ये काफी है. आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हीट एक्शन प्लान अभी भी कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम प्रभावी हैं.

ज्यादातर शहरों में छायादार जगहों की कमी है. बस स्टॉप्स और मार्केट में लोगों के लिए गर्मी से बचने के इंतजाम नहीं हैं. अर्बन प्लानिंग में 'ग्रीन कवर' बढ़ाने की बात तो होती है, लेकिन हकीकत में हर साल हजारों पेड़ विकास के नाम पर काट दिए जाते हैं. नीति निर्माताओं को ये समझना होगा कि गर्मी से लड़ना सिर्फ AC बांटना नहीं है, बल्कि शहरों को फिर से सांस लेने लायक बनाना है. इसके लिए वॉटर बॉडीज का पुनरुद्धार और सस्टेनेबल आर्किटेक्चर को बढ़ावा देना जरूरी है.

मिडिल क्लास का संकट: महंगाई और बिजली बिल का दोहरा बोझ

एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बढ़ती गर्मी का मतलब है बजट का बिगड़ना. जब हीट इंडेक्स 45 के पार जाता है, तो कूलर काम करना बंद कर देते हैं क्योंकि वो हवा की नमी को और बढ़ा देते हैं. मजबूरन लोगों को AC की तरफ शिफ्ट होना पड़ता है. एक औसत परिवार के लिए बिजली का बिल गर्मियों में तीन से चार गुना तक बढ़ जाता है. साथ ही, फ्रिज और AC की मेंटेनेंस का खर्चा अलग.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) और कंज्यूमर स्पेंडिंग डेटा के मुताबिक गर्मी के कारण होने वाली बीमारियां मेडिकल खर्च को बढ़ा देती हैं. पानी की कमी के कारण बाहर से पानी के टैंकर मंगवाने पड़ते हैं. ये सब मिलकर एक आम आदमी की बचत को खत्म कर देते हैं. जो पैसा बच्चों की पढ़ाई या भविष्य के लिए बचना चाहिए था, वो सिर्फ 'सर्वाइवल' यानी जिंदा रहने की जद्दोजहद में खर्च हो रहा है. ये एक ऐसा साइलेंट आर्थिक संकट है जिस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती. 

क्या कहता है भविष्य: क्या हम एक 'बिना रहने लायक' दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं?

वैज्ञानिक चेतावनियां डराने वाली हैं. IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) की छठी असेसमेंट रिपोर्ट के मुताबिक अगर कार्बन उत्सर्जन इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो इस सदी के अंत तक भारत के कई हिस्से साल के कई महीनों तक 'अनइनहेबिटेबल' यानी रहने लायक नहीं बचेंगे. 

हीटवेव की फ्रीक्वेंसी और तीव्रता दोनों बढ़ रही है. जो गर्मी पहले 10 साल में एक बार पड़ती थी, वो अब हर साल या हर दूसरे साल पड़ रही है. भविष्य में हमारे पास सिर्फ दो ही रास्ते होंगे: या तो हम अपनी जीवनशैली और शहरों की बनावट बदलें, या फिर एक बड़े माइग्रेशन यानी पलायन के लिए तैयार रहें.

आने वाले समय में 'क्लाइमेट रिफ्यूजी' शब्द भारत के भीतर भी आम हो सकता है. लोग अत्यधिक गर्म इलाकों को छोड़कर ठंडे या कम नमी वाले इलाकों की ओर भागेंगे. ये सामाजिक असंतुलन पैदा करेगा और संसाधनों पर दबाव बढ़ाएगा. अभी हमारे पास वक्त है कि हम रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ तेजी से मुड़ें और अपने शहरों में हरियाली को वापस लाएं.

प्रैक्टिकल सॉल्यूशन: आप खुद को और अपने परिवार को कैसे बचाएं?

जब सिस्टम अपनी रफ्तार से काम करेगा, तब तक आपको खुद का बचाव करना होगा. सबसे पहली बात, हीट इंडेक्स पर नजर रखें. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की एडवाइजरी के मुताबिक अगर नमी ज्यादा है, तो सिर्फ पानी पीना काफी नहीं है. पानी के साथ इलेक्ट्रोलाइट्स या नमक-चीनी का घोल (ORS) जरूर लें ताकि शरीर के मिनरल्स बने रहें. 

दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहर निकलने से बचें. अगर निकलना जरूरी हो, तो सूती और ढीले कपड़े पहनें जो पसीना सोख सकें और हवा को शरीर तक पहुंचने दें. घर को ठंडा रखने के लिए खिड़कियों पर खस के पर्दे या गहरे रंग के पर्दे लगाएं. अगर हो सके तो छतों पर सफेद रिफ्लेक्टिव पेंट करवाएं, जिसे 'कूल रूफ' तकनीक कहते हैं. इससे घर का तापमान 2-3 डिग्री तक कम हो सकता है. 

डाइट में तरबूज, खीरा और छाछ जैसी चीजें शामिल करें. सबसे जरूरी बात, अगर किसी को चक्कर आए या तेज सिरदर्द हो, तो उसे तुरंत ठंडी जगह पर ले जाएं और डॉक्टर से संपर्क करें. इसे मामूली थकान समझकर नजरअंदाज करना जानलेवा हो सकता है.

रसोई का 'टॉर्चर चेंबर': महिलाओं पर गर्मी की दोहरी मार

हीट इंडेक्स के इस पूरे खेल में एक ऐसा वर्ग है जिसकी चर्चा एयर कंडीशनर कमरों में बैठे विशेषज्ञ अक्सर भूल जाते हैं, वो है घर की महिलाएं. भारत के करोड़ों घरों में किचन आज भी ऐसे बने हैं जहां वेंटिलेशन की भारी कमी है. जब बाहर उमस यानी ह्यूमिडिटी 70 प्रतिशत पार होती है और तापमान 40 डिग्री होता है, तो रसोई के भीतर का 'फील्स लाइक' टेम्परेचर 55 डिग्री के पार पहुंच जाता है. चूल्हे से निकलने वाली गर्मी और हवा में मौजूद नमी मिलकर एक जानलेवा भाप बनाती है.

मध्यमवर्गीय घरों में महिलाएं घंटों इस वातावरण में बिताती हैं. शरीर से पसीना सूखता नहीं और लगातार हीट के संपर्क में रहने से उन्हें सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और लो-ब्लड प्रेशर की शिकायत रहती है. इसे 'साइलेंट हीट टॉर्चर' कहना गलत नहीं होगा. 

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑक्यूपेशनल हेल्थ (NIOH) की जेंडर और हीट स्ट्रेस पर स्टडी के मुताबिक जब तक हम अपनी रसोई के डिजाइन और घर के भीतर के जेंडर-आधारित श्रम विभाजन को नहीं बदलते, तब तक गर्मी का ये डरावना सच आधी आबादी को बीमार बनाता रहेगा.

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नींद की चोरी और मानसिक सेहत: गर्मी जब दिमाग चढ़ने लगे

गर्मी सिर्फ पसीना नहीं निकालती, ये आपकी नींद भी चुरा रही है. विज्ञान कहता है कि गहरी नींद के लिए शरीर का तापमान कम होना जरूरी है. लेकिन हीट इंडेक्स बढ़ने के कारण रातें भी अब उतनी ठंडी नहीं रहीं. जब शरीर को रात में 'रिकवरी' का समय नहीं मिलता, तो इसका सीधा असर मानसिक सेहत पर पड़ता है. अधूरी नींद और लगातार बढ़ती गर्मी के कारण लोगों में 'रोड रेज' और छोटी-छोटी बातों पर झगड़े बढ़ रहे हैं.

लैंसेट (The Lancet) की 'हीट एंड मेंटल हेल्थ' रिपोर्ट बताती है कि जैसे-जैसे पारा चढ़ता है, अस्पतालों में डिप्रेशन और एंग्जायटी के मरीजों की संख्या में भी उछाल आता है. इसे 'क्लाइमेट एंग्जायटी' भी कहा जा रहा है. यानी आप सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं थक रहे, बल्कि उमस भरी गर्मी आपके दिमाग को भी 'फ्राई' कर रही है. अगर आप खुद को ज्यादा गुस्से में पा रहे हैं, तो समझ जाइये कि ये सिर्फ आपका स्वभाव नहीं, बल्कि बाहर का बढ़ता हीट इंडेक्स है जो आपके न्यूरोन्स को परेशान कर रहा है.

सुविधा बनाम संघर्ष: डिलीवरी पार्टनर्स और गिग इकोनॉमी का सच

हम अपने घर में बैठकर एक ऐप के जरिए ठंडा जूस या खाना ऑर्डर करते हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि 48 डिग्री वाले 'फील्स लाइक' टेम्परेचर में उस पार्सल को लाने वाला डिलीवरी बॉय किस हाल में है. भारत की बढ़ती गिग इकोनॉमी उन लाखों नौजवानों के कंधे पर टिकी है जो तपती सड़कों पर 10-10 घंटे बाइक चलाते हैं. उनके पास न तो कहीं छांव में बैठने का अधिकार है और न ही ज्यादातर कंपनियों ने उन्हें कोई 'हीट इंश्योरेंस' दिया है.

ये एक बड़ा सामाजिक और नैतिक सवाल है. क्या हमारी सुविधा किसी की जान से कीमती है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) की वर्किंग कंडीशंस रिपोर्ट के अनुसार कई शहरों में अब डिलीवरी पार्टनर्स के बीच डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक की घटनाएं आम हो गई हैं. सरकारों और कंपनियों को मिलकर ऐसी पॉलिसी बनानी होगी कि जब हीट इंडेक्स एक खतरनाक लेवल को पार करे, तो इन आउटडोर वर्कर्स के लिए काम के घंटे बदले जाएं या उन्हें अनिवार्य 'हाइड्रेशन ब्रेक' दिया जाए.

बेजुबानों का मौन संकट: जब आसमान से गिरने लगते हैं पक्षी

इंसान तो फिर भी अपनी तकलीफ बोलकर बता सकता है, लेकिन इस हीट इंडेक्स की सबसे ज्यादा मार हमारे आसपास के बेजुबानों पर पड़ रही है. शहरों में कंक्रीट के विस्तार और जलाशयों के खत्म होने से आवारा कुत्तों, बिल्लियों और पक्षियों के लिए पानी का कोई जरिया नहीं बचा है. 

वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर की वार्षिक रिपोर्ट की मानें तो गर्मी के दिनों में पक्षियों का उड़ते-उड़ते बेहोश होकर गिरना अब आम बात हो गई है. उनके छोटे से शरीर के लिए हवा की नमी और गर्मी का ये मेल बर्दाश्त से बाहर होता है.

एक समाज के तौर पर हम कितने संवेदनशील हैं, इसका पता इसी बात से चलता है कि हम अपने आसपास के इन जीवों के लिए क्या कर रहे हैं. सिर्फ अपने घर की छतों या बालकनी में पानी का एक कटोरा रखना भी हजारों बेजुबानों की जान बचा सकता है. ये प्रकृति का चक्र है, अगर वो नहीं बचेंगे, तो अंततः इंसान का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा.

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क्या हम सिर्फ सहते रहेंगे या कुछ करेंगे?

हीट इंडेक्स का बढ़ना सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि ये हमारे पर्यावरण के साथ किए गए खिलवाड़ का नतीजा है. हम जिस तरह से बिजली खर्च कर रहे हैं, गाड़ियां चला रहे हैं और पेड़ काट रहे हैं, उसका ब्याज अब हमें गर्मी के रूप में चुकाना पड़ रहा है. ये एक सामूहिक संकट है और इसका समाधान भी सामूहिक ही होगा.

सरकारों को बड़े फैसले लेने होंगे, लेकिन एक नागरिक के तौर पर हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. कम से कम बिजली की खपत, पानी का संचयन और अपने आसपास पौधे लगाना, ये वो छोटे कदम हैं जो हम आज उठा सकते हैं. अगर हमने आज इस 'डरावने सच' को स्वीकार नहीं किया और बदलाव नहीं किया, तो शायद हमारे पास आने वाली पीढ़ियों को देने के लिए सिर्फ एक जलती हुई धरती ही बचेगी.

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