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अपने जमाने के पहले ह्यूमर किंग थे गोनू झा

हाजिरजवाबी और चतुराई ऐसी कि बिहार और पूर्वांचल में डंका बजा दिया.

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फोटो - thelallantop
अरे गोनू झा को जानते हो कि नहीं? नहियो जानते हो तो कौनो बात नहीं. हम बता देते हैं. आज जब कॉमेडी की बात होती है तो जनता फटाक से कपिल शर्मा का नाम लेने लगती है, लेकिन आपको पता है कि बिहार में एक गोनू झा हुए थे, जिनके ह्यूमर का डंका पूरे बिहार और पूर्वांचल में बजता था. उनकी कहानियां बहुतै मजेदार होती थीं. वो बिहार के मिथिलांचल के रहने वाले थे. वहीं दरभंगा का फेमस गांव है न, भरवारा. ऊ गांव गोनुए झा का न है जी. गोनू झा की चालाकी के किस्से तो मिथिलांचल क्या, अगल-बगल के एरिया में भी सौ साल से प्रचलित हैं. गोनू झा कौनो इस्कूल-कालिज के पढ़े नहीं थे. ऊ तो मिथिला के एगो सीधा-सादा किसान थे, लेकिन हाजिरजवाबी और चतुराई में बड़के विद्वानों को धूल फंका देते थे. उनके यही टैलेंट देखकर मिथिला के राजा ने उनको अपने दरबार में नौकरी दे दी. उनके किस्से इत्ते फेमस हैं कि वहां के लोगों को मुंह-जुबानी याद हैं. मिथिला नरेश के दरबारी गोनू झा का जलवा बिल्कुल वैसा ही था, जैसा अकबर के दरबार में बीरबल का. तो आओ, पढ़ाते हैं आपको उनकी कुछ जबराट कहानियां...

'गोनू झा मरे! गांव को पढ़े!!'

ये कहानी गोनू झा के गांव की है. उनके गांव में भी बहुत बड़े वाले रहिते थे. कई लोग उनकी चालाकी से जलते थे, मगर मुंह पर उनके 'पंखे' बने फिरते थे. गोनू की छट्ठी बुद्धि को शक था कि ई लोगों के प्यार में कुछ झूठ छिपा है. ऊ बहुत दिन से गांव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का पिलान बना रहे थे. अगर बात सिर्फ गांववालों की होती, तो गोनू अपनी जुगाड़ टेक्नॉल्जी से उन्हें तुरंत फिट कर देते. मगर उन्हें तो अपने घरवालों की बातों में भी मिलावट की बास आती थी. तो उन्होंने सोचा कि क्यों न सबको एक बरी चेक किया जाए.
बहुत सोच-विचार के गोनू एक दिन सुबह उठबै नहीं किए. सूरज चढ़ गया छप्पर पर, मगर गोनू झा बिछौना नहीं छोड़े. ओझाइन को जरा अंदेशा हुआ. गईं. जगाया तो ई का... आहि रे दैय्या... रे बाप रे बाप...!!! झा जी के मुंह से तो गाज-पोटा निकला हुआ था और बेचारे बिछौना से नीचे एगो कोना में लुढ़के पड़े थे. ओझाइन तो लगीं कलेजा पीटकर वहीं चिल्लाने. बेटा भी मां की आवाज सुन कर बाबू के कमरे में आया. नजारा देखकर ऊका कलेजा भी दहल गया. उहो लगा फफक-फफक कर रोये.
इधर ओझाइन कलेजा पर दुहत्थी मार-मारकर चिंघाड़ रही थीं, उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई ले ले, बस हमरे बाबूजी को लौटा दे. ई महादुखद खबर सुनकर गोनू से उनके मरने पर अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया भी पहूंच गए. गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी. लगे दुन्नो जने झा जी के बेटा को समझाए. "आ..हा...हा...! बड़े परतापी आदमी थे. पूरे जवार में कोई जोर नहीं. अब विध का यही विधान था.'
उधर जिंदगीभर झा जी का चिलमची रहा अकलू हज्जाम औरत महाल में ज्ञान बांट रहा था. 'करनी देखो मरनी बेला! देखा... गोनू झा जैसे उमिर भर सबको बुड़बक बनाते रहे, वैसा ही चट-पट में अपना प्राण भी गया. सारा भोग बांकिए रह गया.' सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, 'झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे. सीधे सरग गए हैं. अब इनके पीछे रोने-पीटने का कौनो काम नहीं है. कुछ रुपैय्या-पैसा रखे हैं तो गोदान करा दीजिये. बैकुंठ मिलेगा.'
उधर मुखिया जी गोनू के बेटे को बोले, 'जल्दी करो भाई, घर में लाश ज्यादे देर तक नहीं रहना चाहिए. ऊपर से मौसम भी खराब है. प्रभुआ और सीताराम को तुम्हरे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने. जल्दी से ले के चलो.' फिर दो आदमी झा जी को पकड़कर कमरे से बाहर निकालने लगे, लेकिन गोनू झा की कद-काठी जितनी बड़ी थी, उनके घर का दरवाजा उतना ही छोटा था. अपना जिनगी में तो झा जी झुककर निकल जाते थे, लेकिन अभी लोग बाहर करिए नहीं पा रहे थे. तभी मोहन बाबू कड़ककर बोले, 'अरे सुरजा बढ़ई को बुलाओ. दरवाजा काट देगा.'
सूरज तुरंत औजार-पाती लेकर हाजिर भी हो गया. तभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, 'रुको हो सूरज भाई! बाबू जी तो अब रहे नहीं. ऊ बड़ा शौक से ई दरवाजा बनवाये रहे. ई का काटे से ऊ की आत्मा को भी तकलीफ होगा. अब तो ऊ दिवंगत होय गए. शरीर तो उनका रहा नहीं. सो उनका पैर बीच से काटकर छोटा कर देयो. फिर आराम से निकल जाएंगे.'
'हूं' करके सूरज बढ़ई जैसे ही झा जी के घुटना पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठकर बैठ गए और बोले, 'रुको! अभी हम मरे नहीं हैं. ऊ तो हम तुम सब लोगों का परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरे के बाद भी.' अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हज्जाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा... सब का मुंह बसिया जलेबी की तरह लटक गया. आखिर सबकी कलई जो खुल गई थी. गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए, लेकिन तभी से ई कहावत बन गया कि 'गोनू झा मरे! गांव को पढ़े!!' मतलब बुरे वक्त में ही हित और अहित की पहचान होती है.

गोनू झा की बिल्ली वाली कहानी

एक बार मिथिला राजा ने अपने दरबारियों की बुद्धि की परीक्षा लेने की सोची. राजा ने सभी को कहा एक-एक बिल्ली देता हूं. बिल्ली को दुध पिलाने के लिए एक भैंस भी देता हूं. इन दोनों को आप अपने घर ले जाइए और बिल्ली को खूब खिलाइए-पिलाइए. एक साल बाद जिसकी बिल्ली सबसे मोटी होगी, उसे इनाम दिया जाएगा. सभी दरबारी भैंस और बिल्ली लेकर अपने घर आ गए. बिल्ली को खूब खिलाने-पिलाने लगे. गोनू झा भैंस को खूब खिलाते थे और भैंस भी खूब दूध देती थी, पर सारा दूध बिल्ली पी जाती थी. गोनू झा को ये बात अखरने लगी. सोचे कि भैंस को इतनी मेहनत से खिलाते हैं और सारा दूध बिल्ली पी जाती है. लेकिन, बिल्ली को दूध नहीं पिलाया तो बिल्ली पतली हो जाएगी. राजा उन्हें दंड देंगे. सोचे कि कुछ ऐसा उपाय करते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.
गोनू के दिमाग में एक उपाय आया. उन्होंने एक कटोरे में उबला दूध रखा और बिल्ली को बुलाया. बिल्ली ने जैसे ही कटोरे से मुंह लगाया, उसका मुंह जल गया और वो वहां से फटाक से भाग निकली. ये सिलसिला तीन-चार दिनों तक चला. अब बिल्ली का ये हाल हो गया कि कटोरा देखकर ही भाग जाती थी.
इसी तरह एक साल बीत गया. राजा ने अपने सभी दरबारियों को बुलवाया. सबकी बिल्ली मंगवाई गई. सबकी बिल्लियां मोटी-ताजी थीं, लेकिन गोनू झा की बिल्ली दुबली-पतली थी. राजा ने गोनू झा से इसका कारण पूछा. वो बोले, 'महाराज, इसमें मेरा कोई दोष नहीं है. मेरा तो भाग्य ही खोटा है. मेरी बिल्ली तो दूध पीती ही नहीं.' राजा भौंचक्के रह गए ये सुनकर कि बिल्ली दूध नहीं पीती है. राजा ने कहा कि आप मुझे ठग रहे हैं. गोनू झा ने तपाक से कहा, 'महाराज, आप चाहें तो जांच कर सकते हैं.' तुरंत एक कटोरा दूध लाया गया. दूध देखते ही बिल्ली भाग गई. कई बार लोगों ने कोशिश की पर बिल्ली नहीं मानी. फिर एक थाली भात लाया गया तो बिल्ली ने भात झट से खा लिया. राजा गोनू की चालाकी समझ गए. बोले, 'मैं समझ गया कि गोनू झा बुद्धि के तेज हैं और इन्होंने बिल्ली के साथ कुछ करामात किया है.' राजा ने गोनू झा से कहा 'आप अपनी परीक्षा में सफल हुए, लेकिन दरबार ये जानना चाहता है कि आपने ऐसा क्या किया और क्यों किया, जिससे बिल्ली दूध देखते ही भागने लगती है.' गोनू झा ने सारी बात राजा को बता दी. राजा गोनू झा की बुद्धि के कायल हो गए. उनको दान विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया. सारे दरबारी उनकी तारीफ करने लगे. तो ऐसे थे गोनू था, जिनका दिमाग आईफोन से भी तेज चलता था. आज इन्टरनेट के जमाने में लोग ह्यूमर कैश करा रहे हैं. कोई टीवी शो के जरिए तो कोई यूट्यूब के जरिए. बीबी की वाइन से नजरबट्टू तक देख लो. मल्लब ह्यूमर है, तो सब कुछ है. लेकिन एक थे गोनू झा, जिनके ह्यूमर पर ही कहानियां बन्ने लगीं. का समझे? ह्यूमर दौड़ाओगे तो बहुतै आगे जाओगे. गोनू झा बन जाओगे.

ये स्टोरी द लल्लनटॉप से जुड़े आदित्य प्रकाश ने की है


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