दिन-ब-दिन, रोज-ब-रोज हम अटक जाते थे, न सांस लेते थे, न हिलते थे यूं खामोश और ठहरे हुए, जैसे कोई ताजा रंगा जहाज खड़ा हो और उसके नीचे की सतह पर समंदर का हरा रंग ताजा-ताजा बिखरा होसमंदर के नीचे एक पनडुब्बी. पनडुब्बी में 23 लाशें. 100 साल पुरानी. फर्स्ट वर्ल्ड वॉर की. ये दौर था पनडुब्बियों का. समंदर की लड़ाई का. उसमें ठूंसे जाने वाले जहाजियों और सैनिकों की बड़ी लंबी दास्तां है. इतिहास है. रोमांच भी है. दर्द भी है. सबक भी है.
अंग्रेजी के कवि सैम्युअल टेलर कोलरिज. उन्होंने एक लंबी उदास कविता लिखी. 1797–98 में. द राइम ऑफ ऐन्सियेंट मरिनर. एक नाविक बहुत लंबे सफर से वापस लौटता है. रास्ते में उसे एक शख्स मिलता है. नाविक उसे रोककर अपनी कहानी सुनाता है. कविता की शक्ल में. सैम्युअल ने अंग्रेजी में लिखी थी ये कविता. हमने उनकी 4 पंक्तियों को ऊपर अपनी जुबां में समझाने की कोशिश की है. जिस इतिहास की बात हम करने जा रहे हैं, उसे जानने के लिए इस उदासी को समझना जरूरी है.

तस्वीर में जो दिख रहा है, वो जर्मनी की उसी पनडुब्बी का हिस्सा है, जो बेल्जियम में मिला है...
समंदर में मिले इतिहास के इस टुकड़े से आया पनडुब्बियों का जिक्र बेल्जियम के समुद्री तट के पास एक खजाना मिला है. पहले विश्व युद्ध के समय का. जर्मनी की एक पनडुब्बी. नॉर्थ सी की तलहटी पर शांत पड़ी हुई. करीब 27 मीटर गहराई में. उसके अंदर 23 लाशें भी हैं. सारे नाविक. जहाजी. सैनिक होने की संभावना ज्यादा है. पनडुब्बी डूबी और साथ ही वो भी डूब गए. डूबे थे या डुबाए गए थे? कई कारण हो सकते हैं. समंदर में बिछी बारूदी सुरंगें. ब्रिटेन का कोई जंगी जहाज. या फिर कोई ब्रिटिश विमान. ये नॉर्थ सी कोई मामूली जगह नहीं है.

1917 की इस तस्वीर में जर्मन पनडुब्बी के हमले के बाद डूबते जहाज से बचकर भागते लोग. ऊपर रस्सी से लटकता शख्स नाव तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है. (क्रेडिट: US आर्मी)
एक दशक पहले इन पनडुब्बियों से लड़ी गई थी सबसे खतरनाक समुद्री लड़ाई 100 साल पहले यहां दुनिया की सबसे खतरनाक जंग लड़ी जा रही थी. एक वक्त लगा था जर्मनी बाजी मार लेगा. लेकिन फिनिशिंग लाइन पर पहुंचने से कुछ पहले जर्मनी का सितारा डूब गया. ये पनडुब्बी इतिहास के सबसे खतरनाक दौर की गवाह है. ऐसे दौर में समंदर में कोई नियम नहीं था. जैसे जंगल का कोई कानून नहीं होता. मारना ही मकसद था. क्या सैनिक, क्या नागरिक, जो दिखे मार दो.

नॉर्थ सी में बिछाई गई एक बारूदी सुरंग को बाहर निकालते लोग. ये 29 अक्टूबर, 1918 की तस्वीर है (फोटो: US नैशनल आर्काइव्ज)
पहले विश्व युद्ध में पनडुब्बियों की पौ-बारह थी जर्मनी और ब्रिटेन के बीच नौसेना में आगे निकलने की होड़ थी. 20वीं शताब्दी की शुरुआत से ही. इस औपनिवेशिक दौर में अर्थव्यवस्था की तरक्की का रास्ता थे समुद्र. जिसका जितना हिस्सा, उसका उतना फायदा. जर्मनी की तरक्की ब्रिटेन की राह का रोड़ा थी. वही ब्रिटेन, जिसके साम्राज्य का सूरज कभी डूबता नहीं था. पहले वर्ल्ड वॉर में ब्रिटेन के शामिल होने का ये बड़ा कारण था. 1914 से 1918 तक चला था विश्व युद्ध. इन चार सालों में कई नए हथियार बने. जवाबी हथियार बने. एक से एक तोपें बनीं. जहाज बने. और बनीं पनडुब्बियां. सबमरीन. इससे ज्यादा खौफनाक शब्द और कोई नहीं था तब. समंदर में एकाएक धप्पा बोलकर हमला कर देती थीं पनडुब्बियां. घात लगाकर हमला करती थीं. संभलने का मौका भी नहीं देती थीं. जर्मनी में इनको यू-बोट कहते थे. जर्मन नौसेना सबसे मारक थी. कुल 5,000 जहाजों को डुबा दिया था.

ब्रिटेन का ए-क्लास सबमरीन HMS A5 (फोटो: लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस)
पहला विश्व युद्ध: शुरुआत में अलग थी स्थिति शुरू-शुरू में पनडुब्बियों का रोल सीमित था. बड़े जंगी जहाज दूर समंदर में लड़ने-भिड़ने जाते. सबमरीन्स को मिलता सपोर्टिंग रोल. अपने-अपने तट की हिफाजत में तैनात. शुरुआत में ज्यादातर के अंदर डीजल इंजन था. बल्कि उससे भी पहले जर्मनी तो गैसोलीन वाली पनडुब्बियां लाया था. पनडुब्बियों का इतने बड़े स्तर पर इस्तेमाल पहले वर्ल्ड वॉर में ही शुरू हुआ था. इनकी रफ्तार बड़ी धीमी थी. पानी के भीतर इनका दम भी घुटता था. थोड़ी-थोड़ी देर में गलफड़ों से पानी निकालने सतह पर आना पड़ता था. बाकी देशों के मुकाबले जर्मनी के यू-बोट बेहतर थे. हां, पनडुब्बी से निकलने वाला बारूदी गोला यानी टॉरपिडो उतना सधा नहीं था. फिर टेक्नॉलजी का जादू दिखने लगा. बेहतर पनडुब्बियां बनने लगीं.

ब्रिटिश रॉयल नेवी दुश्मन के जहाज पर हमला करते हुए. ये 1917 की तस्वीर है (फोटो: Bibliotheque nationale de France)
जर्मनी ने खूब पैर पसारे, नॉर्थ सी में शुरू हुई आजमाइश ब्रिटेन की नेवी बड़ी थी. जर्मनी की छोटी, लेकिन मारक थी. उसने सोचा नॉर्थ सी चला जाए. वहां जाएंगे और खुलकर खेलेंगे. उसने अपनी पनडुब्बियां वहां भेजनी शुरू की. दांव ठीक लग गया. ब्रिटेन के कई जहाजों को डुबा दिया. ब्रिटेन के जंगी जहाज बड़े महंगे थे. उसे जर्मनी की पनडुब्बियां छका रही थीं. ब्रिटेन डर गया. कि ये तो महंगा पड़ रहा है. फिर ब्रिटेन ने अपने बड़े-बड़े जंगी जहाजों को दूर भेजना बंद कर दिया. ब्रिटेन ने छोटे-छोटे जहाजों को निकाला और जर्मनी को घेरने लगा. अब जर्मनी में भुखमरी की नौबत आ गई. ब्रिटिश जहाज राशन भी नहीं आने दे रहे थे. तिलमिलाये जर्मनी ने फिर किया पलटवार. ये पलटवार आधुनिक युद्धनीति का एक अहम पड़ाव माना जाता है.

जहाजों पर सवार होकर जा रहा रसद और युद्ध का सामान (फोटो: स्टेट लाइब्रेरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स)
बेलगाम हो गया जर्मनी, ये ही थी उसकी रणनीति 1915 की शुरुआत में जर्मनी बेलगाम हो गया. उसने ब्रिटेन के आस-पास के इलाके को भी वॉर जोन घोषित कर दिया. चेतावनी दी कि इस इलाके में घुसने वाले पर कोई रहम नहीं दिखाई जाएगी. फिर चाहे व्यापारी जहाज क्यों न हों. जो देश तटस्थ हैं, उनको भी नहीं बख्शा जाएगा. जर्मनी की पनडुब्बियां बिना चेतावनी के सिविलियन जहाजों पर हमला कर देतीं. ये पनडुब्बियां पानी के अंदर घात लगाकर बैठी रहतीं. फिर एकाएक हमला कर देतीं. शुरुआत में जर्मनी के नौसैनिक चेतावनी देते थे. फिर ब्रिटेन ने हथियारबंद मर्चेंट शिप्स भेजने शुरू किए. इसके बाद तो जर्मनी की पनडुब्बियां चेतावनी भी नहीं देती थीं. संभलने का मौका दिए बिना औचक हमला करतीं. सैकड़ों व्यापारी जहाज शिकार हुए.

31 मई, 1916 को नॉर्थ सी में हुई जुटलैंड की लड़ाई के दौरान जर्मन नौसेना के एक जहाज में हुए विस्फोट के समय की तस्वीर
सबसे मशहूर शिकार था लुसितानिया, जिसमें 1,198 लोग मरे थे 1 मई, 1915. ब्रिटेन का मशहूर जहाज लुसितानिया. न्यू यॉर्क से ब्रिटेन के लिए रवाना हुआ. उसमें हथियार रखे थे. अमेरिका से खरीदे थे ब्रिटेन ने. अमेरिका स्थित जर्मन दूतावास ने अखबार में एक विज्ञापन भी छपवाया. इसमें चेतावनी थी. कहा था लुसितानिया को मत भेजो. हम हमला करेंगे. सबने समझा, कोरी धमकी है. जर्मनी गंभीर था. 7 मई, 1915. शुक्रवार. दोपहर का वक्त. जर्मनी की एक पनडुब्बी ने लुसितानिया पर टॉरपिडो छोड़ा. आयरलैंड तट से करीब 18 किलोमीटर दूरी पर. लुसितानिया में धमाका हुआ. 18 मिनट में पूरा जहाज सागर की तलहटी पर निढाल पड़ा था. कुल 2,000 यात्री सवार थे. इसमें से 1,198 मारे गए. इनमें 128 अमेरिकी भी थे. तटस्थ देश के नागरिक मारे गए थे. अमेरिका के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने जर्मनी को चेताया. याद दिलाया कि अभी अमेरिका जंग से दूर है. उसमें कूदा नहीं है.

1916 में नॉर्थ सी में हुए जुटलैंड वॉर के दौरान जर्मनी के जहाज से निकलती लपटें
अमेरिका की धमकी कुछ रंग तो जरूर लाई लुसितानिया के डूबने की कई कहानियां हैं. कहते हैं कि ब्रिटेन ने जान-बूझकर ऐसा किया. ताकि अमेरिका युद्ध में शामिल हो जाए. अमेरिकी आवाम खूब नाराज हुई. सरकार पर दबाव बना. अब तटस्थ नहीं रह सकते. अमेरिका की चेतावनी पर जर्मनी सहमा. लेकिन फिर ब्रिटेन ने नाकेबंदी कर दी. फिर जर्मनी में भुखमरी की नौबत आ गई. सितंबर 1915 तक जर्मनी का रवैया सख्त हुआ. नौसेना को सख्त हिदायत दी गई. सरकार ने पनडुब्बियों पर बड़े कड़े नियम लाद दिए. इतने कड़े कि नेवी को पनडुब्बी ऑपरेशन बंद करना पड़ा. नेवी कमांडर्स निराश थे. उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी. पहले सेना को मनाया. फिर सरकार को. जर्मन चांसलर थियोबाल्ड हॉलवेग के अलावा सब मान गए. लेकिन हॉलवेग की किसी ने नहीं सुनी.

7 अप्रैल, 1917 को ब्रिटिश कार्गो जहाज 'SS मेपलवुड' पर हमला करता जर्मन सबमरीन (फोटो: Deutsches Bundesarchiv)
फिर वही बेलगाम समुद्री लड़ाइयों का दौर शुरू हुआ 1 फरवरी 1917. जर्मनी दोबारा पहले की तरह निरंकुश हो गया. मारने से मतलब है. सैनिक हो कि आम नागरिक, कोई अंतर नहीं. 1914 से 1918 के बीच मित्र राष्ट्रों ने करीब 10,000 जहाज तैनात किए. हजारों विमानों को ड्यूटी पर लगाया. एक लाख से ज्यादा बारूदी सुरंगें बिछाईं. ये सब बस जर्मनी की करीब 375 पनडुब्बियों से निपटने के लिए. जर्मनी के 178 सबमरीन्स काम आए. आंकड़े कहते हैं. उसने दुश्मनों के करीब 5,000 जहाजों को बर्बाद किया. जमीन की लड़ाई में मित्र राष्ट्र आगे थे.

जर्मनी द्वारा आत्मसमर्पण करने के बाद ब्रिटेन के दक्षिणी समुद्र तट पर फंसा एक जर्मन यू-बोट (कीस्टोन व्यू कंपनी)
लंबे समय तक चला जर्मनी का इक्का जर्मनी लंबे समय तक समंदर की जंग का बादशाह रहा. उसकी पनडुब्बियां समंदर की गहराइयों से चुपचाप अपना शिकार करती रहीं. लेकिन फिर हालात बदले. 1918 आते-आते मित्र राष्ट्रों के ऐंटी-सबमरीन तरीके जर्मनी पर भारी पड़ने लगे. 1918 के मध्य तक पनडुब्बियों का नुकसान चरम पर पहुंच गया. सैनिकों का मनोबल टूट गया था. पतझड़ आते-आते तस्वीर साफ होती गई. 24 अक्टूबर, 1918 को जर्मनी की सारी पनडुब्बियों ने हमला बंद कर दिया. वे घर को लौट गए. एक खतरनाक दौर खत्म हुआ.

पहले विश्व युद्ध में लड़कर घर लौटे अमेरिकी सैनिक और उन्हें लेने आए उनके दोस्त-रिश्तेदार...
विश्व युद्ध के इस पनडुब्बी युद्ध पर कई फिल्में भी बनीं सिनेमा सब कुछ समेटकर चलता है. इस दौर पर भी कई फिल्में बनीं. 1933 में आई अमेरिकी फिल्म 'हेल बिलो'. 1918 में रिलीज हुई 'द कैसर, द बीस्ट ऑफ बर्लिन'. 1975 में आई 'द लैंड दैट टाइम फॉरगोट'. 1933 की जर्मन फिल्म 'मोरजेनरोट'. 2007 में आई इंग्लिश-जर्मन फिल्म 'सिंकिंग ऑफ द लुसितानिया: टेरर ऐट सी'. 1939 में आई ब्रिटिश फिल्म 'द स्पाइ इन ब्लैक'. 1929 में आई जर्मन साइलेंट फिल्म 'थ्री डेज ऑफ लाइफ ऐंड डेथ'. 1939 की अमेरिकी फिल्म 'थंडर अफ्लोट'.
पनडुब्बी की नौकरी दुनिया की सबसे खतरनाक नौकरी थी 1981 में एक जर्मन फिल्म आई. दस बूट. इसमें दिखाया था. कैसी नरक सी जिंदगी जीते थे इन पनडुब्बियों पर जाने वाले सैनिक. ये एक वॉर फिल्म है. दूसरे विश्व युद्ध पर. लेकिन इसकी स्थितियां वैसी ही हैं. फर्स्ट वर्ल्ड वॉर जैसी. जर्मनी की बंदरगाहों से करीब 375 पनडुब्बियां रवाना हुईं. इनमें से 202 कभी नहीं लौटीं. कई अपने ही मैकेनिकल सिस्टम के कारण डूब गईं. कई हादसों का शिकार हुईं. कई दुश्मन का शिकार हुईं. उनमें सवार सैनिक और जहाजी भी मारे गए. कुल 17,000 लोग इनमें भेजे गए थे. इनमें से 5,100 से ज्यादा जंग के काम आए.

जापान के एक जंगी जहाज पर खाली समय में मनोरंजन करते सैनिक (फोटो: लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस)
परिवार और दोस्तों से आखिरी विदा लेकर ड्यूटी पर रवाना होते थे इन पनडुब्बियों में जाने वाले अपने परिवार-दोस्तों से आखिरी विदा लेकर जाते थे. उनके लौटने की उम्मीद बहुत कम ही होती थी. लौट आते, तो करिश्मा. न लौटते, तो कोई आश्चर्य नहीं. यू-बोट की जॉब दुनिया की सबसे खतरनाक नौकरियों में से एक थी. बेल्जियम के पास जो पनडुब्बी मिली है, उसके अंदर दफ्न लाशें कभी घर नहीं पहुंच पाईं. उनकी पहचान भी मालूम नहीं. किसी ने बरसों उनका इंतजार किया होगा शायद. ऐसी और भी कई लाशें शायद अब भी समंदर की छाती में दफ्न हैं. ठिकाने पर न पहुंचे ये मुसाफिर बड़ी बुरी मौत मरे. उनके हाथों मारे गए लोग भी यूं ही मरे होंगे.

अमेरिकी नौसेना के आगे आत्मसमर्पण करता जर्मनी का एक सबमरीन (फोटो: लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस)
जंग का जिक्र होना जरूरी है, पता तो चले कि लड़ाई कैसी बर्बादी लाती है नाविकों की जिंदगी बड़ी मुश्किल होती है. 100-200 साल पहले तो ऐसी थी कि आप सोच भी नहीं सकते. ऐसे ही जहाजियों पर बीटल्स ने कभी एक गाना गाया था - वी ऑल लिव इन अ येलो सबमरीन. ऐसे ही जहाजियों ने एक बड़ी भयंकर लड़ाई लड़ी थी. अपने-अपने देशों के लिए. युद्ध के दौर को याद किया जाना चाहिए. अक्सर उनका जिक्र होना चाहिए. कम से कम उन लड़ाइयों का हाल सुनकर हम डरेंगे. डरा हुआ इंसान जंग लड़ने की नहीं सोचता. वो जीता है, जीने देता है.
युद्ध की बात है, तो साहिर लुधियानवी की कविता सुनिए:
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