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जब फुफ्फो घर आती हैं, तो लगता है 'ईस्ट इंडिया कंपनी' आई है

फुफ्फो खानदान का एक विचित्र प्राणी है. जो सब जगह पाया जाता है.

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फोटो - thelallantop

एयरटेल की लाइन है हर फ्रेंड ज़रूरी होता है. ऐसे ही हर रिश्ता ख़ास होता है. दादा-दादी, नाना-नानी तो किस्से-कहानियों का ज़खीरा होते हैं. बात-बात में कहानी होगी. मुहावरे होंगे. मिसालें होंगी. ठीक है उनकी जिंदगी का अनुभव है. मगर खानदान में एक ऐसी शख्सियत भी होती है. जो होती तो मौजूदा ज़माने की है. मगर उसकी बातें दादा-दादी तो छोड़िए परदादा से भी पुरानी होती हैं. ये शख्सियत ऐसी है जो कभी बिजली बनकर कड़कती है. तो कभी मोहब्बत की चाश्नी ऐसे उडेलती है कि आप मिठास से बाहर ही नहीं आ पाएंगे. और जब तक उस चाश्नी की मिठास ख़त्म होगी आप खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे. इस शख्सियत की बातें सुनकर कभी आपको 'नागिन' सीरियल याद आएगा. कभी 'घर-घर की कहानी.' खानदान की ये शख्सियत है- 'फुफ्फो' यानी पापा की बहन.

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वल्लाह! होती तो बहन है, मगर जब फुफ्फो बनती है. तो रायता बनकर फैल जाती है. अगर पापा से बड़ी हो, तो समझो फिर बच्चों की खैर नहीं. हर बात में टोका-टाकी, हर बात में टांग अड़ाई. अगर उनकी इस हरकत की वजह से कोई बात छिपा लो, और फिर कहीं और से पता चल जाए तो समझो खैर नहीं. मुंह ऐसे फूल जाता है कि मुझे तो केजरीवाल की ये तस्वीर याद आ जाती है.
Arvind Kejriwal

उसे मनाना ऐसे जैसे अन्ना को अनशन से उठाना, मतलब ये कि पहले उसकी मांग पूरी होगी तभी वो फिर से घर में कदम रखेगी, वो भी दोबारा से मुसीबत बनने के लिए. कुछ बातें पॉइंटर में समझानी आसान होंगी, नहीं तो आपको लगेगा कि फुफ्फो से ज्यादा मैं आपको पका रहा हूं. शुक्र है मुझे इस बात का एहसास जल्दी हो गया. नहीं तो लोग इसे पढ़ते-पढ़ते न जाने कितनी गालियां बक चुके होते. सही कहा न मैंने. हम्म! जैसे आप पढ़ते रहे और मन ही मन बुदबुदाते रहे कि क्या बकवास कर रहा है. ऐसे ही फुफ्फो की सुननी पड़ती हैं और मन में ये ही सब चलता है. ऐसी ऐसी दकियानूसी बातें लगता ही नहीं हम डिजिटल युग में हैं.
जब फुफ्फो घर आती हैं. तो ऐसा लगता है जैसे पापा की बहन नहीं बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी आई हो. सारी आज़ादी छिन जाती है. सब फुफ्फो के गुलाम. पापा भी उनकी हर बात में हां में हां मिलाते है. डर लगा रहता है कहीं फुफ्फो नाराज़ न हो जाएं. मनाना मुश्किल होता है.
जब फुफ्फो घर आ जाती हैं. तो हर बात में हां करनी पड़ती है. Source Parhlo.com
जब फुफ्फो घर आ जाती हैं. तो गर्दन ऐसे काम करती है. Source Parhlo.com

अपनी हदों में रहो, इतना छोटा जम्पर पहनकर घूम रही हो

फुफ्फो के तरकश में सबसे ज्यादा तीर भतीजी (भाई की लड़की) के लिए होते हैं. अगर भतीजी ने अपनी पसंद के कपडे पहन रखें हैं. तो ये फुफ्फो को नागवार गुज़रता है. भले ही खुद ने डीप गले का जम्पर, तंग पजामा पहन रखा हो, लेकिन भतीजी ने जींस या स्लैग्स पहन रखी है. तो देखते ही बोलेंगी- 'भय्या रे हमारे भाई ने तो अपने बच्चों को कुछ ज्यादा ही छूट दे रखी है, पहनावा तो देखो लड़की ने क्या कर रखा है. हमारी भाभी भी लुल ही है जो बच्चों को नहीं समझाती हैं. चलो भाई तो काम पर रहता है. कम से कम तुम्हें तो नजर बनाके रखनी चाहिए.' अब आप ही बताओ जब ऐसी तानाकशी होगी तो 'फूफी कमीशन वापस जाओ' के नारे क्यों न बुलंद होंगे. बात बच्चों की होगी मगर भाभी को ऐसे निशाने पर लेंगी जैसे खुद के बच्चे इशारों पर चलते हैं. एक बात जो उनकी ज़बान से सबसे ज्यादा निकलती है. वो ये कि 'हमारे टाइम में' हर बात में वो अपना टाइम घुसा देती हैं. जैसे हमारे टाइम में ऐसे कपड़े नहीं पहने जाते थे. और भाई के सामने तो कभी बिना दुपट्टे के भी नहीं आये. और इनको देखो कैसी मटकती फिरती हैं.
फुफ्फो की नसीहत.
फुफ्फो की नसीहत.

क्या करूं, कीड़े निकालने की आदत से हूं मजबूर

फुफ्फो घर आईं. कोई बात नहीं झेल लिया जाएगा. पता है इतने दिन की परेशानी है. मगर फुफ्फो इतने दिन पता नहीं कितने दिन बना देती हैं. और कुछ नहीं तो दस्तरख्वान पर ही शुरू हो जाती हैं. 'ओह्ह...! भय्या कैसे खा लेते हो इतनी मिर्च. जब हम थे तो भाई ज़रा सी मिर्च तेज़ होने पर बर्तन उलटे कर देता है. अब कैसे खा लेता है इतनी मिर्चें. खाना वैसे तो ठीक बना है बस मिर्चें तेज़ कर दीं और नमक तो ऐसा लगता है जैसे भाभी डालना ही भूल गई हैं. हम होते थे तो खाने में कुछ मीठा ज़रूर बनाते थे. कभी आलस न माना दौड़ दौड़ के सब पका लेते थे. इतने दिन बाद आना हुआ है, कम से कम खीर ही बना ली होती.'
फुफ्फो की ये सब बातें सुनकर ऐसा लगता है जैसे मिर्च में मिर्च न हों, बल्कि फुफ्फों की ज़बान में मिर्चें हो. जो पापा और अम्मी के बीच झगड़ा करा दें. ये सब बोलते हुए पता नहीं वो ये बात कैसे भूल जाती हैं कि वो भी किसी की भाभी हैं.

सबसे खतरनाक होता है, जब फुफ्फो अपने बेटे का रिश्ता लेकर आ जाती हैं

दुर्लभ से भी दुर्लभतम जो वो कह लीजिए. ये घड़ी वही होती है, जब फुफ्फो अपने बेटे का रिश्ता लेकर घर आ बैठती हैं. लड़की की मर्ज़ी पूछना तो बहुत बड़ी बात. ये भी नहीं देखती कि भाई या भाभी की मर्ज़ी है या नहीं. बस बेटे की शादी भतीजी से करनी है तो करनी है. दो टूक लहजे में भाई से कहती हैं, देख तू चाहे मना कर या हां कर मुझे अपने बेटे चमन के लिए नाज़िया को ले जाना है तो ले जाना है. अगर तू नहीं करता है तो आज से जीना मरना तुझसे ख़त्म. अब बताओ. इस जोर जबरी को गुंडागर्दी या नेतागीरी न कहा जाए तो फिर आप ही बता दो क्या कहा जाए.
चाहे कुछ भी कर अगर फुफ्फो ने ठान लिया बेटे के साथ भतीजी की शादी करानी है तो चाहे फिर कोई भी आ जाए उसके इरादे को नहीं बदल सकता. ऐसे में उस लड़की की हालत खस्ता हो जाती है. जो फुफ्फो के आने पर अपने ऊंचे कुरते, स्लैग्स, जींस को अलमारी में रख देती है. और दुपट्टा संभाले रहती है. और फुफ्फो के जाने तक सहमी रहती है. ऐसे में उसकी क्या हालत होगी, जब उसकी शादी बिना पूछे फुफ्फो के बेटे के साथ करा दी जाएगी. अब तक फुफ्फो के तानो से लाचार थी. अब सास बनने के बाद उस बेचारी पर क्या गुज़रेगी. ये तो उसके लिए उम्रकैद सुनाना हो गया. वो भी बिन कुछ किए.
जब फुफ्फो के बेटे का रिश्ता आता है तो लड़की की हालत.
जब फुफ्फो के बेटे का रिश्ता आता है तो लड़की की हालत.
फुफ्फो कहेगी, 'देख मैं तुझसे दहेज में कुछ नहीं मांग रही, अपनी भतीजी को मैं एक सुर्ख जोड़े में ही ले जाउंगी. तू भी ज़िम्मेदारी से फ़ारिग हो जाएगा.' और जब हां हो जाए तो फुफ्फो गिनाने लग जाती है अब तो हमारा डबल हक़ है लेने का. अभी तक फुफ्फो को देते थे अब बेटी को भी देना पड़ेगा. और फिर दहेज लेने का अंदाज़ होगा. मेरी ससुराल में बेइज्ज़ती न हो जाए भय्ये इस बात का ध्यान रखिये. खाना स्टैंडिंग में ही रखना. और सामान पहले ही भिजवा देना ताकि सब सेट हो जाए. ब्याह वाले दिन बहुत काम हो जाता है. और हमारे जेठ की लड़की की शादी हुई उसने ये दिया है , वो दिया है. वैसे तो ये हर शादी वाले घर में होती हैं. मगर फुफ्फो की ज़बान बिना हिचक के चलती है.

त्योहार पर कितने पैसे दे दो मगर कपड़े न बनाओ तो बस खैर नहीं

चाहे ईद हो या फिर बकरीद. या फिर हो कोई और त्योहार. भाई-भतीजे चाहे कितने भी त्योहार के पैसे दे दें. बस कपड़े न दें. तो नई कथा शुरू. फुफ्फो की ज़बान है रोक कौन सकता है. कहती हैं, 'लो जी! हमारा भय्या त्योहार पर एक जोड़ा बना दिया करता था, अब के वो भी खतम. भय्या बहुएं आने के बाद सब बदल जाते हैं.' देख लिया. त्योहार दिया भय्ये ने. मगर तीर चला भाभी पर. अरे फुफ्फो इतने पैसे जो भाई ने दिए थे उनसे एक जोड़ा खरीद लोगी तो कोई सितम न हो जाएगा.

फुफ्फो से प्यारा कोई नहीं

ऐसा भी नहीं है कि फुफ्फो बहुत जल्लाद टाइप होती है. या फिर सौतन सी होती है. हां इतना ज़रूर है कि जब वो घर आती है तो कुछ दिन के लिए घर में राष्ट्रपति शासन सा लगा देती है. अब तक घर में अम्मी पापा की सत्ता थी. मगर फुफ्फो के आते ही साड़ी पॉवर फुफ्फो के हाथ में. लेकिन एक दूसरा पहलु भी है प्यार का पहलू. मोहब्बत की चाश्नी होती हैं कुछ फुफ्फो. भतीजे को देखकर ऐसे खिलती है, जैसे चांद के पास का तारा ये ही हो. और भतीजी को देखकर ऐसे तंज़ करती है जैसे वो भतीजी न हो बल्कि सौतन हो. भतीजी पर प्यार दिखाएंगी. मगर तानाकशी करना नहीं भूलेंगी. हर ताना हमारे टाइम वाले डायलॉग से ही शुरू होता है.
जब फुफ्फो मिलती हैं तो प्यार भी ऐसे जताती हैं.
जब फुफ्फो मिलती हैं तो प्यार भी ऐसे जताती हैं.
प्यारी फुफ्फो आप मान लीजिये आप अंग्रेजों के ज़माने की फुफ्फो बन जाती हैं. ज़माना बदल चुका है. बच्चे जींस से लकर चड्डी तक अपनी पसंद से खरीदते हैं. फिर क्यों आप अपनी टांग अड़ाकर किसी की जिंदगी में रोड़ा बनती हो. काहे शादी जैसे अहम फैसलों में जोर ज़बरदस्ती करती हो. जी लेने दो उन्हें भी अपनी जिंदगी. और खुद भी जियो.
वैसे सभी फुफ्फो ऐसी नहीं होती हैं. बहुत प्यारी भी होती हैं. सबकुछ न्योछावर करने वाली. कुछ अच्छी दोस्त बन जाती हैं. तो कुछ अपने फायदे के लिए दोस्त बना लेती हैं. और हां सबसे अहम बात. मेरी फुफ्फो बहुत अच्छी हैं. मेरा लाल मेरा लाल करती हैं. ये बात इसलिए कह रहा हूं कभी ये रिपोर्ट फुफ्फो तक पहुंच जाए. और पता चला मैं ही रिमांड पर ले लिया गया हूं.


अपनी प्यारी बेटी से ये बातें कभी मत कहना

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