मुझे नहीं लगता कि आजाद भारत के इतिहास में इससे बड़ी कोई घटना हुई है. अंडर 17 फुटबॉल वर्ल्ड कप होने जा रहा है इंडिया में. छह अक्टूबर को इंडिया अपना पहला मैच खेलेगी अमेरिका से. ब्लू जर्सी वाले उतरेंगे मैदान में. दिल्ली में ही.
ब्लू जर्सी पहने इन लड़कों के सिर पर सेहरा बंधा है, इनकी कहानी अपनी लगती है
ये उन जगहों से आते हैं, जहां पर भारत की आजादी के बाद से ही गोलियां चलती हैं.
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छह अक्टूबर को इंडिया अपना पहला मैच खेलेगी अमेरिका से.
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21 खिलाड़ी चुने गये हैं इंडियन टीम के लिए. जिनमें से नौ नॉर्थ ईस्ट के हैं. ये कोई राजे रजवाड़े नहीं हैं. इनमें से कई के मां-बाप मछली बेचते हैं, चाय बेचते हैं, लकड़ी का काम करते हैं. 40 रुपये बचाने के लिए साइकिल से मीलों जाते हैं. ये वो लड़के हैं जिनको पढ़ाई करने का स्कोप भी नहीं था. खेलना तो बहुत दूर की बात है. ये उन जगहों से आते हैं, जहां पर भारत की आजादी के बाद से ही गोलियां चलती हैं. ये वो क्षेत्र है जो बाकी भारत से सिर्फ एक रास्ते से जुड़ा है. अगर पानी बरस जाए तो वो भारत से कट ही जाता है.
जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट खेलकर संबंध सुधारने की बात होती है तो हंसी आती है. इसलिए कि लगता है कि हो भी सकता है, ये भी लगता है कि क्या बकवास है ये. पर इन लड़कों के माथे ये सेहरा बंधा है. इनकी कहानी हमें अपनी लगती है. हमें लगता है कि इनमें और हममें कोई अंतर नहीं है. राजनैतिक दुश्वारियां छोटी लगने लगती हैं इनकी कहानियों के सामने. आप इनके पैशन को देखेंगे तो पागल हो जाएंगे. लगेगा कि अभी फील्ड में पहुंचना चाहिए. मेरे पास रिसोर्स नहीं है, नहीं तो इनके घर से रिपोर्टिंग करता. मुझे भी वो पागलपन देखना था, जो मछली बेचते इनके मां बाप के चेहरों पर होगा.

फुटबॉल के लिए हमारे दिल में पुराना प्यार है.
बाकी दुनिया मैदान में खड़े भारत के 11 खिलाड़ियों को सुरेश, अनिकेत और तमाम नामों से जानेगी. पर हम भारतीय भावुक लोग हैं. फुटबॉल में हमारी हालत देखते हुए हमें इनमें भगत सिंह, राणा प्रताप, टीपू नजर आयेंगे. ऐसा लगेगा कि ये हमारी आजादी के लिए लड़ रहे हैं.
हममें से सबको याद होगा कि 1996 के पहले तक फुटबॉल हमारे गांवों का पागलपन हुआ करता था. खुद मेरे गांव तरांव और थोड़ी दूर के गांव बारे (जिसको जिला कहा जा सकता है, इतना बड़ा है) में कांटे की टक्कर होती थी. महीनों प्लान बनता था कि पेलना है इन लोगों को. मैच के दौरान मारपीट की नौबत आ जाती थी, क्योंकि हारना मंजूर नहीं था. हारने पर मातम मनता था. मेरे गांव में एक ही मुस्लिम परिवार था. सुल्तान का. उसके लिए ताजिया निकलता था. सारे हिंदू मिल के निकालते थे. मुझे शक है कि इसमें भी फुटबॉल का योगदान था. क्योंकि सुल्तान गोलकीपर था, शानदार वाला. उसकी छाती खराब हो गई थी, कभी शॉट लग गया था. मेरे पापा बहुत अच्छा खेलते थे. बहुत मशहूर खिलाड़ी थे गांव जवार में.

गांव में खूब खेला जाता है फुटबॉल.
1996 और 1999 के क्रिकेट वर्ल्ड कपों ने घरों में किट पहुंचा दिया. क्योंकि नंगे पांव फुटबॉल खेलने से ज्यादा सुविधाजनक था नंगे पांव क्रिकेट खेलना. मिलना तो दोनों में ही कुछ नहीं था. और इस तरह हम अपने पहले प्यार को भूल गए. फुटबॉल इंडिया का दबा हुआ पैशन है. देशभक्तों के लिए विवेकानंद ने भी कहा था कि गीता पढ़ने से अच्छा है, फुटबॉल खेलो.
हो सकता है कि पूरे टूर्नामेंट में ये लौंडे एक भी गोल न करने पाएं. ये भी हो सकता है कि इंडिया सारे मैच हार जाए. पर ये भी हो सकता है कि ये लड़के धुआं छुड़ा दें मैचों में. ये भी हो सकता है कि इंडिया जीतती जाए. हम सब छुपे हुए पापी हैं. फुटबॉल वर्ल्ड कप होते ही पागल हो जाते हैं. हम सबने वर्ल्ड कप जग-जग के देखा है. मजबूरी में कभी रोनाल्डो तो कभी मैसी से इमोशन जोड़ लेते हैं पर देखते ज़रूर हैं. बस ये है कि क्लबों को फॉलो नहीं कर पाते पर अगर कोई उनकी इमोशनल कहानी बता दे तो हम उसे भी फॉलो कर लेंगे.
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जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट खेलकर संबंध सुधारने की बात होती है तो हंसी आती है. इसलिए कि लगता है कि हो भी सकता है, ये भी लगता है कि क्या बकवास है ये. पर इन लड़कों के माथे ये सेहरा बंधा है. इनकी कहानी हमें अपनी लगती है. हमें लगता है कि इनमें और हममें कोई अंतर नहीं है. राजनैतिक दुश्वारियां छोटी लगने लगती हैं इनकी कहानियों के सामने. आप इनके पैशन को देखेंगे तो पागल हो जाएंगे. लगेगा कि अभी फील्ड में पहुंचना चाहिए. मेरे पास रिसोर्स नहीं है, नहीं तो इनके घर से रिपोर्टिंग करता. मुझे भी वो पागलपन देखना था, जो मछली बेचते इनके मां बाप के चेहरों पर होगा.

फुटबॉल के लिए हमारे दिल में पुराना प्यार है.
बाकी दुनिया मैदान में खड़े भारत के 11 खिलाड़ियों को सुरेश, अनिकेत और तमाम नामों से जानेगी. पर हम भारतीय भावुक लोग हैं. फुटबॉल में हमारी हालत देखते हुए हमें इनमें भगत सिंह, राणा प्रताप, टीपू नजर आयेंगे. ऐसा लगेगा कि ये हमारी आजादी के लिए लड़ रहे हैं.
हममें से सबको याद होगा कि 1996 के पहले तक फुटबॉल हमारे गांवों का पागलपन हुआ करता था. खुद मेरे गांव तरांव और थोड़ी दूर के गांव बारे (जिसको जिला कहा जा सकता है, इतना बड़ा है) में कांटे की टक्कर होती थी. महीनों प्लान बनता था कि पेलना है इन लोगों को. मैच के दौरान मारपीट की नौबत आ जाती थी, क्योंकि हारना मंजूर नहीं था. हारने पर मातम मनता था. मेरे गांव में एक ही मुस्लिम परिवार था. सुल्तान का. उसके लिए ताजिया निकलता था. सारे हिंदू मिल के निकालते थे. मुझे शक है कि इसमें भी फुटबॉल का योगदान था. क्योंकि सुल्तान गोलकीपर था, शानदार वाला. उसकी छाती खराब हो गई थी, कभी शॉट लग गया था. मेरे पापा बहुत अच्छा खेलते थे. बहुत मशहूर खिलाड़ी थे गांव जवार में.

गांव में खूब खेला जाता है फुटबॉल.
1996 और 1999 के क्रिकेट वर्ल्ड कपों ने घरों में किट पहुंचा दिया. क्योंकि नंगे पांव फुटबॉल खेलने से ज्यादा सुविधाजनक था नंगे पांव क्रिकेट खेलना. मिलना तो दोनों में ही कुछ नहीं था. और इस तरह हम अपने पहले प्यार को भूल गए. फुटबॉल इंडिया का दबा हुआ पैशन है. देशभक्तों के लिए विवेकानंद ने भी कहा था कि गीता पढ़ने से अच्छा है, फुटबॉल खेलो.
हो सकता है कि पूरे टूर्नामेंट में ये लौंडे एक भी गोल न करने पाएं. ये भी हो सकता है कि इंडिया सारे मैच हार जाए. पर ये भी हो सकता है कि ये लड़के धुआं छुड़ा दें मैचों में. ये भी हो सकता है कि इंडिया जीतती जाए. हम सब छुपे हुए पापी हैं. फुटबॉल वर्ल्ड कप होते ही पागल हो जाते हैं. हम सबने वर्ल्ड कप जग-जग के देखा है. मजबूरी में कभी रोनाल्डो तो कभी मैसी से इमोशन जोड़ लेते हैं पर देखते ज़रूर हैं. बस ये है कि क्लबों को फॉलो नहीं कर पाते पर अगर कोई उनकी इमोशनल कहानी बता दे तो हम उसे भी फॉलो कर लेंगे.
ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के लिए ऋषभ ने लिखी है.
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