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क्या है 'गूगल टैक्स', जिसको लेकर अमेरिका ने भारत पर जांच बैठा दी है?

घबराइए मत! गूगल में कुछ सर्च करने पर आपको पैसे नहीं देने हैं.

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क्या 'गूगल टैक्स' के चलते भारत और अमेरिका के संबंध ख़राब होने वाले हैं?
इस वित्तीय वर्ष यानी फाइनेंशियल इयर की शुरुआत सरकार ने एक ऐसे कदम से की है कि एमेज़ॉन जैसी बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियां परेशान हैं. और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप उखड़े-उखड़े से लग रहे हैं. वजह है पैसा. या यूं कहें टैक्स का पैसा. क्योंकि इंडिया में धंधा कर रही तमाम विदेशी कंपनियों को देना होगा पहले से ज्यादा टैक्स. अब ये टैक्स कौन सा है, कैसा है, ये हम समझेंगे, आसान भाषा में.
अखबारों में एक शब्द पढ़ने में आ रहा है. 'गूगल टैक्स.' घबराइए मत. आपको गूगल इस्तेमाल करने के लिए कोई टैक्स नहीं देना है.
# इक्वलाइज़ेशन लेवी-
असल में 'गूगल टैक्स' एक चलताऊ नाम है. इस टैक्स का असली नाम है ‘इक्वलाइज़ेशन लेवी’. इक्वलाइज़ेशन लेवी को वित्त वर्ष 2016-17 में भारत सरकार ने पेश किया था और इसे 1 जून, 2016 को लागू कर दिया गया. इसका उद्देश्य था भारत के बाहर ‘परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट’ वालीं ऐसी ‘डिजिटल कंपनीज़’ को टैक्स के दायरे में लाना जिनका आय का सबसे बड़ा स्रोत विज्ञापन है.

सर के ऊपर से गया? मेरे भी सर के ऊपर से ही गया था. लेकिन इसे तोड़कर समझेंगे तो आसान लगेगा.
पहले तो डिजिटल कंपनी क्या है? जो इंटरनेट पर ही चलती हैं. खालिस. जैसे गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर वग़ैरह. डिजिटल कंपनीज कई विज्ञापन चलाती हैं. आपको फेसबुक स्क्रॉल करते हुए तमाम विज्ञापन दिखते होंगे. और ये, इनकी इनकम का एक सॉलिड सोर्स होता है. अब जहां इनकम, वहां टैक्स.
मगर ये कंपनियां अपनी इनकम पर उतना टैक्स नहीं दे रही थीं. जितना देना चाहिए था. इसकी दो बड़ी वजहें थीं.
1. पहली बात तो डिजिटल दुनिया ही नई है. लगभग 10 साल हुए होंगे, इंटरनेट को प्रॉपर बिजनेस स्पेस बने. और हमारे टैक्स सिस्टम ठहरे ट्रेडिशनल. 25 साल पहले अपने लैंडलाइन के बटन घुमाते हुए हमने थोड़े न सोचा था. कि एक दिन ऐसा फोन भी होगा जिसकी स्क्रीन पर विज्ञापन दिखेंगे?
2. ऐसी कई सारी कंपनीज का 'परमानेंट इस्टैब्लिशमेंट' इंडिया में नहीं है. माने गूगल, फेसबुक वगैरह के आलीशान दफ्तर तो दिखेंगे. लेकिन असली बॉस लोग किधर हैं? अमेरिका में. भारत के टैक्सेशन क़ानूनों के दायरे में वही कंपनियां आ सकती हैं जिनका इस देश में परमानेंट इस्टेब्लिशमेंट (पीई) हो. इंडिया में जो इनके दफ्तर हैं, वो दरअसल इनकी सबसिडरी कंपनी के हैं. जिसका नाम है, ‘गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’. ये कंपनी कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सर्विसेस देती है. यूं तो, ये इंडियन सबसिडरी भी पेरेंट ‘गूगल’ का ही हिस्सा है, लेकिन अगर आप गूगल पर (ईवन गूगल डॉट इन पर भी) कोई विज्ञापन देते हैं तो आप गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को नहीं, इसकी पेरेंट कंपनी ‘गूगल’ को पे करते हैं, जो कि भारत में नही है.
तो अब सीन ये हैं कि हमारी सरकार टैक्स तो लेती थी. लेकिन इनकी इंडियन सब्सिडियरी कंपनियों से. जबकि ऑनलाइन विज्ञापन वगैरह से आया पैसा सब पापा कंपनी के जेब में जाता है. जो है विदेश में.
इसी चीज़ को ध्यान में रखकर 2016-17 में सरकार बजट के माध्यम से इक्वलाइज़ेशन लेवी लेकर आई. ये एक डायरेक्ट टैक्स है. यानी जो टैक्स पेयर सीधे सरकार को देगा. जल्दी से बता दें कि टैक्स दो तरह के होते हैं.- एक जो सीधे सरकार को जाता है. जैसे इनकम टैक्स. सैलरी से कटा, सरकार को गया. दूसरा होता है इंडायरेक्ट टैक्स. जैसे आपने साबुन ख़रीदा तो आपने दुकानदार को दिया. GST के रूप में. दुकानदार देता है होलसेलर को, होलसेलर ने साबुन कंपनी को, साबुन कंपनी ने सरकार को.
तो अब ये इक्वलाइज़ेशन लेवी डायरेक्ट टैक्स के रूप में सरकार तक कैसे पहुंचेगा?
# समझेंगें गुड्डू के उदाहरण से-
1. गुड्डू ने फ़ेसबुक को 20,000 रूपये देने हैं. क्यूं? क्यूंकि उसने फ़ेसबुक पर अपनी साड़ी की दुकान के विज्ञापन दिए. इक्वलाइज़ेशन लेवी टैक्स आने से पहले होता ये था कि एफ़बी गुड्डू को 20,000 रूपये का बिल देती थी और गुड्डू रक़म चुका देता था. बात ख़त्म!
2. अब नए नियमों के तहत गुड्डू को इसपर 6% इक्वलाइज़ेशन लेवी भी देना पड़ेगा. मतलब 1,200 रूपये. होगा ये कि फ़ेसबुक गुड्डू को 21,200 रूपये का बिल देना.
3. अब सोचिए, अगर गुड्डू, FB को पूरे 21,200 चुका दे और FB सरकार को 1,200 तो? फिर तो इक्वलाइज़ेशन लेवी इनडायरेक्ट टैक्स हो गया.
4. लेकिन ऐसा नहीं होता है. यानी गुड्डू FB को केवल 20,000 रूपये देगा. तो फिर आप पूछेंगे 1,200 का क्या? देखिए, अब ये FB की नहीं, गुड्डू की ज़िम्मेवारी है कि वो सरकार को ये पैसा दे.
5. अब अगर गुड्डू ये देना भूल जाता है, या जानबूझ कर नहीं देता तो उसे सरकार को भारी पेनल्टी चुकानी होगी. जो समय बीतने के साथ-साथ गुणोत्तर रूप से बढ़ती चली जाएगी. यानी इस टैक्स को देने की पूरी ज़िम्मेवरी गुड्डू की होगी. FB ने बिल बना के गुड्डू को थमा दिया, वो मुक्त.

6. अच्छा एक बात और. गुड्डू को एक लाख रूपये के विज्ञापनों तक कोई टैक्स नहीं देना. लेकिन जैसे ही वो एक लाख से ज़्यादा के विज्ञापन दे देता है उसे पूरे पर टैक्स देना पड़ेगा.
7. अब आप कहेंगे इतनी भसड़ क्यूं? साबुन वाले उदाहरण की तरह ही, FB पैसे लेकर सीधे सरकार को क्यूं न दे दे? वो इसलिए क्यूंकि भारत में टैक्स के नियम कहते हैं कि आप सिर्फ़ उन्हीं कंपनीज़ से टैक्स ले सकते हैं जिनके परमानेंट इस्टेब्लिशमेंट इंडिया में हों.
8. इस टैक्स का नाम इक्वलाइज़ेशन लेवी भी इसलिए है, क्यूंकि ये टैक्स विदेशी परमानेंट इस्टेब्लिशमेंट वाली कंपनियो को मिलने वाले एडवांटेज़ को ज़ीरो आउट कर देता है.
अब आपको लग रहा है बात हो गई खत्म. लेकिन पार्टी अभी बाकी है. ये तो केवल सोशल मीडिया साइट्स हैं. उनका क्या, जो खालिस बजनेस साइट्स हैं. जैसे एमेज़ॉन?
देखिए ये साइट्स दो तरह से बिजनेस करती हैं:
1. बी टू बी: यानी बिजनेस टू बिजनेस. फेसबुक बिजनेस है. गुड्डू का भी बिजनेस है. कंज्यूमर तो वो हुआ तो विज्ञापन देखकर ऑर्डर करेगा साड़ी. है न.
2. बी टू सी: यानी बिजनेस तो कस्टमर. एमेज़ॉन बिजनेस है. आप हो कस्टमर. ऑर्डर करोगे सीधे. वो डिलीवर करेगा.
अब सरकार को इन्हें भी टैक्स के दायरे में लाना था. लेकिन-
1. इनडायरेक्ट टैक्स नहीं ले सकते क्यों परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट विदेश में ठहरा.
2. अगर हर कस्टमर, हर खरीद पर सरकार को डायरेक्ट टैक्स देने लगेगा, तो भसड़ मच जाएगी. सोचो आप एमेज़ॉन से जब भी कुछ ऑर्डर करो, सरकार को अलग से टैक्स भरो.
तो सरकार ने तिकड़म निकाला. साल 2020 में ऑनलाइन बी टू सी यानी एमेज़ॉन जैसी कंपनियां भी टैक्स के दायरे में लाई गईं. तय हुआ कि 1 अप्रैल, 2020 (वित्त वर्ष 2020-21) से ये कंपनियां भी 2% टैक्स देंगी हर लेन-देन में. और ये होगा इंडायरेक्ट टैक्स ही. यानी ग्राहक देगा कंपनी को, कंपनी देगी सरकर को.
पहले एड प्लेटफ़ॉर्म फिर ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म, भारत सरकार सभी विदेशी कंपनियों को टैक्स के दायरे में लाना चाहती है. पहले एड प्लेटफ़ॉर्म फिर ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म, भारत सरकार सभी विदेशी कंपनियों को टैक्स के दायरे में लाना चाहती है.

लेकिन फिर परमानेंट इस्टेब्लिशमेंट तो ऐमज़ॉन का भी भारत में नहीं है?
परमानेंट इस्टेब्लिशमेंट की इसी दिक्कत भरी डेफ़िनेशन से पार पाने के लिए सरकार ने 2018 के फ़ाइनैन्स बिल में एक नया टर्म डाला. ‘सिग्निफिकेंट इकोनोमिकि प्रेजेंस’. यानी किसी विदेशी कंपनी की भारत में कितनी और किस हद तक मौजूदगी है. टैक्स उस आधार पर लगेगा.
सरकार ये भी सोच रही है कि परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट वाला नियम ही हटा दें. और टैक्स को इस बात के हिसाब से लगाएं कि सामान बिक कहां रहा है. न कि इस बात से कि कंपनी का हेड ऑफिस किधर है. लेकिन अभी ये सोच ही रही है.
# अस्पष्टता-
लेकिन इन सारी परिभाषाओं और उनकी एंबीग्यूटी (अस्पष्टता) के चलते ही कंपनियाँ, सरकार से कह रही हैं कि प्लीज़ इसे अगले छः महीनों तक टाल दें. चूंकि टैक्स नया नया है, इसको लेकर अमेरिका और इंडिया में आर्थिक लेवल पर थोड़ी टेंशन भी है. अमेरिका क्यों, क्योंकि अधिकतर कंपनियां जो इंडिया में डिजिटल होकर पैसे कमा रही हैं वो अमेरिकी हैं. सभी नहीं, मगर अधिकतर.
डॉनल्ड ट्रंप ने इसके चलते दो चीज़ें कर दी हैं:
1. भारत सहित 9 अन्य देशों पर जांच बिठा दी है. ये जानने के लिए कि क्या लिया जाने वाला ‘गूगल टैक्स’ नैतिक और उससे ज़्यादा विधिक रूप से उचित है?
2. ‘प्यूनिटिव टैरिफ़’ लगने की आशंका. प्यूनिटिव शब्द ‘पनिश’ या दंड से बना है. जब किसी देश की सरकार आयात पर, ये सोचकर बहुत ज़्यादा कर लगा देती है, कि दूसरा देश अपना सामान उनके देश में बेच ही न पाए तो उसे ‘प्यूनिटिव टैरिफ़’ कहते हैं. तो अगर ट्रंप ने इंडिया से अमेरिका जाने वाले माल को बेतहाशा महंगा कर दिया, तो इंडिया के कस्टमर गिर जाएंगे. और एक्सपोर्ट से आने वाली कमाई भी. ये बात और है कि गुस्से में नुकसान अमेरिका को भी होगा. क्योंकि आखिर महंगाई तो वहां ही बढ़ेगी.

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