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बाबर की 'रहकला' से लेकर सेना के 'धनुष' तक, भारत में तोपों की पूरी कहानी

पानीपत की पहली लड़ाई में 21 अप्रैल 1526, वो दिन था, जब भारत की धरती पर पहली बार तोपों का इस्तेमाल हुआ. तब से लेकर 21 अप्रैल 2026 तक भारतीय तोपों ने 500 सालों का सफर तय किया है. बाबर की बैलगाड़ी वाली तोपों से लेकर 'मेक इन इंडिया' की डिजिटल होवित्जर तक, जानिए भारतीय तोपखाने का पांच सदियों का लंबा सफर और सेना में महिलाओं की एंट्री का पूरा इतिहास.

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पानीपत से LoC तक: 500 साल में कितनी बदल गई भारत की 'तोपें'?

21 अप्रैल 1526 की वो सुबह. दिल्ली की सल्तनत पर इब्राहिम लोदी का राज था. लोदी के पास एक लाख सैनिकों की विशाल फौज थी और सैकड़ों की तादाद में लड़ाकू हाथी. दूसरी तरफ था फरगाना से आया एक हमलावर, जिसका नाम था जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर. बाबर के पास फौज कम थी, लेकिन उसके पास कुछ ऐसा था जो भारत की सरजमीं ने पहले कभी नहीं देखा था. वो थी 'तोपें'…

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जब पानीपत की मिट्टी तोपों के धमाके से पहली बार कांपी, तो इब्राहिम लोदी के हाथी डरकर पीछे भागे और अपनी ही सेना को कुचल दिया. उस एक दिन ने भारत का इतिहास बदल दिया और शुरू हुआ बारूद का वो सफर, जो आज 'धनुष' और 'K-9 वज्र' तक पहुंच चुका है.

आज जब हम लद्दाख की चोटियों पर चीन के सामने M777 होवित्जर तैनात देखते हैं या रेगिस्तान में धूल उड़ाती K-9 वज्र को देखते हैं, तो ये महज मशीनें नहीं हैं. ये 500 साल के उस विकास की कहानी हैं जिसमें पत्थर फेंकने वाली मशीनों से लेकर 40 किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन का डिजिटल खात्मा करने वाले किलर शामिल हैं.

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इस सफर में बोफोर्स का शोर भी है, घोटालों का सूखा भी है और अब 'मेक इन इंडिया' की गूंज भी है. आइए इस मेगा एक्सप्लेनर में समझते हैं कि कैसे हिंदुस्तान का तोपखाना यानी आर्टिलरी दुनिया के सबसे ताकतवर लड़ाकू दस्तों में से एक बना.

जब पहली बार 'धमाके' ने दिल्ली का तख्त बदल दिया

बाबर की जीत के पीछे उसकी रणनीति 'तुलुगमा' तो थी ही, लेकिन असली खेल दिखाया उस्ताद अली और मुस्तफा की जोड़ी ने. ये बाबर के वो तोपची थे जिन्होंने उस्मानी (ओटोमन) तकनीक से बनी तोपों को बैलगाड़ियों पर फिट किया था. इन तोपों को उस वक्त 'रहकला' कहा जाता था.

आप कल्पना कीजिए कि जिस दौर में युद्ध तलवारों, तीरों और हाथियों के दम पर लड़े जाते थे, वहां अचानक आग उगलते गोलों ने क्या तबाही मचाई होगी. लोदी की सेना को समझ ही नहीं आया कि ये आसमानी बिजली कहां से गिर रही है.

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इतिहासकार सतीश चंद्रा अपनी किताब 'मध्यकालीन भारत का इतिहास' में लिखते हैं,

बाबर की इन शुरुआती तोपों की रेंज बहुत ज्यादा नहीं थी. मुश्किल से 500 से 800 मीटर तक ये गोला फेंक सकती थीं. लेकिन इनका मनोवैज्ञानिक असर जबरदस्त था. ये तोपें कांसे (Bronze) की बनी होती थीं और भारी भरकम होती थीं. एक बार गोला दागने के बाद इन्हें ठंडा करने और दोबारा लोड करने में काफी समय लगता था. फिर भी, इन्होंने साबित कर दिया कि आने वाले वक्त में जंग वही जीतेगा जिसके पास 'लंबी दूरी' की मारक क्षमता होगी.

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तोपों ने पानीपत की जंग का नतीजा बदल दिया

मध्यकाल: मुगलों की 'भारी' तोपें बनाम मराठों की 'फुर्ती'

जैसे-जैसे मुगल साम्राज्य फैला, उनके तोपखाने का आकार भी बढ़ता गया. अकबर के दौर में तोप बनाने की तकनीक में काफी सुधार हुआ. मुगलों ने ऐसी विशालकाय तोपें बनवाईं जिन्हें 'किला कुशा' (किला तोड़ने वाली) और 'जहांकुशा' (दुनिया जीतने वाली) कहा जाता था.

ये तोपें इतनी भारी थीं कि इन्हें खींचने के लिए 50-60 हाथियों और सैकड़ों बैलों की जरूरत पड़ती थी. कई बार तो युद्ध खत्म हो जाता था और ये तोपें रास्ते में ही फंसी रह जाती थीं. जदुनाथ सरकार अपनी किताब 'मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ इंडिया' में लिखते हैं,

यहीं से युद्ध की तकनीक में एक नया मोड़ आया. जब मराठा साम्राज्य का उदय हुआ, तो उन्होंने मुगलों की इस कमजोरी को पकड़ा. मराठा और बाद में सिखों ने भारी तोपों की जगह हल्की और 'मोबाइल' आर्टिलरी पर जोर दिया.

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मराठों ने इस्तेमाल की हल्की तोपें

महाराजा रणजीत सिंह ने तो अपनी फौज में 'फौज-ए-खास' बनाई थी, जिसमें फ्रांसीसी अधिकारियों की मदद से तोपखाने को बेहद आधुनिक बनाया गया था. उन्होंने पीतल और लोहे के मिश्रण से ऐसी तोपें तैयार करवाईं जिन्हें ऊबड़-खाबड़ रास्तों और पहाड़ों पर भी आसानी से ले जाया जा सके.

अंग्रेजों का दौर: पीतल से स्टील तक का सफर

भारत में अंग्रेजों के आने के बाद आर्टिलरी का पूरी तरह से संस्थागत ढांचा तैयार हुआ. अंग्रेजों ने 1835 में 'रॉयल इंडियन आर्टिलरी' की नींव रखी. उन्होंने तोपों को धातुकर्म (Metallurgy) के जरिए मजबूत बनाया. अब तोपें सिर्फ पीतल की नहीं, बल्कि स्टील की बनने लगी थीं.

विश्व युद्धों के दौरान तोपों की अहमियत और बढ़ गई. पहले विश्व युद्ध में जहां 'हॉर्स-ड्रोन' (घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली) तोपें थीं, वहीं दूसरे विश्व युद्ध तक आते-आते ये पूरी तरह से मोटर चालित हो गईं.

रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी म्यूजियम, नासिक में रखे दस्तावेजों के मुताबिक अंग्रेजों ने भारत में तोपों की रेंज और सटीकता पर काम किया. इसी दौर में आर्टिलरी को 'किंग ऑफ द बैटलफील्ड' यानी युद्ध के मैदान का राजा कहा जाने लगा. आज भी भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी का मोटो 'सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल' (Everywhere with Honour and Glory) इसी गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है.

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ब्रिटिश काल में आर्टिलरी

अंग्रेजों के जाने के बाद भारत को एक व्यवस्थित तोपखाना तो मिला, लेकिन तकनीक के लिए हम पूरी तरह से पश्चिम पर निर्भर हो गए.

बोफोर्स कांड और भारतीय तोपखाने का 'सूखा'

आजाद भारत के इतिहास में 1980 का दशक एक बड़ा मील का पत्थर था. भारत ने स्वीडन से 155 mm की 400 बोफोर्स तोपें खरीदने का सौदा किया. ये उस वक्त की सबसे आधुनिक तोपें थीं. इनकी खासियत थी इनका 'शूट एंड स्कूट' फीचर, यानी गोला दागने के बाद ये अपनी जगह बदल सकती थीं ताकि दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बच सकें.

1999 के कारगिल युद्ध में बोफोर्स ने ही पाकिस्तान के छक्के छुड़ाए थे. टाइगर हिल और तोलोलिंग की चोटियों पर बैठे दुश्मनों को बोफोर्स के गोलों ने ही नेस्तनाबूद किया था. कारगिल रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट में बोफोर्स का ये कारनामा दर्ज है.

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बोफोर्स तोप ने कारगिन में किया कमाल

 लेकिन बोफोर्स के साथ एक काली छाया भी जुड़ी थी-कमीशनखोरी का आरोप. इस घोटाले ने भारतीय राजनीति और रक्षा खरीद को इतना डरा दिया कि अगले तीन दशकों तक भारतीय सेना में एक भी नई तोप शामिल नहीं की गई.

सेना चिल्लाती रही कि उसे नई तोपों की जरूरत है, पुरानी हो चुकी तोपें दम तोड़ रही थीं, लेकिन किसी भी सरकार ने 'बोफोर्स' जैसा दाग लगने के डर से नई फाइल पर साइन नहीं किए. ये भारतीय आर्टिलरी का सबसे बुरा 'सूखा' दौर था.

2016 का टर्निंग पॉइंट: 'मेक इन इंडिया' की गूंज

साल 2016 के बाद से भारतीय तोपखाने की तस्वीर पूरी तरह बदल गई. रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भरता' और 'मेक इन इंडिया' के विजन ने दशकों पुराने सूखे को खत्म किया. भारत ने एक साथ कई मोर्चों पर काम शुरू किया. हमने अमेरिका से M777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर खरीदीं, दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर K-9 वज्र बनाई और सबसे बड़ी बात, अपनी देसी तोप 'धनुष' को सेना में शामिल किया.

आज की भारतीय आर्टिलरी अब सिर्फ गोला फेंकने वाली मशीन नहीं है. ये डेटा लिंक, ड्रोन और सैटेलाइट से जुड़ी हुई है. अब आर्टिलरी अफसर को दुश्मन को देखने की जरूरत नहीं है. एक छोटा सा ड्रोन दुश्मन की लोकेशन भेजता है, कंप्यूटर पर निर्देशांक (Coordinates) सेट होते हैं और 40 किलोमीटर दूर बैठा दुश्मन पलक झपकते ही खत्म हो जाता है. ये तकनीक का वो छलांग है जिसे बाबर के तोपची उस्ताद अली शायद कभी सोच भी नहीं सकते थे.
स्रोत: रक्षा मंत्रालय, वार्षिक रिपोर्ट 2022-23. https://mod.gov.in/

M777: पहाड़ों का हल्का योद्धा

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन और पाकिस्तान की ऊंची चोटियां हैं. ऐसी जगहों पर बोफोर्स जैसी भारी तोपें ले जाना मुश्किल होता है. इसीलिए भारत ने अमेरिका से M777 होवित्जर ली. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका वजन है. ये टाइटेनियम से बनी है, इसलिए बहुत हल्की है. इसे भारतीय वायुसेना के चिनूक हेलीकॉप्टर से टांगकर किसी भी ऊंची चोटी पर महज 15-20 मिनट में तैनात किया जा सकता है.

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M777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर

चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के दौरान M777 ने भारत को बड़ी बढ़त दी है. इसकी मारक क्षमता 30 किलोमीटर तक है और इसकी सटीकता इतनी जबरदस्त है कि ये एक छोटे से कमरे को भी निशाना बना सकती है. ये वो तोप है जिसने हिमालय की पहाड़ियों पर भारत की पकड़ को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत कर दिया है.
स्रोत: डिएआरडीओ (DRDO) टेक्नोलॉजी बुलेटिन. https://drdo.gov.in/

धनुष (Dhanush): बोफोर्स का देसी और बेहतर अवतार

धनुष को 'देसी बोफोर्स' कहा जाता है, लेकिन असल में ये उससे कहीं ज्यादा उन्नत है. जब बोफोर्स का सौदा विवादों में फंसा, तो भारत के पास उसकी डिजाइन और ब्लूप्रिंट मौजूद थे. जबलपुर की गन कैरिज फैक्ट्री (GCF) के इंजीनियरों ने उन ब्लूप्रिंट्स को उठाया और उसमें आधुनिक तकनीक का तड़का लगाया. धनुष 155 mm/45 कैलिबर की तोप है, जबकि पुरानी बोफोर्स 39 कैलिबर की थी.

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धनुष भारत का स्वदेशी बोफोर्स

धनुष पूरी तरह से ऑटोमैटिक है. इसमें एक आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगा है, जो इसे रात के अंधेरे में भी अचूक बनाता है. इसकी रेंज 38 किलोमीटर तक है, जो पुरानी बोफोर्स से लगभग 11 किलोमीटर ज्यादा है. सबसे खास बात ये है कि इसका 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भारत में ही बना है. ये भारत की उस क्षमता का प्रतीक है कि हम दुनिया के बेहतरीन हथियार खुद बना सकते हैं.

ये भी पढ़ें: बोफोर्स तोप: सरकार हिलाने से लेकर कारगिल में दुश्मन पर कहर बरपाने वाली होवित्जर का नया अवतार

K-9 वज्र: रेगिस्तान में आग उगलती मशीन

अगर पहाड़ों के लिए M777 है, तो मैदानी इलाकों और रेगिस्तान के लिए भारत के पास K-9 वज्र है. ये एक 'सेल्फ-प्रोपेल्ड' तोप है, यानी ये एक टैंक की तरह खुद चल सकती है. दक्षिण कोरियाई तकनीक पर आधारित इस तोप को भारत की लार्सन एंड टुब्रो (L&T) कंपनी ने गुजरात के हजीरा में बनाया है.

रेगिस्तान की तपती गर्मी में जहां लोहे की मशीनें जवाब दे जाती हैं, वहां K-9 वज्र 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते हुए दुश्मन पर गोले बरसा सकती है. इसकी रेंज 38 से 40 किलोमीटर है. हाल ही में सेना ने इसे लद्दाख की कड़ाके की ठंड में भी तैनात किया, जहां इसने अपने इंजन और मारक क्षमता का लोहा मनवाया. ये साबित करता है कि अब भारतीय तोपखाना हर मौसम और हर इलाके के लिए तैयार है.

K-9 वज्र
K-9 वज्र

शारंग प्रोजेक्ट: कबाड़ से कमाल तक का सफर (The Upgradation)

भारत के पास 130mm की सैकड़ों पुरानी सोवियत काल की तोपें थीं. इन्हें फेंकना नुकसानदेह था और इस्तेमाल करना पुराना पड़ चुका था. यहीं भारत ने 'जुगाड़' और इंजीनियरिंग का कमाल दिखाया जिसे 'शारंग' (Sharang) नाम दिया गया. इस प्रोजेक्ट के तहत पुरानी 130mm तोपों को अपग्रेड करके 155mm का बनाया गया.

इससे भारत को दो फायदे हुए. पहला, बहुत कम खर्चे में हमें आधुनिक मारक क्षमता मिल गई. दूसरा, हमारी तोपों की रेंज 27 किलोमीटर से बढ़कर 39 किलोमीटर हो गई. यह मिडिल क्लास टैक्सपेयर के लिए अच्छी खबर है क्योंकि सरकार ने नई तोपें खरीदने के अरबों रुपये बचा लिए और पुरानी ताकत को नया जीवन दे दिया. आज ये शारंग तोपें हमारी सरहदों पर मजबूती से तैनात हैं.

प्राइवेट प्लेयर्स की एंट्री: जब टाटा और बिड़ला ने बनाई 'तोप'

दशकों तक तोप बनाना सिर्फ सरकारी ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों का काम माना जाता था. लेकिन 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान ने दरवाजा खोल दिया. आज टाटा एडवांस सिस्टम्स (Tata), एलएंडटी (L&T) और भारत फोर्ज (Bharat Forge) जैसी कंपनियां दुनिया की बेहतरीन तोपें बना रही हैं. भारत फोर्ज द्वारा बनाई गई 'भारत-52' और ATAGS (एडवांस्ड टाउड आर्टिलरी गन सिस्टम) इसका सबूत हैं.

खास बात ये है कि अब भारत सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर रहा, बल्कि तोपें 'एक्सपोर्ट' भी कर रहा है. आर्मेनिया जैसे देशों को भारत ने अपनी तोपें बेची हैं. जब प्राइवेट सेक्टर की एफिशिएंसी और सेना की जरूरतें साथ मिलती हैं, तो डिफेंस कॉरिडोर में नौकरियों के नए अवसर भी पैदा होते हैं. यह भारत की रक्षा अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है.

आर्टिलरी में नारी शक्ति: बदलती सामाजिक तस्वीर

तोपखाना हमेशा से एक ऐसी रेजिमेंट रही है जहां शारीरिक मेहनत और भारी मशीनों का बोलबाला रहा. लेकिन 2023 में भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया- रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में महिला अधिकारियों को शामिल करना. आज ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA) से निकली महिला अधिकारी इन विनाशकारी मशीनों को कमांड कर रही हैं.

यह सिर्फ जेंडर इक्वालिटी की बात नहीं है, यह बदलती हुई युद्ध कला का प्रतीक है. आज की तोपें शारीरिक बल से ज्यादा 'ब्रेन पावर' और 'डिजिटल इंटेलिजेंस' से चलती हैं. महिला अधिकारी इन डिजिटल प्रणालियों और फायर कंट्रोल सिस्टम्स को संभालने में बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं. 500 साल पहले बाबर की फौज में जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, आज वो हकीकत है.

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आर्टिलरी में नारी शक्ति

गोला-बारूद का संकट: यूक्रेन युद्ध से मिला सबक

तोप कितनी भी आधुनिक हो, अगर उसके पास गोले नहीं हैं, तो वो महज लोहे का ढांचा है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया कि लंबे युद्ध में गोला-बारूद (Ammunition) की कमी सबसे बड़ी हार का कारण बनती है. भारत ने इससे सबक लेते हुए 'प्रोजेक्ट 155' पर काम तेज कर दिया है.

अब भारत सिर्फ साधारण गोले नहीं, बल्कि 'स्मार्ट एम्युनिशन' बना रहा है. ये वो गोले हैं जिनके पीछे छोटे पंख (Fins) लगे होते हैं और ये हवा में अपनी दिशा बदल सकते हैं. यानी अगर दुश्मन थोड़ा हिल भी जाए, तो ये गोला उसे ढूंढकर मारता है. 

स्वदेशी गोला-बारूद बनाने के लिए मुनिशन इंडिया लिमिटेड (MIL) जैसी नई सरकारी कंपनियां और निजी फर्म अब दिन-रात काम कर रही हैं ताकि संकट के समय हम आत्मनिर्भर रहें.

526 साल का सफर (1526 vs 2026)

अब बात चल ही पड़ी है तो लगे हाथों 21 अप्रैल 1526 में इस्तेमाल हुई तोप की तुलना 21 अप्रैल 2026 के भारतीय तोपों से कर लेते हैं. एक चार्ट के जरिए इस अंतर को आसानी से समझिए.

फीचरबाबर की तोप (1526)आधुनिक होवित्जर (2026)
धातु (Material)कांसा या ढलवां लोहाटाइटेनियम और हाई-ग्रेड स्टील
वजनबहुत भारी, 50 हाथियों की जरूरतM777 मात्र 4200 किलो, चिनूक हेलीकॉप्टर से लिफ्ट
रेंज (Range) 500 से 800 मीटर38 से 45 किलोमीटर (स्मार्ट गोले के साथ ज्यादा)
सटीकतादिशा का अंदाजा, निशाना भाग्य के भरोसेGPS, लेजर गाइडेड और ड्रोन असिस्टेड
ऑपरेटरसिर्फ पुरुष तोपचीपुरुष और महिला अधिकारी (डिजिटल कमांड)
निर्माणउस्मानी कारीगर (विदेशी)आत्मनिर्भर भारत (स्वदेशी और प्राइवेट सेक्टर)

भविष्य का परिदृश्य: रैमजेट और एआई का युग

आने वाला वक्त 'रैमजेट' (Ramjet) तकनीक का है. भारत ऐसी तोप के गोलों पर काम कर रहा है जिनमें अपना छोटा इंजन होगा. इससे तोपों की मारक क्षमता 60 से 100 किलोमीटर तक बढ़ जाएगी.

साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब यह तय करेगी कि कौन सा गोला कब और कहां दागना है ताकि कम से कम नुकसान में ज्यादा से ज्यादा असर हो.

भारत का तोपखाना अब 'नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर' का हिस्सा है. इसका मतलब है कि एक जगह से दागा गया गोला दूसरी जगह तैनात ड्रोन या सैटेलाइट से सीधे बातचीत कर सकता है. 1526 में जो धमाका पानीपत में सुना गया था, आज उसकी गूंज डिजिटल है और मारक क्षमता अचूक.

ये भी पढ़ें: Rafale के लिए क्या भारत ने इंडोनेशिया और मिस्र के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकाई?

बारूद से डिजिटल ताकत तक

बाबर की तोपों ने भारत में एक युग का अंत किया था और दूसरे की शुरुआत की थी. आज की आधुनिक होवित्जर उसी विकासवादी प्रक्रिया का चरम हैं. 1526 के पानीपत से लेकर आज के लद्दाख तक, भारत ने न सिर्फ हथियारों को बदला है, बल्कि अपनी रक्षा सोच को भी बदला है. अब हम सिर्फ खरीदार नहीं हैं, हम निर्माता हैं.

यह सफर हमें सिखाता है कि तकनीक ही शक्ति है. जो देश समय के साथ अपनी मारक क्षमता को आधुनिक नहीं बनाता, इतिहास उसे पीछे छोड़ देता है.

भारत ने बोफोर्स के दौर की गलतियों से सीखा है और आज हम एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां हमारा तोपखाना न सिर्फ हमारी सरहदों की रक्षा कर रहा है, बल्कि 'मेक इन इंडिया' के जरिए वैश्विक मंच पर भारत की धमक भी बढ़ा रहा है. पत्थर फेंकने वाली उन भारी मशीनों से लेकर आज के 'डिजिटल किलर्स' तक का ये सफर हिंदुस्तान के बढ़ते कदमों की कहानी है. 

वीडियो: तारीख: अहमद शाह अब्दाली को पानीपत जिताने वाली तोप की कहानी, जिसे जजिया टैक्स से बनाया गया था

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