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यूरोपीय संघ से हो रही भारत की ट्रेड डील अमेरिकी डील से ज्यादा अच्छी क्यों है?

India-EU Trade Deal: भारत और EU के बीच इस डील को लेकर अंतिम तैयारियां चल रही हैं. कहा जा रहा है कि जनवरी 2026 के आखिरी सप्ताह में ये समझौता अंतिम रूप ले सकता है. इस डील में कृषि क्षेत्र को बाहर रखा जा रहा है, कुल मिलाकर ये भारतीय किसानों के हित में ज्यादा दिखती है. आइए विस्तार से समझते हैं कि ऐसा क्यों है.

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यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और PM मोदी (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)

भारत-यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच होने वाला मुक्त व्यापार समझौता (FTA) जल्द ही फाइनल होने की उम्मीद है. पर ये डील भारतीय किसानों के लिए अमेरिका के साथ संभावित समझौते से बेहतर क्यों है? ये सवाल काफी चर्चा में है, खासकर जब भारत और EU के बीच इस डील को लेकर अंतिम तैयारियां चल रही हैं. कहा जा रहा है कि जनवरी 2026 के आखिरी सप्ताह में ये समझौता अंतिम रूप ले सकता है.

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इस डील में कृषि क्षेत्र को बाहर रखा जा रहा है, लेकिन कुल मिलाकर ये भारतीय किसानों के हित में ज्यादा दिखतती है. आइए विस्तार से समझते हैं कि ऐसा क्यों है.

इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े हरीश दामोदरन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कृषि और किसान बहुत संवेदनशील मुद्दा हैं. 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार, देश में 14.645 करोड़ ऑपरेशनल किसान होल्डिंग्स हैं. और अप्रैल-जुलाई 2025 तक पीएम-किसान सम्मान निधि योजना से 9.714 करोड़ भूमि धारक किसान परिवार लाभान्वित हो रहे हैं.

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इतनी बड़ी संख्या में किसानों की आजीविका दांव पर लगे होने के कारण सरकार किसी भी FTA में कृषि को लेकर बहुत सतर्क रहती है. अमेरिका के साथ बातचीत में कृषि मुख्य रुकावट बनी हुई है. जबकि EU के साथ डील में इसे बाहर रखकर आगे बढ़ा जा रहा है.

सब्सिडी और प्रतिस्पर्धा का खेल

किसानों की सुरक्षा में सब्सिडी का लेवल काफी महत्वपूर्ण है. OECD की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोड्यूसर सपोर्ट एस्टिमेट (PSE) से मापा जाता है कि किसानों को टैक्सपेयर और उपभोक्ताओं से कितना समर्थन मिलता है. EU में 2022 से 2024 के बीच PSE औसत सालाना 973 अरब डॉलर (8 लाख करोड़ रुपये) रहा था. ये ग्रॉस फार्म रिसीट्स का 16.4% था. इसमें 586 अरब डॉलर (लगभग 5 लाख करोड़ रुपये) डायरेक्ट/मिसलेनियस पेमेंट्स में था. 162 अरब (लगभग 1 लाख 50 हजार करोड़ रुपये) इनपुट सब्सिडी और 225 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख 80 हजार करोड़ रुपये) कमोडिटी मार्केट प्राइस सपोर्ट शामिल हैं.

अमेरिका में 2022 से 2024 के बीच PSE 382 अरब डॉलर (3 लाख करोड़ रुपये के आसपास) था. ये ग्रॉस फार्म रिसीट्स का 7.1% था. डायरेक्ट पेमेंट्स 220 अरब (1 लाख 75 हजार करोड़ रुपये), इनपुट सब्सिडी 134 अरब (1 लाख 25 हजार करोड़ रुपये) और प्राइस सपोर्ट सिर्फ 27 अरब (लगभग 24 हजार करोड़ रुपये) था.

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भारत में 2022 से 24 के बीच इनपुट सब्सिडी में 479 अरब डॉलर (लगभग 4 लाख करोड़ रुपये) की थी. ये 54 देशों में सबसे ज्यादा है. डायरेक्ट पेमेंट्स 79 अरब (लगभग 64 हजार करोड़ रुपये) थी. लेकिन कमोडिटी प्राइस सपोर्ट नेगेटिव -1290 अरब डॉलर (10 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा) था. क्योंकि घरेलू नीतियां और निर्यात प्रतिबंधों से किसानों को मिलने वाली कीमतें निर्यात समता (export parity) से नीचे रहती हैं. नेट PSE -731 अरब डॉलर (लगभग 6 लाख करोड़ रुपये) रहा था. यानी किसानों पर प्रभावी रूप से टैक्स लग रहा है.

वहीं, चीन का PSE पॉजिटिव 2705 अरब डॉलर (20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा) है. ये उसके ग्रॉस फार्म रिसीट्स का 13.3% है. इससे साफ है कि भारतीय किसान पहले से ही घरेलू स्तर पर नुकसान में हैं. ऐसे में विदेशी सस्ते आयातों से उनकी स्थिति और खराब हो सकती है.

EU से खतरा कम, अमेरिका से ज्यादा

EU ज्यादातर कृषि कमोडिटी में कॉस्ट कॉम्पिटिटिव नहीं है. केवल कुछ प्रीमियम चीज (cheese) जैसे नीदरलैंड्स का गौड़ा (Gouda) चीज ही बड़ा खतरा हो सकता है. EU से संभावित आयात मुख्य रूप से वाइन, स्पिरिट्स या जैतून का तेल तक सीमित रह सकते हैं. जो भारतीय किसानों को ज्यादा प्रभावित नहीं करेगा.

दूसरी तरफ, अमेरिका के साथ FTA होने पर मक्का (कॉर्न), सोयाबीन, इथेनॉल और कपास का बड़े पैमाने पर आयात हो सकता है. अमेरिका इनमें अत्यधिक उत्पादक और सब्सिडाइज्ड है, जिससे भारतीय किसानों की आय पर गहरा असर पड़ सकता है. इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के प्रोफेसर अशोक गुलाटी कहते हैं कि EU से आयात का खतरा अमेरिका से कहीं कम है. जरूरत पड़ने पर 15% स्टेरलाइजेशन ड्यूटी लगाकर सब्सिडी प्रभाव को न्यूट्रलाइज किया जा सकता है.

भारतीय निर्यात के अवसर

EU के साथ डील भारतीय निर्यातकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है. 2024-25 (अप्रैल-मार्च) में EU को भारत के प्रमुख निर्यात इस प्रकार थे:-

झींगा और प्रॉन्स: 518.16 मिलियन डॉलर (लगभग 5 हजार करोड़ रुपये)
कटलफिश और स्क्विड: 361.79 मिलियन डॉलर (लगभग 3 हजार 200 करोड़ रुपये)
कॉफी: 775 मिलियन डॉलर (7 हजार करोड़ रुपये)
चाय: 93.57 मिलियन डॉलर (800 करोड़ से ज्यादा)
अंगूर: 175.5 मिलियन डॉलर (1500 करोड़ रुपये)
चावल: 279.34 मिलियन डॉलर (2500 करोड़ रुपये)
तिल के बीज: 77.66 मिलियन डॉलर (लगभग 700 करोड़ रुपये)
सूखा प्याज: 75.33 मिलियन डॉलर (675 करोड़ रुपये)
खीरा और घेरकिन्स: 57.86 मिलियन डॉलर (513 करोड़ रुपये)
जीरा: 59.47 मिलियन डॉलर (531 करोड़ रुपये)
हल्दी: 36.82 मिलियन डॉलर (324 करोड़ रुपये)

ये उत्पाद समुद्री भोजन, फल-सब्जियां, पेय, मसाले और चावल जैसे क्षेत्रों में भारत की ताकत हैं. EU समझौता इनके लिए बेहतर बाजार पहुंच दे सकता है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी.

कैसे भारत को फायदा होगा?

दूध और डेयरी भारत में करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका है. EU से प्रीमियम चीज के अलावा कोई और बड़ा खतरा नहीं है. सरकार डेयरी को संरक्षित रखने के लिए सतर्क है. कई पुराने विश्लेषणों में भी डेयरी को FTA से बाहर रखने पर जोर दिया गया है, क्योंकि लाखों महिलाएं और छोटे किसान इस पर निर्भर हैं.

EU-Mercosur डील (अर्जेंटीना, ब्राजील आदि के साथ) पर भी फ्रांस में विरोध हुआ और यूरोपीय संसद ने इसे कोर्ट में भेज दिया. क्योंकि बीफ, शुगर और पोल्ट्री के आयात से किसान प्रभावित हो सकते थे. भारत में भी किसान विरोध प्रदर्शन की राजनीति मजबूत है. इसलिए EU डील में कृषि को बाहर रखना समझदारी है.

EU के साथ समझौता भारतीय किसानों के लिए बेहतर इसलिए है क्योंकि EU ज्यादातर कृषि उत्पादों में प्रतिस्पर्धी नहीं. साथ ही आयात का खतरा भी सीमित है (मुख्य रूप से प्रीमियम चीज में). इससे भारतीय निर्यात (समुद्री भोजन, मसाले, फल-सब्जी, चावल आदि) को बढ़ावा मिलेगा. अमेरिका की तुलना में जहां मक्का, सोयाबीन जैसे उत्पादों से बाढ़ आ सकती है, EU से ऐसा जोखिम कम है. जरूरत पड़ने पर सुरक्षात्मक ड्यूटी जैसे उपाय उपलब्ध हैं.

ये डील किसानों की आजीविका को ज्यादा सुरक्षित रखते हुए भारत को वैश्विक बाजार में मजबूत स्थिति दे सकती है. कुल मिलाकर, EU वाला रास्ता सतर्क लेकिन फायदेमंद है. जबकि अमेरिका वाला ज्यादा जोखिम भरा.

वीडियो: UK के साथ कौन सी डील साइन होने वाली है?

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