The Lallantop

'उसकी इच्छाएं रेत पर तड़पती मछलियों ने ले ली हैं और वह उन्हें खा रहा है.'

एक कविता रोज़ में आज पढ़िये गद्यात्मक कविता या कवितामय गद्य सा कुछ नया - नए शेखर की जीवनी

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop
अविनाश मिश्र मेरे कुछ ही गिने चुने साहित्यिक मित्रों में से एक हैं, या केवल एकमात्र हैं. बाकी मित्र या तो साहित्य वाले नहीं हैं या बाकि साहित्य वाले, मित्र नहीं हैं. होने को 'साहित्य वाला' कहने से अविनाश को आपत्ति हो सकती है, लेकिन मैंने उनसे कुछ भी लिखने की 'आज़ादी' की 'आज्ञा' ले रक्खी है. अस्तु... 05 जनवरी, 1986 को जन्मे तो आज बड्डे है. पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे, अब कुछ बेहतर हैं. बीमारी, जितना उनसे बात करने पर पता चला, खतरनाक थी. इसलिए बोलने की आज़ादी के चलते इस जन्मदिन को अतिश्योक्ति में उनका पुर्नजन्म कहा जा सकता है. उनकी ‘अज्ञातवास की कविताएं’ शीर्षक से कविताओं की पहली किताब साहित्य अकादेमी से गए बरस छपकर आई है. ‘नए शेखर की जीवनी’ प्रकाशनाधीन है. उसी का एक अंश 'दी लल्लनटॉप' के पाठकों को पढ़वा रहे हैं.
शेखर - एक जीवनी अतीत में आ चुकी है, अज्ञेय ने लिखी थी.
‘नए शेखर की जीवनी’ में शेखर का पुनर्जन्म हुआ हो ऐसा नहीं है और न ही ये कोई टू पॉइंट ओ टाइप अपडेटेड वर्ज़न है. ये दरअसल अवसादों में उपमाओं वाला, अतिश्योक्ति में पुर्नजन्म वाला और पुराने शेखर में उत्प्रेक्षा वाला शेखर है.
इस नए शेखर में अविनाश नया है और इसलिए शेखर युवा है.
इस नए शेखर की फेसबुक में काफी बड़ी फैन फॉल्विंग है, ये तो नए शेखर के फैन और फॉल्वर्स जानते ही होंगे. नए शेखर की जीवनी की भी दो कड़ियां दी लल्लनटॉप पर आपको यहां और यहां पढ़वा चुके हैं, आज पढ़िये 'अविनाश मिश्र' कृत 'नए शेखर की जीवनी' की एक और क़िस्त. उससे पहले - अविनाश को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं.

नए शेखर की जीवनी

(नायक शब्द ‘नी’ धातु से बना है. इसका अर्थ है ले चलना, आगे बढ़ाना. छोटे से छोटा कलाकार भी अपने मन के किसी बहुत भीतरी कोने में यह महत्वाकांक्षा पाले रहता है कि एक बार वह भी किसी नाटक के कथानक को फलागम तक ले जाए... भले ही उसमें इतनी सामर्थ्य हो या नहीं!)

Advertisement
यह चक्रपालित ने कपिंजल से कहा था— सुरेंद्र वर्मा के नाटक ‘नायक खलनायक विदूषक’ में. यह शेखर खुद से कहता रहता है— महत्वाकांक्षा को रचनात्मकता के लिए भवभूति के बताए पांच नागों में से एक मानते हुए : उसे शुभकामनाओं के लायक होना चाहिए प्रशंसाएं उसे नालायक कर दें इससे पूर्व उसे अपने अवगुणों को दूर करना चाहिए उसका अतीत अपराधों का अतीत है और उसका आज सुधार-कार्यक्रमों की व्यस्तता राजनीति और व्यावहारिकता का बोझ ढोने में असमर्थ वह परनिंदा में कुशल रहा आया है ‘मुझे माफ किया जाए’ उसके इस वाक्य को भी कोई गंभीरता से नहीं लेता जबकि इसमें पर्याप्त गंभीरता होती है क्योंकि प्रायश्चित, प्रेम और कला के अतिरिक्त वह और जानता ही क्या है इतना कम जानना उसे वैसे ही कमजोर करता है जैसे उसकी लापरवाहियां उसे बीमार उसके कमजोर और बीमार क्षण उन दूसरों के लिए अवसर हैं जो उसके लिए दूसरे नहीं इस अवसर के बावजूद प्रायश्चित, प्रेम और कला उसे बचाए रखते हैं बनाए रखते हैं कहीं उसे भी समानता के संघर्ष में उन मूल्यों के बीच जिन्हें मानवीय कहा गया है ***
# शेखर सुंदरताओं की तलाश में बारिशों तक गया और हस्तक्षेप की तलाश में अकेलेपन तक, जबकि सबसे सुंदर बारिशें सबसे नकली और सबसे उत्तेजक थीं और सबसे जरूरी हस्तक्षेप सबसे निरर्थक थे. # अब वह जहां है, वहां बारिशें याद बन चुकी हैं. वैसे बारिशें कई तरह की उसने देखी हैं, लगभग उतनी ही तरह की जितनी कि ‘फॉरेस्ट गम्प’ के नायक ने वियतनाम युद्ध के दरमियान देखी थीं. एक दिन शुरू होकर चार महीनों तक नहीं रुकने वाली बारिशें. हर तरह की बारिशें सही उसने. छोटी-छोटी बूंदों वाली और बड़ी मूसलाधार बारिशें. बारिशें जो एक तरफ से आती थीं और कई बार लगता कि वे नीचे से आ रही हैं. हर वक्त होती रहने वाली बारिशें... # लेकिन इन दिनों उसके हिस्से की सारी बारिशें सबसे फूहड़ फिल्मों के सबसे फूहड़ गीतों में बरस रही हैं. नकली नायक और उत्तेजक नायिकाएं उनमें भीग रहे हैं. # उससे छूट गया सारा संगीत हेयर कटिंग सैलूनों, पान की दूकानों और सार्वजानिक वाहनों में बज रहा है. # वे किताबें जिन्हें वह मुफ्त में भी पढ़ने को तैयार नहीं है, एक बहुत बड़ी जनसंख्या खरीदकर पढ़ रही है. # वे सारे शब्द जिन्हें वह बहुत अविश्वसनीय और रूढ़ मान चुका है : त्यागपत्रों, शपथग्रहण के मौकों पर और हादसों के बाद इस्तेमाल हो रहे हैं. # उसके हिस्से की सारी हंसी विदूषक चुरा ले गए हैं और उसके हिस्से के सारे पाप खलनायक. # उसकी इच्छाएं रेत पर तड़पती मछलियों ने ले ली हैं और वह उन्हें खा रहा है. # वह नदी जिसे उसने कभी नाव से पार किया, एक रोज वही नदी उसे बस से भी पार करनी पड़ी. # यों कुछ बस में नहीं रहा... # बस के बहुत पीछे छूटते जाते रिक्शों और ठेलों पर बोझ इतना ज्यादा था कि उसे बस से उतरकर उन्हें घसीटना-धकेलना पड़ा. # वह फिर बस में चढ़ा और रिक्शों और ठेलों को खींच रहे पसीने में तरबतर चेहरे फिर पीछे छूटने लगे. # वह धक्के खाते हुए पार होने लगा और उसके साथ के लोग सिक्के फेंकते हुए. # यहां तक आते-आते नदी छूट चुकी है. # इच्छाएं, पाप, हंसी, शब्द, किताबें, संगीत, हस्तक्षेप और बारिशें तो नदी से पहले ही छूट चुके.
*** एक बहुत विद्वान आलोचक — जिनकी विद्वता का सार्वजनिक प्रकटीकरण उनके संकोच पर हावी है — से अपनी कुछ जिज्ञासाओं को साझा करते हुए शेखर ने जाना कि हिंदी में बायोडेटावाद मार्क्सवाद से भी पुरानी चीज है. उसने एक रोज जब खुद को सच्चा वामपंथी कहा, तब एक भूतपूर्व वामपंथी आलोचक उससे उसका बायोडेटा मांगने लगा. वह बेरोजगार था, इसलिए उसने कहा कि आप बायोडेटा सार्वजनिक करने के एवज में मुझे नौकरी दे सकते हैं?
हालांकि नौकरियों के प्रस्ताव उसके पास बहुत थे, लेकिन वह कुछ दिन तक केवल जीवनियां लिखना चाहता था. इस जीवन में अगर जीवनियां लिखने की एक नौकरी मिल जाती, तब वह उसे बहुत कम वेतन पर भी स्वीकार कर लेता. इस तनाव में उसने कभी-कभी बहुत कम शब्दों में कुछ देवियों और कुछ सज्जनों की कुछ जीवनियां सार्वजानिक कर दीं. इससे आहत होकर कुछ देवियों और सज्जनों ने कहा कि इस जीवनीकार की मां बचपन में मर गई थी, इसलिए यह ऐसा कर रहा है.
कुछ और देवियों और सज्जनों ने इस कथ्य को और आगे बढ़ाया और कहा कि इसका बाप भी बचपन में मर गया था. कुछ और और देवियों और सज्जनों ने इस कथ्य को और और आगे बढ़ाया और कहा कि वह बेरोजगार है, इसलिए ऐसा कर रहा है. मां-बापहीन और बेरोजगार होना सच था और इस वजह शेखर जीवनियां लिखने की पात्रता खो चुका था. ***
औसतताएं औसतताओं को वैसे ही आकर्षित करती हैं, जैसे कुलीबाजार के सूदखोर को लाटूश रोड का सूदखोर.
श्रेष्ठताएं ईर्ष्याओं से उतनी ही दूर हैं, जितना बादशाही नाका से बर्रा. एक उत्कृष्टता दूसरी उत्कृष्टता को वैसे ही आमंत्रित करती है, जैसे आनंदेश्वर जाने वाले शिव-भक्तों को आकर्षित करता है पनकी में बजरंगबली का दरबार भी, और परेड के चौराहे पर मिलने वाली बिरयानी के प्रशंसकों को रोटी वाली गली के कबाब-पराठे. बूचड़खाने की बू आस-पास बनी ऊंची इमारतों के वातानुकूलित कमरों तक भी घुसनी ही चाहिए, इससे बचाव करना शुद्धतावाद है. फरमाइशी वादों के समक्ष नतमस्तक फरमाइशी पक्षधरताओं से यह कहना कि जरा अपने गिरेबां में झांक लीजिए, यह भी शुद्धतावाद ही है. बांसमंडी में अब भी खरीदे जा सकते हैं बांस, लेकिन आश्चर्य है कि यह सुनकर चमनगंज में कुछ लोग चमन खरीदने पहुंच जाते हैं और फूलबाग में फूल... इन पंक्तियों पर वीरेन डंगवाल का असर है जो कुछ साल कानपुर में रह गए और अपनी एक कविता ‘कानपूर’ में कह गए :
‘मोतीझील में झील नहीं फजलगंज, चुन्नीगंज, कर्नलगंज में कुछ गंजे जरूर होंगे मगर लेबर दफ्तर और कचहरी में न्याय नहीं.’
अफीमकोठी से होते हुए जरीब चौकी जाना वैसे ही मुश्किल है, जैसे कुछ स्थायी महत्व का काम करते हुए बहुत तात्कालिक गद्य लिखने लगना. बहरहाल, शेखर अकेले और पैदल घूम चुका है पूरा शहर, उस उम्र में ही जब किसी की उंगली पकड़कर घूमना होता है. वह रह चुका है शहर की सबसे गंदी गलियों से लेकर, शहर की सबसे संभ्रांत कॉलोनियों तक में. ***

इस कथ्य के आखिरी हिस्से में आए कुलीबाजार, लाटूश रोड, बादशाही नाका, बर्रा, आनंदेश्वर, पनकी, परेड, रोटी वाली गली, बूचड़खाना, बांसमंडी, चमनगंज, फूलबाग, मोतीझील, फजलगंज, चुन्नीगंज, कर्नलगंज, अफीमकोठी और जरीब चौकी... कानपुर की कुछ मशहूर जगहों के नाम हैं.


अविनाश मिश्र को और अविनाश मिश्र के बारे में और पढ़ें:

एक कविता रोज़: अविनाश मिश्र के 'अज्ञातवास की कविताएं' ‘फूल और कांटे’ टाइप फिल्मों के आशिक बहुत बदतमीज होते थे शेखर के मत के बगैर भी चुनी जाती हैं सरकारें पूर्ण बहुमत से

Video देखें:

अविनाश मिश्र दी लल्लन टॉप अड्डे में:

Advertisement
Advertisement