इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट आई थी. होम मिनिस्टर उछल पड़े. क्या बात. क्या बात. फिर धीरे से उन्होंने तीसरी बार भी क्या बात कहा. जब तक वो तीन बार कुछ कह नहीं लेते थे, चैन नहीं मिलता था. इसके बाद तीन बार उन्होंने अपनी जेब के पेन को ठीक भी किया.
‘पर सर, एक और बात है.’
होम मिनिस्टर ने पहले ब्यूरो चीफ, फिर सीबीआई चीफ और अंत में चपरासी को देखा और अनमने ढंग से कहा एक तो कह ही लिये. एक क्या, दो और कह लो. खुशी का मौका है. एक सप्ताह में तो आ रही है बकरीद.
‘सर, सारे मुसलमान इस बार बकरीद हिंदू रीति रिवाज़ से मनायेंगे.’
होम मिनिस्टर साहब की आंखें छलछला गईं. तुरंत मिठाई ऑर्डर कर दी. राष्ट्रगान बजाने का हुक्म दिया.
‘सर, पूरी बात सुन लीजिए.’
होम मिनिस्टर खड़े होने लगे. सुनाइए, हमने रोका थोड़ी है. आधी सुनाइए. पूरी सुनाइए.
‘सर, ये लोग बकरीद दिवाली की तरह मनायेंगे. पटाखों के साथ.’

फ़ैक्ट: साल 2017 की दीवाली के आस-पास सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली/एन सी आर में पटाखों की बिक्री पर बैन लगाया था.
करुण दृश्य पैदा हो गया. सबकी निगाहों में पानी आ गया. होम मिनिस्टर साहब ने फिर कुछ ऑर्डर करने के लिए फोन किया, पर कुछ कह नहीं पाए, गला रुंध गया. सीबीआई चीफ ने तुरंत घर पर मैसेज किया. I wl com let 2de. Party tim. Big news. Wl tl latr. Dnt tel nyon.
‘पर सर, 20 करोड़ मुसलमान हैं देश में. सबके पास पटाखे होंगे.’
सीबीआई चीफ ने तुरंत आंखें घोर निराशा में बंद कीं. जैसे कोई रहस्य खुल गया सामने. फोन पर कुछ मैसेज टाइप किया. कि गलती से चला गया. मजाक था. फिर मिनिस्टर की ओर देखते हुए कहा कि आजकल पटाखे पटाखे नहीं होते साहब, बम होते हैं. दुकानदार बम कहकर बेचते भी हैं. कई पटाखे मिला दें तो बम की तरह काम भी करेगा. २० करोड़ हाथों में बम!
‘सर, हाथ तो चालीस करोड़ हैं.’
होम मिनिस्टर का चेहरा लाल हो गया.
तुरंत इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई. तीनों सेनाओं को सूचित किया गया. जवानों की छुट्टियां कैंसिल की गईं. पुलिस को चौकन्ना रहने का आदेश दिया गया. कमांडो फोर्सेज़ को हेलिकॉप्टर तैयार रखने के लिए कहा गया. जीआरपीएफ को कहा गया कि आप लोग जो कर रहे हैं, वही करिए. ज़्यादा इधर-उधर पूछने की ज़रूरत नहीं है. नक्सली ऑपरेशन पर ही फोकस रखिए. पहले ये बताइए कि आपको पता कहां से चला कि इमरजेंसी की स्थिति आ गई है? और आ ही गई है, तो जंगल से आप क्या कर लेंगे? अगर आपका फोन कटवा दें अभी तो आप किसी काम के रहेंगे? ढंग का ड्रेस तो है नहीं आप लोगों के पास, क्या बकवास कर रहे हैं. रहने दीजिए.

प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर थे. कहा गया कि आप उधर ही गए हैं, तो यूरोप और दक्षिणी अमेरिका भी घूम आइए. देख लीजिए कि फुटबॉल वर्ल्ड कप की क्या तैयारी चल रही है. वहां पर बड़ी-बड़ी स्क्रीनें भी लगी हैं. फोटो चमकेगा, तो चर्चा भी होगी. वैसे वहां कोई पहचानता भी नहीं, फोटो खिंचाने का मन न हो तो मॉल वगैरह घूम लीजिएगा. उनको कुछ बताया नहीं गया. क्योंकि मूड खराब करना ठीक नहीं होता. कोई बाहर गया हो तो मन हल्का करेगा या ऐसी बातें सुन के बोझ बढ़ायेगा. काम-धाम तो लगा ही रहता है.सारे राज्यों की पुलिस चौकन्नी हो गई. सब थानों से निकलकर बाहर घूमने गये. ठेलेवालों को पीट-पाट दिया. मोड़ पर एक पुलिसवाला सूआ लेकर खड़ा हो गया. वहां से गुज़र रहे हर ऑटोरिक्शा की हवा निकाल दी. पान की दुकान से लेकर मोची की दुकान, सबको अलर्ट कर दिया गया कि कुछ होगा तो तुरंत बताना है. फिर कुछ समझ नहीं आया तो शाम को सारे पुलिसवाले थाने वापस लौट आये. जो अपने घर चले गये, उन्होंने अपने बच्चों को दम भर बेल्ट से कूटा.
अगले दिन पटापट इंटेलिजेंस की खबरें आने लगीं. कहीं पर किलो के भाव से पटाखे बिक रहे थे, कहीं पर छुट्टा. अभी तक कहीं से भी खूब भारी मात्रा में पटाखे बिकने की खबर नहीं आ रही थी. कई जगहों पर कई मुसलमान परिवार पटाखों के दाम पूछ के वापस जाते दिखाई दे रहे थे. यूपी पुलिस ने खुफिया सूचना दी कि कोई बड़ा कन्साइनमेंट आ रहा है. दाम पूछना और धीरे से वापस चले जाना किसी कूट संकेत की ओर इशारा करता है.

तुरंत आईआईटी और आईआईएम के बंदों को लगाया गया काम पर. कोड तोड़ना है. आईटी सेल में बैठाया गया इनको. पसमंजर में सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा बज रहा था. धीमे-धीमे. कुछ लोगों ने इयरफोन लगा लिया और कर चले हम फिदा जानोतन साथियों सुनने लगे. कई का मन नहीं लग रहा था. क्योंकि इन्होंने जैसे-तैसे इंजीनियरिंग पास कर ली थी. बुला लिया गया तो आ गये थे, कुछ आता थोड़ी था. नौकरी ही तो लगती है इन कॉलेजों से. कुछ आता तो गूगल और फेसबुक नहीं चले गये होते सारे. सीवी में यूं ही हैकिंग को अपना इंटरेस्ट बता दिया था. यहां आने के पीछे मंशा थी कि शायद परमानेंट सरकारी नौकरी मिल जाये बाद में. टच में रहना चाहिए.ये दिन भी बीत गया. हर जगह से एक ही तरह की खबरें आ रही थीं कि मुसलमान हार के हार घर से निकल रहे हैं, मार्केट में जाकर दाम पूछ रहे हैं और बिना कुछ खरीदे वापस आ-जा रहे हैं. बहुत तनावपूर्ण स्थिति हो गई थी. ये संकेत समझ नहीं आ रहे थे. उधर इराक और अफगानिस्तान के कुछ संदेश डिकोड किये गये थे. वो लोग रक्का की लड़ाई हारने के बाद कहीं फंसे हुए थे. पानी पीने का भी जुगाड़ नहीं था. चीफ चप्पल भी टूटी पहने था. पर बात यही हो रही थी कि साउथ एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना है. दिल जीतना है.
इधर रोहिंग्या मुसलमानों ने प्रदर्शन करना भी बंद कर दिया था. कहने लगे थे कि देश से निकालना है तो निकाल दो. हम कुछ नहीं कहेंगे अब. केरल से दो मुसलमान लड़के भाग के मुंबई चले गये थे. दो दिन बाद वापस भी आ गये. बंगाल में एक मुसलमान लड़के ने एक हिंदू लड़की से शादी की और फिर सबके विरोध के बाद तोड़ दी थी. लड़की से डायलॉग मार के गया था कि तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है. अल्लाह चाहेंगे तो सब अच्छा होगा. सब कुछ यहीं तो नहीं मिलता न. ऊपर भी मिलेगा. ये सब सुन के इंटेलिजेंस एजेंसिज़ घबरा सी गई थीं.
अगले दिन होम मिनिस्टर साहब ने तकरीबन हर एजेंसी के चीफ को और हर राज्य की पुलिस के चीफ को फोनकर फटकार लगाई, 'कोई अभी तक पकड़ा नहीं गया, कहीं से कोई खतरनाक सामान नहीं बरामद हुआ. अभी तक तो प्लानिंग करते चार-पांच युवक भी नहीं धराए. क्या कर रहे हैं आप लोग?' कुछ देर बाद उन्होंने दोबारा फोन करने की कोशिश की. सबके फोन बिज़ी आ रहे थे. घंटे भर बाद उन्होंने तिबारा सबको फोन घुमाया. फिर किसी ने नहीं उठाया. तय हुआ था कि कुछ मिलेगा तभी बतायेंगे. क्योंकि पिछली बार की बात में होम मिनिस्टर साहब ने ही कहा था कि कुछ मिले तभी अपनी भद्दी आवाज सुनाना. तो लोगों ने इनके फोन को इग्नोर करना शुरू कर दिया. क्योंकि अनुमान था कि इनका पीए होगा, जो अपने किसी आदमी को इसी इमरजेंसी के बहाने कहीं पोस्टिंग कराना चाह रहा होगा.शाम हो गई थी. सारे लोग चले गये थे. बस कुछ नौकर और माली रह गये थे बंगले पर. होम मिनिस्टर साहब को चाय की तलब महसूस हुई. तुरंत चपरासी को फोन किया कि आदिल, चाय लेकर आओ. फिर कुछ सोचने लगे. सोचते-सोचते आंख झपक गई. अचानक दिमाग घूम गया इनका. आदिल. आदिल. ये तो मीटिंग में भी था. तब से अब तक शांत भी है बहुत. कल मार्केट भी गया था. घंटों उधर ही रहा. फोन भी नहीं उठाया. अभी चाय ला रहा है. हे भगवान! कहीं ऐसा तो नहीं कि होम मिनिस्टर को मारने का प्लान हो. सारी बातें ध्यान भटकाने के लिए हों. प्रधानमंत्री हैं नहीं देश में. होम मिनिस्टर के असेसिनेशन से बड़ी बात क्या हो सकती है. उनके अपने बंगले पर. क्या ये वही संदेश तो नहीं है कि दिल जीतना है. आदिल. दिल. आदिल. दिल. दिल. आदिल. इनकी भुजाएं फड़फड़ा उठीं. अपने सदा शिव आदर्श इंटर कॉलेज में पढ़ने पर गर्व भी हुआ. उस वक्त के मास्टर मार-मार के पढ़ाते थे. तभी दिमाग क्लियर था एकदम. आजकल के बच्चे सेंसिटिव बहुत हैं. कल से बैठे हैं चिप्स और कोल्ड ड्रिंक लेकर. क्या पता कर पाए. गांव का ये छोरा कोड तोड़ ले गया.
क्या करूं? बाहर जाऊं या कमरे में ही रहूं? बाहर निकलते ही बम दाग दिया तो? और बाहर ना निकलने पर कमरे में ही दाग दिया तो? इतना बड़ा बम नहीं होगा उसके पास. हुआ तो?
तब तक दरवाज़े की घंटी बजी. और उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना दरवाज़ा धकेलकर आदिल अंदर आ गया. ट्रे में बड़ा सा मग रखा हुआ था. एक छोटा सा गिलास. मिनिस्टर साहब का पसंदीदा हिमालयन पानी भी था बड़े गिलास में. कुछ ऐसा-वैसा दिख नहीं रहा था. टेबल पर आदिल ने ट्रे रख दी और टीवी ऑन कर दिया. टीवी पर ताजमहल को लेकर विशेष चर्चा हो रही थी. एंकर बार-बार कह रहे थे कि 400-500 साल पहले बनी इमारत से ऐसा व्यवहार ठीक नहीं है. 400 कहते ही एक जोगी बाबा उछल पड़ते औरंगज़ेब भारत के इतिहास का सबसे क्रूर शासक रहा है. 500 कहते ही एककाबिल मास्टर कहते कि अकबर महान नहीं था. एक मौलवी साहब ने कहा धीरे बोलिए, समझ नहीं आ रहा. तुरंत ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश होने लगी. जर्रानाबाद के शाही इमाम ने जारी किया फतवा, ज़ोर से बोलने को किया मना. मौलवी साहब ने अपने मुंह पर उंगली रख ली. तुरंत फ्लैश हुआ मौलवी ने ऐसी जगह रखी उंगली, जानकर रह जायेंगे दंग.आदिल हंसने लगा. बोला कि ताजमहल तो गिरा ही देना चाहिए. मिनिस्टर साहब चौंक गये. भक्कू की तरह देखने लगे. बोले नहीं यार, क्या बात करते हो. नहीं सर, पूरा बचपन पढ़ के बिता दिये कि चांदनी रात में यमुना में नौका विहार, चांदनी रात में ताज का सौन्दर्य. सब पे निबंध भी लिखे हैं. लेकिन अब तो शाम सात बजे ही वहां से भगा देते हैं. क्या फायदा ऐसे ताज का और ताज के दीदार का. मिनिस्टर साहब बोले कि अरे नहीं, हम गये थे तो नौ बज गये थे फिर भी कोई नहीं रोका. बोलते-बोलते खुद ही चुप हो गए कि क्या फालतू बोल रहे हैं. कौन रोकेगा. रोके तो गिरवा नहीं देंगे.

दिवाली पर पटाखे जलाते बच्चे
चाय की पहली घूंट लेकर ही मुद्दे पर आ गये. पटाखे खरीदे हो आदिल? आदिल कुनमुना गया. थोड़ा सा. क्या करोगे उसका? आदिल हंसने लगा. सच बताऊं तो काफी खरीदा है. पर छोड़ूंगा नहीं. कुछ दिनों में दीवाली आनेवाली है. बेचूंगा. मेरे मुहल्ले के ज्यादातर मुसलमानों ने यही प्लान किया है. इससे हाथ में चार पैसे आ जाएंगे. दिवाली पर बिकवाली ज़्यादा होगी पटाखों की. अभी तो उतनी बिक नहीं रही है. इमाम ने प्रस्ताव रखा था. पर सबको इंटरेस्ट नहीं है इस प्रस्ताव में. कहां अपने पैसे का मटन खाना और कहां पटाखों में आग लगाकर पैसा फूंक देना. चुनाव होता तो इमाम हार गये होते.
होम मिनिस्टर साहब को कुछ कुछ समझ आने लगा था. खुद की समझ पर गर्व हुआ. तुरंत-तुरंत सब समझ जाते हैं. बौद्धिक ट्रेनिंग बहुत सही हुई है बचपन में.
टीवी पर माहौल बदल गया था. कोई ओ बेसी नाम के शख्स थे. कह रहे थे पंद्रह मिनट के लिए दुकानों से दुकानदार हटा दो, सारा पटाखा लूट लेंगे मुसलमान. तुरंत किसी करुण गेंदी का बयानआया. हमसे पहले किसी ने लूटा तो सिर काटकर लटका देंगे.
होम मिनिस्टर साहब थोड़े आश्वस्त से हो गये. एक सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पढ़े थे. अंदाजा लगाये कि हर जगह तो यही हाल है. हर जगह मुसलमान पटाखे बेचने के चक्कर में ही होंगे. पर ये भीफेल ही रहेगा. क्योंकि जो दुकानदार इनको बेचेंगे, वो दीवाली पर संन्यास थोड़ी ले लेंगे. अरे यार! कहीं ऐसा ना हो कि मुसलमान पटाखे खरीद लें, छोड़ें भी नहीं और बेच भी ना पायें. तो क्या करूं किमैटर हाथ के हाथ बदल जाये. बिना पैनिक हुए सलट जाये. बाकी मंत्रियों को कैसे समझाऊं जो पाकिस्तान के टैंकों के बारे में पढ़ रहे हैं और लाहौर में नाश्ता करने की स्पीच तैयार कर रहे हैं.उधर टीवी पर पतली आवाज में कोई एक्टर कह रहा था जो आग में कूद जाए, वो राजपूत. जो आग से झुलस जाये, वो राजपूत. जो आग बुझा दे, वो राजपूत. जो आग लगा दे, वो राजपूत. जो फायरब्रिगेड को बुला दे, वो राजपूत. मिनिस्टर साहब ने स्विच टीपते हुए कहा जो टीवी ऑफ कर दे, वो राजपूत. फिर सोचने लगे. प्रधानमंत्री तो अगले सप्ताह आयेंगे. बीच में अफगानिस्तान यामंगोलिया भी उतर सकते हैं. तो कोई कड़ा फैसला लेना ही होगा. चूंकि मामले को सिर्फ मैं समझता हूं. पर अपनी बात कैसे मनवाऊं? परिक्रमा का पराक्रम दिखाना ही होगा. इतने दिन से इतनाव्यवहार बनाया है संघ से.

नोटबंदी के बाद आए 2000 के नोट
खूब सलाह मशविरा हुआ. कई नेता तो मीटिंग से निकलने के बाद रोते हुए पाये गये थे. गुप्त सूत्रों से पता चला कि कुछ लोगों को दबा के मशविरा दिया गया था. याद दिलाया गया था कि जबपुलिस पीछे पड़ी थी, चोरी करके भागे थे, तब कौन तुमको महीना भर बेसमेंट में रखा था. सामने से जवाब आया कि लैट्रिन नहीं था वहां पर, पॉलिथीन का प्रयोग करना पड़ा था. पर सहमति में सिरहिलाना पड़ा. केस खत्म थोड़ी हुआ था. दबा था बस. कुछ लोगों को उनके उद्यमशील बेटों का परिचय दिया गया तो वो आश्चर्य प्रकट करने लगे कि अच्छा ऐसा है. पर बात माननी पड़ी. कुछ लोगोंको उनके निजी जीवन के मनोहारी चित्र दिखाये गये. तो उन लोगों ने सहमति में सिर इतना नीचे झुका लिया कि मीटिंग खत्म होने तक उठा ही नहीं.बाहर आकर होम मिनिस्टर साहब ने घोषणा कर दी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में. आज से सारे नोट बंद. कागज़ के टुकड़ों की कीमत भी उनसे ज़्यादा है. पचास दिनों की बात है. किसी ने भी चूं-चपड़ की तो चौराहे पर फांसी दे दी जाएगी. फिर अंत में दार्शनिक भाव से कहा कि मैं तो फकीर हूं, किसी का भी झोला उठा के चल दूंगा. अगले दिन फाइनेंस मिनिस्टर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुझे तो पता ही नहीं था. प्रधानमंत्री जी को भी नहीं बताया गया है. ये फैसला बहुत गोपनीय ढंग से लिया गया है. देश हित में. एक सेक्रेटरी साहब थे. वो सुबह-शाम टीवी पर आने लगे. खूब जोक मारते थे.
नतीजा ये हुआ कि मुसलमानों का कहा भी रह गया और वो पटाखे खरीद भी नहीं पाये. देश सुरक्षित रहा और सरकार की बेइज़्ज़ती भी नहीं हुई. अगले महीने संविधान के आर्टिकल 368 में जोड़ दिया गया कि सरकार जब चाहे, नोट बंद कर सकती है. इकॉनमी से लेकर इंटर्नल सिक्योरिटी सबका हवाला दिया गया. इसको पुख्ता बनाने के लिए आर्टिकल 14 में जोड़ा गया कि कोई भी सरकार, केंद्र की या राज्य की, बराबर भाव से नोट बंद करने का फैसला ले सकती है. आर्टिकल 32 में जोड़ा गया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट नोटबंदी से जुड़े फैसलों पर मुंह क्या अखबार तक नहीं खोलेंगे. भूटान, बांग्लादेश और नेपाल को इस फैसले की एक एक कॉपी फैक्स कर दी गई.उसके अगले महीने होम मिनिस्टर साहब को देश का राष्ट्रपति बना दिया गया. खूब रो रहे थे शपथ ग्रहण के वक्त. हालांकि कह ये रहे थे कि पार्टी से रिश्ता खत्म होने की वजह से हो रहा है, और थोड़ा मिर्ची के हाथ से आंख रगड़ भी लिये हैं. पर कोई मान नहीं रहा था.
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