तकरीबन छः महीने पहले के इस घटनाक्रम पर उस दिन बेइंतेहा चिढ़ आ रही थी. पूरे मोहल्ले में एक गुप्ता ही मिला था पापा को लड़ने के लिए? और उससे ज्यादा गुस्सा इस बात का कि पूरे मोहल्ले में इस खूबसूरत सी लड़की के घरवालों को एक गुप्ता का ही घर मिला था किराए पे लेने को?इतिहास गवाह रहा था हमने जो पेपर देने जाते वक्त गुप्ता के घर की ओर देखा था, उसमें तकरीबन फेल हो गए थे. बाज़ार से दूध लेने जाते वक्त गलती से गुप्ता का घर दिखाई पड़ जाता तो निश्चित दूध फट जाता था. ये गुप्ता का घर ही पनौती था. पर मोहल्ले की इस नई लड़की को देखने का ज़रिया भी गुप्ता का घर ही हो गया था, अब कैसे पनौती कहाता? अंधविश्वास निर्मूलन ऐसे ही हो सकता है. मंगलवार की शाम थी. बजरंग बली का वार, और हमारी शाम. गुप्ता के छत से मोहल्ले की नई लड़की अपने नए मोहल्ले को निहार रही थी. और हम अपनी छत से मोहल्ले की इस नई रौनक को. बेतरतीब से बिखरे सुनहरे बाल और शाम की केसरिया किरणों में चमकता सा चेहरा. भक्क. सीधे शब्दों में ये लड़की गदर ढ़ा रही थी. सो हमने बगल में पड़ी विक्की वाली गेंद उठाई और आहिस्ता से गुप्ता की छत पर दे फेंकी. “अ, सुनिए! वो हमारी गेंद चली गई है आपकी छत पर, ज़रा दे दीजिएगा..." आवाज़ को ज़रा सौम्य कर के मैं बोला. झटपट शर्ट का गिरा कॉलर खड़ा करते, और बिखरे बालों में एक हाथ फेरते मैं उसकी ओर देख रहा था. “अकेले ही खेलते हो क्या? और छक्के मारने का इतना ही शौक है तो मैदानों में क्यों नही चले जाते? अगर ये गेंद हमें लग जाती तो तुम तो सॉरी बोल कर कट लेते, दर्द तो हमको होता न. नही देंगे तुम्हाई गेंद. और ज्यादा क्रिकेटर के पोंछ हुए हो तो नई खरीद लेना!" हम जिसको सोनपरी समझ रहे थे वो तो हिटलर की अम्मा निकल गई. “अच्छा, आप कानपुर से हैं क्या?" कनपुरिए लहज़े में हुरपेटे जाने की एक अलग ही फीलिंग होती है, वो समझ आ जाता है.
“हम कहां से हैं उससे क्या लेना-देना तुमको? गेंद आई है तो गेंद से ईं मतलब रखो बस." “नही वो लहज़े से लगा ज़रा. और फिर गेंद तो आप देंगी नही कह रही हैं, तो हम सोचे कुछ और ही चीज़ों से मतलब रखा जाए." अब बातें छिड़ गईं थीं हमारे बीच, गेंद फेंकना सफल रहा जवान. “एक बात बताओ, कहां से सीखते हो ये सब बोलना?" कह कर ज़रा सा हंसते हुए उसने हमारी गेंद हमारी ओर फेंक दी और नीचे जाने लगी. “अरे सुनिए! अरे नाम तो बता दो अपना! अरे! अच्छा, धन्यवाद! हां, थैंक्यू! बाय!" हम चिल्लाए.सीढ़ियों तक जाते जाते वो लड़की वापिस मुड़ गई. नही...था तो ये अच्छा ही सिग्नल पर हमारी फट गई. जाने इस बार कोई गाली ही न दे दे. पर ये कनपुरिए न, बड़े अनप्रेडिक्टेबल चीज़ होते हैं. मोहल्ले की नई लड़की घूमी, चलते हुए गुप्ता और हमारे छत की छूती दहलीज़ पर आ खड़ी हो कर बस कहा, “रिया", और फिर चली गई. यूं तो रोमैंटिक सी चीज़ें बहुत हुईं थी उस शाम, पर हमारी भी फ़ितरत देखिए कि इश्क़ हमको डांट खाने से ही हुआ था. हम छत की खूबसूरती से नीचे उतरे कि मम्मी के प्रपंच से हमारे इश्क़ की मुश्किलातों का अंदाज़ा मिलने लगा. “ये गुप्ता की नाली पूरा दरवाजा छेंक ली है हमारा! जीना हराम हो गया है इसके घर के बगल में. दिन-रात पानी बहाता है, सड़क का किच्चा बना रखा है. और आज तो इसी का एक रिश्तेदार आया है, हमारी दीवार पे पान थूक दिया हरामखोर!" वो जैसे पीयूष मिश्रा के हुस्ना गाने में प्रेमी-प्रेमिका के बीच भारत-पाक का बॉर्डर था न, वैसे हमारे और रिया की प्रेमकहानी के बीच में ये नाली बह रही थी. न भारत-पाक बॉर्डर हट सकता है, न ये नाली हटती, पर इश्क़ तो पनपेगा ही. तकरीबन हर शाम छः बजे हम अपने छत पर पहुंच जाते और पांच-दस मिनट में छत पर पहुंचने का कारण आ जाता. हर दिन हमारी दोस्ती कुछ नए मुक़ाम हासिल कर रही थी, हर दिन दोस्ती से ज़रा आगे बढ़ रही थी. रुझान बदल रहे थे. सोच भी. इतना बदलाव कि अब कुछ भी करने घर से निकलता तो गुप्ता के घर की तरफ देख कर ही निकलता, लगता कि ऐसा करना शुभ रहेगा. गज़लों में इंटरेस्ट बढ़ गया था. पर नाली वाली समस्या तो थी ही.
“आज कितना प्यारा मौसम है न!" सूरज को डूबता देखते हुए हमारी जिंदगी के एक बेहद महत्वपूर्ण दिन रिया ने हमसे कहा. हर शाम की तरह हम अपनी छतों पर बैठे हुए थे. “यार रिया एक बात कहें?" हम बोले. “एक बात कहें, एक बात कहें क्या करते रहते हो? हम नही कह देंगे तो क्या नही बोलोगे? बोलना होगा तो बोलोगे ही!" हम चुप हो गए. “अच्छा बोलो." रिया ने कहा. “यार ये पानी ज़रा कम गिराया करो तुम नहाते-वहाते समय. गुप्ता के घर की नाली पूरे दरवाज़े पे आ जाती है हमारे!"बात मौसम से शुरू हुई थी और हमने नाली पे ख़त्म की. रिया उठी और चली गई! गुस्सा गई होगी शायद. पर अच्छा तुम ही बताओ उस डूबते सूरज को डिस्कस करना ज्यादा जरूरी था कि हमारे घर के सामने बहती नाली को? नाली का क्या हुआ या गुप्ता का क्या हुआ या हमारी छत या उस डूबते सूरज का क्या हुआ. ये वो बातें हैं. जो आप जानना भी न चाहते होंगे. सबसे खास रहा वो गुस्सा कर उठ जाना. वो एक प्रमाणपत्र सरीखा था. तो इस तरह उस महत्वपूर्ण दिन हम बन गए थे, ऑफिशियल बातें करने वाला, ऑफिशियल बॉयफ्रेंड.
'मडुआडीह से धूल का बवंडर उठता है, बनारस में वसंत अचानक आता है'























