ऐसा पहले भी हुआ था. तब पंडित रामचंद्र का बेटा नीरज बंदूक लेकर आया था. एक गोली लगने पर सांप उछल पड़ा था. बड़ी मुश्किल से मारा गया था. नीरज उस दिन भी बंदूक लेकर आया था. अमीना उसके पीछे खड़ी हो गई. नीरज ने उसे पीछे से खींचकर सामनेवाले कमरे में बंद कर दिया था. फिर कुछ धड़धड़ की आवाज हुई थी. लगा सामान उलटा पलटा जा रहा है. फिर चीखने की आवाज आई. वो आवाज फिर दूर निकलती गई. अचानक लगा कि घर से सारे लोग चले गये हैं. अमीना ने बहुत देर बाद दरवाजा खोलने की कोशिश की. पर हतभाग्य, ये तो खुला ही था. नाहक लगा था कि सेफ्टी के लिए नीरज ने बंद कर दिया था. वो भागी बाहर गई थी. फिर उसे कुछ याद नहीं रहा. अब यही पता है कि फ्रिज में बीफ नहीं रखना चाहिए था. अल्लाह का शुक्र है कि मियां बच गये. वरना गुनाह तो बड़ा था ही. अमीना ने सबसे माफी मांगी थी. रोज वो घर के बाहर खड़ी हो जाती और हर आने जाने वाले से माफी मांगती. कि जाने दो टीपू की गलती थी, अब्बा ने तो नहीं की थी. मुझे भी कहां पता था. शुरू में लोग सहम जाते थे. कुछ कुछ बोल देते थे. बाद में लोग हंसने लगे थे अमीना की बात पर. तब अमीना को लगने लगा था कि सबकुछ ठीक हो गया है अब. तभी तो लोग मुस्कुराने लगे हैं. मिल जुल के रहने में ही भलाई है. पर नीरज अभी भी सहम जाता था अमीना को देख के. एक उसी से माफी नहीं मिली थी. ऐसा अमीना को लगता था.उस रात टीपू ने कहा था कि आज मीट अब्बा बनायेंगे. अम्मी को बनाने नहीं आता. तब तक मकरंद आ गया. मकरंद टीपू के साथ मीट खाता था. उसके घर में मीट की मनाही थी. टीपू ने कभी किसी को बताया नहीं था. अभी गैस जलाई ही थी कि मकरंद का फोन बज गया. वो बाहर चला गया. तब तक १५-२० लोग घर में घुस आये. शोर शराबा होने लगा. अमीना को लगा सांप निकल आया है.
लगने वाली बातें घूम-फिरकर सामने आ जाती हैं.अब दिन अचानक गेरुए होने लगे थे. सितंबर के महीने में धूल उड़ती, जैसे कोई रामरज से होली खेल रहा हो. पर दिन के बाद शाम नहीं होती थी. अचानक रात हो जाती. रात के बाद भोर नहीं होती थी. अचानक सूरज नारंगी रंग का होकर चमकने लगता था. रातें हरी होती थीं. चांद की तरफ देखने में डर लगता था. ऐसा लगता हरे रंग की गाय पत्थर की एक आंख लगवाकर घूर रही है. अमीना जब भी बोलती, उसे लगता खूब घंटे घड़ियाल बज रहे हैं. घबराकर वो कुछ सोचने लगती थी आजकल. पर इस क्रम में मन में भी कोई बात बोलती तो लगता कि चार पांच लाउडस्पीकर लगातार बज रहे हैं. वो पसीने पसीने हो उठती. टीपू उसकी किसी बात का जवाब नहीं देता था उस वक्त. खिड़की से बाहर देखता रहता. जब सुबह होती तो अचानक बोल उठता देख अम्मी वहां तालाब के कीचड़ में कमल खिल रहा है. एक भौंरा बैठा है उस पर. फिर उसके अब्बू आ जाते और टीपू आलमारी के पीछे छुप जाता.
आज अमीना बहुत खुश थी. कल से नवरात्रि शुरू हो रही थी. रामलीला होती थी गांव में. टीपू बचपन में सीता बना करता था. इतना प्यारा था. मकरंद राम बनता था. अमीना ने तय किया था कि रात होने से पहले वो नीरज से पूछेगी. बोलेगी कि माफ कर दो. अब तो रामलीला होगी, तो चाची को नहीं दिखाओगे.चौराहे पर अमीना खड़ी हो गई. बड़ी देर हो गई पर नीरज नहीं आया. अब अमीना को बहुत तेज प्यास लग रही थी. वहीं एक फूटा घड़ा पड़ा हुआ था. अमीना ने झांककर देखा तो उसमें पानी था. पर टीपू उसी में पांव डाले बैठा था. पता नहीं क्या सोच रहा था. अमीना ने टोका कि हट जा, पानी तो पी लेने दे. तो टीपू ने हाथ हिलाकर मना कर दिया. कड़वा सा चेहरा बना लिया. फिर अचानक उठकर चल पड़ा कि मैं जाता हूं. अमीना की प्यास मिट गई. तभी नीरज आता दिखा. मोटरसाइकिल पर. अमीना को देखते ही उसने गियर बदले, एक्सिलरेटर लिया, और मोटरलाइकिल हुर्र हुर्र करके रुक गई. वो उतरकर जल्दी जल्दी किक मारने लगा. तब तक हैंडिल छूट गया और मोटरसाइकिल गिर गई. उसका मिरर फूट गया. अमीना ने ध्यान से नीरज को देखा और जोर से हंस पड़ी. फूटे हुए शीशे में लग रहा था कि नीरज के दस सिर हैं. नीरज ने चिल्लाकर कहा- क्या हंस रही है. पागल है क्या तू? अमीना सामने आकर खड़ी हो गई. बोली- माफ कर दो. नीरज का गला फट गया- भागती है कि नहीं. अमीना ने कहा- टीपू भी यहीं कहीं होगा. वो क्या सोचेगा कि मां से कैसे बात कर रहे हो. नीरज के हाथ से बाइक छूट गई. उसने खड़े होने की कोशिश की, पर नहीं हो पाया. ऐसा लग रहा था कि फूटे हुए कांच के टुकड़ों ने बाउंड्री सी बना दी है. वो चाह कर भी उनके पार नहीं जा पा रहा था. अमीना ने फिर कहा- बेटे की तरह हो, माफ कर दो. नीरज चिल्लाने लगा. लगातार. पर अब पता नहीं चल पा रहा था कि क्या बोल रहा है. तभी वहां पर दो लोग प्रकट हुए. एक अमीना के बगल में. दूसरा नीरज के बगल में. अमीना के बगल में साड़ी पहने और सोलहों श्रृंगार किये हुए टीपू खड़ा था. पर उसने अपनी मूंछें नहीं हटाई थीं. नीरज के बगल में मुकुट पहने और तीर धनुष लिए मकरंद खड़ा था. वो कुछ बेचैन सा लग रहा था. बार बार टीपू की तरफ देखता और नजरें फेर लेता.
नीरज को अचानक लगने लगा कि वो चारों तरफ देख सकता है. उसे सिर घुमाने की जरूरत नहीं. अब उसे इतने रास्ते नजर आ रहे थे कि वो असहाय महसूस कर रहा था. भागने की बिल्कुल इच्छा नहीं हो रही थी. अचानक वो टीपू की तरफ सम्मोहित सा बढ़ने लगा. उसने उसकी साड़ी खींच दी. मकरंद चिल्ला पड़ा. जमीन पर देखते हुए.नीच, उसको हाथ मत लगा. पहले तू मुझसे निपटेगा. नीरज ने अमीना की ओर देखा. अमीना ने दोनों हाथ जोड़ लिए. नीरज ने अपना माथा पकड़ लिया. लग रहा था कि फट जाएगा. अचानक उसका चेहरा तमतमा उठा और वो मकरंद पर टूट पड़ा. उसने उसके सिर पर पत्थर दे मारा. सिर फूट गया. खून बहने लगा. मकरंद लोट गया. और फिर नीरज ने डिक्की से बंदूक निकाल ली. उधर टीपू दोनों हाथों में चाकू लिए जमीन खोदने लगा था. पता नहीं उसके हाथ में कितनी ताकत आ गई थी कि एक एक बार में दो दो फीट गड्ढे कर दे रहा था. अमीना आश्चर्य और प्रशंसा से उसे देख रही थी. मकरंद ने गिरे-गिरे पानी मांगा. अमीना तुरंत फूटे हुए घड़े को लेकर दौड़ पड़ी. तभी नीरज की आवाज गूंजी- पानी नहीं मिलेगा. जहां खड़ी हो, वहीं रहो. पर अमीना ने अनसुना कर दिया. बोली कि शैतान हो क्या, मेरे बेटा जैसा है वो. प्यासा है, पानी तो पिला लेने दो. फिर लड़ना. पर जितना वो चलती, रास्ता खत्म ही नहीं हो रहा था. ऐसा लग रहा था कि रेगिस्तान में चल रही है. और फिर तब तक दिन जाने लगा. रात हो गई. हरे आसमान के नीचे गेरुए रंग की मिट्टी उड़ने लगी. ये मिट्टी अमीना के पैरों में जल रही थी. मकरंद ने फिर पानी मांगा. इस बार नीरज ने बंदूक चला दी. गोली मकरंद के कंधे पर लगी. खून रिसने लगा. मकरंद इतना प्यासा था कि अपना खून चाटने लगा. अमीना हंसने लगी. बोली कि अब तो माफ कर दो. उधर टीपू ६ फीट गहरे गड्ढे में उतर चुका था. और बहुत तेजी से मिट्टी अपनी तरफ खींच रहा था. एक बार में पता नहीं कितना खींच ले रहा था. अमीना ने उसकी तरफ देखा. फिर नीरज ने देखा. फिर मकरंद ने. इतनी देर में वो गले तक मिट्टी में धंस चुका था. अब वो मुस्कुराया एक बार. और फिर जोर से सांस ली. बाकी की मिट्टी भी उड़ते हुए उसके ऊपर आ गिरी. अब वहां कुछ नहीं था. सबकुछ पहले जैसा हो गया था. समतल जमीन.
मकरंद के शरीर में हलचल होने लगी. वो खड़ा हो गया. बिना किसी की तरफ देखे चल पड़ा. चलता गया. फिर वो आंखों से ओझल हो गया. अगले दिन तालाब में उसकी लाश तैरती हुई मिली थी.नीरज अमीना को मोटरसाइकल पर बैठाकर घर छोड़ आया था. टीपू के अब्बू नाराज थे. अमीना बिना कुछ बताये गायब हो गई थी. वो घबरा रहे थे. अमीना ने रहस्यमयी मुस्कान से टीपू के अब्बू को देखा. फिर हंसने लगी. खाना बनाकर, खिलाकर वो अपने कमरे में गई. आलमारी के पीछे झांका. पर टीपू वहां नहीं था. उसने फिर देखा. नहीं था. अमीना ने लाइट जला ली. टीपू नहीं था. वो बदहवास सी भागने लगी. खोजने लगी. रातभर इंतजार किया. पर टीपू नहीं आया. उस दिन सुबह पहली बार लोगों ने अमीना को टीपू टीपू कहकर रोते सुना था. इसके पहले अमीना कभी नहीं रोई थी. उसी दिन सुबह सुबह खूब गाजे बाजे बजने लगे थे. लोग कह रहे थे कि चुनाव प्रचार हो रहा है. पंडित रामचंद्र ने सुबह सुबह ही जनेऊ की कसम खाई थी कि इस मुल्क को पाकिस्तान नहीं बनने दूंगा. तभी उनके कान में किसी ने आकर कुछ कहा. वो गश खाकर गिर पड़े. नीरज को हर थाली में मीट नजर आ रहा था. रात से ही. वो पचासों बार उल्टियां कर चुका था.
दी लल्लनटॉप के लिए ये स्टोरी ऋषभ ने लिखी है.
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