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हिंदुओं ने उसे दौड़ाया, मुसलमानों ने भी भगा दिया

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए, असद शैख़ की कहानी 'पार्टीशन'

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फोटो - thelallantop
"इंडिया डन दिस" ये कहते हुए ओम ने अपने असाइनमेंट के लिए ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के स्टाफ रूम में कहा. जिसे कहने के बाद पूरे स्टाफ रूम में सन्नाटा था. ओम कुछ समझता या बोलता उससे पहले ही प्रोफेसर बोले "व्हाई यू चूज़ इंडिया" ओम बहुत तेज़ आवाज़ के साथ बोला. सर इसलिए क्योंकि इंडिया हमारे सब्जेक्ट 'कम्युनल हारमनी' के लिए बेस्ट है. ऐसा उसने इंग्लिश में बोला. उसके बाद स्टाफ रूम में बैठे बाक़ी स्टूडेंट्स आपस में बातचीत करने लगे और ओम बड़ी अजीब तरीके से सबको उसके इंडिया कहने की वजह से देखने लगा.
बहरहाल उसने इंडिया अपने असाइंमेंट में लिखवाया और तेज़ कदमों के साथ स्टाफ रूम से बाहर निकलता हुआ यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर आया लेकिन वो अब भी सबके आश्चर्य में पड़ जाने की वजह को समझ नहीं पाया. वो सोच में डूबा ही जा रहा था. तभी उसका दोस्त अलेक्स बजाज. अनिल जिसका असली नाम था. अपनी बाइक पर तेज़ी से आकर उसके सामने रुका. जिससे ओम थोड़ा हड़बड़ा गया. अलेक्स बोला "यो ब्रो केसा है?" और ओम उफ़ कहता हुआ उससे गले मिला.
थोड़ी बातचीत हुई और अलेक्स ने ओम से पूछा, तुमने कौन सी लोकेशन सेलेक्ट की है. जवाब आया 'हां...इंडिया...' ये सुनते ही अनिल बजाज, अरबपति बाप का बेटा, और ओम का बेस्टफ्रेंड भी चुप हो गया और बोला, "ओके योर चॉइस आइल गो नाउ" ओम इस बार और गुस्से में आ गया आख़िर क्या आफत आ गई. वो विदेश में रहने वाला और अपने देश से मोहब्बत करने वाला स्टूडेंट था. अब इतने लोगों से सुनने के बाद वो तमतमा गया और गुस्से में अपने रूम पहुंचकर ज़िद पर उतर आया. अब वो जल्दी-जल्दी अपने असाइंमेंट से जुडी चीज़ जमा कर सुबह तक रेडी होकर अपनी फ्लाइट में था. वो एयर इंडिया की अपनी फ्लाइट में सोने की कोशिश में था. उसने अपनी नज़र घुमाई तो चारों तरफ भारतीय चेहरे नज़र आए. तब उसने सोचा कि ये दूसरे देश वाले कितना गया गुज़रा समझते है हमारे देश को. वो ये सोच ही रहा था तभी अनाउंसमेंट हुई दिल्ली पहुंच जाने की. फ्लाइट दिल्ली में लैंड कर गई, ओम अंगड़ाई लेता हुआ फ्लाइट से उतरा, बहुत ख़ुशी थी ओम को यहां आने की वो अपना लगेज लेकर एयरपोर्ट के वेलकम इंडिया पोस्टर को पार करता हुआ, रेस्टोरेंट पहुंचा और थोड़ा बहुत खाने का ऑर्डर देने के बाद असाइंमेंट के लिए तैयारी करता हुआ एक जगह तलाशने लगा. और गूगल पर ऐसी जगहों को ढूंढने लगा जहा आजतक हिन्दू-मुस्लिम साथ साथ सद्भाव से रहते है. तभी उसकी नज़रों के सामने मुजफरनगर ज़िले के कई गांव पड़े जहां पर आजतक यानी फ्रीडम से लेकर अब तक ख़ुशी-ख़ुशी रहते है, उसने ध्यान देकर उन पर कुछ आर्टिकल पढ़े और फिर दो गांवों हर्रा और कुटबी का नाम लिखा.
अपनी चाय खत्म करते हुए एयरपोर्ट से बाहर निकला जहा खूब सारी टैक्सी लाइन लगाकर खड़ी थी, वो एक के पास गया और डायरी में लिखे मुज़फ्फरनगर के गांव (कुटबी) का नाम दिखा कर बोला यहां जाना है, टैक्सी वाला बोला 'एक्स्ट्रा पैसे लगेंगे' उसने कहा ओके चलो.. और टैक्सी हाइवे पर होती हुई, मुज़फ्फरनगर की तरफ चल दी.
अब ओम इस सोच में था कि पहले गांव जाए या होटल रुके क्योंकि वक़्त कम था, उसने सोचा कही सामान रख कर डायरेक्ट गांव चलता हूं. उसने ड्राइवर से किसी होटल ले जाने को कहा और वापस आने तक रुकने को कहा ड्राइवर होटल ले गया और ओम वहां उतरा रूम के लिए बोला रूम में गया और सामान रख कर बहुत तेज़ी से सिर्फ मुंह ही धोकर जल्दी से वापस टैक्सी में आ गया साथ में उसका सिर्फ ज़रूरी सामान था.. वो मुज़फ्फरनगर में थे जो अमन का शहर था. जो आपसी मोहब्बत का देश था. बस उसे अपने असाइनमेंट में इसी बारे में तो लिखना था, तभी कुछ ही देर में ड्राइवर बोला 'साहब कुटबी गांव आ गया' ओम ने नज़र उठाकर गांव की तरफ देखा. वो लहलहाती फसल वाला, सोंधी सी खुशबू वाला गांव था जैसा उसने गांव के बारे में पढ़ा था. उसने अपनी निकाली डीटेल्स में कुटबी की इकलौती मस्जिद को रिसर्च में पहले नम्बर पर रखा था. तभी टैक्सी रुकी. वो उतरा और ड्राइवर से बोला. इंतजार करना. ओम गांव में अंदर गया. जहां चौपाल जमी थी वो ख़ुशी-ख़ुशी वहां गया और जाकर नमस्ते बोला. सभी को अपने बारे में और आने की वजह बताने लगा. चौपाल पर बैठे लोगों ने वहां ओम के लिए लस्सी मंगाई. फिर वहां बैठे चौधरी हरपाल बोले 'भई बहुत सही चलो पूछ लो के पूछना है?' ओम मुस्कुराया और पूछने लगा ये गांव की मस्जिद कहां है? मस्जिद का नाम सुनकर हरपाल सिंह भड़ककर बोले "किसने कई थारे से? यहां कोई मस्जिद नहीं और न वहां जाने वाला कोई और तुझे के करणा हैं..."
ओम थोड़ा घबरा कर बोला नहीं...नहीं...यहां मस्जिद है ना नेट पर. इसलिए पूछा और यहां मुस्लिम लोग भी रहते हैं. कहां हैं वो? बस इतना सुनना था कि हरपाल सिंह के साथ बैठा उनका जवान पोता राजीव बोला "अरे बावला हो गया के तू साले कोई *** न रहता यहां और न रहेगा और साले तू हिन्दू ही है न फिर क्यों पूछे है?" बस भीड़ जमा हो गई सारे गांव की वहां, और ओम घबरा गया. पसीने में तर हो गया. नजर घुमाई तभी एक बिल्डिंग पर उसकी नज़र पड़ी जो बड़े से ताले में बंद थी उस पर 'मस्जिद' इंग्लिश में लिखा था.
ओम इससे पहले उस बिल्डिंग को देखकर कुछ बोलता टैक्सी ड्राइवर वहां आया और बोला 'चलिए साहब' ओम ये बाते सुनकर अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पा रहा था और ऊपर से भीड़ देखकर वो घबरा भी गया था. वो वहां से जाने लगा और पीछे से शोर भी आने लगा. वो आगे बढ़ ही रहा था तभी ड्राइवर बोला. "साहब मरना है क्या? जो इस हालात में हिन्दू-मुस्लिम की बात करते हो और ऊपर से हिन्दुओं के गांव में. चलो!" वो टैक्सी में बैठे. ओम बोला "ये इंडिया ही है क्या?" और वो अपनी पढ़ी हुई भारत की छवि के बारे में सोचने लगा. लेकिन समझ नहीं पा रहा था. तभी ड्राइवर बोला. अब कहां? ओम डायरी में देख कर बोला अब हर्रा गांव. ड्राइवर बिना कुछ बोले गर्दन हिलाते हुए उफ़ करते हुए बोला. ठीक है... तभी वो हर्रा गांव पहुंचे जो ज़िले के बीचोंबीच स्थित एक खूबसूरत सा गांव था.
वो गांव में घुसा और हिन्दू परिवारों की जानकारी और पिछले गांव की अजीब याद भुलाते हुए आपसी मोहब्बत ढूंढने उतरा. जहां उसने कुछ ग्रुप में खड़े लडकों से जाकर कहा 'एक्सक्यूज़ मी' अपना नाम और धार्मिक सद्भाव वाली सारी चीज़ों के बारे में बताने लगा और पूछने लगा हिन्दू परिवार किधर रहते हैं? उन लड़कों में से एक लंबे-चौड़े लड़के ने उसकी तरफ घूरा और बोला "अब न रहते यहां. भाग लिए *** सब और तू भी निकल जा सही जाना चाहवे है तो! समझा नहीं चल अब निकल" ओम पिछली गलती को दुहराया जानकर चुपचाप मुड़ा और अजीब तरह से गांव की तरफ देखता हुआ वापस टैक्सी की तरफ चल पड़ा.
ड्राइवर से 'होटल चलो' कहकर जाम सा होकर बैठ गया. उसके हाथ-पैर सुन्न थे. उसके कपड़े घबराहट के मारे पसीने में तर थे. उसने आंखें मूंद लीं. और उस दुःख में बहने को तैयार था. जिसकी उसने उम्मीद भी नहीं की थी. तभी गाड़ी रुकी. पैसे देकर सीधा अपने रूम में गया और बाथरूम में घुस गया. जहां वो तकरीबन आधे घण्टे शावर में खड़ा रहा. वापस आकर अपना लैपटॉप निकाल, फेसबुक पर लिखा. 'हिंदुस्तान, इंडिया जो अपने सद्भाव, आपसी भाईचारे और अमन के लिए जाना जाता रहा है. वो आज पार्टीशन की तरफ है. वो बंटने की हद में है. भारत एक ज्वालामुखी पर है जो कभी, कभी भी फट सकता है'. अगली फ्लाइट से वो वापस चला गया. कभी न लौटने को.

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