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इतनी तेजी से मत उड़ो, बारिश में फिसलन अक्सर बढ़ जाती है

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए सौरभ मिश्रा की कहानी 'बारिश'

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फोटो - thelallantop
सिर्फ एक बार नहीं, कई दफ़े मैंने तुमसे कहा, कि 'वर्षा, क्या हम कभी शादी कर सकते हैं?' ...और तुम हर बार मुस्कुराकर चली जाती थी, मुझे नहीं समझ आता था, तुम्हारी इस मुस्कुराहट के मुझे क्या मायने निकालने चाहिए? समझ बस इतना आता था कि तुम्हारी मुस्कुराहट मेरे लिए मायने रखती थी, तुम्हारा मुस्कुराकर यूं जाना मेरे मायनों को पंख देने लगा था. वो 'पंख' जो पिछले मानसून की बारिश में साथ भीगने के बाद और भी ऊंची उड़ान ले रहे थे और सब भांपते हुए तुमने बस इतना कहा था कि, 'इतनी तेजी से मत उड़ो, बारिश में फ़िसलन अक्सर बढ़ जाती है.' मैं बावरा कल बारिश की ठंडी हवाओं के बहने और बूंदों के तेज गिरने के बीच कहीं, बस ये महसूस कर पा रहा था कि मैं तुम्हारी स्कूटी पर तुम्हारे ठीक पीछे था जिसके आगे तुम थी, हमेशा की तरह. तुम हां, तुम ही थी आगे, हर बार की तरह और मैं था तुम्हारे पीछे हर बार की तरह.
बारिश में भीगती कल तुम मुझे याद दिला रही थी, 'बादल' तुम्हें याद हैं न, जब हम एक साइकिल पर साथ होते थे, मैं कभी तुम्हारे पीछे नहीं बैठती थी, तुम पुरजोर से पैडल मारते थे और मैं आगे हैंडल को जोर से पकडे रखती थी कि कहीं तुम मुझे गिरा न दो, और देखो आज भी फिर तुम मेरे पीछे ही हो और मैं तुम्हारे आगे.
'पगली कैसे समझता मैं तुम्हें कि तुम तो आगे थी ही नहीं कभी, मैं ही पीछे रहना चाहता थे तुम्हारे हमेशा, ताकि उन बहती ठंडी हवाओं के बीच, तुम्हारे बालों को अपने चेहरे पर आने दे सकूं, तुम्हारे उड़ते दुप्पट्टे को मेरे कंधों से लिपट जाने दे सकूं, तुम्हारी खुशबू से खुद को महक जाने दूं, अचानक से तुम्हारे गालों को अपनी नाक से छू जाने दे सकूं और सबसे ख़ास ये कि तुम्हारी आंखों की पलकों से बारिश की उन गिरती बूंदों के बीच तुम्हारी तिरछी निगाहों की मुस्कराहट को सीधे दिल में उतर जाने दे सकूं' तुम्हें तो बस हमेशा ये ही लगता रहा, कि तुम मुझसे आगे हो पर हक़ीक़त ये थी कि मैंने तुम्हें आगे कर रखा था. अगर मैं तुमसे आगे होता तो कैसे जीता इन सबको, जिनके बिना अब मेरा मरना हो रहा है. 14628273_894015897408749_1897278468_n पर इन सब के बीच अचानक कल चलती स्कूटी पर भीगते हुए पीछे मुड़कर ये पूछना कि 'बादल'...क्या तुम मुझे कभी मौका नहीं दोगे अपने पीछे आने का? जहां तुम मेरे आगे हो और मैं तुम्हारे पीछे आकर तुम्हारे हाथ को पकड़ सकूं?
मैं उसी वक़्त तुमसे कहना चाहता था कि 'वर्षा' ये हक़, तो मैं तुमसे कबसे मांगते आ रहा हूं, पर तुम नासमझ हर बार ही बिन कुछ समझे बिन जवाब दिए मुस्कुराकर चली जाती हो.
...पर देखो न, मैं भी उस वक़्त तुमसे कुछ न बोल सका, सामने से तुम्हारे सवाल करने पर भी. जिसका जवाब मैं तुमसे मांगता आ रहा था, वो जवाब अब मुझे देना था, मैं देना चाहता भी था. पर जवाब दिया भी तो दिया क्या? 'तुम्हारी आंखों में आंखें डालकर मुस्कुराता हुआ तुमसे बस ये कह सका, रास्ते पर नजर रखो, इतनी तेजी से मत उड़ो, 'बारिश में अक्सर फिसलन बढ़ जाती है.' और तुम मुस्कुराकर बोली उठी, शायद हम दोनों को ही 'हां बोलने की जगह बस मुस्कुराकर बात टाल जाना ही आता है.'
बीते कल की उन मुस्कुराहटों के जवाबों ने, आने वाले कल में हम दोनों को एक-दूसरे के आगे-पीछे चलने की हामी भर दी है, पर देखो न 'शहज़ादी' यहां भी तुम मेरे आगे ही हो और मैं तुम्हारे पीछे, 6 फेरों के लिए बाज़ी तो यहां भी तुम मार गई, 7 में 6 तुम्हारे. पर आख़िर में जीतूंगा मैं ही, जब मैं तुम्हारे आगे आऊंगा. सातवें फेरे के लिए तो फिर तुम्हें, अपने से आगे कभी न जाने दूंगा, हमेशा के लिए अपने साथ, अपने बगल ही सजा लूंगा, इस जहां में हरदम के लिए.
और हां, अब ये सोचकर हमेशा मुस्कुराती रहना कि 'सच में, बारिश में अक्सर फिसलन बढ़ जाती है...'

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