हम मिलान के माल्पेन्सा एयरपोर्ट पर उतरे. मिलान से हमने एक प्राइवेट टैक्सी कर ली और सीधे लोगनो के लिए रवाना हुए. एक पुरानी फैक्ट्री को पार करते हुए हमने घुमावदार हाइवे में प्रवेश किया. हमारे साथ-साथ चटख हरे रंग की एक टूरिस्ट बस भी चल रही थी. हम कोमो और लागो शहरों से गुज़रे . दरअसल कोमो, लागो और लोगानो - ये तमाम शहर कुछ-कुछ नैनीताल, भीमताल, सातताल जैसे ही हैं. सभी झील के किनारे बसे यूरोप के मशहूर पहाड़ी पर्यटक स्थल हैं.
एक कहानी रोज: 'छोटी ड्रेस, ऊंची सैंडल, लिपस्टिक का रंग लाल'
आज पढ़िए नीता गुप्ता की कहानी.
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फोटो - thelallantop
नीता गुप्ता. यात्रा बुक्स नाम के बुटीक पब्लिकेशन की कर्ता धर्ता. उनकी ये नई कहानी. लल्लनटॉप के रीडर्स के लिए. कहानी देखिए और उसका एंड देखिए. क्योंकि वो खत्म होने के बाद भी आपके साथ बना रहेगा. एक शुरुआत का बीज बनकर.
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कुछ देर बाद स्विस बॉर्डर आया. बस के यात्री उतरे अपने पासपोर्ट चेक करवाने के लिए लेकिन हम चूंकि प्राइवेट कार में थे, इसलिए किसी ने हमें नहीं रोका. आगे रास्ता साफ़ था. दूर कहीं झील में दिन थककर डूबने लगा था. ढलते सूरज की तरह मैं भी अपनी ही किसी कहानी के एक पात्र के रूप में ढल गई. इस शहर का मौसम भी उस शहर की तरह महसूस होने लगा, जिससे पीछा छुड़ाकर मैं यहां छुट्टियां बिताने आई थी. शहर बदल जाने से ज़िन्दगी के खेल में किरदारों की किस्मतें थोड़े न बदल जाती हैं! कुछ ही देर में हम लोगानो पहुंचे. झील के किनारे शानदार ईडन पाराडीज़ो होटल में हमारी बुकिंग थी. फिर क्या था! बस ऐश ही ऐश! बेचैनी पर पर्दा डालने के लिए ऐश-ओ-आराम का होना बहुत ज़रूरी है. हमारे कमरे की दीवारों पर बारीक चाइनीज़ कलमकारी का वॉलपेपर लगा हुआ था. राइटिंग टेबल के दोनों तरफ भयानक अफ़्रीकी शेर से खड़े थे. मैं लम्हा भर के लिए उनकी आंखों में आखें डाले ख़ुद को बहादुर समझती रही. बेडकवर पर हाथियों का झुण्ड मानो दौड़ लगा रहा था. जंगल आस-पास कहीं नहीं था, जंगल का काला जादू पूरे कमरे में पसरा हुआ था. बाहर बड़ी सी बालकनी के सामने झील का पानी झिलमिलाता हुआ नज़र आ रहा था. और झील के ठीक बीच में एक फव्वारा. दूर क्षितिज की ओर बढ़ती, एक अकेली नाव. सूरज ढलने के बावजूद भी कितनी रौशनी थी यहां! हमारे स्वागत में होटल वालों ने कमरे में जगह-जगह सुंदर फूलदान सजाये थे और एक टोकरी में कुछ फल और तरह-तरह के नाश्ते रखे थे. कमरे का मुआयना करके मैंने सबसे पहले अपनी सैंडल को एक तरफ पटका और रूम सर्विस को फ़ोन करके चाय मंगाई. थोड़ी ही देर में हम कमरे से उतरकर होटल की बार में पहुंच चुके थे. झील के किनारे एक बड़ी सी जेटी पर बने उस बार का नज़ारा अद्भुत था! आकर्षक वेशभूषा में सुंदर सुडौल नौजवान जोड़े हाथ में गिलास थामे एक-दूसरे की आंखों में आखें डालते हुए एक-दूसरे को चियर्स कर रहे थे. आपने नोटिस किया होगा कि यंग लोग आजकल कुछ भी पहन लेते हैं और फिर भी सुंदर लगते हैं. एक लड़की ने तो केवल एक सुनहरी ब्रा और उस पर शिफॉन की सफ़ेद पतली सी कमीज और शॉर्ट्स पहने हुए थे, घुटनों तक के बूट्स के साथ. उसका प्रेमी अभी-अभी बोट से उतरा था और उसे बाँहों में भरकर चूम रहा था. मैंने अपनी आंखें फेर लीं. मेरे बाल हाल ही में पकने लगे थे, और शायद उन दोनों को देखकर एक बाल और सफ़ेद हो गया होगा, जल भुन कर. मैंने अपनी नज़र पहाड़ों की ओर कर ली. दूर पहाड़ों के बीच छोटे-छोटे घर और गिरिजाघरों के शिखर नज़र आ रहे थे. जाने वो किस तरह के लोग हैं जो भीड़ से इतनी दूर, अलग अपनी दुनिया बसाते हैं. ये मेरी समझ के परे का ख़्याल है. ज़िन्दगी तो यहाँ है: इस बार में, उस रोमांटिक रेस्टोरेंट में, बाजारों की रौनक में, शहर के बीच बने कसीनो में, या फिर उस बोट पर, जिसमें चढ़कर वह युवा दम्पति प्यार की तलाश में कहीं निकला है. उनको देखकर मेरे मन में आया कि काश मैं भी जवान होती. रिच, यंग, सिंगल, केयरफ्री! मुझे भी चाहिए था वह सब. वो पहली बार नज़रों का मिलना, वो प्यार की पहली छुअन और पूरे बदन में फैलता रोमांच, रोमांटिक डिनर डेट्स पर जाना, वो मस्ती भरे रतजगे, वो एक-दूसरे में पूरी तरह डूबा हुआ होना... मैंने अपने पति की ओर नज़र की. वो वेटर से अपने लिए दूसरी बियर मंगवा रहे थे. इशारे से उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं भी दूसरे ड्रिंक के लिए तैयार हूँ? मैंने ‘हाँ’ में सर हिलाया. एक ड्रिंक के बाद मेरे दिमाग ने मेरा साथ देना तय किया, और एक प्लान मेरी आँखों के सामने स्पष्ट रूप से तैरने लगा. "डार्लिंग, आय हैव एन आइडिया!" *** ईडन पाराडीज़ो होटल की जेटी पर बोट उनका इंतज़ार कर रही थी. उन्होंने एक बार मेरी ओर मुड़कर देखा, थम्स अप का संकेत दिया और बोट पर चढ़ गए . "बाय, हैव फन!" कहते हुए मैं भी मुस्कुरा दी! उनके निकलते ही मैं भाग कर कमरे में गई. दस मिनट में कपड़े बदलकर पीछे के गेट से बाहर निकल आई. प्लान के कामयाब होने के लिए ये ज़रूरी था: ड्रेस (हर लिहाज़ से) छोटी थी, सैंडल ऊंची. लिपस्टिक का रंग गहरा लाल. आई शैडो ब्लू. शाम की सर्दी से बचने के लिए मैंने एक हल्की सी शाल बड़े स्टाइल से गले में बांध ली थी. पहले सोचा टैक्सी ले लूँ. फिर तय किया कि झील के किनारे चिनार के पत्तों की छांव तले चलते हुए ही मेन स्क्वेयर तक जाउंगी. मन में अजीब-अजीब तरह के ख्याल आ रहे थे. क्या सही है, क्या गलत कौन जाने? प्लान सिंपल था. वे बोट लेकर झील के रास्ते मेन स्क्वेयर में स्थित कसीनो जायेंगे. मैं अलग से टैक्सी से वहां पहुँचूंगी. हमने तय किया था कि हम कसीनो के बार में मिलेंगे, मगर अजनबी बनकर. वन थिंग विल लीड टू अनअदर. मैं बहुत एक्साइटेड थी. चलो इस बहाने कुछ नया ही सही. धीरे-धीरे अँधेरा घिर आया. चलते-चलते मन हल्का होने लगा था. मुझे लगने लगा कि शायद मैं, हम दोनों को लेकर, यूँ ही घबरा रही थी. सब कुछ इतना आसान तो है! बस एक-दूसरे पर भरोसा होना चाहिए और अपने मन की बात को कह डालने की छूट. हम यूँ ही मन में गाँठें लिए बैठे रहते हैं. एक-दूसरे के सामने गिरहें खोल पाने की आज़ादी हो तो बोरिंग से बोरिंग रिश्ते सुधारे जा सकते हैं. झील के किनारे हर दस कदम पर बेंच लगे हुए थे. उनमें ज़्यादातर बूढ़े दम्पति बैठकर झील की ख़ूबसूरती का आनंद ले रहे थे. मैं मुस्कुराने लगी. बस यही सही है! ये उम्र भर का साथ. ये भरोसा. यंग लोग इस तरह के रिश्तों को कभी नहीं समझ पाएंगे. मैं खुश थी. मैंने सही समय पर सही फैसला लिया था. मैं आखिरकार कसीनो पहुंची. बार ढूंढने में मुझे दस मिनट और लग गए. वे बार काउंटर पर मेरी ओर पीठ किए बैठे थे. मैं बार की ओर बढ़ी. एक आकर्षक ढंग से मैंने उनकी ओर झुक कर "हैलो" कहा और नज़ाकत से पूछा, "क्या ये सीट खाली है?" उनकी आँखें लाल थीं. "मैं दो घंटे से यहाँ इंतज़ार कर रहा हूँ. तुम इतनी देर कहाँ थी ? किस के साथ? और ये कैसे कपड़े पहन रखे हैं तुमने? शर्म नहीं आती तुम्हें क्या? ये किस तरह का घिनौना खेल है?" *** (पुनश्चः इतालवी भाषा में कसीनो शब्द का एक अर्थ बने बनाये काम का बिगड़ना भी होता है.)
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