रविवार का दिन है. सोफे में बैठे मस्ती से टीवी देखी जा रही है. तभी याद आता है कि जो प्राचीन चाय का कप रखा है, उसको धो लिया जाए (अब शायद वो ‘समय’ से भी पुराना हो चुका होगा). आप उठकर कमरे से कप उठाते हैं. कप कितने दिनों से पड़ा है? ये बताने के लिए शायद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम भी बुलानी पड़े. खैर, आप कप लेकर किचन में पहुंचते हैं. कप को मेज पर रखते हैं और जब तक सिंक में पहुंचते हैं, तो रिएक्शन ऐसा कुछ होता है:
एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने पर क्यों भूल जाते हैं चीजें? अब जाकर वजह पता चली!
क्या सच में किसी दरवाजे से गुजरने पर लोग चीजें भूल जाते हैं? अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्टे डॉम के साइंटिस्ट्स के मन में भी ये सवाल था. जवाब पाने के लिए इस पर बाकायदा रिसर्च की भी गई है.
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क्या आप के साथ भी ऐसा होता है? एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हैं, तो चीजें भूल जाते हैं? भला यहां क्या करने आए थे? तो क्या सच में किसी दरवाजे से गुजरने पर लोग चीजें भूल जाते हैं? अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्टे डॉम (Notre Dame) के साइंटिस्ट्स के मन में भी ये सवाल था. जवाब पाने के लिए इस पर बाकायदा रिसर्च की गई.
रिसर्च के बाद एक पेपर छापा गया. पेपर का टाइटल भी ऐसा कि साफ पता चले रिसर्च किस बारे में है. टाइटल था, “दरवाजों से गुजरने पर चीजें भूल जाते हैं (Walking through doorways causes forgetting).” इसको डोरवे इफेक्ट (Doorway effect) कहा जाता है.
डोरवे माने वही अपना किवाड़, पट या दरवाजा. इस इफेक्ट के मुताबिक, किसी दरवाजे से गुजरने पर याददाश्त पर भी फर्क पड़ सकता है. लेकिन ये शार्ट टर्म (short term) होता है. जैसे रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजें, क्या लेने आया था? चाबी अभी तो थी कहां रख दी? वगैरह-वगैरह. गजनी फिल्म के संजय सिंघानिया जैसा नहीं. जिसमें संजय का किरदार कुछ भी याद रख नहीं पाता.
मसला ये था कि ये कैसे बताया जाए कि दरवाजे से होकर गुजरने पर ही लोग चीजें भूलते हैं, ऐसा है क्या? इसका भी तोड़ निकाला गया कई एक्सपेरिमेंट्स के जरिए. आइए समझते हैं.
क्या रिसर्च हुई?इस बारे में एक शुरुआती रिसर्च हुई थी 2006 में. जिसके बाद ये सवाल गरमाया कि क्या सच में दरवाजों से गुजरने का मेमोरी पर फर्क पड़ता है? फिर इस बारे में नॉर्टे डॉम यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट्स ने रिसर्च करके जवाब खोजने की कोशिश की. इसके लिए एक एक्सपेरिमेंट किया गया. जिसमें लोगों को एक बॉक्स में अलग-अलग आकार की चीजें दी गईं. जिनके अलग- अलग रंग थे.
कुछ लोगों को कहा गया कि एक कमरे में बॉक्स में रखी चीजों का आकार और रंग याद करें. इसके बाद कुछ लोगों के एक ग्रुप को उसी कमरे में रहने के लिए कहा गया. दूसरे ग्रुप को दरवाजे से होकर दूसरे कमरे में जाने के लिए कहा गया.

जब दोनों ग्रुप से बॉक्स के भीतर की चीजों के बारे में फिर से पूछा गया, तो सब हैरान रह गए. मालूम चला कि दरवाजे से होकर गुजरने वाला ग्रुप चीजों का नाम याद रखने में दूसरे ग्रुप से पीछे था. मतलब वो लोग ज्यादा भूले थे कि बक्से में क्या-क्या किस रंग का था.

रिसर्च में इस सवाल का जवाब भी खोजने की कोशिश की गई. आखिर ऐसा भी तो हो सकता है कि हम एक जगह से उठकर दूसरी जगह जाते हों इसलिए भूलते हों. तो साइंटिस्ट ने एक दूसरे एक्सपेरिमेंट में इसका तोड़ निकाला.
लोगों के दो ग्रुप्स के नामों की एक लिस्ट दी गई. लिस्ट याद करके नाम दोहराने को कहा. लेकिन एक ग्रुप को उसी कमरे में रहना था. वहीं दूसरे ग्रुप को दरवाजे से होकर दूसरे कमरे में जाना था. सामने आया दूसरे कमरे में जाने वाले लोग ज्यादा नाम भूले.
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ऐसा क्यों होता होगा?आगे इस बारे में कई रिसर्च हुईं. सबमें एपिसोडिक मेमोरी या कहें थोड़े देर को कर रहे किसी काम को लेकर जो मेमोरी होती है. उसे लेकर भूलने के कारण जानने की कोशिश की जा रही थी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि हमारा दिमाग बहुत बिजी रहता है. ऐसे में हो सकता है, वो तुरंत एक काम के बाद दूसरा काम करने चला जाता हो. और पिछले काम को भूल जाता हो.
शायद दरवाजे इतने भी बेरहम नहीं!हालांकि, रोजमर्रा में चीजें भूलना लोगों के लिए आम बात है. लेकिन क्या दरवाजों का इसमें कोई हाथ है या नहीं? ये बताने के लिए हाल ही में फिर एक रिसर्च आई. जो पुराने तर्कों से थोड़ा इतर बात करती है. ये रिसर्च कहती है कि हमेशा दरवाजों से गुजरने पर याददाश्त पर फर्क नहीं पड़ता. हां, दिमाग में जब कई चीजें चल रही होती हैं, तो लोग एक-आध बातें जरूर भूल सकते हैं. क्योंकि दरवाजों से गुजरना भी दिमाग के लिए एक नई जानकारी होती है.
तो फिर अगर कोई जरूरी बात याद रखनी हो, तो दरवाजों से गुजरने का रिस्क लेने से पहले सोचना तो पड़ेगा, क्या कहते हैं?
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