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'वंदे मातरम न गाने वालों के हिस्से की ऑक्सीजन छीन लेनी चाहिए'

देशभक्ति सिखानी पड़े तो कड़े कदम उठाने पड़ते हैं.

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फोटो - thelallantop

प्यार किया नहीं जाता हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता खो जाता है.

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'वो सात दिन' फिल्म का ये गाना है. जिसका अर्थ है प्रेम जबरदस्ती नहीं किया जाता. बस हो जाता है. लेकिन आजकल प्रेम का फॉर्मैट काफी बदला हुआ है. जबरदस्ती का सौदा हो गया है. लड़की प्रेम स्वीकार करने से इंकार कर दे तो उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया जाता है. ये प्रेम के दोनों स्वरूपों में हो रहा है. चाहे 'देह प्रेम' हो या 'देशप्रेम.' दोनों के ठेकेदार जबरदस्ती प्रेम कराने में लगे हुए हैं. देशप्रेम वाले तेजाब नहीं फेंकते, स्याही फेंक देते हैं. या ट्रोल आर्मी के हवाले कर देते हैं. जो उनकी तसल्ली बख्श तरीके से मोब लिंचिंग कर देते हैं.
इधर देश के नागरिकों में देशभक्ति या देशप्रेम जगाने के बहुत सस्ते तरीके ईजाद किए गए हैं. महाराष्ट्र में मांग उठ रही है कि वंदेमातरम गाना अनिवार्य किया जाए. जैसे मद्रास हाईकोर्ट ने कर दिया है. वारिस जैसे कुछ लोग दूसरे एक्सट्रीम पर चढ़े हुए हैं. कह रहे हैं कि चाहे गोली मार दो चा देश से बाहर फेंक दो. वंदेमातरम नहीं कहेंगे तो नहीं कहेंगे. कायदे से होना भी यही चाहिए. जब तक किसी के अंदर से किसी व्यक्ति, वस्तु, विचारधारा, देश, नारा, समाज या किसी भी चीज के लिए भावना का संचार न हो, स्टेट को जबरदस्ती भावना जागृत करने का कोई हक नहीं होना चाहिए. मैंने कभी अगरबत्ती नहीं सुलगाई, कभी आरती नहीं गाई, कभी पूजा पाठ नहीं किया लेकिन हर हर महादेव का नारा लगाने में मुझे मजा आता है, मैं लगाता हूं. जिस दिन आप अनिवार्य कर देंगे, मैं नहीं लगाऊंगा. मैंने अपने स्कूल में बहुत वंदेमातरम गाया है. लेकिन उसके बाद कभी नहीं. अभी तो याद भी नहीं है. जो अनिवार्य कराने की मांग कर रहे हैं उनको भी नहीं याद होगा. उनसे बंकिम चंद्र चटर्जी की चार किताबों के नाम पूछिएगा तो दांत निकाल देंगे.
jan-gan-man राष्ट्रगान पहले सबको प्रिय था. आजादी के 70 सालों में किसी ने इस पर बहस नहीं की कि गाना है या नहीं गाना है. राष्ट्रगान बजने पर खड़े होना है या नहीं होना है. जैसे ही कहीं से आवाज आती थी लोगों के अंदर स्वत: श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता था, वो खड़े हो जाते थे. फिर राष्ट्रगान को ठेकेदारों ने अपने हाथ में ले लिया. उसे हर फिल्म से पहले मल्टीप्लेक्स में बजना और उस पर खड़े होना अनिवार्य कर दिया गया. उस टाइम के नए नए देशभक्तों को ये बहुत पसंद आया. लेकिन कुछ लोगों को इस जबरदस्ती पर आपत्ति भी हुई. अब उस टाइम के कथित देशभक्तों को भी राष्ट्रगान के टाइम उठने में लाचारी सी महसूस होती है. सोचते हैं फालतू में ही लक्कड़ से खेल गए यार. देशभक्ति पैदा करने के लिए सस्ते टिकाऊ तरीकों में एक टैंक निकाला गया है. कथित देशद्रोही यूनिवर्सिटी जेएनयू में टैंक रखने की संस्तुति की गई. बंपर बवाल हुआ. हालांकि अगर सिर्फ टैंक रखने से देशविरोधी स्टूडेंट्स में देशप्रेम जागता है तो टैंक अच्छा है. हर क्लास में ग्रेनेड रखना चाहिए. टीचर्स को चॉक और डस्टर की जगह एके 47 लेकर क्लास में घुसना चाहिए. भई हमारी आर्मी का प्रतीक है. स्टूडेंट्स के लिए भी फौजी ड्रेस अनिवार्य कर देनी चाहिए ताकि वो आर्मी का सम्मान करें. लेकिन ये सब करने से अगर जेनुइन देशभक्त छात्रों को कॉलेज प्रशासन और हिटलरी फरमान जारी करने वालों से चिढ़ हो जाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? देशभक्ति और देशभक्ति की ठेकेदारी में मामूली फर्क है. हमारे पूर्वजों में से किसी ने एक पेड़ लगाया. पेड़ बड़ा हुआ. अब उसके फल सारा मोहल्ला खाता है. ये देशभक्ति है. हमने उस पेड़ को काटकर डंडा बनाया और उसमें झंडा लगा लिया. अब मैं देशभक्ति का ठेकेदार हूं. मैं अब देशभक्तों के सामने वो झंडा लहराकर उनसे कहूंगा कि अपनी देशभक्ति का सुबूत दो. राष्ट्रगान गाओ, भारत माता की जय बोलो, वंदेमातरम गाओ, रस्सी पर चलकर दिखाओ, बेली डांस करो, नाक से खाना खाकर दिखाओ, कान से सांस लो. अगर नहीं कर पाते तो देशद्रोही हो.
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