क्या वाकई नोटबंदी का कुछ फायदा हुआ?
क्या नोटबंदी के बाद देश में फेक करेंसी कम हुई?
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क्या नोटबंदी के बाद देश में फेक करेंसी कम हुई?
महंगाई क्यों बढ़ती है या बढ़ रही है, इसकी कई अलग अलग वजह हम-आप या कोई अर्थशास्त्री हमें बता सकता है. लेकिन महंगाई बढ़ने का एक अल्हदा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 साल पहले बताया था. उनके अनुसार देश में कैश के सर्कुलेशन का एक सीधा संबंध भ्रष्टाचार से है. यानी देश में ज्यादा नकदी बढ़ेगी तो भ्रष्टाचार बढ़ेगा, और भ्रष्टाचार से अर्जित कैश का कारोबार महंगाई पर असर डालेगा. और गरीबों को महंगाई झेलनी पड़ेगी. 8 नवंबर 2016 को राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान किया था. और नोटबंदी की जरूरत के लिए जो वजह उन्होंने बताई थी उनमें एक वजह नकदी कम करने वाली थी. पांच साल गुज़र गए इन बातों को. हमें महंगाई पर अभी कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है, वो सब आपको मालूम है. कैश के फ्लो पर आते हैं. क्या नोटबंदी के बाद देश में नकदी की लेनदेन कम हुई? यानी जिस एक वजह से देश में हज़ार रुपये और 500 रुपये के नोट बंद किए गए थे, उसका कितना असर हुआ? क्या अब लोग नकदी के बजाय डिजिटल पेमेंट ज्यादा कर रहे हैं? इन सारे सवालों का एक शब्द में जवाब है- नहीं. और इस नहीं का आयाम कितना बड़ा है, ये प्योर नंबर्स में समझते हैं. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया हर 15 दिन से 'करेंसी विद द पब्लिक' की रिपोर्ट जारी करता है. यानी लोगों के पास कितना नकदी है, इसका आकलन इस तरह से होता है कि देश में जितना नकदी पैसा या 'करेंसी इन सर्कुलेशन' होता है, उसमें से सभी बैंकों में जमा पैसे को माइनस कर दिया जाता है. उसके बाद जो अमाउंट आती है, उसे करेंसी विद पब्लिक यानी जनता के हाथों में नकदी पैसा माना जाता है, जो बैंकिंग सिस्टम से बाहर है और लोगों के हाथों में है. दिवाली से एक दिन पहले यानी 3 नवंबर को RBI की लेटेस्ट रिपोर्ट आई. रिपोर्ट बताती है कि 22 अक्टूबर को पब्लिक के पास 28 लाख 25 हजार करोड़ रुपये की नकदी थी. अब ये कम है या ज्यादा, ये इस बात से तय होगा कि नोटबंदी के ठीक पहले जनता के पास कितना नकदी था. अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 4 नवंबर 2016 को देश में 17 लाख 97 हजार करोड़ रुपये की नकदी थी. और इसका मतलब ये है कि 5 साल बाद देश में लोगों के पास 10 लाख 28 हजार करोड़ रुपये की नकदी और बढ़ गई है. यानी करीब 57 फीसदी का इजाफा. और ये तो हमने सिर्फ नोटबंदी से पहले और अब की तुलना करके बताया है. 500 और 1000 हजार रुपये के नोट बंद होने के बाद पैसा बैंकों में जमा हुआ तो लोगों के पास नकदी काफी घट गई थी. कितनी?- जनवरी 2017 में सिर्फ 7 लाख 80 हजार करोड़ की नकदी लोगों के पास थी. और वहां से तुलना करें तो अब 262 फीसदी बढ़ गई है. और हर नए साल में नकदी कम होने के बजाय बढ़ ही रही है. 23 अक्टूबर वाले डेटा को पिछले साल से कंपेयर करें तो नकदी 2 लाख 21 हजार करोड़ रुपये और बढ़ गई है. मतलब करीब साढ़े 8 फीसदी. तो अगर प्रधानमंत्री मोदी के दिए तर्क के हिसाब से क्या इसे यूं समझना चाहिए कि कैश बढ़ रहा है, तो भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और महंगाई बढ़ रही है. अब समझने वाली बात एक और है. सरकार डिजिटल पेमेंट पर पूरा ज़ोर लगा रही है. RBI डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रहा है, हमें अपने अनुभव से भी डिजिटल पेमेंट बढ़ता दिखता है. बड़े शहरों में सब्ज़ी के ठेले वाले से लेकर बड़े शोरूम तक में, हर जगह ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा अमुमन होती है. तो एक तरफ ऑनलाइन पेमेंट भी बढ़ता दिख रहा है, फिर लोगों के पास नकदी क्यों बढ़ रही है. इसे किस तरह समझना चाहिए. पेमेंट सिस्टम्स पर नज़र रखने वाली एक कंपनी है ACI वर्ल्डवाइड. इसके डेटा के मुताबिक 2020 में दुनिया में सबसे ज्यादा डिजिटल पेमेंट भारत में हुए हैं. साढ़े 25 अरब रियल टाइम पेमेंट्स. और इस तरह से नंबर ऑफ पेमेंट्स के मामले हम चीन से भी आगे हैं. ACI वर्ल्डवाइड के मुताबिक 2025 तक भारत में ऑनलाइन पेमेंट्स करीब 71 फीसदी और बढ़ जाएंगे. ACI ने भारत सरकार की वेबसाइट MyGov के साथ मिलकर एक सर्वे भी किया था जिसकी फाइडिंग्स अक्टूबर महीने में जारी हुई थी. सर्वे के मुताबिक 60 फीसदी कंज्यूमर्स हफ्ते में एक बार या एक से ज्यादा ऑनलाइन पेमेंट करते हैं. RBI का डेटा भी कहता है कि देश हर साल डिजिटल पेमेंट्स बढ़ रहे हैं. पिछले वित्त वर्ष में डिजिटल पेमेंट्स में 30 फीसदी का इजाफा हुआ है. यानी इस बात में कोई संशय नहीं है कि नोटबंदी के बाद ऑनलाइन पेमेंट का चलन बढ़ा है. लेकिन लोगों के पास नकदी भी तो बढ़ रही है. क्यों ऐसा हो रहा है. ये सवाल हमने पूछा इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के चीफ इकॉनमिस्ट और पब्लिक फाइनेंस के हेड डॉ देवेंद्र पंत से. उनका कहना है कि लोगों के पास नकदी बढ़ने का ट्रेंड समझना मुश्किल है. अभी भी कंज्यूमर के दिमाग में ये है कि वो कुछ पैसा अपने पास रखना चाहता है. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में अभी भी नकदी से ही लेन देन ज्यादा चल रही है. नकदी इस्तेमाल की एक वजह कोरोना और लॉकडाउन को भी बताया जा रहा है. पिछले साल लॉकडाउन लगने के बाद से करीब 5 लाख करोड़ रुपये की नगदी लोगों के पास बढ़ी है. और RBI के डेटा से ये संकेत मिलता है कि जब लॉकडाउन सख्त लगाया गया तब लोगों ने अपने पास थोड़ा ज्यादा पैसा रखना मुनासिब समझा. शायद लोगों के मन में ये डर रहा होगा कि लॉकडाउन में वो पैसा निकालने दूर के ATM नहीं जा पाएंगे, इसलिए अपने पास ज्यादा कैश निकाल कर रखा. वजह चाहे जो भी हो, सच ये ही है कि लोगों के पास अब पहले से ज्यादा नकदी है. और वो तस्वीरें भी महीने दो महीने से आ ही जाती हैं जब किसी एजेंसी के छापे में नकदी से अलमारी भरी मिलती है या पलंग के नीचे से नोट मिलते हैं. ये ही तो पहले भी हो रहा था. मतलब नोटबंदी से ये मकसद ज़रा भी पूरा नहीं हुआ. तो फिर नोटबंदी से क्या फायदा हुआ. पीएम मोदी ने नोटबंदी की एक और वजह बताई थी कि इससे कालेधन पर प्रहार होगा. मतलब जिन लोगों ने कालाधन जमा कर रखा है वो बैंकिंग सिस्टम से बाहर हो जाएगा, किसी काम का नहीं रहेगा. नोटबंदी के बाद नोट फेंकने या जलाने के कुछ मामले भी आए. लगा कि सरकार ने वाकई मास्टरस्ट्रोक चल दिया है. लेकिन फिर सबने अपने नोट बैंकों में जमा कराने के तरीके निकाल लिए. RBI की अगस्त 2018 की रिपोर्ट कहती है कि 500 और 1000 के जितने नोट थे उसका 99.3 फीसदी बैंकों में जमा हो गए. मतलब लगभग सारा पैसा वापस आ गया. तो फिर कालाधन कहां गया? एक और वजह ये बताई गई थी कि नोटबंदी से जो जाली नोट, सर्कुलेशन में हैं वो बंद हो जाएंगे. इसलिए फिर नए नोट भी जारी हुए. ये सही बात है कि नोटबंदी से पहले हमारी कैश सिस्टम में जाली नोट चल रहे थे. इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट की 2016 रिपोर्ट के मुताबिक करीब 400 करोड़ रुपये के बराबर जाली नोट थे. यानी हर 10 लाख रुपये में 250 रुपये जाली थे. लेकिन क्या नोटबंदी के बाद जाली नोट बंद हुए? नहीं. नए आंकड़े बताते हैं आपको. NCRB की हाल में जारी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में करीब 92 करोड़ के जाली नोट देश के अलग अलग हिस्सों में पकड़े गए थे. एक साल में पकड़ी गई ये जाली नोटों की सबसे बड़ी मात्रा है. यानी फेक करेंसी का कारोबार देश में बढ़िया फल फूल रहा है. नोटंबदी का कोई असर नहीं हुआ.
एक बार फिर मेरा सवाल है, कि नोटबंदी का फायदा हुआ क्या. इस महायज्ञ के लिए उस वक्त पीएम ने जनता से कितनी कुर्बानियां मांगी थी. अब आप तय करिए कि देश के लिए महायज्ञ बताए गए नोटबंदी से आपको और देश को क्या फायदा हुआ. 5 साल हो गए हैं, एक फैसले को समझने के लिए पर्याप्त टाइम है. नोटबंदी के बाद देश की अर्थव्यवस्था ने जो नुकसान झेला, उसके लिए दुनिया में पर्याप्त रिसर्च हुई हैं. नुकसान के आंकड़ें मौजूद हैं. और अगर कोई फायदा हुआ है तो सरकार को सामने आकर देश को बताना चाहिए कि क्या और कितना फायदा हुआ है.
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