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यहां मुसलमानों के बिना सिर पर पगड़ी नहीं रखते हिंदू

ये उस इलाके की कहानी है, जहां अख़लाक़ की मौत के बाद 'असहिष्णुता' का जुमला उछला था.

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फोटो - thelallantop
दादरी में घोड़ी बछेड़ा गांव, तिल बेगमपुर से करीब छह किलोमीटर की दूरी पर है. इन दोनों गांवों का जो इतिहास बताया जाता है, भले शुरू में भयानक रहा हो. लेकिन आज बेहद खूबसूरत है. मिसाल है. हैरान कर देने वाला है. इन दोनों गांवों से सबक लेना चाहिए कि अगर हम भूतकाल को ही याद करके दुश्मनी पाले रहें तो वर्तमान भी बिगड़ जाए. लेकिन ये दोनों गांव अपने पूर्वजों की प्रतिज्ञा को निभाते हुए आ रहे हैं. घोड़ी बछेड़ा गांव में हिंदू सबसे पहले मुस्लिम से अपने सिर पर पगड़ी रखवाते हैं. और इसके पीछे एक लंबी कहानी है.
घोड़ी बछेड़ा और तिल बेगमपुर गांव के रिश्तों पर पंकज पाराशर ने डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है.
घोड़ी बछेड़ा और तिल बेगमपुर गांव के रिश्तों पर पंकज पाराशर ने डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है.

दादरी का बिसाहड़ा गांव. यहां 28 सितंबर 2015 की रात मनहूस बन गई. क्योंकि लाउडस्पीकर से ऐलान हुआ. और फिर गौरक्षा के नाम पर भीड़ जुटी. भीड़ की अदालत में सुनवाई नहीं होती. जिस तरह गुस्सा अक्ल को खा जाता है, वैसे ही भीड़ सही गलत के भेद को खा जाती है. एक शोर होता है. वही शोर उस भीड़ का सच होता है. शोर हुआ. 'अखलाक के फ्रिज में गाय का मीट है...!' और फिर इस भीड़ ने अखलाक को घर से निकालकर इतना मारा कि उनकी तो मौत हो गई. बेटा ज़ख़्मी हो गया. जो घर बकरीद पर ख़ुशियों से लबरेज़ था, वहां अब मातम था. इस मातम ने देश की एकता को हिला दिया. असहिष्णुता की आवाजें उठने लगी थीं. इनटोलरेंस के खिलाफ अवॉर्ड वापस किए गए. सोशल मीडिया दो धड़ों में बंटा नज़र आया. लगा था दादरी में नफरत की फसल तैयार हो गई है. हो सकता है नफरत की बात में सच हो. लेकिन ये सच की पूरी तस्वीर नहीं है. एक सच ये भी है कि बिसाहड़ा के पास के दो गांव ऐसे हैं, जिनमें बड़े भाई और छोटे भाई जैसा प्यार है. हिंदुओ के पगड़ी बिना मुसलमानों के नहीं बंधती. मुसलमान आते हैं और हिंदू भाई के पगड़ी बांधते हैं.
बिसाहड़ा के पास के गांवों की ये वो तस्वीर है, जिसको सामने मजबूती से रखा जाना चाहिए था, ताकि नफरतों की आंधी थम सके. घोड़ी बछेड़ा और तिल बेगमपुर, बिसाहड़ा से 15-20 किलोमीटर के आसपास ही हैं. अखलाक की मौत के बाद ऐसा लगा जैसे यहां हिन्दू और मुसलमान साथ नहीं रह सकते. लेकिन तस्वीर बिल्कुल जुदा है.
इस जुदा तस्वीर को अखलाक हत्याकांड पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'द ब्रदरहुड' में दिखाया गया है. इस फिल्म को पंकज पाराशर ने ग्रेटर नोएडा प्रेस क्लब की मदद से बनाया है. जिसके को-डायरेक्टर हेमंत राजौरा हैं. दोनों ही जर्नलिस्ट हैं. पंकज कहते हैं, 'घोड़ी बछेड़ा हिन्दू ठाकुरों का गांव है और तिल बेगमपुर में मुस्लिम ठाकुर हैं. लेकिन घोड़ी बछेड़ा गांव, तिल बेगमपुर गांव को अपना बड़ा भाई मानता है. इसके पीछे कई ऐतिहासिक घटनाएं हैं.'

ये बताया जाता है इतिहास

'द ब्रदरहुड' के को-डायरेक्टर हेमंत राजौरा कहते हैं कि इन दोनों गांवों का इतिहास खंगालने के लिए जैसलमेर की विजिट की. जैसलमेर का राजघराना अभी मौजूद है. राजपूतों का इतिहास (बीकानेर साहित्य संस्थान), जैसलमेर का इतिहास (डॉ रघुवीर सिंह भाटी), बुलंदशहर गेजेटियर्स, बॉम्बे गेजेटियर्स 1901, गुर्जरों का इतिहास (डॉ दयाराम वर्मा) और हुमायूंनामा से जानकारियां जुटाईं.
इन दोनों गांवों के बारे में बताया गया कि साल 1713 में दिल्ली की सत्ता मुगल बादशाह फर्रूखसियार के हाथों में आ गई थी. उन दिनों घोड़ी बछेड़ा में रावल संपूर्ण सिंह जमींदार थे. तभी एक बड़ी घटना हुई. किसी वजह से रावल संपूर्ण सिंह पर फर्रूखसियार क्रोधित हो गए. उनकी सेना ने कासना और घोड़ी बछेड़ा को तहस-नहस कर दिया. हालात बहुत ज्यादा बिगड़े तो रावल संपूर्ण सिंह ने फर्रूखसियार के पास माफीनामा भेजा. माफी की एवज में फर्रूखसियार ने संपूर्ण सिंह के सामने इस्लाम कबूल करने की शर्त रख दी.
इस बुरे वक़्त में सम्पूर्ण सिंह के बड़े बेटे रावल फतेह सिंह सामने आए. उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया. रावल फ़तेह सिंह से वो फ़तेह खान बन गए. कहा जाता है कि उन्होंने ऐसा फांसी से बचने के लिए ऐसा किया. और अपने छोटे भाइयों के लिए माफी हासिल कर ली. उनके चार भाई थे बलवीर सिंह, धीर सिंह, नायब सिंह और राज सिंह. यह घटना उस वक़्त क्रूर थी. मगर आगे चलकर ये ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हुई.
फ़तेह खान की संतानों के रूप में आगे चलकर मुसलमान भाटी बन गए. फ़तेह खान को चार गांव मिले. बेहरा मंडपा. कामरा, तिल बेगमपुर और अंधियार. ये चारों मुसलमानों के गांव हैं. इनके अलावा एक और गांव, दौला गांव मिला. आज इन सभी गांवों में भाटी मुस्लिम हैं.
फतेह खान के बाकी चार छोटे भाइयों के वंशज हिन्दू रहे, लेकिन वे खुद को फतेह खान का अहसानमंद मानते हैं. तब उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि वो एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल रहेंगे. ये ही वजह है कि आज भी तिल बेगमपुर के लोगों को भटनेर में सबसे बड़ा मानकर सम्मान दिया जाता है. भटनेर वो इलाका जहां पर भाटी हिंदू रहते हैं.

क्या कहते हैं खुद को वंशज बताने वाले

फ़तेह खान के वंशज पीर बख्श खान भाटी ने 1857 के गदर में हिस्सा लिया था. तिल बेगमपुर में रहने वाले नसीम खान भाटी कहते हैं कि वो पीर बख्श के वंशज हैं. नसीम खान का कहना है, 'तिल बेगमपुर गांव हमारे पूर्वजों के सबसे बड़े भाई ने बसाया था. इस कारण भटनेर के सारे गांव हमें बड़ा भाई मानते हैं. हम अब इस्लाम धर्म के मानने वाले जरूर हैं, लेकिन हमारी संस्कृति तो हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति है. बिसाहड़ा जैसी घटनाएं परेशान तो करती हैं, लेकिन हमारे रिश्तों के बीच नहीं आ सकती हैं.'
'द ब्रदरहुड'फिल्म के एक सीन में रामदेव रावल और नसीम खान.
'द ब्रदरहुड'फिल्म के एक सीन में रामदेव रावल और नसीम खान.

घोड़ी बछेड़ा गांव में रहने वाले रामदेव रावल खुद को फ़तेह सिंह के छोटे भाई बलवीर सिंह का वंशज बताते हैं. वो कहते हैं,
'जब गांव में किसी के कोई गमी हो जाती है. मतलब जब बुज़ुर्ग की मौत होती है तो बेटे के पगड़ी बांधने की रस्म होती है. ये रस्म तब तक नहीं होती, जब तक तिल बेगमपुर से आकर हमारे मुस्लिम भाई सबसे पहले पगड़ी नहीं बांध देते. और जब बच्चों की शादियां होती हैं. तो शगुन का सिक्का मुस्लिम भाई ही लेते हैं.'
नसीम खान कहते हैं, 'हम सब एक दूसरे के हर सुख दुःख में शामिल रहते हैं. हम उसी प्रतिज्ञा को निभा रहे हैं जो हमारे पूर्वजों ने की. और ऐसा करने में हमें ख़ुशी मिलती है.'
फिल्म में हिंदू मुस्लिम रिश्तों को मज़बूत करने की एक अच्छी कोशिश की गई है.
फिल्म में हिंदू मुस्लिम रिश्तों को मज़बूत करने की एक अच्छी कोशिश की गई है.

समाज सेवी और जनता इंटर कॉलेज तिलपता के प्रबंधक बलवीर सिंह आर्य का कहना है कि बिसाहड़ा कांड ने हमारे इलाके की बदनामी की है. मीडिया और नेताओं ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया जैसे यहां हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हैं. जब दोनों समुदाय एक साथ रहते हैं तो प्यार और तकरार भी तो आपस में करेंगे. इस इलाके में हिन्दू और मसलमान कैसे मिलकर रहते हैं, घोड़ी बछेड़ा और तिल बेगमपुर के रिश्तों को आकर देख लीजिए. बिसाहड़ा कांड के बाद हालात सुधारने के लिए हम लोगों को इन दोनों गांवों से बड़ी मदद मिली.'

यहां मस्जिद की नींव पुजारी ने रखी

बिसाहड़ा गांव के पास ही खेरली भाव गांव है. खेरली गांव में एक मस्जिद थी. लेकिन मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होने की वजह से बड़ी मस्जिद की ज़रूरत थी. गांव के मंदिर में पंडित ने तय किया कि गांव में नई मस्जिद की नींव रखी जाए. अप्रैल में शुभ मुहूर्त देखकर मस्जिद की नींव रख दी गई. पुजारी बाबा महेन्द्र गिरी ने वैदिक मंत्रोच्चारण किया. नींव खुदवाई गई. चावल और रोली से नाग देवता की पूजा की.
मस्जिद की नींव इसी साल अप्रैल में रखी गई.
मस्जिद की नींव इसी साल अप्रैल में रखी गई.

हिन्दू परम्परा के मुताबिक मुस्लिम लोगों के हाथों में कलावा बांधा गया. जहां से नफरत फैलने की ख़बरें आ रही हो, वहां ऐसी ख़बरें आपसी सौहार्द को जिंदा रखने की कोशिश करती नजर आती हैं. तो दिल को सुकून मिलता है. धर्म सबका अपना अपना है, क्या बाकी लोग भी इसी मेल मिलाप से नहीं रह सकते. मेल मिलाप के लिए ये भी ज़रूरी नहीं कि मंदिर मस्जिद की नींव रखी जाएं. महज़ इतना किया जाए कि किसी की आस्था को बुरा न कहें. गलत को गलत कहें. इंसान को इंसान समझें.
खेरली गांव के मंदिर के महंत बाबा महेंद्र गिरी और मस्जिद के इमाम महिउद्दीन.
खेरली गांव के मंदिर के महंत बाबा महेंद्र गिरी और मस्जिद के इमाम महिउद्दीन.

द ब्रदरहुड फिल्म बनाने वाले पंकज का कहना है कि इन्हीं रिश्तों को सहेजने के लिए ये फिल्म बनाई है. करीब 24 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में ग्रेटर नोएडा, दादरी, जैसलमेर, सोमनाथ और ऋषिकेश से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को दिखाया गया है.
देखिए द ब्रदरहुड का ट्रेलर
https://www.youtube.com/watch?v=b8HxpegxyCY

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