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कोरोना का पीक बीतने के बाद भी स्पेशल ट्रेनों में खाना, चादर, कम्बल क्यों नहीं दे रही है रेलवे?

यात्री हचककर आ गए, फिर भी रेलवे स्पेशल ट्रेन क्यों नहीं बंद कर रही?

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मोदी जी ने आपदा में अवसर की बात देश की आत्मनिर्भरता के परिप्रेक्ष्य में कही थी, लेकिन भारतीय रेलवे आपदा के वक़्त शुरू हुई महंगी स्पेशल ट्रेनें अबतक चला रहा है. ( फ़ोटो सोर्स- आज तक)
कोरोना महामारी के दौरान जब लॉकडाउन और ट्रांसपोर्ट में ढिलाई शुरू हुई तो सबसे राहत की ख़बर ये थी कि रेलवे ने भी स्पेशल ट्रेनें शुरू कर दी थीं, जो लोग घर से दूर लॉकडाउन में फंसे थे उनके लिए इन स्पेशल ट्रेनों का बढ़ा हुआ किराया कोई मुद्दा नहीं था, बल्कि दूसरे शहरों में मजदूरी करने वाले भी राहत महसूस कर रहे थे कि अब कम से कम पैदल नहीं चलना होगा.
लेकिन हैरत इस बात की है कि अब कोरोना नियंत्रण में है, सभी सरकारी विभाग और इंडस्ट्रीज़ का काम वापस अपने ट्रैक पर आ गया है, इसबार दिवाली के सीज़न में बाज़ारों की रौनक भी कोरोना के पहले जैसी ही रही है, लेकिन रेल मंत्रालय की तरफ़ से लगातार कोरोना के दौरान वाली स्पेशल ट्रेनें आज भी चलाई जा रही हैं, कई ट्रेनों का तो अगले साल मार्च तक का शेड्यूल बना हुआ है. किराया अभी भी बढ़ा हुआ चल रहा है. तत्काल वाली जनरल टिकट और MST की सुविधा शुरू नहीं की गई है, रेलवे की तरफ से यात्रियों को मिलने वाली फैसिलिटीज़ की स्थिति भी वैसी ही बनी हुई है. ऐसे में क्या स्पेशल ट्रेनों के जरिए रेलवे सिर्फ अपना घाटा कम करने की कोशिश कर रहा है? सब कुछ विस्तार से जानते हैं.

पार्ट वन: आपदा में उगाही

जब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा था, उस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ‘देश के नाम संबोधन’ देकर लोगों को कोरोना से लड़ने के टिप्स दे रहे थे, 14 अप्रैल, 2020 से शुरू होकर पिछले महीने 22 अक्टूबर, 2021 तक 10 मर्तबा PM के ये संबोधन हुए. इन्हीं में से पांचवें संबोधन का एक हिस्सा था ये. मोदी की अपील ‘आपदा में अवसर’ तलाशने की थी. लेकिन शायद रेलवे ने इसे आपदा में उगाही समझ लिया जो अभी तक जारी है.
देश के नाम संबोधन देते प्रधानमंत्री मोदी (फोटो - पीएमओ इंडिया) देश के नाम संबोधन देते प्रधानमंत्री मोदी (फोटो - पीएमओ इंडिया)
# रेल की सवारी, हाले-इंतेजारी बीते 8 नवंबर को इकॉनमिक टाइम्स में छपी एक ख़बर के मुताबिक
पिछले वित्तीय वर्ष में कोरोना के चलते ट्रेन से सफ़र करने वालों की तादात बहुत कम थी. एक RTI के जवाब में जो आंकड़ा आया है. बात ये भी है कि इस साल 52 लाख से ज्यादा लोग ऐसे थे जो रेलवे में सीट रिजर्वेशन की वेटिंग लिस्ट में थे लेकिन सफ़र नहीं कर सके. यानी सीट नहीं मिली. माने साफ़ है कि और ट्रेनें चलाए जाने की ज़रूरत थी. 2021-2022 यानी चालू फाइनेंशियल इयर में सितम्बर तक 32 लाख से ज्यादा PNR यानी पैसेंजर नेम रिकार्ड्स ऑटो-कैंसिल हो गए, इसी तरह 1 अप्रैल,से 1 जून के बीच भी क़रीब 13 लाख लोग ट्रेन का सफ़र नहीं कर पाए. वजह वही, वेटिंग लिस्ट. मतलब भीड़ हचककर चालू है. # दिक्कतों के बावजूद कोरोना के दौरान यात्रियों की संख्या बढ़ी ट्रेन में सीट न मिल पाने का आम सवारियों का दर्द काफ़ी पुराना है. कोरोना से पहले भी लाखों सवारियों को ये दिक्कत हर साल झेलनी होती थी. लेकिन ये दिक्कत तब और बढ़ गयी जब कोरोना के दौरान घर जाने वाले लोगों की भीड़ रेलवे स्टेशनों पर जुलूस की शक्ल में उमड़ रही थी. माने इस दौरान ट्रेन के सवारों की तादात बढ़ रही थी. आंकड़ों में इसकी तुलना करें तो अक्टूबर 2019 में जब रेगुलर ट्रेनें चल रहीं थीं तब करीब 4.5 करोड़ लोगों ने ट्रेन से सफ़र किया था, और इस साल सितम्बर में ये आंकड़ा लगभग 7 करोड़ हो गया. यानी इस साल ये नंबर बढ़ा है.
जनवरी 2021 में जब ट्रैवेल रेस्ट्रिक्शंस कम किये गए थे, तब पूरे देश में ट्रेन से यात्रा करने वाले लोगों की तादात 5 करोड़ से ज्यादा थी. और ये यात्राएं स्पेशल ट्रेनों से हो रही थीं, गौरतलब बात ये भी है कि ये तादात जनवरी 2019 में जब ट्रेनें रेगुलर सर्विस दे रही थीं, तब के यात्रियों की तादात से भी कहीं ज्यादा थी. यानी दो साल पहले की तुलना में यात्रियों की संख्या 2021 में कहीं ज्यादा रही.
माने कुल-मिलाके आंकड़ों से ये साफ़ है कि स्पेशल ट्रेनें जिनका किराया आम ट्रेनों की तुलना में ज्यादा है, उनमें सवारियों ने ज्यादा पैसे दिए और ये भी साफ़ है कि ये सवारियां भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा रहीं. मतलब प्रॉफ़िटेबिल्टी के लिहाज़ से कहें तो, 'आइसिंग ऑन दी केक.' # कोरोना के दौरान चलने वाली स्पेशल ट्रेनों का हाल ड्यूरिंग कोरोना रेलवे की स्पेशल ट्रेनों ने किराया तो ज्यादा लिया लेकिन फैसिलिटीज़ के नाम पर व्यवस्थाएं ठप रहीं. पिछले साल जब कोविड स्पेशल ट्रेनें शुरू की गईं, तब रेलवे ने एसी कोच के पैसेंजर्स को कंबल, तकिया. हैण्ड टॉवल और सीट पर बिछाने वाली चादरें देना बंद कर दिया था, अब अगर किसी सवारी को ये सब चाहिए होता तो उसे रेलवे स्टेशन पर वेंडर्स से ये सब खरीदना होता था. वरना ख़ुद का लेकर जाओ. खाने पीने की बात करें तो पैंट्री में खाना बनाने का काम बंद था, पैंट्री को सिर्फ इतनी परमीशन थी कि पानी, चाय-कॉफ़ी वगैरह के लिए पानी गर्म किया जा सके. और कुछ रेडी टू ईट फ़ूड ही मिल सकते थे, वो भी पेमेंट के बाद. प्री-आर्डर जैसा कुछ नहीं था, बस कुछ लोकल वेंडर्स बोगी में चाय-कॉफ़ी बेचने आ जाते थे.
# किराया और टिकट बुकिंग- किराए बढ़े हुए थे ही, जनरल टिकट की सुविधा भी बंद कर दी गयी थी, MST कार्ड अमान्य हो गया था और अनरिज़र्व्ड टिकटिंग सिस्टम यानी यूटीएस की सरकारी ऐप से टिकट ख़रीद पाना जंग जीतने जैसा था. प्लेटफॉर्म्स पर टिकट विंडो भी बंद थे, अन्य ऑनलाइन माध्यमों यहां तक कि ब्रोकर्स से भी टिकट की परचेजिंग कर पाना बहुत टेढ़ी खीर थी.
ये तो नितांत क्राइसिस का समय था. लेकिन हमारी जिज्ञासा ये है कि आज स्पेशल ट्रेनों का औचित्य क्या है? रेगुलर ट्रेन सर्विस वापस कब रिज्यूम होगी? कोरोना के दौरान जो हुआ सो हुआ, वही दिक्कतें आज भी जस की तस क्यों बनी हुई हैं? # स्पेशल ट्रेनें अभी भी क्यों चल रहीं हैं ट्विटर पर किसी भी रेलवे जोन का हैंडल खोल लीजिए, स्पेशल ट्रेनों की जानकारी देने वाले ट्वीट मिल जाएंगे. इनमें ट्रेन कहां से कहां जा रही है से लेके बीच के स्टेशनों की भी लम्बी लिस्ट भी विद टाइमिंग डाली हुई है. माने ट्रेनें अभी भी स्पेशल बताकर चलाई जा रही हैं. स्पेशल बताकर मतलब ऐसे समझिए कि, मान लीजिए कोरोना के पहले किसी ट्रेन का नंबर 24952 था तो उसके आगे शून्य जोड़कर उसे स्पेशल ट्रेन बना दिया गया था, यही शुरू में शून्य नंबर वाली ट्रेनें अभी भी चलाई जा रही हैं. आपदा में अवसर वाला सवाल इसलिए खड़ा होता है क्योंकि ट्रेनों के किराए अभी भी बढे हुए हैं, दूसरा कि अभी भी ज्यादातर टिकट काउंटर्स से टिकट नहीं मिल पा रहे हैं. टिकट लेना है तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स जैसे, 'IRCTC'  'मेक माय ट्रिप', 'यात्रा' वगैरह पे जाइए या सरकारी ऐप UTS पर क़रीब 10 से 15 फ़ीसद एक्स्ट्रा चार्ज दीजिए, उसके बाद टिकट की बुकिंग होगी. # सुविधाएं भी जस की तस हालांकि रेलवे ने इस साल जनवरी में अपनी ई-कैटरिंग सर्विस-‘रेल रेस्ट्रो’ फिर से शुरू कर दी है. इस सर्विस में होता ये है कि आप ऑर्डर करके अपने सफ़र के बीच आने वाले स्टेशंस पर खाना रिसीव कर सकते हैं. इसे आप फ़ूड डिलीवरी सर्विस की तरह ही समझिए.इसके लिए IRCTC ने अपने साथ कई फ़ूड कंपनीज़ को जोड़ा है. जैसे MTR, ITC, DUNCAN, बाघ बकरी, RK कैटरर, हल्दीराम वगैरह. ऐसे में ‘रेडी टू ईट’ फ़ूड ही ज्यादातर अवेलेबल है.
पैंट्री अभी भी खाना पकाने का काम नहीं कर रही हैं, ख़बर तो ये भी है कि रेलवे कई ट्रेनों से पैंट्री हटाने की योजना बना रहा है, इन ट्रेनों में पैंट्री की जगह पर एसी कोच बढ़ा दिए जाएंगे, ताकि रेलवे की कमाई बढ़ाई जा सके. अब एसी कोच भले ही बढ़ा लें, यात्रियों को एसी कोच में जिन चीज़ों की ज़रूरत सबसे ज्यादा होती है वही नदारद हैं. ठंड में आपको कंबल चाहिए तो जेब ढीली करनी पड़ेगी और रेलवे की तरफ़ से लगाए गए स्टाल से कंबल वगैरह खरीदना होगा. ये सारा सामान तीन केटेगरी में खरीदने के विकल्प रखे गए हैं.
अगर आप 300 रूपए दे सकते हैं तो आपको डिस्पोज़ेबल कंबल, बेडशीट, तकिए का कवर, बैग, टूथपेस्ट, हेयरआयल, कंघी, सैनिटाइजर वगैरह मिलेगा, और अगर 150 वाली किट खरीदते हैं तो केवल कंबल मिलेगा. वहीं तीसरी किट 30 रुपये की है, जिसमें टूथपेस्ट, ब्रश, हेयर ऑयल, कंघी, सैनिटाइजर, पेपर-सोप और टिश्यू वगैरह होंगे..
होटल, रेस्टोरेंट खुल गए हैं, लेकिन रेलवे पहले जैसा खाना नहीं दे रहा है. खाना है तो खरीदिए. एसी कोच में ठंड से सिकुड़ना नहीं है तो रजाई-कंबल वगैरह घर से लेकर चलिए या रेलवे से खरीदिए, वो भी डिस्पोज़ल वाले.
डिस्पोजेबल ब्लैंकेट, ट्रैवेल किट (फोटो सोर्स -ANI, Railmitra) डिस्पोजेबल ब्लैंकेट, ट्रैवेल किट (फोटो सोर्स -ANI, Railmitra)
#त्योहारी सीजन में भी रेगुलर नहीं स्पेशल ट्रेनें ही मिलेंगीं- स्पेशल ट्रेनों की कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि कोरोना में शुरू की गईं और आगे भी चल रही हैं, मज़े की बात तो ये है कि त्योहारों के लिए भी स्पेशल ट्रेनें शुरू कर दी गई हैं. आज तक की एक ख़बर के मुताबिक़ सितंबर महीने से, यानी दिवाली वाले फेस्टिव सीज़न से पहले, 80 नई ट्रेनें शुरू कर दी गईं थीं. 10 सितंबर से इनके लिए रिज़र्वेशन भी शुरू कर दिया गया था. कौन-कौन सी ट्रेनें? मसलन दिल्ली से बनारस के लिए वन्दे भारत एक्सप्रेस. और इन स्पेशल ट्रेनों को शुरू करने का सिलसिला अगले साल तक थमने वाला भी नहीं है. नार्थ सेंट्रल रेलवे के ट्वीट में 31 मार्च तक स्पेशल नंबर वाली कई ट्रेनों का पूरा टाइम टेबल दिया हुआ है. ईस्टर्न रेलवे का ये ट्वीट भी देखिए- इन ट्रेनों की हर श्रेणी में किराया बढ़ाया हुआ है. और इस तरह कमाई कितनी हुई है? अगर पिछले बीस महीनों की बात की जाए तो रेलवे लगभग 20 करोड़ रूपए यात्रियों से कमा चुका है. ख़बर के मुताबिक जनरल डिब्बों में सफ़र करने वालों को भी मेल एक्सप्रेस का किराया देना पड़ रहा है.
दैनिक भास्कर ने इस बढ़ोत्तरी पर जब नॉर्थ-वेस्टर्न रेलवे के CPRO शशि किरण से बात की तो उनका कहना था कि-
ये किराये रेलवे बोर्ड के ही निर्देशानुसार लिए जा रहे हैं. इसके अलावा आम लोगों ने लेटर लिखकर रेलवे मंत्री से भी इस एक्स्ट्रा चार्ज के बोझ को लेकर गुहार लगाई है.

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